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ॐ;

तनककछगा र

निगमाननद

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पकाशक‌ :

सवामी जञानाननद सरसवती असम बगीय सारसवत मठ, पो° हालिसहर, (उ २४ परगणा)

पशचिम बग, ७४३१३४

दवितीय ससकरण-अकषय ततीया, १९८८

ततीय ससकरण-अकषय ततीया, २००५

© सरवसवतव सरकषित

मलय : छषयन रपय.

परािसथान :

(१) असम बदधीय सारसवत मठ,

पो० हालिसहर, उ २४ परगणा, पशचिम वङग, ७४२३१३४

(२) महश लादतररी, २/१, शयामाचरण द सरीट‌

` कलकतता-७३

(३) सरवोदय बक टल, हावडा सटशन,

पो जि०-हावडा

अकषर विनयास :

साधना परस

४५/१, एफ, वीडन सटरीट ` कलकाता-७०० ००६

क‌ क अव "= ककष क ' कः व ` ` छक च 5 । ९ वा अक कन» कवक कषकाककककवाककककक

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शरी १०८ सवामौ निगपाननद सरसषततौ परमहसदव

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ॐ> तत‌ सत‌

उतस पतर

मरौ गविी भा ! षरलोक सिघरारत समय तमन मजञ जन‌ जननीषी गोदम सौप दिया था! उसन अपनी मरञगलमय गोदभ

म किस यतन स पाला द, उसीका निददन सवरप यह पसतक तमहार गकानी चरणो र निवदन कर रहा ह ।

`मा! जगजजननी की गोदम बठकर मनजञ भात हमा कि तमहारी ` तरिमदधि ( कनया, जाया, माता } उनका ही भिनन-भिनन भावोका विकास सातर ह । वसततः बम अभिनन हो । मा,.इस बालकषकाभार अब शकत नही कना द, अब बालक ही तरी भारको समहारगा। म तक अपन हदयम बठाकर नयनो का पहरा लगाङगा । ह मर मनो-

-.-मयौ गौरि ! परकटित हो किम वगद दख सक । मरी साधना की साघ को-पण करो मा ! मर अनतर परकाित हो कि पराणस तह उपलबध कर. सः । द परभमयि ! मरी मनोमयी बालिकाकासपर ठकरभर

, ` दयाघन पर विराजो--इसय करो भौर म भातमहारा होकर, पागल . .: बनकर तमद दखता रह । मर दस ठठ क समकष बरहमपद भी मति

.तचछ ह । मा, सनल मरी पकार । ।

नकषण भर तो हदय म बठ, बिहस बोलो बात” आजो, आकरः मरा. उपहार गरहणकरो ।

. लमहारा वयारा सतान. ४ नङिनीकानत

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परमथकारका वकतवय

सषट‌वाऽखिल जगदिद सदसत‌सवरप शकतया सवया तरिगणया परिपाति विडवम‌ । सहतय कलपसमय रमत तथका - ता सरवविशवजननी मनसा समरामि ॥

जिनस यह‌ जगत‌ सषट हओआ द, . जिनको अवलमबन बना कर यह‌ भवसथित ह, तप क अनत म जिनम फिर यह जय होगा; बरहमा, विषण, महदवर भिनकौ आराधना करत ह, उसी विषयादविनिखया महामाया की कपा स उपलबध यह ^तानतरिकगरण सवसाधारण क

करोम परम भादर क साय अरपणकररहाह।

बङगार म तनतरशासतर काबडाही भरभावद। शाकत, शव, वषणव भादि सभी साकार क उपासक तनवशासतर क मनसार ही दीकषा गरहण करत ह । जप, पजा, योग मादि अधिकास ही तनवोकत मतानसरा अनषठित होत ह । कलियग म ततरोकत उपासना ही परशसत तथा शीघर फलदायक होता ह ।

कत रदकतमागः सयात‌ बताया समतिसभवः। दवापर. त पराणोकतः कलावागमसममतः ॥

सतययग म वदोकत, तरतायग म समतयकत, दवापर म पराणोकत तथाः करियग म तनतरोकत विधि क अनसार करियाय समपनन कौ जाती ह । अतएव कलियग म तनतरमाग क- अतिरिकत अनयानय माग परसत नही होत । समभवतः इसी शासतर वचन को मवलमबन बना कर ईस दशम

तनतर का परभाव फला गौर तनतरशासतर क मतानसार ही सनधयाहभिक. तपः, जप, पजा का अनषठान जाज भी होता ह किनतबडदी दःख का विषय ह कि तनववासतर का इतना पराधानय रहन पर भी माजकलः

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{ ख | हमार यहा तनधजञ गर कदाचित मिलत ह 1. कवर मातर पाणडितय या बदधिक दवारा तनतर समकष या समघलान की कषमता नही होती । वसततः गर क सवमख स यदि कोर तनतरशचाघर का उपदशनसनतो उसका यथारथ अथ या मम को गरहण .करना असमभव साह। यही कारण ह कि इस परकारक परतयकष फलपरद शासवरपदधतिक अनसार दीकषा गरहण या करिया-कलापका अनषठान करन परभीरहम फल की

भराति नही होती कयोकि सचच ततरजञ गरक अभाव म यया रीति करिया-

कलाप का अनषठान समभव नही । फलतः शसतरगररयो स लोपौ का विदवार घटता जाता ह। दश की इस ददशा को दखकर मर कछ परिचित शिकषित साधनापिपास सजजनो न .मञ “जानी गर” तथा “योगौ गर” की तरह तनत शासवरक समबनध भी एक पसतक लिखन

का अनरोध किया। उनही क उतसाह स उतसाहित होकर इस गरनथ को परकाशित करन का साहस भिला। ओ करहा तक सफल हो सका

ह, उसका विचार सधी साधक दही करग।

हमार दकम कई परकार क तनतरशासतर परषलित ह । किनत मन

किसी निदिषट गरनथ का अनसरण नही किया ह ) जिन करिया-ककापो क माघयम स मनषय को माधयातमिक उननति होती ह भौर गरत मजञ ` नो कछ मिलाषशः उसीका कछ अश साधारण लोगो क निमितत

परकाशित कर रहाह। जो सबक करन योगय तया सहजसाधय ह; उनद गकतिक साथ यहा लिलता गया ह । तनतरासतर मारय-छषियो की ` अलौकिक मषटि ह। उनद समादित चिततस पठन पर विसमित तया सतममित दोना षडतादह। जञानी हो या अजञानी- सबकी समसयाओ काहल ततरमः मिलता ह । ततर साधनाशासत ह । उस हम परधानतः

दो हिससो म वाट . सकत ह-परडतति कौ साधना भौर निदतति की साधना 1 परडतति मागम रोग, गरहशानति, बाजीकरण, रसायन, दइनय-

जण, षटकम, ( भारण, सतमभनः सममोहन, उचचाटन, वकषीकरण तथा

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[ ग ]

आकरषण ) क अतिरिकत दव, दानव, भत, भरत, पिशाच आदिक

-साघना परणाली विनत हय ह । म यह नही बाहा कि असयतचितत

-अविदयाविमोहित मानव-समाजम अवियक साधनो को वयकतकर साधकक सलाहट का हत वन । निशतति राग को साधना-परणाली .. मर परतिपाद विषय रहरह। वह जियावान‌ साधक जो परतिदिन

नियमानसार चल, कवल वही निबरतति माग का अधिकारी दह । आज भी सपराजम नितयनमिततिक करियारय परचकतित ह भतः उनह यहा लिखकर भ इस पसतकक कङवरफो बढाना नही चाहता । यहा न . कवल साधना-पदधति मनतरोकोदही परकारित कियाह। आशादटकि शर थम लिखी गयी साधना परणाकयो क माधयमस साधना करन पर साधक करमशः आतमजञान को काभ कर मानवजीवनक परणतयको परस कर सकमा ।

साधारण रोगो की अवगतिक लियि गहसथो क नितयपरयोजनीय - रातवयो क निमितत रवततियाय कौ दो-चार साधना-परणालिया षरि-

विषटभददी गरईरह। म वाहना ह कि आप साधनाक दवारा घासव- . - वाकयकी सतयताको उपरनधि कर ।

इस पसतकको तीन भागोम बाटागयादह। पहर भागव तव

तथा ततोकत साघनादि की यकति, दवितीय भागम साघना-अरभाली : सथा परिशिषट साधारण. मनषयक सख तथा सवासथयकरौ उननतिक `

उपायो का वणन मिलगा । अतिपोख विषयो कौ सतयता क परमाण सवरप मन तनवरकषासतर तथा पराणशासवो कौ यकतयो को उदधत किया ह । यथासमभव सहज तथा परचलित सरल भाषा म मन लिखन का परयतन किया दह। भव गणगराही साघकवरग ही विवचन करग कि म कहातकसफलहोसकाह)

अनतम म यह सबषटरपत कहता' हः कि माधयातमिक ततवो को हदयगम करन क लम विधिवद चिततदयदधि की अतयनत मावरयकतरा ह ॥

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[ ध | भगवान‌ की कपा बिना साधनततवोको हदयगम करन का दसरा कोई पथ नही । साधना-पिपास वयाततिः यदि मरी वरणादधिरया, भाषादोष भादि कष‌ दर विषयो की मालोचनाम वथा समय न बीता कर सवकाय भ वरती हो सक तो भ मपना.परिशषम सायक समकघगा । साधक यदिः किसी विषय को समकष नकषकहो पोमर निकट भान परम उनह सादर यतनक साथ समकषान या साधनततव फी शिकष। दन म कोरदतरटि मही रखगा ।# भौर मधिक कया लिक ?

ढाका, शानति-भाशरम ` +` भकतपदारविनदभिकष‌ ३५ वा शरावण, शलन‌ (राखी) पणिमा | दीन--निगमाननदः

¶१३१८-बगाबद

भवजयपाद भरनयकार मत १२३४२ सार भ महासमाधि लिय द । -परकादाकः

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सचो-पन "विषय

छनवरदासव तनवोकत साधना म-कार ततव परथम तसव अनयानय ततव पचम तततव

सप आचार -भावतय तनव का बरहमवाद कशकति-उपासना -दवमति का तततव

साधनाकाकरम दवितीय अदा-साधनाकलप

गरकरण भौर दीकषापदधति । शाकताभिषक परणाभिषक ।

नितय, नमिततिक भौर कामयक -अनतरयाग अथवा भानसिक-यजा भाका-निरणय भौर जप का कौदाल सथान-िणय भौर जप का नियम .

जप~रहसय भौर समपग-विधि मतराय गौर मतरचतनय योनिमदरा स जप अजपा जप की परणारी

ईमशन भौर बिता-साघना ` नशावनसाघना

परयम अश--यकतिकलप ` पषठ

१०

१६

` २३ २७.

३१ ३५

३९

५१

६३ ६७

७३ ८६

८७

९४

९९

१०९ ११६

१२३ १२९

१३५ १४४ ..

१४८ १५४

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[च | विषय

शिवाभोग ओर करचार कथन पछ मकार स कालीसाधना ततरोकत षकरानषठान

मतरसिदधि का लकषण ततर की बरहमसाधना

ततरोकत योग ओर मकति परिशिषट

विशष नियम । योगिनी-साधना हनम व की वीर-साधना सवजता लाभ

दिवयदषटि लाभ अदशय होन का उपाय पादका साघना । गनावषटि हरण अगनिनिवारण |,

सप-बरिचिकादि का विषहरण शलरोग करा परतिकार सखभरसव-मतर

मतवतसा दोष शानति बनधया अर काकबनधया परतिकार बवालक-ससकार

जवरादि सब रोरगोकी शानति : . माषडदधार

कतिपय सतर शो आशचय छिया ` उषसहार

पऽट‌

१६५ १७६ १९६ २०७ २०९ २२०

२२७

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२३७

२३८

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२४२ २४४

२४६

२४७.

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चानतरिकगर छएवरथयसन अचछा ययकिचछटपन

तनतरशासतर

आजकल अधिकाश नवशिकषित तनतरशासट को वयवसायी-गभो क

दवारा रचित अरथोपाजन क साधन-सवरप कतपितशासतर कटकरर, उसम शरदधा नही रखत. फलसवरप उस शासतर को कालकरम क अनरप

यवसायोपयोगी करन क किए मलरप म अनक परकार क परकषिपत, रपक ओर अरथवादादिक योगस जो वषटा की गई ह,.उस उस शासर क आधनिक मदरित गरनथो को दखन स बहत ही सरतास जानाना सकता ह । सषट पदाथ, दरन म सरषटा अरथात‌ ईदवर-परतिपादन भौर उनकी उपासना ही वदक विषयरह। जब समयकी गतिक साथः दिनदरजाति की बदधि-परखरता का उतकष साधन होन रगा, तबः परमाथ विषय म मन क अगरसर होन पर बदधिक सहयोग स काल-

करम स उपनिषद‌, दशन भौर तनतर शासतरादि परकारित हए ह । तनवर - कोई सवतनतर नही ह; वह‌ वद का रपानतर ह - विशषतः सासप-दशन

मौर उपनिषद‌ का सार । उसम मकति -का रहज उपाय निरधारित

ओर विचारित ह ह। वतमान समय म वाक‌-सवसवता ओर करिया-शनयता-दोष स भारतीय-समाज म तनतर ासतर की जिस परकार घोर ददशा उपसथित हद ह, उसस. तनतर का नाम सन कर ही बहत स णोग उपहास करभ--ईइसम बचिशय कया ? . फलतः जिस परकार दचछानकल परतति-परलोभिनी कलपितवयवसथा तनतर-क भीतर अनत. निविषट करन कौ वषटा फी जाती ह, उसस कछ लोगो का . उपहास करना भी नितानत असगत नही का जा सकता । मसटमान-राजतव- . काल म हिनदगो का फो भी गरनथ निरदोषावसथा म नही था; एस

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२] तानतरिकगर [ तनतशासतर

समयमभी तनवरकी दरदशा हद द। एक ओर मसलमानो का - अतयाचार दरसरी भोर दहिनद-समाज क सदगरगो कौ विरलतानश

शिकाविभराट स उतानन सवचछाचारिता सत परकषि विषयादि स परि- पण होकर परकत तनतरशासतर अनक सथलो पर इस परकार विकत होकर पडा ह कि उसम स अविकत ततव का मनसनधान करना अलपाधि- कारी क लिए असमभव ह। वद ओौर सदाचार-विरोधी कितन ही तनतगरनथो की नवीन रचनाए परसतत हद ह । किनत उस ` कारण स साधारण लोगो क भरम म पडन पर भी तनतर ततवजञ उनह पहचान विना नही रह सकत । अनक आधनिक विजञ वयकति कहत ह कि एकवार परदतति मारग पर मन क चक जान पर उस फिर सहसा. निदतति माग पर लाना बहत कठिन ह । अकसमात‌ किसी परकार निदति कौ उपरनधि करन पर भी वह मपरिपकव सिदधि सथिर नही रहती; इसलिए अतयनत कौशलपवक भोग क मधय स सनमारग पर मन को परवततकरम क ङएि ततका नाना परकार की वद विरदध वयवसथा विधिविदित समपनन की जाती ह । उसकी इस भाति गयाखया भी परायः भलयहीन परतीत होती ह । सतव, रज, तम-तरिगणभद स उपासना क भरधिकार मौर परकारभद की वयवसथा वद मभी द; इसलिए महायोगलीलावतार महादव-परणीत भल तनतरशासतर म वह‌ ततव छोडा नही गया ह, नही समकषन स जो शासतर-निनदा होती ह वह‌ कवल भरवाचीनता ह । उस सथिति म आधनिक कतिपय तनतर क अनक सथलो पर महादव गौर पारवती क कथोपकथन क परसगो की अवतारणा करक अनक विकट, विहत भौर तचछ विधि-विधान धरमशासतर क अनतगत करन की चषटा की गई परतीत होती दह। फिर अविकत शिववाकय तनवर म भी सामपरतिक दषटिस इस भाति अनक अशवाभाविक, मदभत मौर वीभतस विषो का वणन हमा ह कि उसका मम-रहसय मद‌, रचिरोग-गरसत, सथलनीति-सरवसव अनक सथाधिकारियो क विचारस महादव भौर पावती का नाम भी

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यकतिकलप | तानवरकयड # [३

उनम थोडी-सी भी पवितरता का सपादन नही कर सकता । सारा. ` यह ह कि सफछ-साधना करियानवित सदगर की कपानककता क अभाव . भ बहत स वयकति तनतर-मयित नवनीत को न पहचान कर कवर महा पीकर विशयखला फला रह द ।

शरति-समति विरदधानि आगमादीनि यानि च। करारभरवनवापि यामलशवापि यत‌ कतम‌ । एवम‌ विधानिचानयानि मोहनारथानि तानि व ॥

-कमपराण

सभी लोगो को मोहाभिभत करन क लि९ शर. ति-समति विरद धम- शासतर को महादवदवारा रचित कहन का कारण कया था ? ताननिक- रहसय फी मरमगरनयि का भद इसी सथान पर ही करन षडगा

तनतरगासतर शी ` मलरभितति की आलोचनादवारा इसक परयोजन का परतिपादन करना ही रनयकारका लकषय दह।

परकत तनतरशासतर म वद-विरदध वयवसथा . बहत सपषटरप स ` निषिदध हदद। ।

दवीनानच यथा दरगा वरणानाम‌ बराहयणो यथा । तथा समसतासतराणाम तनतरशासतरमनततमम‌ ॥

सरवकामपरदम‌ पणय तनतर व वदसममतम‌ ॥ समपण तनतर शासर क विवचन करक दखन पर सपषटरप स

जाभासिस होगा कि उसकी मलभितति साखय ओर उपनिषद‌ पर ` सथित द । हिनदरसमाज म यगधरम क अनरप पवितर तनतशासव षय सातविक साधना फा रोप होकर उसकी राजसिक ओर. ताभसिक- साधना की पकरिया-भणारी ही परायः परचलति हद ह। ईसीकिए.

भधिकार-वतततबोध का मभाव ही तनरचासतर क अनादर का कारण ह । - वसततः तनतर को योगधम का भणडार कहना भी अतयकति..नही ह । . इसीशिए सायसिक मौर बाहिक पजा मौर पराणायाम परभति वयवसथा

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= च `क चम चकः चवि = सजय भव [नी

४1] । तानतरिकगर [ तनतरशासतर. ।

अतयनत सनदररण म सननिविषट हई ह । वद जिस परकार जञान ओर

कमकाणड इन दो भागो म विभकत ह। उसी परकार योगशासतर भी दो भागो म विभकत ह। तनतरोकत करियाकलाप ही करमकाणड दह)

तनत कौ उपासना-परणादी असयनत पवितर ह । इसम पराणायाम भौर साधना-पथ अति उतकषट शप म सननिविषट ह ।

योग गौर तननोकत उपासना-परणारी का उदभव एक उपकरण ~ सहीहभारह; इन सभी विषयो को पराणो म बहत सरलढगस

समङञाया गया ह । तनन परतिपाद साधना. को मलभितति महातम कपिल कत साखय ह । यह बात सतय र कि कपिचदवन वरतमान .

समय की तरह भति-उपातना-परणाली का उदभावन. नही कियाद;

किनत, उनहोन साखय म जिस परकति-परव क तततव का परकाश किया

ह तनम भ भौ उसी मर माधार पर दव-दवी की उपासना परणाली

विधि समपनन हई ह} कपि मनि का परपही अनत म हिनदर उपासना क नाना रपो म विकसित हमा ह । रचि गौर अधिकार

क अनसार नाना मतियो म उपासय हमा ह । परकति म ही भगवती दवी. का परथम आविरभाव ह--वही काली दवी ह । .

८ तसयाः विनिगतायानत कषणाभत‌ सापि पावती । काकतकिति समाखयाता हिमाचलकताशरया ॥ १ -माकणडयपराणः

. परकति क सतवाधिकय स परष क साननिधय म महततव भौर बदधितततव उतपनन होति ह; बदधितव स अहकार भौर इसी अहकार क भिनन-भिनन विकार स इनदरिय ओौर इनदरियोक विषय दोरनो की उतपति हई ह । परष ही चतनय शकति ह । सख-दःल आदि स शनय द। य अकरता ह, कोई काय नही करत ई-समसत विरव-वयापार परकति काही कायह। यह परकति ओर परष परसपर सापकषयरह। शोहा जि परकार चमबक क समीपसथ होन स उसी दिशाम जाताः

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यकतिकतप | तानतिकगर [५

“द, उसी परकार परति भी -परष-सननिधान-परकत विशव-रथना म दत रहती द । परकति का ही ताकषाव कठतव द, यही सासयदशन का अत ह, इसलिए पष दवी क करियाघारसप म पदतल म ह मौर ` उसी अभिनय म काछीदवी की मति महादव क ऊपर.ससथा- -पित द।

कपिल-परकारित परकतिपरष का ततव परिषकाररप स सरवा- धिकारी को विशषप स समहनन क किए पराण ओौर तनतरशासतर का

शरयोजन हभा ह । परकति-परष क साकाररप का तनर गौर पराणो

म वणन भा दह । सभी वदो स जिससपम सनधथोपासना भीर अनयानय वदिक कमो की पदधति समपनन हरदटउसौो रप म साखय दधन का अवरमबन करक तनगोकत उपासना की परणारी गयवसथापित हई ह । तनदरशासतर योग का सवसमपतसमपनन अति विशदध धरमशासतर ह । कपि ओर पतञजलिमनि न जिस योगानषठान क भावततव को समकषाया ह, वही करमजञानानषठान स परण तमशासतर ह । उपनिषद‌ म

उपासना क जो सब मत ह मौर रीतिरथा दिखाई दती ह थोडी अनय-

खपमहोन पर भी तनतरम भी परायः उसी रप म. वयवसथित ढग सो विधि-समपरन हई ह ! बीजमनतर गौर यनतर, उपनिषद. ओर यनत दोनो ही शासत म ह, हसकिए तशर कोई आधनिक कलपित शासर ह

इस परकार क किसी सिदधानत. की मानता का कोई कारण

नही ह । ।

वद ओर तनतरोकत उपासना-परणाली पर द षटिपात कर स सहजन

स ही आभासित होगा करि समयक परिवरतन स मनषय की चिनता-

' शीरता भौर बदधिदतति क साथ-साथ उसकी सचि मौर अधिकारम परिवतन हमा ह गौर मनियो मौर ऋषियो न भी समय-समय पर परिवरतन की वयवसथा की ह 1. वदोकत कम अतयनत कषटसाधय ह ।

। किती सभय मनषय की शारीरिक गौर. मानसिक दरबलता क आरमभ

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` ६] | क ताननिकग [ तनतरशासतर

त हो जान पर‌ पारलौकिक सख की अपकषा लौकिक सख हौ अधिक .“ . वाछनीय हो गमः. तव करमशः वद क कमकाणडोकत सभी कारय शिथिल

“. न छग, ततकाल ही सहज उपाय स ईदवर को आराधना क लिए ` ‡ , ` तनमखासमःकपयवहार क परति लोगो का अधिकतर अनराग हा ।

, णो वद भौर.तनयोतत पराणायाम स गवगतरद,व हीइन दोनो म , तकार बिना परयासक दी पारथकय कर लग ।

` ` इसी कषण यद परषटवय ह कि तनर वद की तरह दह, यह महाजन भौर छषिगणडारा समथित ह भयवा नदी 2 रघननदन का अडाइस तसव दख परदश म सव साधारण म परचलित ह भौर उसकी मीमासा वदवाकय क सदश भानयद। उस परनय म परमाण सथलो पर अनक तनत क वजन वयवहत हए द । इस परकार सथल विशष पर धष करतभय निदित हमा ह । भगवान‌ शकराचारय न सवरचित शभननद छहरी" सतोतर म तनतर क परति बहत सममान परदित किया हि भौर 'शाकतामोद' परभति कई तनर-सगरह का सकलन भी परसतत किया द । धणरजञदरशन क . भाषयकार आननदतीरथ न. भी जपन भाषय म तनतर क परमाणो को उदधत किया ह । य समात भटा- चाय (रघननदन), भगवान‌ शकराचारय, आननदती परभति न जिन शासयो का परामाणिकसप म परयोग किया ह, उनह जय की अभि- छाषा भौर नाना परकारक सवायोसपररित होकर कया कोई रता

द जो सदाशिषोकत तनतरशासतर को भपरामाणिक कहकर हासयासपद होन का साहस करगा ?

` ` ऋषियो क एठारा भी यह तनदरशासतर समयत भौर समादतः, । हमा ह, इसकिए परामाणिकरप म सवीकत ह । वयासदव कहत ह :--

, शखतनतरम‌ दवताशच भदयन‌ नरक ` बरजत‌ । ` गङगादरगाहरीचानाम‌ भद कननारकी यथा ॥

-बहदढमषराणः

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यकतिकलप ] तानधरिकगख | [ ७

गङगाभौर दरगा एव हरि. मौर हर म भदलञानकारी जिस भकार नरफमामी दोता.ट उसी परकार गर, तना भौर दवता म भद- जञान करन पर नरकगामी. होना पडता ह । ।

वषणवो क परधान शासतर शरी -भीमदभागवत म भगवान‌ न सवय

कदाह- वदिकी तानतिकी मिशच इति तरिविधो मसः। शरयाणामीपसितनव विधिना मा समरचयत‌ ॥

. ~-११ च सकनध

, वदिक, तानलिक एव वदिक-तामदरिक भिशच - इमही तीन परकार

की. विधियो क वारा जिसकी जिस परकार इचछा हो वह‌ उसी रपम

भरी भाराधना कर ।

सभी पराणो स इसी परकार अनक परमाण उदधत किए जा सकत

ह । इन सभी. पराणो क ऋषिवाकयो को अगरा कर जो विपरीत मत

सथापित फरन की वषटा करत `, उसको असमबद परकापी' भौर

नासतिक छोडकर गौर कया कहा जा सकता ह ? वसततः ¶राण की

अवहलना करन पर अधिकाश हिनदज को विकषतः परायः बङखदशीय

दिनदभो को धर क विषय म अवलमबनशनय दोना पडगा । भतएव वनवरशासा को अपरामाणिक कना, सवरण को दर फककर वसत म

खारी गाठ छगाना ह ।

बहदधपराण भ आया ह--भगवती न शिव स कहा द--*भाष

भागमकरता ह गौर सवय विषण वदकरता ह । परम आप ~ भागम-

कततवम रग ह गौर वद कलरतव म हरि लग हए ह 1 मागम ओर वद

ही हमारी दो परधान बाह ह । इन दोनो बाहो ढारा भरभवादि चरिलोक :

कषारण फिथागयादह। इन सब स वद क सदषय तनाका-भी

अपौरषयतव परमाणित हजा ह । तनतर म मदय -मास परभति वयवहत . ह ९ . ^

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८ | तानविकगद [ तसतरकषासतर कहन स बहतो की धारणा ह कि तनतर वद-विरदध ह। यह धारणा

. भी नितीनत रभीतमक द । यचवद क इककीसरव अधयायम सराका गयवहार दिखाई दता ह । यथा--

बहयकषतरम‌ पवत तज इनदरियम‌ सरया सोम सत आसतो मदीय ` शकर ण दव दवताः पितगधि रसनाननम‌ यजमानाय धहि ।

हदव सोम! तम सरादवारा परवर ओर सामथययकत होकर अपन शदधवीरयदारा दवतागण को परितषट करोगीर रस-सदित अनन यजमान को परदान करो गौर बराहयण-कषनियो को तजसमपलन करो ।

अतएव मथमास सवन वदिक गौर पौराणिक मतक भौ विप- रीत नही ह । वद गौर पराणो स उतसतफा यथषठ परमाण सगरहीत हो सकता ह । सथानाभाव क कारण बहत स परमाण उदधत नही करयि । महापरभ निनथाननद न खडदहरम तरिपरा-यनतर सथापित कर इसका परिचय दिया द।

यदि किसी शासम रम तना का उललख नही दिखाई दततातो भौ

तनन को अभराचीन नही, कहा जा सकता । कारण यह‌ ह कि तनयशासतर

अतयनत गोपनीय शासर ह; शासतरकारो न कलवध सद.श साधनशासतर

को गस रखन का उपदश परदान किया ह । (तनवर शबद क अथको शतिशाललाविशष' -कहकर मदिनी-मभिधान म चलि गया दह) पवतन षिगण अति परलरबदधि-समपनन य । उनहोन जिस परकार अतयनत -कौशल-सहित उपासना की वयवसथा का निधरिण किया ह-- उसक परति थोडा सा भी धयान दिया जाय तो उसका परकतमाव कछ

` परिणाम म उपलबध किया जा सकता ह ओर उससो मन म अतयनत पविधर.भाव का म‌विरभाव होता ह; उस आननद-भाव को दसर को समरनान का उपाय नही ह । जिनहोन उकत साततिविकाननद का अनभव किया ह उनस अतिरिकत भौर कोई भी ईस समकन नही पायगा । वत-

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यकतिकलतप | तानतरिकिगर ` {९

मान समय म अधिकाश रोग इन सब विषयो क परति धयान नही

दन कर कारण तनव शासर क परकत अथ को हदयङगम नही कर पात; इसीलिए व तनतरशासतर को वद-विरशदध कायो क अभिपराय स वयय

-सायी समपरदायक दवारा परसतत ह कह कर उपकषा.करनम कणठित नही होत ।

निगम वद को कहत ह, भागम तनतर को । “कलावागमसममता'”

कलिकार म आगम-सममत उपासना ही फलपरदा ह; कारण यहटहकि

इसम दरबल मनषय क उपयोग करन योगय साधना-विधन ही सनि- `

विषट ह, इसलिए तनतरही कलि कावदद।

अतएव-

आगमोकतविधानन कलौ दवान यजत‌ सधीः ॥ एक बात ओर ह । तनतर आधनिक हौ अथवा जो भी हो, हम जब

दखत ह, बरहमाननद, परणाननद, जगनमोहन, राजा रामकषण, रामपरसाद, सरवनिनद ओौर कमलाकानत परभति वङखमाता क ससनतानगण

तनतरोकत साधना स सिदधिलाभ किया ह, तब तनतरशासतर हमार समीप अनादत उपकषित कयो होगा? एक सतरीन दसरी सतरीस पखा- “भगनि ] कया तमहारा लढका मर गया?” दवितीया रमणीन कहा यह कस उसतोखिला करभ रही ह ।'* परथम रमणी कछ

गमभीर होकर बोली--““वही तो, दादा मिथया तो बोरत नही । “` लिसकरा रडका ह वह कहती ह कि लडकरा जीवित ह, किनत दादा को

मिथयावादी नही कहकर दसरी उसम विशवास नही करत ह । उसी परकार नवशिकषित “तनतर आधनिक ह कहकर उसकी उपकषा-करत

. ह, परनत परतयकष कितन गयकति तनतरोकत साधना स आतमजञान की

उषलनधि कर धाक समानम पजित हए ह। इस परकार परतयकष

भरमाण को छोडकर अनमान पर निभर रहना मखता माथ.ह । इन `

सभी परमाणो क रहत हए भी जो तनवरशासम की उपकषा करत ह व

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१०] । तानपिकय [ तनवोकत साघना

वायस दवाराशचवणापहरण इततानत सनकर उस वायस को लकषय कर अनसरण करत-करत पथ पर सथित कपम गिरन वार मख षयकति

- क समान रमान कप म ही गिर ।

, तनतरोकत साधना , इस दश म अधिकाश सथो पर तनतर-मनतरस षटी दवतागणः की आराधना होती ह गौर तानतरिक भत स टी दवता-आराधना म अति- शीघर फल-पराति होती ह । इस परकार तानविको न सहज गौर सरर भागो का आविषकार कियाद, जिसस मनषय योगक पयस

- सरता स भगरसर हो सक । तनतरकषासव रिव क हारा विरचित ह; |. जो योग का रतनोजञवर पथ ह, वह पाथिवभोगक लिएही बिरणिप

ह, यह‌ विचारना भी महापाप द । जिस पनतरहासवम मधय, मास शरभति विषयोपभोग की बात छिखी ट, वह‌ तनतरशासतर. कया बरहयशषान

भ अदरदरधीः ट?

| महानिरवाणवनव म कहा गया द कि परमयोगी महादव स आधारशकति भगवती न कटा--^ह दवदव महादव ! आप दवगण क गरगो क गर ह; आपन जो परमश परबरहमकी बातकटीटह भौर

` जिसकी उपासना स मानवगण भोग गौर मोकषखाभ कर सकता दह, ह .

भगवान | किस उपाय स व परमातमा परसनन होत ह ? दिदव!

उनकी साधना अथवा मनत किस परकार ह ? उस परमातमा परमशवर का धयान मथवा बिधि किस परकार? ह रभो! म सक परकत तथय को सनन क किए समससक द । अतएव कपा कर उस मकष बततलाव ।'

सदाहिव न कहा-- पराणवलकभ ! तम मकषस गदयस गह ` बरहमतव. सनो । .भ इस रदसय को की भी भरकाशित नही करता ६ गहय विष भ पराण.की भपका भी परिय - पदारथ ह, तमस सनह द

, शसलिए क‌ रदा द । उस सचवितरिवारमा परजरहय को किष भकार

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गकतिकलप ] तानविकगद , {११

लाना जा सकता ह ? जो सतयासतय अभिनन ओर वाकय तथा मन क ` अगोचर ह उनको यथायथ सवरपलकषण-दारा किस परकार जानाभा

सकता ह { जो अनितय जगनमणडर क वीच सतरप म परतिभासित ह, जो बरहासवरप द, सवव समदषटि समाधि क दवारा जिनको जाना

, जा सकतादह; मो इनदातीत निविकलप भौर शरीरातमशञानपरि- शनय ह, जिसस विदव-ससार समदभत हमा ह भौर लिनस समदशत होकर निखिर विषव सथित ह, जिनम सकल विव .खयगरातत किए रहता ह, बही बरहम तटसथ-लकषणारा जञय ह ।

सवरपबदधया यदरयम‌ तदव लकषणः दिव 1. लकषणरापतमिचछनाम‌ विदितम‌ ततर साधनम‌ ॥ ततसाधनम‌ परवकषयामि शणषवावहिता शरिय ।

--महानिरवाणतनतर, दय उ०

-ह शिव ! सवशपलकषणहारा जो बरहम जञय होत. ई, तटसथ

ककषणषटारा वही जव रहत ह । सवरपलकषणदारा जानन क चयि. साघना फी अपकषा नही ह । वटसय लकषण क दासा बरहयपराि.क लयि

साना का विधान ह । ह परिय ! बही साधना, अरथात‌ तटसथलकषणःक ` हारा बरहम की साधना को बताता ह; सावधान होकर सनो ।"*

इसक दवारा कया नही रमकषा जा सकता ह कि सवरपरकषण म बरहम का सवरप अवगत होन पर भी वह सवसाधारण क लषएिकञय

नही ह ? इसलिए तटसथलकषण क दारा आराधना करन पर शी उसको परा किया जायगा कहकर शिव निरचितत तनतरसाधना परव तित हआ ह । तदननतर फिर कया समकषाना होगा फि तनतरोकत साधना अतयनत पवितर ह .गौर उसक मोकषपरापतिः का सहज उपाय . उपरनधः होता ह ? तनतरशासतर विजञान ह अयवा रसायन ह ;. योय ह जयवा भवसागर ह उसको विचार कर सथिर करन का अधिकार किसी का भी नही ह । तनवरासतर की जालोचना करन पर मः-गौर माशचय

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१ नतानजिकगर { तनतरोकत साधना

नवकित होना पडता ह । एसा परतीत होता ह कि जो जञान-विजञान की

इतनी उननत सीमा पर अधिरोहण किएय,कयाव मनषयय अथा दवता ? तनतरी भआविचकरिथा तनतर का -विजञान गौर तनरकी अभावनीय अखौकिक सभी वयापारो का दशन कर निशचष विवास

दता दह कि वह‌ मनषयक दवारा आविषत नदी हभा ह; वसततः

दक-दव परमयोगी शिवषरारा उसका परचार हआाथा। तनरमजो सव विषय लिखि गए ह, उनकी परीकषा म अधिक परयास नही होता; -तनतरोकत साधनापरणालीस शीघरही फल परपि होता ह। यथाविधि अनषठान कर सकन पर एक रातरि म शवरघषाधना की सिदधिहोन पर चअहयपद की उपलचधिकी जा सकतीरह। तनरकी यकतियहरहकि कलि का मनषम अलपाय ओौर मलपचित होगा ; उपङ दवारा कठोर कषाधना समभव नही होगी .; इती स उती अलपाय, अलपचितत, अलप- मधा जीवन क निसतार क किए महादव न इस मत क परचार किया द । अतएव तनव कवल अजञानी क अनधकारमय हदय की करई एक

-ककरियानो की पदधतिस परिपरण नही ह । यह भोगासकत जीवन को भोगका परथ दकर निवतति पथस जान की पदधतियोस परिपरण ह। अव तानतरिक साधनातव का योडा विशलषण किया जाय ।

वद म परणव-मनतर स परबरहम की उपासना हई ह । कयो कि--~

तसय वाचकः परणवः । `

। । -पातञजलदरशन

अ-उ-म वणो! क योग स बरहमा, विषण, शिव परतिपादित होत ह 1 कली - शबद म “शरी कषणाय भगवत गोपीजनवललभाय नमः' परनिपादन करत ह । फलसवरप साधारणतः ॐ शबद स सगण बरहम का सवरप परति-

- पादन करत ह णव क चिनतनस तरिगण तरिमति अरथात‌ बरहमा, -विषण, शिव.का चिनन करना समपरणखपस सहज वयापार नही ह।

वह‌ अधिकाश सथरो पर मसमभवहो जाताद। इसी कारण स तनतर

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यकतिकलप | तानतरिकगर [ ष

भ अधिकार विभदसदव मौरदवी की एकाएक मति कौ साधनाः

फी वयवसथा पर परकाश डाला गया ह 1 वदिक मनतर ।॥ ॐ ॥ का सरल-

शप म उचचारण सभी क किए समभव नहीद, किनत तनवोकत मनतरः (दीघ परणव ओौर अनयानय बीजमतन परभति) अति सरलतास दी उचचारित होत.ह। सरवसाधारणक लएि ततरशासर की वयवसथा हई ह। उसकी अशिकषितणोगभौ सरलतास ( सवाधिकार परयो जनानरप) साधना कर सकत ह । अधिकारी भदस उपाततनाकी

परणाली भी पथक‌-पयक‌ सपस हिनदकासतरम निदिषटदहरदर। सतरी, ददर परभति को वदका . अधिकार परापत नही ६। उनक लषएिभीः तनवौकत सहज उपासना परसतत हशह। जो वद क- अधिकारी य,

उनहोन काल करम स वद-पथ का अतिकरमण कर तनगोकत -साधना-पदधति को अपनायाथा ; इसालिए बराहयणो म तजतरकषासतर का अधिक आदरः

हभा ह।

परकतति क परिणाम अथवा दिकारहारा समपण विशव-वयापार

उतपनन हभा ह ।, परिणामसवरप आदि कारण का नाम दही परकति

शबद म उतकिसित ह । भरङति का कतततव वदसममत ह ! परकतिकी `

उपासना भी सतययगावधि परचलित ह! सतययग म मारणडय मनि

दवारा चणडी कापरणयन हमा ; उसम भी परकतिक कततव का अति, विसतारस वरणन ह ह। यथा-

नितयव सा जगनमतिसतया सवमिदम‌ ततम‌ । -- बह महाविदया नितय ह, जनम-मतय-रहित-सवभाव, -जगत‌ का

भादिकारणदह; यह बरहमाणड ही उसकीमति दह, उसीस यह‌ ससार

विसतारित हभ ह । तरतायग म जो राम-सीता ह, उनका उपरनिषद‌ भ. वरणन ह परतीत होता ह ।- उसी उपनिषद‌ की छाया का अवलमबन

ककर महातमा वातमीकि न महाकावय रामायण की रचनाकीः ह । राम-सीता भी उपनिषद‌ भ परकति-परष रप म वणित ह--

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१.८ कः

१४] , ` तानविकगदः [ तनवोकत साधना

शरी रामखानतिषयवशाजजगदाननददायिनी . उलततिसथितिवहारकारिणी सवदहिनाम‌ । सा सीता भवति तवा मलगरकतिसलिता. परणवतवात‌ परकतिरिति वदनति बरहमवादिनः ॥

-रामतापनी

-रीराम क साननिघयवशातः जगद को माननद परदायिनी मौर. सभी पराणियो की उतमतति, सथिति मौर परचय करनवारी सीता कफो मख-पकतिलप म समञज । जर सीता परणवसहित अभद परात करती ह, तव बरहवरादी उन परकति कौ सजञा दत ह । -दवापरयगम शरी कषण ओर योगभाया, भागवत परणता न रसटीला म उनका वरणन (परिषतलप म ककिया ह ।यवा-

भगवानपि ता रातरीः श।रदोतफलकमललिकाः । वशय . रनत मनशचकर योगमायामपाधितः ॥

उसी शारदोतफल मललिकाशोभित रातरि को दखकर भगवान न योगमाया को माशरय करक करीडा करन का विचार किया ।

शरीमदधणवदगोका म परकति क कतव का वरणन हआ ह । यथा- । ` ।

` मयाधयकषण परकतिः सयत सचराचरम‌ । हतनानन कौनतय जगदविपरिवरतत ॥

` "द कौनतय ! भर भधिषठानवशातः ही परदति इस सचराचर जगत‌ को जनम दकर मर अधिषठान क लिए ही यह जगत‌ र

. ३ जनमगरहण करता द ।

उपरोकत गीताताकय म परकति न ही जगद को जनम दिया ह-- ` कहा गवा ह । वही परङतिदवी तसर क परधान अधिषठातरी दवता द, उनको उपनिषद‌ बौर पराणादि न अनमोदित किया ह । तनव म दव

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यकतिकलप ] ` तानतरिक ग [ १५

आौर दवी-दोनो की उपासना ही विधि समपनन ह ह। भारतवष

“ ज विभिनन खमपरदाथो क उपासक दख जात ह । उनम एक समपरदायो क

खोग कवर परकति दवी क उपासक ह; व भी तनतरकत साधना की

गयवसथा क अनसार परिचाकति ह । जिस परकार भगवान‌ शचीकषणन .

गीता म योगशासतर को करम का कौशकर कहा ह, यथा--

बदधियकतो जहातीह उभ सकतदषकत । तसमात‌ योगाय यजयसव योगः कमस कौरालम‌ ॥

उसी परकार तनधरशसवम भी अति सकौशल-सहित द-दवी की

उपाकतना-परगारी योगशासभ म विधिसमपनन हई । तनतरशासतर न

दहभद स नाना परकारक आचारो ओर भावोको परकारित किया

ह। किसी-किसी तनबशासव म. गपत साधना की कथा भी परकाशित `

` इई ह। जो मनषय जिस परकारक आचार अथवा भाव गौर जिस साधना का अधिकारी ह, उसी क अनरप अनषठान करन पर फल-

भोगी होता ह गौर साधना स निषपाप होकर ससा र-समदर स समततीरण .

होता ह । जनमजनमाजित पणय-परभावसि कलाचार म निनकोगो की वासना रमती ह, व कलाचार क अवलमबन स आतमाको पवितर

करक पकषात‌ दिवमय दहो जात ह, जिस सथान पर भोगवाटलय की `

विसतति ह, वहा साधना क योग की समभावना कया द वहाभोयका

भाव ह-किनत कलाचारम परवतत होनस भोग ओर योग दोनौः

करी उपरनधिकीजा सकती दह।

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म-कार ततव

तनव शासतर म पञच म-कार साधना का उललख ह । पच मकार अरयात‌ पाच दरवयो का आरमभिक भकषर “म ह। यथा मय, मास, मतसय, मदरा मौर मथन इनही पाचो को पच म-कार कहत ह । पच म-कार का साघना-फल भी असीम द । यथया-

` मदम‌ मासम तथा मतसयम‌ मदरा मथनमव च । म-कारपकम कतवा पनजनम न विदयत ॥

पञच म-कार-साधको का पनजनम नही होताह। साधारण कोग

सक मलततव भौर उदशय को नही समकन सकनक कारण इस समबनध म मनक बारत कहत ह । _ विशषतः वरतमान कालक शिकषित शछोगो म मदयपान वयवसथा, मासिभोजन-मथा, मथन का परवरतन ओर मदरा का वयवहार दखकर तनतरशासतर क परति अतिशथ अशरदधा दिखाई

पठती ह ; कवल यदर नही तानविकि लोगोका नाम सनकर जस शिहरन उतपनन होती ह । वसततः अनक सथलो पर दखा जाता ह कि `

, खोग मदयादि का सवन आरमभ करक ओर करछभी करन परभी निदततिपथ पर जा नही सकत, भोग-तसी का साधन परस हो जान परकषछ भी करन पर फिरधम परमा सकनम सकषम हो सकत ह एखा विशवास किसी भी परकार नही किया जः सकता । जो मदयपान म भाशकतर, धरमपथ तोदरकी बातदह, व नतिक पथपरभौ विचरण करन म समरथ नही होत । मयपान स मनषय की असकति असत‌ पय स परभावित होती द । तव तनवरशसतरम मय-मसि का वयव- हार कयो दिखाई पडता ह ? पतरम ही कदा गया दह कि सतव, रजः

सौर तमः किसी भी गणभद स उपासनः का भधिकार भओौरपरकार- . भद हमा ट । इसलिए पशच म-कार भी सथल ओर सकषमभद स अधि-

. कारानयायी मयवहत होता द । शिव जी कहत ह--

= 49 =

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यकतिकतप |] तानतिकगरर [ १७

सोमधारा कषरद‌ या त बरहमरगराद‌. वरानन । पीतवाननदमयसताम‌ यः स एव मदयसाधकः ॥

ह वरानन ! बरहमरनधर स जो अमतधारा कषरित होती ह, उसक

पान करनस लोग आननदमय हो जत ह, इसीका नाम भद

साधनाद। #

* मतानतर स-

यदकतम‌ परम बरहम निविकारम‌ निरञजनम‌ । तसमिन‌ परमदन-जञानम‌ तनमयम‌ परिकीततितम‌- ॥ --निविकार निरजन परबरहम स योग-साघना दवारा जो परमदन

जञान दह, उसीकानाममदय ह।

एवम‌ मा सनोति हि यतकम तनमासम‌ परिकीतितम‌ । न च कायपरतीकनत योगिभिरमासमचयत॥

--जो सव सतकम निषकाम परबरहम को मपित करता ह ; उसि फरमसमरपण का नाम मासदह।

मतसयमानम‌ सवभत सखदःलमिदम‌ परिय 1 इति यत‌ साततविकम‌ जञानम‌ तनमतसयः परिकीततितः ॥ -सभी भतो म अपन समान सख-दःख भ समनञान--यही जो

सातविक जञान ह, उसका नाम मतसय ह ।

सत‌ सङग न भवनमकतिरसतसङग घ बनधनम‌ । असतसङखमदरणम‌ यत‌ तनमदरा परिकीततिता ॥ ।

-सतसङख म मकति भौर असतसङग म बनधन--दसको . जानकर , भसतसदख क परितयाग का नाम मदरा ह,

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१८]; 3 तानविकगर `. [ म-कार ततव

भा शनदादरसना जञया तदशान‌ रसनापरिय । ` सदाया भकषयटवि स एव माससाधकः ॥ ह रसनाभरिय ! मा , रसना शबदः का नामानतर ह । उसस उतयनन

वाकयो का भकषक- मास साधक कहलाता ह । वह मौनी होता ह।

गगा -यमनयोरमधय मतसयौ दवौ चरतः सदा । तौ मतसयौ भकषयद‌ यसत स भवनमतसयसाधकः ॥

गङगा गौर यमनाम दो मतसय निरनतर चकतह। जो वयकति न दो मतसयो को लाता ह--उसका नाम" मतसय-साधक ह । डा भौर पिगला नादी को गङगा गौर यमना कहत ह । शवास-परशवास ही दो भसय द, जो पराणायामदवारा इवास-परशवास को रोक कर कमभक का पषटि-साधन करत ह, उसी को मतसय-साधक कहा जाता ह ।

सहसरार महापदम करणिकामदिताचरत । आतमा ततरव दवशि कवलः पारदोपमः ॥ सरयकोटिगरतीकारशननरकोटिसशीतलः । अतीव कमनीय महाकणडलिनीयतः । यसय जञानोदयसततर मदरासाधक उचयत ॥

कलकणडलिनीराकतिदहिनाम दहधारिणी । तया शिवसय सयोगो मथनम‌ परिकीतितम‌ ॥

--मराधारतथित कणडलिनीशकति को योन-साधनादवारा षद‌ भदकारा शिरःसथित सदलञदरकमरकणिका क भीतर विनद-रप परम- दिव सहित सयोग करन का नाम मयन ह ।

यही पच-मकार, ह । इसका नाम लययोग ह । इसलियि पव म- कारयोग का काय मम रचित 'शञानीगड क साधना काणडम अङतिःदखषयोग की साधना-परणारी परकाशित हरद ह ।

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भकतिकलय ] तानतरिकगर [ १९

--द दवशि ! शिर म सथित सहललदकर भ कणिका क भीतर शदध पारदलय. तमा की सथिति ह । यथपि कि उसका तज, कोटि सव- .. सदश ह किनत सनिता म कोटि चनदरतलय ह। यह परमपदाथ अतिशचय मनोहर गौर कणडलिनीशकति समनवित ह जिसक शान का उदय इस परकार होता ह, बही परकत मदरा-साधक ह ।

मथनम‌ परम तततवम‌ सषटिसथितयनतकारणम‌ । भथनात‌ जाय सिदधतरहयजञानम‌ सदरभम‌ ॥

-मथन-गयापार सषटि, सथिति ओौर परलयका कारण, हस , परमतततव कहकर शसतर म. इसका वरणन किया गयाह। मथन .. सिदधिलाभ होता ह मौर उसस सदकभ बरहमजञान की उपरनधि होती ` ` ४ । वह मथन किस परकारकारह? ।

रफसत कडकमाभासः कनतमधय वयवसथितः। मकारशच विनदरपो महायोनौ सथितः परिय ॥ आकर-हसमाशहय एकता च यदा भवत‌ 1 तदा जातो महाननदा बरहमजञानम‌ सद ङभम‌ ॥

` रफ कमवण कणड म जवसथित रहता द, भकार विनदरप भ भहायोनि म अवसथित ह । अकाररपी हस क भय स जब इन दोनो

की एकता सथापित होती द; जो हस परकारका मिलन करा सकत. ह-वदी मथन-साधकद। जिस परकार मयन-काय आशिदखन,. घमबन, रीतकार, अनष, रमण ओर रतोतसग इनही छः भदध सित करिया-समपनन होता ह, उसी परकार आधयातमिक मथन-वयापारम भी दसी परकार छः अङग कौ दखा जाता ह । यथा

आलिङखनः भवननयासदचमबन धयानमीरितम‌ । आवाहनः शीतकरः सयात‌ नवयमनरपनम‌ ॥ लपनम‌ रमणम‌ परोकतम‌ रतःपातशच दकषिणा । सवथव तवया गोपयम मम पराणाधिक शरिय ॥

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२०] तानतिकगख [ म-कार तततव

--योगकरिया तततवादिनयास का नाम भकगिन, धयान का नाम ` भमबन, आवाहन का नाम शीतकार, नव का नाम अनलपन, जप

` कानाम रमण गौर दकषिणानत कानाम रतःपातन ह । फल सवरप

षडदक योग म दसी परकारक षडदध साधनाकरन का नाम ही मथन-

साधना ह ।

पञचम पनचमाकारः पशवाननसमो भवत‌ । पञच म-कार की साधना म साधक किवतलय हो जाता}

इसलिए पशच म-कार परहत काय योग की करिया ह, उसम सनदह नही

ह । ततर मौर योग दोनो शासतर ही सदाशिव क दवारा रचित ह।

सकषम पशच म-कार कौ साधना योगशासतर क भीतर कही गई ह । तनतर की सथल साधना इसकिए सकषम पञच म-कार तनतरशासन का उद‌षफ

मही ह। तव भी तनतर म सकषमका भाभासह । रपकादि विशलषणः करन पर भोग की सकषम साधना का पता लगायाजा सकताह)}

किनत ततरशास का वह उदकय नही ह । एक ही वयकति की एक बात

क लिए दविविध -चासतर क परणयन की कया मावशयकता द ?

जगत‌ म दोनोही पथ! एक का नाम निडतति ओर दसरका ` नाम परवतति ह । निदतति योग गौर परवतति भोग ह । आगमसारोकत पच

म-कार निदतति क पथ, भौर महानिरवाणतनत परभति का वणित-

सथल पशच म-कार परवतति क पथ स चलत ह; इस परकार दोनो म यही भद ह । जिनकी नरिषय-बासना निडतति होकर विषय-वरागय म बदल

गई ह, उनक लिए निदतति पथ का योगपथ सकषम पच म-कार की साधना ह । भौर जिनकी भोगवासना शतवाह सजन करक समसत

ससार को रोक ठना चाहती ह, उसका उपाय कया ह ? उन पर दयाः

करक ही सदाशिव न सथर पशच म-कार की साधना करो परकादित करियाः ह। दशय भोग क मधय स योगपथ को उननत बनाना ह,“ परदततिकः पथ स निदतति को लाना द।

क व

1

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यकतिकलप | तानतरिकगर [ २१

बङख क एक मातर गौरव भकतावतार शरीमनमहपरभ चततनयदवन

हरिशास को हरिनाम क परचार का अदश दिया । किनत हरिदासन उसस असफल होकर परतयागमन करक कहा,--“'परभो । भोगासकत जीव भोग का परितयाग कर हरि नाम ऊन की इचछा नदी करता ह ।'

तब चतनयदव न सवय हरिनाम काभरचार करना आरमभ किया।

उनदन सवसाधारण स कहा, “तम लोग मदयमास खाकर रमणीक

अक म वठकर हरिनाम लो 1" तब समह‌ क सम‌ लोग आकर रि- नाम महामतर को गरहण कर लग। हरिदास न का--“शरभो

हमार छिए इस परकारका कठोर सयम विधानह, भौर. साधारण ककि ईस रप गयवसथाका कयाकारण ह? चतनयदरव-न हसकर कटा-- “तम लोग विषयविरागी .ईइवरानरागी भकत हो, धसी कारण

तम लोगो क किए सातविक पथ की वयवसथा की दह; किनद साधारण भोगासकत जीव भोग को छोडकर जीवित रहन फी इचछा नही रखत ह । भगवान‌ की अपकषा स भोय को अधिक परम करत द । व वासना-

चथाथी न रह सङन पर हरिनाम कथो कग ? इसीलिए उनक भोपम दी दरिनाम की वयवसवाकीदह। कछ दिन बादहरिनाम कगणक

करण. अपन स ही सबर तयाग कर दग ।'' चतनयदव क इस उपदशच . क मरम.को गरहण करन म जो परमथ हए, व सहन दी ततरासव क मधमा अदि की वयवतयाको हदपरगम करसनतह।

अतएव मयमासादि वयवसथादवारा. तनवरशासम का निङषटतव भरतिपनन न होकर बलकि सरवङिपणतव ही साधित हभादह। कारण शासतर सपरकार अधिकरारी क अधिका विषयो का उपदषटा ह। दपीलिए कतसित अभिपराय चरितारथकामी क पकष भ. भी शासत उप- दश करन म कणठित कयो होगा ? जिनकी अनतर की इतति ईषित र, व वासदरोपदश नही पान पर भी इचछानरप अपनी वतति चरितारथ न करन म सथिर नदी रह सकत । वयाघर. शासमोपवश निरपकष होकर ..

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२] ` तानतिकगर [ म-कार तततव `

हिषावतति घरिताथ करता ह । ईसलिए जिसकी जो वतति द, वह‌ उसका अनशीलन नही किए बिना नही - रह सकता । बलकि इमी शरासपरोपदश क अनसार अपनी कतसित इतति क निषपादन करन भ.

` सचषट होन पर समगर पाकर कभी भी इन सभी उततियो का हास होकर सवदतति का उनमष हो सकता ह । कतसित इतति को चरितारथ करन क किए शासतरविधि का अनवरतन करन पर जिस परकार कितन अनषठान करन पडत ह जो उनक दारा असत‌ दतति का हास कर

` दत ह । इसलिप तनयरशासतर भावी मगल का दार उनमकत कश दता ६। ।

एक आसथायिका हकि एक समय किसी दरदनति तसकर न किसी एक सथान पर जात जात पय म एक साघ क पविशर आशचम

, को दखकर यहा उपसथित हमा । उसी सथान पर साध को वहत स धिषयो स परिवतत दरयन करत हए दखकर भौर उनकी विदयदध भामोद-परमोद भौर भाव-भकति दलकर तसकरकी भी शिषय होन की परवल इचछा हई । उसन उसी समय साघ क समीप परसताव रखा । उनटनि घोर क परसताव फो सनकर तथा अतिशय विसमित होकर कहा -- “वतस ! तम न चौयदतति का अवलमबन कर अदोष पाप सचित किया ह, मर शिषयतव परहण करन स कया होगा ? जो हो तम गगर भर एक आदश का सवदा पालन कर सको, तब म छमको दीकषित करक शिषपरप म परण कर सकता ह ।*“ चोर न तव अतीव आननद क साय साध फी आजञा पारन करना अगीकार' किया । साध न कहा--"“दचछानकरल तसकर वतति को चरिता करो, उसम मञल कोई भापतति नही ह, किनत तम कभी भी मिथया नही बोलोग

इसको .भङगीकार करना होगा ।” साध क वाकय क शरवण मावरसही = पररिणाम पर वितरारन कर उसक भदश पालन की समभति द दी । साषट न उस दीकषित कर शिषयसपम परहण कफिया। करमशः तसकर

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कतिकतप | तानविकगर [२३

सतय बोलकर विशवासभाजन 'होकर जपत -वयवसाय म लीन रहन लगा । वह मन ही मन विषार करन लया हाय, मन कया किया द। मन सतय बोलकरर थसदटतति का. अवलमबन करन पर भी शषठतव भरातर किथा, न जान सदविषय क अवलमबन करन स किष अपव सख का धोग कर सकता । इसलिए आज स ओौर कतसित इतति का भनसतरण नही कर गा । इसी परकार तसकर की कटतति दर हई। उसम सदटतति वदन लगी वह भर मशः साध नामस. विभरत

` हमा । |

वही कता ह, सवभाव स ही कडततिसमपनन वयकतियो क किए

उनकी पर दतयानमोदित ततकाल परदतत कएन वाक सब विषय ततरास

म निबदध ह भौर उनक अनकरार भ इस परकार क उपाय -निटित ह

कि उनक हारा कलयाण की ही पराति होगी । अनयथा भपनी परदतति-

हारा अनभोदित विषयो म भर इतति नदी हो परती । अतएव पशव मकार

रपक नही ह भौर सषषमभाव भी दस शासतर का उदशय नही द ।

उनकी मशः आलोषना कौ. जाय । तब यह‌ निरवय द कि यथाय परमारथानवषी विषयविरागी ततर की सथल-साधना का थोडा भी

भरयोजन नही

परयम‌ तततव ।

पनच मकार को ही पशचतततव कहत ह । मदय ही परथम तततव ह । ,

` ---अहानिरवाणततर म मय की इसी परकार वयवसथा की गई ट :--

गौडी _पषटी तथा माषवी तरिविधा चोततमा सरा। सब नाना विधा परोकता ताल खजर समभवा ॥

तथा दशषविभदन नाना . दरवया विभदतः। ` बहधयम‌ -समासयाता परशसता दवताचन ॥ ध |

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२४] तानतरिकगङ [ परथम तततव

यन कन समतपनना यन कनाहतापि वा ।

नातर जातिविभदोऽसति शोधिता सरवसिदधिदा ॥

गौडी (गड कदवारा जो मदय परसतत होता ह) पषटी (पिषटक

दवारा जो मब परसतत होता ह) गौर माघवी (मधदराराजौ मय

परसतत होती दह) य तीनसरा ही उततम कह कर गणयह। य

सव सरा ताल, खजर गौर भनयानय दरवय रसस सयकत रहती ह ।

दल ओर दरवयभदस नाना परकार की सराकी सषटि होती दह।

दवारचन क यि सभी सरा परशसत ह । यह सवसरा जिपतपरकार उदभत भौर जिभन परकार निसत करिसी वयकतिक दवारा छाई गरईकयो

नहो, शोधित होन पर काय सतिदध होताह । इनकी जाति का विचार नही ट।

महौषधम‌ यजजीवाना दः खविसफारक महत‌ । आननदजनकपर यचच तदादय तततवलकषणम‌ ॥ अससकतनञ यततवम‌ मोदकम‌ भरमकारणम‌ । विवादरोगजनननतयाजयम‌ कौलः सदा शरिय ॥

भाय' तततव का लकषण यही ह-यह‌ महौषधिसवरप ह । इसक सहार जीवगण सभी रोगोकभोगको भल जाति ह । यह अतिशय भाननद की सषटि करता ह । यदि आाययतततव ससकत नही होता तव उसस मोह‌.मौर भरम कौ उतपतति होती ह । ह परिय ! कलसाधकगण क लिए अकसछत ततर का परितयाग करना ही सवदा करतवय ह,

मादि सवन का उदशय धम नही ह, परनत धम का उदोशयही पखतत क अनषठान की परयोजनीयता ह । वसततः मदयपान काल म -जिस भराव-का पोषण होता ह, वही उचछवशषित होता ह गौर एकागरता का भाव उततरोततर साघना-पथ पर अगरसर होता ह। साधक क पान क लिए साघना नही ह-साधना क किए ही पान ह । यथा :--

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यकतिकरलप | तानतरिकगख [ २५

मनवजञानसफरणाय बरहयजञानसथिराय च। अलिपान परकतगय लोलपो नरक तरजत‌ ॥

दवता का धयान परिसफट रखन क लिए मौर अपन सहित दवता

का अभदजञान सथिर रखनक किए जपादिक परव मदयपान करना चाहिय । आननद क लिए कषजध होकर पान करन स नरकगामी दोना पडता ह ।

इस सयल.पर भाशका हो सकती ह कि मदयपान स विचलित. 4यकति का कतत वयाकततनय का जञान किस परकार रहगा ? वसततः

सी आशदधासही महादव न आदश दिया ह कि जितन पान करन

पर.दषटि भौर मन विचकतिन हो उसी परिमाणस पान करना चाहिय । ईसक अतिरिकत पान को पपान कहत द । यथा :--

शताभिषिकतः कौरशच त‌ अति पानात‌ कलखवरि । पशरव स मनतवयः करधम बहिषकतः ॥ ह कलशवरि ¡. शतवार अभिषिकत कौल वयकति भी अतिपान-दोष

स दषित होन पर धरमचयत होग ओर उनको पचमो म शशिनना होगा ।

अतएव मपान करक मतत होना तनतर का उदषय नदीह। उस मनव पत ओौर ससकत होन स साधक तजोधरमी होता ह, उस

“ समय वह साधनानयायी कणडलिनीशकति क मख म गिरकर उसको उदभोधित करता ह, इसीलिय .साधक का मदयपान ह । नही तो एक

ही तवरशासतर मदयपान क शत-शत दोषो को दिखाकर साधक क लिए उसकी वयवसथा कयो करगा ? ।

ससार म परमातः हितकर गौर भहितकर वसत कया ह ? शरति का कथन ह--कोई भी वसत वसततः भहितकर अथवा जहर

नही ह ; परकति की परिचछितततानिबनधन म कौन सी वसतः हितकर,

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2६] । तानतिकगर [ परथमः-तततवः

वििषट परकति क अनषि अयवा-सवादी मौर कौन सी वसत अदित- , ।

कर विदिषट भरकति क परतिकर, बाधापरद जथवा विसबादी नामरक `

परतीयमान होती ह । विषय वषमय ही विषः नतो दिष वसततः

विष नही. । चरक दिता म का ह-जो अननः पराणीगण क शिप

पराण-सवसप ह, यकतिक भकषिठ होन परर. वदी मनन हीः जीवन

सहार करता ह, फिर विष पराणहर होन पर भी यदि यतनपरवक वयव

हव हो, पव बह रसायन ह-पराणपरद ह ।** ससार म फोर दरवय एकाति

हितकर अथवा एकात मदिवकर नही ह । परयोजन भौर कारयसाधन

क किए यथोचित वयवहार भी -अदितकर.नदी ह । तज पदाथ क

परयोग वयतिरक स जिसकी कणडलिनी नही जगगी, उ सक लिए यथा-

विधि.मच परयोग म दोषशया ह ? भौर जिसकी कणडलिनी जमी द,

तिसका सषमना-माग परिषटत हमा ह, उसका उस काय स कय

भरयोजन ह ? शासतरम हसी स -उन--लोरगो क लिए मघखपान का

निषधकियादह।-

` इस समय रगताः ह--मौर कटन की बवरदयकता नही कि पतर

शासत का उदय नदी ह कि रोग मतत होकर आननद की उ पलजि

। कर । मदपायी भो मनषयतव क बाहर चरा जाता द, मयपायी नो पप भरी अघम होकर पडा रहवरा ह, मदयपायौ ` जिसका समसछ.

हिताहित कनान लष हो जाता द, उसस . सवदा सरवान महायोगी

यरशाखी महादव अवगत य । किनत दस तज-परदानदरारा कणडलिनी ` क जागरण क छथि उसक हारा ततर छी साधना परवारित इई द, जिस परकार "रिषसय विषमौषधम‌” अरथात‌ विष परयोग स विष'की

` चिकरितसा होती ह; उती परकार सरा सवन की वयवसथा इई ह; कित

उपयकत ग क न होन स मनतराय गौर दवतासफति क परिवतत म

नशा-की सपति भौर जीवन ही नषट हो जाय। उपयकत गर क

उपदशानसार खमय विषष स नाना परकारस दरा परयोगः करनस

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| कतिक ] तानविकग | [२७

- निदचय दी कणडलिनीः चतनय. -होगी, अतएव मदयपान करक मतत जौर तजजनितत-पादाव आननदानभव शासतर फा उदरय नही ह । कणड- . किनीशकति हमः रोगो क दहसथ शकतिसमह काः शततिदनदर ह। उसी शकतिकनदर को उदधोषित करन क रथि उसक गम मयः परदान किया जाताः ह ! इसका उदय अति शभकर ह 1 पाशचातय दशो म जो मसमरिजम बौर हिपनटिक विदया का ¶१रिवलन हमा

दव भी सवीकार करत. ह; किन-किन . गौषधियो क हारा दसी अवसथा आ सकती ह, किनत कयो सौर किस परकार आ सकती द वह

उनको अजञात ह, दसकिए व -सभी तथयो को जानत नही । तातरिक साधको न उस जाना था इसलिए महाशकति का आराधना शकतिकनदर

“को जगान क किए सरापान की योजना हद थी । `

तनतरासतर म सरापान की एस परकार की वयवसथा ह। मटाराकति

` की पजादि करक कलसाधक हषटमन स परमामतपरण ससकत भौर

निवदित सव सव पाजञ रहण करक मरधार स जिदपर परयनत क

कणडङिनी की चिनता करत हए मलमनतर उजवारित कर शीगद कीः आजञा गरहण क अननतर कणडलिनीमख म परमामत परदानः करना ह ॥

कणडलिनी जागरण क किए सषमना पथ स इस मनता को चराना

होता ह । योनिमदरा का अवलमबन करक ही उकत काय - समपनन करन होता द । इस तततव धिकषा क छिए सदगख का परयोजन होता ह।

| ^ अनयतत , ` . दवितीय वततव मरा -द; -उनक समबनध म शासतरका इस भरकारः

,-<विकषान ईह. यथा :- ।

` - माससत तरिविधम‌ ` परोकतम‌ जकभचरचरभ‌ । यसमात‌ कसमात‌ समानितम‌ यन तन किधातितम‌ ।+

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२८] तानविकगड ` [ अनयानय ततव

सत‌ सरवम‌ दवतापरीतय भवदव न सशयः । ` साधकचछा वलवती दय वसतनि दवत॥

यदययदातमपरियम दरवयम‌ तततदिषटाय कलपयत‌ 1 बकदानविधौ दवि विहितः परषः पशः । सतरी पशन च हनतवयसततर शामभशासनात‌ ॥

-मास तरिविध ह जलचर, भचर ओौर खचर। य जिस किसी वयकतिदारा मारा जाय अथवा जित किसी सथान काए

जाय, निःसनदह उसस दवगण की तति होती ह । दवता को कौन सा

मास मथवा कौन सी वसत दय द, वह‌ साधक की इचछा क अनगत

1 जो मास, जो वसत अपन कौ तपरकर ह, इषटदवता क उदय

उसी को परदान. करना करतवय द । दवि ! परषमपश ही बलिदान क शिए विहित ह; सतरी यय बलि दनाशिव की आजञा क विषदः शसलिए उस नही दिया जाता ह ।

अतएव जानतव मासदरारा साधना भिनन ह; उसका अय वाकय

सयम करना अथवा मौनी होना ह; यह तनत का उदकय ह।

बदधितजोबलकरम दवितीयम‌ ततव लकषणम‌ ।

दवितीय तततव पषटकर बदधि, बल भौर तजोविधायक ह। ततीय तततव मतसय ह-

उततमासतिविधा मतसयाः शालपाठिनरोहिताः । मधयमाः कणटकरहीना अधमा बहकणटकाः ।1 तऽपि दवय परदातवया यदि सषट विवजिताः॥ --मससय म शाल, रोयल ओर रोहित यही तीन जातिरथा उततम

ई । कणटकहीन अनयानय मतसय मधयम ओौर बहकणटकशाली मतसव ,

अधम ह; यदि शषोकत मतसय सनदरलप स भजित हो उसस दवी का

निवदन किया जा सकता ह ।

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यकतिकलप ] तानविकगर‌ [ २९

जलोदभवम‌ यत‌ कलयाणि. कमनीयम‌ सखपरदम‌. परजावदधिकरशवापि ततीयतततवलकषणम‌ ॥।

-- कलयाणि ! ततीय ततव जल स उतपनन ह--परजाददधिकर, जीवः

क लिए जीवनसवरप गौर सखपरवः ह।

इत समय भी कया कहना होगा कि तनतर म मतसय रपक नही

ह; वह हमाराः नितय का खादय ह--शाल, रोय, रोह मतसयः

इतयादि ? ।

इस समय चतथ तततव मदरा की आलोचना कौ जाय 1,

मदरापि तरिविधा परोकताः उततमादि . परभदतः ।' ` चनदरविमबनिभा शभराः शालितिणडलसमभवा । . यवगोधमजा वापि. घतपकवा मनोहरा 1।: मदरयमततमा मधयाः `शषटशधानयादिसमभवा ।. भजितानयनयवीजानयधमा' परिकीततिता ॥

मदरा भी उततम, मधय भौर अधम-यदही तरिविध ह।जौः चनदरवत‌ शभर शाजितणडक तथवा जव-गोधम परसतत ह- वह तपकव- मनोहर ह; वही उततम कहकर परिगणित ह ।*जो भषट धानय अरथात‌, कावास परसतत ह बह मधयम दह बौर जो अनय कशसय-भित ह उसी को अधम कहा गया ह । ।

सरभम‌ भरमिजातचच जीवानाम‌ जीवनचच यत‌ ।. आयमलम‌ः चतरिजगताम‌ चतथतततवलकषणम‌ 1 `

मासि-मतसयादि वयवहार का कारण भी सरापान क सदा समकषना

जादिय । मन न कहा ह--"“आचाराषटिचयतो विपरो न वदफल- मदनत”” । अरथात‌ आचार रहित विपर वदोकत फल की पराति नही करः

` सकता । इन सभी शासतरो म शययातयाग स पननिदरा परयनत यह पद-पर कठोर नियम निधिबदध दभा दः: जधिकास वयकति उसः आचार मः जसमथः

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- ३०] ` . तानतकगद | [ अनयानय तव

-होत ह। भोगाशकति का सवाय करक कितन छोग वदिक गाषरि पाकन भ परतर हगि? उनक लिएतनवर का पशच मकार द। पच

भ-कार की साधना स कमशः भगवनमखी होकर साधक को परम जञान

भ उपनीत करगा; तनव म. इचछानकर मतसय-मासाहारादि की विधिः नही ह । यथा-

मनताधसफरणाय तरहमजञानोदधवाय च। सषयत मधमाघदि तषणया चत‌ स पातकी ॥।

--मनतराय गौर दवता की सफरति क लिए मौर बरहमजञान. क

, उदमव क लिए ममास परभति निपमानङगल वयवहत होत ह!

जो लोभ वशचतः मासादि का भोजन करगा, उनकी गणना पातकियो भ होगी,

वगदश म परायः.मधिकाश वयकति-मच मास खात । सासविक

बषणव-धम गरहण करक भी कलि क परबल परताप स अधिकाश वयकति

भससय क लोभ क। वजन नही कर "सकत । जिस . आचार का भरति-

पालन करना असमभव ह, उस पथावलमबन स उकत फल की परतयाशा

असभव ह । इसी स तरिकालदरशी महादव न कलि क भोगासकत घवो क लिए मतसयमासादिदरारा साधना की गयवसया कीट। मन न भी कहा ह--

न मासभकषण दोषो न मदन च मथन। "परवततिरषा भतानाम‌ निवततिसत महाफला ॥।

' -- मनषयादि क लिए मासभकषण म, मदयपान म, मथन म, दोष नदी ह-करण कि यह‌ परहततिकभ ह । वाद म नितति कारम भटा की परापि होनी । ।

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यकतिकलप ] , तानतरिकगख [ ३१.

पचम तततव

पचम तसव क समबनध म एक विशद आो चना करनी होगी ।

शषतततवम महशानि निरवीयम‌ परव करौ ४ सवकीया कवखा जञया . सरवदोषविवजिता ॥

- महशानि 1 परबल कलिकाल म मानवगण निरवाय हो जाएभ । इसलिए अनतिम तव (मथन) सरवदोषवजितर अपनी पतनी क साथ ही

समपनन करना होगा; इसकएि-भौर किसी दोष क होन की आशका

नही रहगी ।

मथन क विषयम भी शिव का इसी परकार गढ आदश द कि कल- जञानहीन मयनासकत ओौर सविकलप वयकतिक किए यथाविधि उनक

आद का पालन करना असमभव ह। इसी कारण सदादिव न

` कठाट-- विना परिणीताम‌ चीरः शकतसवाम‌ समाचरन‌ । परसतरीगाभिनाम‌ पापम‌ परापनयाननातर सरायः ॥

--महानिरवाणतसतर

विवाहिता पतनी क अभाव साधकक अनयसतरीक गरहण

करन स परसतरी गमन का पाप होगा--दसम सनदह नदीदह। .

इत सवकीय पलनी छो भीशिव न साधनाङग विधिबदध नियम‌

करक "पतन विधिवजनाव‌"--विधिरषन स पतन अनिवाय कटा

ह। इसलिए वड, समति गौर पराणादि की अपकषा ` मथनः क विषय ` |

भ ततर म किन विवि वयवसथापितः हई द । तव जो तनतर कौ दाद ` दकर सरापान ओर परकीया रमणी क साथ आननद स वयभिचार

करता ह, उसकी बात पराषय नही द। जोभी दहो वनतक मथन जो.

सदलार म जीवातमा का रभ नदी द,. ` बह उपरोकत दो वचनो सदी परमाणित हमा ह,

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३२] तानतरिकगर [ पम तततव

महननदकरम‌ दवि पराणिताम‌ सषटिकारणम‌ । अनादनतजगनमलम‌ रषततवसय लकषणम‌ ॥

। पम तततव महा आननददायक दह, पराण सषटिकारक ह ओौर

- भआदयनतरहित जगत‌ का मल कारण ह ।

अनतिम तततव की आकाकषा जितन जीवमातररह, उनक हदयम

वतमान ह- जिसक आकरषणस जो नरक क पथ पर चढ जाता द, उत कथा इचछाकरनसही छोडा जासकतादह? जो वयकति रमणी

क हाय की मवहलना कर सकता दह, वह पराकतिक वाहवनधन अथवा काकषण की भगिनि त वच घकता ह। इती स अनयानय शासतर कहत

ह--“कामिनी-कशवन तयाग करो" ? किनत तनतरशासर कहता ह-- परितयाग का कयाउपायदट? बल परयोगस कितन दिन तक उसका

तयाग किया जा सकगा ? वह वल अधिक दिन तक रहन वा नही ह । इस विदवपरसारित परकति का अनलबाह क हाथोस वचना अथवा रमणी आसग-सपहा परितयाग करना सहज नही ह अथवा उस परितयाग की शकति किसी म नही ह । रमणीतव को जननीतव म परि-

णत करो, उसक होन स तमहारी पराकतिक पिपासा मिट जाएगी ।* इसी स तनतर म पशवम तततव की साधनादह। इसीस रमणी कोसाथ

ककर उचचसतर पर अधिरोहण किया जाता ह। पचमततवकी साधना म परकति वशीभत होती ह, अआतमजय होती ह भौर विनद साधनो म सषिदधिलाभहोतीह। कयोकि परकतिमतति रमणी अथवा

भातशकति स सदा आकरषित करती रहती ह भौर बाध क रखती ह । यदि उसी शकति की साधनादारा उसस आतम सममिशरण कर लिया जाय

तब मौर उसकी भाकाकषा कयो रहगी ! इसी कारण उसको वशीभत किया शया ।* तव साधक विहव क नर गौर नारी क बीच गौर

* मर दवारा परणीत “शानीगर” रथक नादविनदयोग शीषक भवनध म इस तचव को विशद करक लिखा गया ह ।

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यकतिकलप ] तानतरिकगर ` , . ` [ 88

` सवतनतर सतता दख नही पात; समपण समावशच उसी एक ही सथर पर

होता ६ । वह तब भौर रपज मोह नही रहता-पराण का वधन हो जाता

ह। आतमा म आतमा का मल मिलाप, विजली-विजखी स जिस परकार

जड जाती ह, यह भी उसी परकार का मिलनदह। इसस गौर विचछद

नही होता ह । दोनो शकतिया एक होकर भतमसमपकतति का ऊशच

उठाती ह । इसस परकति की परधानशकतिकी आग बक जाती हर. |

जीव जिस आकाकषा स दौडता ह, उसकी जवाला कम हो जाती ह५

तव जीव जीवनमकत होता ह । ध

तनतरोकत साधना स करमकः नरनारीक चिनतन स महायोगी `

होता ह;-- धारणा, धयान मौर समाधि म मगन होता ह, तव नाय

उसक सयम का आशरय बनती ह ! इसी स आधयारिमक योगी--इसपर स तीनतिक साधकन साधन-परवत क रिखरपर बठकर जञानकी

परदीपत अगनि इस जलाकर ततव-रहरय का आविषकार किया ह। यह

ततव-रहसय जगत‌ का अति अपरव कठोर विजञान ह; यह‌ कविकतपना-

भसत कथा नही ह । किनत यह भी समरण रखना होगा फि तततवदरशी

गर की सहायता क वयतिरक स इस समपरण कारय का मनषय कभी भी

समपादन नही कर सकगा, कयोकि पञचतततव क एक-एक तततव का

भाकरषण मनषय को भाबदध करक.रखता ह । साधारणसप स उसक

एक-एक पदा क सममिलन अथवा वयवहार स मनषय को पदतव परान

होता ह; जड-मनषय जडता की गगहखला म मौर बध जाता ह, ओर

पचपच को ककर मतत होन पर मनषय नितानत अधःपतन को

पहवगा, इसम गौर सनदह कया ह ? पशचतततव का साधना करना जीर

कालभजङग ञकर करीडा करना दोनो समान ह । कलाचार समपत व हो सकन पर मनषय इस पशवततव-साधना का अधिकारी नही होता

ह। ईसका भपवयवहार करन पर मनषय कया इस लोक कया ` परलोक दोनो को विनषट कर दता ह ।

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३४] | तानविकगड [ पचम तततव हरगौरी क चिव को दलकर दमी, कठोरसतय पर‌ पटच सकत

, ई । महाका, महामपय दषभारोण म, * उनक अङक म विशवजननी - परतिषठित ह । वरामादि क रपक की भाषा भ चतषपाद घम का नाम इष ह पचतमाद धम क उवर महाकाल परतिषठित ह भीर उनक अक मः उनकी शकतिः मयवा. परकति अधिषठित ह । इस चितर काः

` ममोरथ-जीवन-मरण क करो म अधिषठित ह, अरथात‌ मरण क.ही राजय

जीवन क नपधय का विधान हा ह । पररणक ही भीतर स जीवनः कापय ह। यह तदव बषडपी अटल विदवजनीन सतय म परतिषठित ह । महायोगी शदर क सक म जिस परहार शकरी मवसथित द, उसी

परकार तानतरिक साधकरक मकम पचम ततव ह। किनत पण चत- भादकोषगहमी दषम क ऊपर अधिषठित होना चादिए। इसीस

= फौल क मतिरिकत गौर किसी को धव साधना का मधिकार नही ह । मनषय जव कौडाचार म धिषठित रहता ह, तव वहा समण धम

षशसीत तव उसक करोड म पशचम ततव अधिषठित ह। वड तब तिषडशकति भ अनपरविषट रहता ह । । “ मनषयिरदिन प ही मातमविसपरत ह; वह‌ रजोगण क परावलय

स अपन को बपनःही सहज - समननत समनषता ह । यदि मनषय अपनी अवसया न समकष कर, अपन को उचचाधिकारी कलाचार समकष फर कठिन स कठिनितर साधना करन क सथि जाता ह तो उधका पतन मनिवाय ह। इसीलिए ग का परयोजन ह । शासतरवित‌ ` चिकित जित परकार वयाधि का निरणय करक गौषधि की वयवसथा करत ह, आधयातमिक-ञानसमपनन' गर भी उसी परकार शिषय क मधि- कार फो समनषः कर सराधना-पदधति फा पथ सथिर कर दत ह। साधक की आधयातमिक भवसयाः परापतकर साधना क पथ को निषट

करदत ह \ उस अवसथा फो तनवशासमर क. सात भागो म विभकत कर सत आचार नाम दिया गया ह । ।

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सपत आवार

आचार नामत हासधरविहित अनषठय कछ कायो फो समकषना

अरथद‌ कषसव भ जिन कायो को विधय कहकर निदिषट कियाऽया ह,

` जिनका अनषठान मवदय ही करना होगा, उसी को आचार समनयना

चाटिए। शासभविधिनिनदिति काय को भी भचार कटा जाता ह,

किनत वह‌ कदाचार ह । - अतएव आचार शबद स शासतर विधि-विदित

अनषठयः कारय समषटि को समञा जाता ह । आचार सततविष ह ।.

यथा--वदाचार वषणवाचार, ` हीवाचार, दकषिणासार, वामाचार

सिदधानतावार मौर कौलाचार। | न

इश समय कौन आचार किस परकार का ह--उसका लकषण

-निरदहित किया जा रहा ह । ॥

वदाचार--वाघक बराहममहत म गापरोरथान पवक गरदव क

नाम क अत म 'गाननदनाथ" यह‌ शबद उचचारण करक उनको परगाम

करगा 1 सदहलदक पदम म धयान लगाकर पञचोपचार स पजा करगा `

ओर बामभव बीज (ए) मरव दशच अथवा उसस अधिक जार जप करक `

परभ-का कलकणडलिनीशकति क .धपरानानतर यथाशकति मरमतर जप.

कर जपसमापन'क अनत म बमन करक नितयकम-विषयनसार

जञ तरिसनधया सनान ओौर समसत कम करगा । राति भ दवपजा नही.

` करना चाहिय । पवदिन भ मरसय, मास का परिरयाग करना

चाहिय मौर ऋतकाल को छोडकर सतरीगमन नही करना चाहिय ।

यथाविहित अनयानय वदिक अनषठान कर । ` ।

` वषण वाचार-वदाचार क वयवसयानसार चखरवदा नियभित

करियानषठान म ततपर रदगा । कभी भी मथन तथा .उसस सकरात बात `

ह भी नही करगा । दिखा, निदा, कटिकता, मासभोजन, रात म भाजा

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३६ | र तानतरिकगर ` [ सपत आचार

जप ,भौर पजा-कारय वरजन करगा । भीविषणदव की भजा करगा

मौर समसत जगत को विशणमय दखगा ।

दौवाचार-वदाचार क नियमानसार स शवाचार की वयवसया की गई ह । परनत शवो भ. विशष यह द कि पशघात निषिदध ह)

सव करमो म शिवनाम का समरण करगा बौर वयोम‌ वयोम‌ शबद दवारा गार बजायगा । ।

दकषिणाचार-वदाचार क करम स भगवती की पजा करगा

बौर रातरियोग म विजया (सिदधि) गरहण कर गद‌-गद‌ चितत स मनव जप करगा 1 चतषपय म, मलान म, शनयागार म, नदीतीर परा

मततिका तव, क नीच पवतगहा म, सरोवर तट पर, शकतिकषतर म पीठ-

सथल म, शिवाखय म, आवला वततकषर पर, पीपल अथवा बिलवमल म

बटकर महाशल माला (नरासथि माला) दवारा जप करगा ।

वामाचार--दिन म बरहमच भौर रातरि म पचततव (मद- मासादि) दवारा साधक दवी की माराधना करगा । चकरानषठान

, भनतरादि जप.करगा। यह‌ वामाचार करिया सरवदा मातजारवत,

"गोपनीय द । पशचततव मौर खपषप हारा कर सतरी की पजाः करगा; उघक होन स वामाचार होगा । वामसवलपा होकर परमाः परकति की पजा करगा ।

सिदधानताचार-जिसस बरहमाननद शञान परा हो जाय, जिस

परकार वद, शासतर, पराणादि म गढ जञान होता ह । मनव दवारा शोधन

-करफ दवी का परीतिकर जो पखततव ह, उ सको पञयशका वरजन परवक रसादशपः म सवन करगा । इस आचार की साधना क छय पहतया हारा (यजञादि सदश) कोई हिसा दोष नही होगा । सदा रदराकष अथवा

# खपषप अरयात‌ सवयभ, कणड, गोरक भौर वज पषप, इन सभी गषततवो को सी सयान पर गत रखना समीचीन सपरञा ।

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यकतिकतप ] तानविकगड [ ३७

असथि माला मौर कपालापतर (खोपडी) साधक ` धारण करगा गौर

नररवमवश धारण क साथ निरभय होकर परकारय सथान पर विचरण

करगा । ।

कौलाचार--कौकाचारी वयकति को महामनत-साधनाम दिला

ओर काल का कोई नियय नहीदह। किस. सथान पर दिषटकिसि `

सथान पर भरषट अथवा कहा भत मथवा पिाचतलय होकर नाना वश

सहित कौलजयकति भमणडल परर विचरण करभा। कौलाचारी वयकति

का कोई निषट नियम नही ह। उसक लिए सथानासथान

कालाकाल-अयवा करमाकम मादिका थोडाभी विचार नहीहोता।

करदम भौर चनदनम समकनान, शतर. गौर मितर म समनञन, दमशान `

भौर गह‌ म समञञान काचन ओौर तण समजञानः इतयादि-अरथात‌

कौलाचारी गयकति परकत जितनदरिय होता ह। (अतः अनतिमतरव

की साधना का मधिकरारी ह) भरथात‌ वह निःसपह, उदासीन मौर

. परम योगीषरष ओर अवधत शबद का योतक ह ।

| अनतःशाकता वहिः दवाः सभाया वषणवा मताः ।

नाना बशधराः कोला विचरति महीतल ॥ - ~-इयामारदसय

अनदर स शाकत, बाहर स शव, सभा मधयम वषणव दसी परकार

नाना वशधारी कौल समसत पथवी म विचरण करता ह 1

साधारण आचार अपना वदाचार, वदाचार स वषणनाचार,

दकषिणाचार स दौवाचार, दौवराचारस दकषिणाचार, दकषिणाचारस

वामाचार, वामाचार स सिदधानताचार गौर सिदधानताचार स कौला-

चार शरषठ होता ह; कौलाचार ही आचार की अनतिम सीमा ह, ईसस

शषठ आवार नही ह! साधक को वदाचार स आरमभ.करक करमस

उननति फौ उपलबधि करनी होती ह; एक ही बार म कोई कौलाचार

म आगमन नही कर सकता द ।

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३८ 1 | तानविकग [ सपत भचार

तनतौकत इस सप आचार क परति एक मनोनिवश करन स तनतर

शासतर-निनदाकारीगण अपन शरम को समजञ सकत ई! यह मद. -मास भोगादिविरसि को पण करना नहीह। यह सयम की पण

, साधना ह। साधक वदादि आचार करम स सयम अभयास मौर भग-

वदभकरित लाभ करत हए सिदानताचार तक पहचता द । इसक बाद साधक नितनी ही उचव भमि परर आरोहण करगा उतनी ही करमादि स निदतत हो जाएगी । करमशः जञान का विकास होगा । इसी परकार स उचच जञानभमि पर भधिरोहण करन स ही जप-पजादि | ही रहग, तव एक चिनमयी महाङकति को ही सरवतर दख सकगा; उस अवसथा म साधना भौ नही रहगी धयान भी नही रहगा, धयय भी

` नही रहगा ““एकमवादवितियम‌” एक महाशकति ही तव अवरिषट

रमी ।# मरा अहमतव विलस होगा, मन का असतितव विनिषट होगा, इनधिथ पराणादि निर होग । साधक इस अरसथाम पहच सकन. पर इतकराय होता ह भौर करम नही रदता। करमवनधन भी नही रहता भौर शरीरात होक वाद परम कवलयपद परसि करता

ह--नःस पनरावततप--उनङो ओर इत सार म पनरात दोना

नदी पडताद। इषीको निरराणमकरिति कह, वही कौरचार `

की चरमावसथा ह 1

योगमागकौलमारगमकाचारकरमम‌ परभो 1 . योगी भतवा कङ-धयातवा सवसिदधीरवरो भवत‌ ॥ ह परभो ! योगसाधना गौर कौलसाधना एकही परकारक)

कारण कौर वयकति योगी होकर क अरथात‌ कटकणडकिनी का धयान फरक समपण सिदधिगो को परात करता ह ।

*वही शरति का कथन ह--यतर ही दवतमिव भवति" “यतर वा अनयदिव सयाततपरानयोऽनयत‌ पशयत‌ भमनयोऽनयद‌ विजानीयात‌ ।** “यतन `

वा भसय शवमातमवाभतततकन क पदयत कन क विजानीयात‌ ।”

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भाचनरय

भाव शबदसजञान की ही अवसथा-विशष समकषी जानी चादिए\+ दिषय, वीर भौर पशयकरम स भाव तीन परकारक ह|

दिवयभाव- दिनयभाव म दवतलय, सरवदा विशदधानतःकरण होना पडता ह । -सख-दःसख शीत-गरीषम परभति दनदरभाव सहय करना होता ह । दिनयभावावलमबी वयकति रागरदरष-विव जित, सवभतोम

समदरशी भौर कषमाकलील होकर रहता ह ।

वीरभाव--जो सभी परकारक हिखा कारयो स विरत, जो सभी जीवो क हितसाधन म रत, जो जितनदरिय होता ह, जो महाबलशोली, वीरयवान‌ मौर साहसिक परष होता ह, जिसको सख-दःख का समजञान

होता ह, इस परकार क साधक वयकति को वीर कहा जाता ह ।

पदयभाव-पभाव म निरामिषभोजी होकर साधक पजा

करगा । मनतरपरायण वयकति ऋत-काल बिना अगनीसतरीको सपश , नही करगा । रातरिकार म माला-जप नही करगा भौरन तो सरा

का सपश करगा! । । |

पवोकति आचारसपतक को दिवय, वौर गौर परश भावतरय क अनदर

` सकषिविषड किया गया ह । अरथात‌ एक-एक भाव क मनतगत करई एक

को रखकर आचार नियोजित किया गया ह ।

वदिक वषणव शव दकषिण पारव समतम‌ । सिदधातवाम वीर त दिवय सत‌ कौलमचयत ॥

। -- विशवसारतनतर

- वदिक गाचार, वषणवाचार, शौवाचार आर दकषिणाचार ` पशभाव क अनतरगत ह| सिदधाचार गौर वामाचार वीरभावक

त ह। मौर कौलाचार को दिनगयभाव क अनतरगत समकषना होमा । ॐ

4

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४०] तानवरिकगङ ` [ भावतरय

इस सथान परर सशय उठ सकता-ह कि तरिविघभाव गौर सपत,

माचार‌. होत करा-कारण कया ह.?..एक.भाव भौर एकावार होन स

हीकयाहानि थीः? उसकी मीमासा-यह दह कि सभी मानव-जीव एक

परकार क परकति-विशिषट नही ह; गणभद स सभी कीपरकति सवततर

ह। -इसछए ' भाव-भरिविघ गौर आचार `सपतविध किए । उनम ˆ -जिसको-जो ` उपयोगी हः. वह उस परकार भाव ओर आचार गरहण

` करन स ही सिदधि-खाम कर सकत ई । यहा दखना होगा कि वह ` जण-मद किसपरकारकाह? `

सातविक, राजसिक.मौर, तामिकर-भद स साधन. तीन परकारक ह.कारण यह‌ दःहि उतम‌, मयम,+-भौर अधम--इनहीः तीन परकार क भावो सःवह सगठितहमाः ह यया--;: -- :*, . - +

:7 „-शरीरःतरिविधः-परोकतमततमारधयमधयमम‌ । >: # ततरव तरिविध परोकतमततमाधममघयममः1 ` "` । ५; | न .;~,. ,-शखयामड

अतएव जिषकी जि परकार की परकतिदह ; उसक किए उसी शरकार काशसाधनःही उपथोगीःठोताःहः।:' तमोगणः समपनन वयकति कभी भी उततम,धरथात साततिक साधन क उपयकत नदी हौ सकताः† कारिण इस परकार क सथर पर गण-विपयव क किए विरकति `विना आननदो- दव ` नहीःहोगा । मतक -सफतियकतःनः होन-त किसी कायम ही सिदधि परानहीकषी जञा सरकरतीथटदपलिएः जिसस मन सफतिभय हो वही

-उतकःलिफ)-विहित ह । इपकिए‌ तमोगण विशिषट वयकरित क किए तमसिङगःसाघनाःहीःपरषषसतः-ह | इस परकार रजोगण वि शिषट--वयकति क-ङिप;-राजसिकर = मौर सतवगण वरििषट गयकितिः क. लिए सातविक सना. हीःमगलकर होतरा ह: यहा समञलना होगाःकि दस शवितक अनसार जिसक शरीर म जिस परकार कायकषम होगा, उसक किए 'उस

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कतिकिलप |] तातिकगर ` 1५१ शरकारनकः भाव की; ही साधना-परणाङीशयसकर होगी । इसलिए बोधनापरणाङीः को शासत म: सातविकादिः भद स तीन" परकार म

उलक कियाःरयि ह ।यया-~ `

' 'शकतिपोधानधात‌ भावना तरयाणा 'साधकरय च † ` ` ` दिवयवीरपदनोशच “` “ भावतरयमदारहतम‌ ॥ ` त. ध ६ "` ` --सदरयामल

- ˆ --साधकःकीः कषमता क अनसार स दिवय; ` पशः; नीरकरमसि भावः तीनःपरकार क कह गय ह । भाव शबदः ` मानसिक धम को सम-

कनाःचादिए.॥यथा--~., ; ~ 1 क द त प

; 5 {भावोःहिः मानसोःधरमो. मनसव सदाभयसत‌ 1 ५.

ष ह पसक दि ज ल -- वामरकदवर ततर

;, मानसिक. धम काः--नाम,. भाव, दः. उसको. मन कः.ढारा ही.

भमपरात करना. होता हः। -: , तवपर ¦ ६ ८

55 ; सः सपरय वरातरःयहः ह -किः ; सनो भावः तो.; अपनः आपरही मनम

ठता: द ।.वरथाद.तमोगणरसमपलनः पविति का भावः; तामसिकः रजोगण

सिमपलःवयकितिःका भाव राजसिकः नौरःसतछगः ससपननः जयकतिःका

मनोभावः सादविकःतो(रमपतन मापः हीः होता, हः। : तब मन दारा

{साधकःमौर कौन-साःमसयास कररणा 2;उसकी उकति, यही द कर मकत-. ` परारथनाः दीः साधकराःका;-उद‌ शयःद ।; सातविक साधना-रित, जव

-अतयागयःसाधनानकारःक दवाराः मकतिलाभ- असमभव ह, तब सवयम‌

उदधततरामसिकरः मनोभावयकतययकतिकः किए कौत" उपायःदः? कारण साविकर भाततभवरलमबन.करत-क लियः.असयासः करना. दोगाः । दस

लिए इसत, का उपदरशःपहः हक ७ 55 3:

आदौ; भव .अशोः कतकहपशचात‌ःकयदरावशयकम‌

वीरभाक का महानाकःऽसतरभातोततपरोततममः। तलशचदतिसौनदर ; “दिवयभाव, ।:महाफररम‌ +\;

1;

१ ५)

~ |

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४२] तानतरिकगर [ भावतरय

करमशः अभयास करन क किए परथम पशभाव अवलमबन पवक काय समापन करक उततम वीरभाव धारण करना होता ह, उसक बाद

वीरभाव का कारय समापन करक अति सनदर दिवयभावको धारण

करना होता ह । अतएव समजञना होगा कि तमोगणातमक परणाली को

पशभाव, रजोगणातमक परणाली को वीरभाव आर सतवगणातमक-

परणाली को दिवयभाव कहत ह । इसकिए परथमावसथा म पदभाव मधय- मावसयाम वीरभाव मौर अनतिमावशथा म दिवयभाव आचरणीयह)

अतएव शासवरयकति क अनसार परथम ही पञयभाव द। इसकरा

कारण यहदहकि परश भथमअनञानदह; अरथात‌ जो पाशवदध अजञाना-

वसथापनन ह, वही प ह । इसचिए अजञानी वयकति का नाम पशह। साधारणतः मानव-जीव को सोलह वषकी अवसथाक अनदरही अजञानावसया को दर करना होता ह । इस सोह वष तक की मनो-

दतति को पञभाव कहत ह । सतरह वपस पचास वरष की अवधि की

जञानावसथा को वीरभाव कहत ह ओर इकावन वरष स बदधावसथा तक

की परिपकव जञानावसथा को दिवयभाव कहत ह । इस समय तक जीवः

काजञानोदयनहो तो वासतविकलप स उस समय तक पशयतलय ही

उस रहना होता ह । ईसचकिए उस काल की मनोदतति को पञभाव

कहन म कोई बाधा नही दखी जाती ह, उसक वाद जवजञान का उदरकहोताह तव सभी मनोदततिया उततजित रहती ह, इसलयि

उसर समयक भावको वीरभाव कटत ह । सवक अनत म जञान परि-

पकव होन पर मनोढतति जब शीतलता परापत करती ह भौर करिसी परकार भौगसपहा नही रहती तव मन भी निमल होकर शीतलता परापत करता ह ; इसलिए ततकालीन मनोदतति को दिवयभाव कटत ह । यथा--

सव च पशवः सनति तलवद‌ भतल नराः । तषाम‌ जञानपरकाशाय वीरभावम‌ परकारितः । वीरभावम‌ सदा परापय करमण “दवता भवत‌ ॥

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यकतिकतप ] तानतरिकगख, ` [४३

इस पथवी म समसतः लोग पञचतलय ह । जव उनम जञानोदय होता ` ह, उसी समय उनको वीरपरष कहा जाता ह । नमस वीरभावस

दवतलय गति पराप होती ह । । इसी कारणवश तनरलासतर म दिवय, वीर एव पशकरम स तरिविध

` भाव की ससथापना की गट ।*

भावतरयगतान‌ दवि सपताचारासत वतति यः स धम सकलम‌ वतति जीवनमकता न ससयः. ॥

--विरवसारतनतर

ह दवि ! जो भावतरय सकनिविषट सपताघारको जानतद। व

सकष धरम को ही जानत ह वही वयकति जीवममकत परष द ।

* पाठकगण न अवदय बदधम चनदर क "दवी चौधराणी' गरनथ का अधययन किया होया । भवानी पाठक न परफलल को घनवोकत भाव- शरय पर आशित रिकषा दी थी। भरफसक क तीन वष तककसणमकी जो वयवसथा थी वह तानतरिक पलभा की वयवसथाथी | बाद भ

चतरथ वष म उसक परति वीरभाव का आदश ह आ । अरयात‌ परफलल

को परथम पश सदश डर-डर खादयादि समबनध म सतकता गरहण करनी

पडी भी । वह शिकषा पण होन पर परफलल को भौर उस सतकता

परहण भावरयकता नही थी । तव वीर भाव मः उसको नाना परकार

सासविकभावविरोधी खादयादि क सममख उपसथित होना पडा ।

उदशय यह ह कि ईस. समसत खाधादि बरहण-जनित मनद फक क साथ `

उसका परव-पकार स शदधीकत साततविक भाव स सघषण उपसथित हो

वही वीर वीरभाव म उसी मनद फल की पराजय कर । पचम वषम

उसक परति इचछानकक भोजन फा उपदश हा ; उसन किनत वीर- भव का निकास कर दिवयभाव का गरहण किया । तनतरोकत भावतरय

क जआाशरयस किस परकार शिकषा. परापत होती ह--परफलल उसका

दषटानत ह ।

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५]; 'तानतिकगहः [तनतर का बहयवादः

`: इसीचयिः जदा तकःभारोषना दईटससःपाठकगणः समजञः सकत द कि तननि साधना अधिकारी भवःसः निणीतः हर द 1८ वह-साधक क हदय कौ मवसथा को ककर हई ह । इसीलिए समासादि ककर जोः साधना ह; वह‌ गोधयारिमिकः उननत हदय साधको कः लयिःद-1;;भतएव भाव अथवा जञान का अनवरती होकर अचार अयव -अनषठयःविषयः का अवलमबन।करना होगा (-: साधिक जि समय जिस परकोरः आनसद समपनन होत ई, उसी समप वहीः जञानानगत ` मथात‌ उसी जञानःसदित पराकाषठा को आचार कहत ह । उसी का आशरय कना होगा । इसका

विपयव करन स साधना म सिदधि शराति नही होगी 1 नही तौ इसक विपरीत लौटना हग । । ५

तनतर क शहमवाद परकति गौर परष क एक(तसभाव का. नाम‌ हय, द । यथा~--- क ।

शिवः परधानः परषः शकतिशच ;परमा-रिवाः। ` : : ~ °: शिवशकतयातमक -बरहमःः योगिनसतततवदशिनः॥

7 दयत 2 = (दमभगवती गीताः

` -शिव ही" परम पष मौरःःशकति ही परमौ परकति, तततवदरशी थोगीगण परकतिपरष की एकता को बरहम कहत ई । ।

कविङञा ,तनवररासतर म आसथान होन पर भी..अजञात भावस तनतरक आचार ओर भरावकी वयाखया कौ टह। इसम तनतर किस भरकार उननत शसतरह वह. सहज ही अनमय ह। इष परकार किसी नई बात का पता लगाना कोई बहत सहन नहीह। जो .इस

विशा हिनदधम क किसी लासवकार न कछ कहा नही ह ।

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यकतिकलपः] 5 : : तानतिकगरः, , [५५

बादयःजगत.क ' मम म जो महती. शकति-ह, उसीका नाम परकतिः

ह भौर बाहयः जगत‌ म. जो चतनय-सफति सवपरकाश ह, उसीका चाम:

रिव ह 1 इसी चतनय .मौर महतीः शकति का जब समषटिरप म एका-

सन पर दोनो फो एकतर जडित कटकरःअनभव होगा अरथात‌ दोनो म

स एक को सवतनर करन जान पर ` जब दोनो अदरय होग कहकर बओोधगमय होगा, तभी साधक बरहम को पटहचान सकगा । एक बरहय ही

: चणकवत‌ ` दविधा होकर ' परष-अरकति ` रप म परिददयमान दए ह ।

यथा-- :'“" `. तवमको दवितवमापननः शिवशकति परभदतः । १ ध

= । --काशीखणड

वही अदवितीय परमातमा ही शिव गौर शविति भद स दवितव

भावापललःहमा हः । 2 ह

१८ सषटि कः पव यह‌ जगत-कवल - सनमातर या ॥. व एक ओौर अदधि- तीय य 1 “उनहोन आखोचना की कि रमः परजारप म वहत होगा ।

` ` सतयोक निराकारा महाजयोतिःसवरपिणी ¢ ` माययाचछादितातमनी चणकाकाररपिणी ॥

" : मोयावतकर सनतवजय 'दविधाः भिनना यदोनमखी । ‡"` शिवराकतिविभागन `जायत ` सषटिकःपना ॥

-निरवाणतनकर ५ ट # र ८

-सतयलोक म .भाकार -रहितः: महाजयोतिःसवरप परबरहम महा- जयोतिःसवपाः-निजमाया - दवारा, सवय ही , आदतत ठोकर जणक-तलय

"जञ स विराजित ह: चणक :(:चतरए..) जिसः परकार एक मावरणः (चिका ) भः स अदभ.र सहित दो दल एकतर आबदध रहत ह, परकति आौर परषःउसी-परकार बरहमचतनय-सदहित आचछादन सः आटतत रहत

ह 1 - ची मयाङय" .वलकलः ( छिलका ) भद करक व शिव-शकति-

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४६ तानतिकगर [ तनतर का बरहमवाद

सपर परकाशित हए ह परकतिपरष को “बरहमचतनय सह‌"

कहन का परयोजन यह ह कि परकति परषातमक. जी वदह बरहम-चतनय ` शवारा ही सचतन हीती ह। बरहमचतनय परितयकत होन पर जीव- शरीर का कवल जड-मातर रहता द ।

बरहम जव निगण बौर निषकरिय रहता ह, तभी वह बरहम ह ओौर सगण होत ही ईइवर अथवा परष होता ह । मौर वही इचछा मथवा वासनाशकति ही परकति या माचाशकति महामाया द । वही परष ओर भरकति सरवतरगामी भीर सववसत म ही अवसथिति कर रह । इस

` ससाररम इन दोनो स विहीन होकर कोई वसत नही रह सकती ह । परमातमा निगण रह, व कभी भी दय नही होत। परमा--परकति-

शपिणी महामाया सजनादि क समय सगणा मौर समाधि अवसथारम - निगण ` होकर रहती ह । परकति अनादि ह, अतएव व सतत ही

इस ससारक कारणसपम विधमानरह; कभी भी कारयरप म नही

होती ह । व जब कावरपिणी होती, तभी सगण होती ह ओर जव शखष क सननिधान म परमातमा सहित मभिननङप म अवसथान करती ह, गरण-तरय की मामयावसथाक कारण गणोदधव क अभावमतभी

भरकति निगरणा होर रहती ह । । -

अतएव “र बहत होगा” बरहम का यह रप वासना सजात होन य उसको परकट चतनय भौर उसी वासना को मकातीत मल परकति कहत ह ।

योगनातमा सषटिविधौ दविधारपो . वभव सः । पमाशच दकषिणारदाङग वामाङध परकतिः समता ॥ सा च बरहमसवरपा च माया नितया सनातनी । यथातमा च तथा शकतरवयागनौ दाहिका समता ॥

। ~ बरहमरववततपराण -पररमातमसवरप भगवान‌ न सषटिकाम क किए योगावलमब-

` ब.करक भपनको दरो घागो य विभकत किया । इस भागदवय म दकषिण

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यकतिकलप |] तानविकगर [४७

अरदधाङग म परष ओर वामाङग म परकति ह। वह परकति बरहम रपिणी मायामयी, नितय ओर सनातनी ह! जिस परकार अगनिक `

-रहन स उसकी दाहिका शकति रहती ह, उसी परकार जिस थान म.

आतमा रहती ह, उसी सथान पर शकति रहती ह मौर जिस सथान पर

यरष, उसी सथान पर परकति वि राजिता ह । कारण--

शकतिराकतिमतोशचापि न विभदः कथचन । शवितमान‌ स शकति कभी भी भिनन नही हो सकती ह । यथा--

यथा रिवसतथा दवी यथा दवी तथा रिवः । भानयोरनतरम‌ ` विदयाचचनदरचनदरिकयोरयथा ॥

~ वायपराण

~ चनदर स चनदरकिरण की जिस परकार पथक‌ सतता नही होती;

उसी परकार शिव भौर शकति की. पथक‌ सतता नही, इसी कए

जहा शिव वही शकति ओर जहा शित वही शिव ह। साखय

कहता ह -- ` ।

परषसय दरानाथ कवलयाय तयथा परधानसय ।

पङगबनधवत‌ उभयोरपि सयोगसतत‌ङकतः सग; ॥ -- साखयकारिका.

-- परकति अचतन ह, इसलिए अनधसथानीय,ह ; परष भकती हः

शसकिए पडगसथानीय द; दोनो सयकत होकर एकर अनय क अभाव को .

दरकरतर। ।

जिस परकार अनधा दख नदी पाता मौर पग चर नही पाता, कित

अनध क कनध पर पग उठकर पथ दिखाता ६; अनधा उसको कनध

पर रखकर चरता.जाता ह । उसी परकार परकति गौर . परष सयकत

होकर एक क अभाव को दसरा पण करता ह ; उसक सयोग क फल

स सषटि साधित होतीदह।

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४८ ] तानतिकगर [ तनतर का बरहमवाद

फः यह.तपरकतति-पषः; उभयातमक बरहम-ही तनत की शिव-शकति द करिनतवदानतकरःमतम मायो मिथया ह;-करवल अधिषठानसप बरहमम हीः

मराफाःकरलतित रमराःरहता दः। कारणःअधिषठान की सतता स रहित.माया `

की पयकरः सतत की!भतीतिबरही होती हः। तव यहा शकति सषही अधि- षठान-भत सततारपणबरहछ कीः ही उपासना सततावित कहकर सवीकार

करनी होगी | फलसवरप; आकरार‌.-मः ; सकति क सवरपतव का परतिपदन होन-स.-कोई हष सगठितः नही हो सकता 1, -वयोकि `

बरहयातिरिकत सतता क शकति-विशिषट‌ बरहमको गरहण करना

होगा । उसी परकार शकतिकरी आराधना करन पर भी पलबरहयसतता-

विचिषट शकति कौ उपासना को समकनना होगा । परिणाम यह‌ ह कि

निरस निखपाधि का विशदध चतनथ सवरप परबरहम कौ उपासना समभव 'ही' नही उती अरकारः बरहय को छोडकर कवर महाशकति की उपसनामौ सरमभव नष ह 1 मधिञनत शकति का आशरय नहीह,व बह क हीःजधित ह) बहीतानविक की महाशकति ह- ` ।

शवरपमहादव -हदयोपरि ~ ससथिता । शवसपहादत दीनि परबरहय-द 1 --उनदी कोः माभ करक -

बरहमयकतिःकिपराशीर ह, उसी महाकाली न शिव क उपर सथित होकर षटि-सथिति-लय कोय को समपनन किया ह । यथा--

€ 1 2 3111: ~

<~ ॥गमदालिवरतर परत -परापतः.शिवः -साकषादपाधिना । सा तसयापि भवचछकतिसतया हीनो निरथकः ॥

. - सतसहिता 71 ग प एमि 1 5 1 न

{>= -ःशितरातिगण, शकतरारा इपाधि विशिषट. होकर-सगण होत इसहिमिःश करिन‌. धिव निरवकः.अरथात‌ `सानत जीव. पकष म वही

भतत‌ वरह दीः निररथकः ह,], ~

बरहय कागणदहीशिवदह, किनत यदि 'शकति ठारा उपाधिमखक

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यकतिरकिलयः |; , तानविकगरः [४९

नहो तव गण का अवलमदर.कह हः एभतलमबनहीनता क कारण ही

व फिर निगगःह-+ निगण होन. क->कारण स. ही तिषकिय ह इसम

ही शिव का शिवतवः तरह. ह। भगवान शङकराचाय.न.कहा. ह--

शरिवः.शकतया यकतो यदि भवति शकतः भरभवितम‌ ।

` <शिव यदि > शकतियकत ह; तभी उनका परभावः; नहीतोव निषकरिय 1 द इणः वि त (द प 1 ए

यनमनसा न मनत यनाहमनो मतम‌ 1 तदव बरहय तव; विदधि तरद यदिदमपासत ॥

रहम निण ह} निग ग कासन सभव ही नही: ;; अतएव शितत की सहयती स उसी~ उपासना करनी चोहिय । तानतरिक को शकतिः" उणाकषना सगण - बरहम की'>उपासनता - मातरः ह )-: एकः-बात स आाशकति महामाया सगण बरहय हः शवरपः शिवः अवरमबतत माधर ह

चितिसतत‌पदलकषयारथा चिदकररसरपिणी 1 " ; °= `

--चिति यह पद 'तत? पद का ककषयाय बोधक ह, अतएव व एकमातर चिदानतदसवसपा ह! पद द. सण

अतः, ससोरनशियिः सौकषिणीमोतमरपिणीम‌ 1:57; ; आराधयत‌: पराः शकति भरपशरोललासवजिताम‌ः॥। ~

गम म उ 4. सततदितः अतएव सपारनाश क निमितत षह साकषीमातर ह । समसत परपशच जौरः

` उललासादि-परि वजित मालमरदरपा पराशकति. की आराधना किजीय +.

इस महाककति भगवती. दवी,को. भाराधना स अहयः सायरय की

परापति होती हि । -यह‌, भगवती ही+जो -परमततर . परभनरहय ह ॥ बह. , भगवान, वरदलयास, क. भरति ऋगादि. वद चतषटय. की _ उकति स. सव-

सममति करम‌ स परमाणित दोगा । . ` न ध क क ~ ~ ^, ९

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५० ] . - ` तानतिकगर [ तनवका बरहमवाद

चऋणवद की उकति यदनतःसथानि भतानि यतः सव परवततत । यदाहसतत‌ पर तततव सका भगवती सवयम‌ ॥

-- सथल सकषम यह समसत जगत‌-परपख--जिसम सकषमरप स ` विलीन रहता ह ओर जिसक इचछानसार सचराचर जगत‌ स परकाश-

मान होता ह जो सवयम‌ भगवती शढदस कीरतिमती होती ह-वही

, परमतततव ह|

` यनरथद की उकति या यजञ रखिलरीशा योगन च समीडयत । यतः परमाण हि वय सकरा भगवती सवयम‌ ॥

-निलिल यजञ गौर योगदवारा जो सतयमान होति ह ओर जिसस ` हमलोग धम विषय म. परमाणसवखप हए ह, वही अदितीया भगवती ही परम तततव |

| सामवद की उकति ययद भरामयत विदव योगिभिरया विचिनतयत ।

यदधता भासत विदव सका दरगा जगनमयी ॥ -- जिसक दवारा यह विशव-ससार भरम विसित ह ह, जो वह‌

योभीगण की चिनतनीया ह, जिसक परभाव स ही समसत जगत‌ होत हए

पाता ह, वह जगनमयी दरगा ही परम "तसव र ।

अथववद की उषित

` य परपशयनति दवशो भकतानगराहिणो जनाः । तामाहः परम बरहय दरगा भगवती मन ॥ -जिन जनगरहाशित लोग भकतदरारा जिनको विदवशवरी सवरप

म दल. पात ह, उनको भगवती दरगा कहत ह, व ही बरहम ततव ह ।

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यकतिकलय ] तानविकगर [५१

वद चतषटय कौ उकििदरारा भविसवादितशप स मीमासित हमा फि यह‌ दवी ही बरहमथादी रषिगणदवारा परिनिशित होकर वद ओर वदानतम इसी रप स परदरित हई द। इसीस तानतरिक साधक सचचिदाननदमयी पराशकति दवी को परबरहम-रपिणी जञान स उपराना करत ह । पर शवितिक अवरमबन क लिए शवषप महदव को सयकत कर लिए ह । अतएव तनतर-शासतर क मत स परकति-परषासमक शिकडा षित ही परबरहम ओर उनकी उपासना ही बरहम-उपासना ह ।

शकत-उपासना

शकति-उपासना आधनिक नही ह । आयजाति की परवल जञानो- सरति क समयव महाशकति क.असतितव को हदयगम करन म सम हए य ।# सतययग म सरथ, तरता म रघवशावतस रामचनदर

# परयाग नगरीकलाट की परसतर-लिपि कापाठ करक जञात इभा जाता ह कि सपतदश शताबदी क पव गसवशीय नरपतिगण म

करई एक शकति-उपासफक य। कानयकमनपति महनदरपालदव मौर उनक पतर विनायकपाल परदतत ताशरशाशषन पाठ स अवगत हमा जाताः ह कि शकावद की अषटम शताबदी स कानयकननपतिगण

परायः सभी शाकत य ? गौडशवर महाराज लकषमण सन क तासरशासन

क शीषदश म दवी दाकषायणी कौ परतिमति उतकीण ह । एसक दवारा सहज ही अनभित होता ह कि शकति सनराजागणो की कलदवता |

रायः आठ शताबदी पव मदी तानविक धम की परबल उननति हई

यी। इसी समय हमारी बगला भाषा का जनम हमा । शकति उपा-

सक दवारा ही बगला भाषा का सवपरथम महाकानय (कविवर मकनद-

राम चकरवती कत चणडीकाशय) रचा गया था ।

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५२) ` तानतिकगह ` [ शकतिडपासतरा

महाशकति.की पनाक -.यी-। बह, महाशकति नितय, जनम‌-मतय- सवभावा, जगत की आदिकारणः ह ।-यह‌. शरहयाणड ही उनकी

अपिर, उसस यह ससार निसतार. हमा द । जिस अनादि मलशकति

स यह‌ निखिल रहमणड षट हवा द, विजञान भौ उसक असतितव को सवीकार नदी कर सकता दः _ इस निखिल, जगत‌ क.मल भ जो -शपिवचनतोय, , अचिनतय, „ अननत‌, -मज य, एक , महाशकति, धिराजित | रहती ह 1. इम.पादचरातय पडितगण --कत-कठ.स सवीकार किए ह| विजञान क उबडसाबड माग स अहनिश शरमण करक पाइवातय

वभनानिकगण ईस महाशकति क असतितव मातर स मवगत हए रह

जिख समय हरबररसयसर परभति पडितगणो क परवपरष निवसन होकर वकषकोटर म रहकतथःतौरपवननति फलमल स कष.निवारण कत. यदतीःसमगर गारयगण, जान^मौर भकति, क सरल मारग स. गमन रक उसी, दागकति का-दशनपाएबः। क ~ 2

5 ए पनिषद क समय ओगण समकष गय यकि जिस शकति सः दवराज इनर तिह-गहयाणड. चण: कर - सङगत ह। जिस, -शकति स , अगि विरव

दाटतरकरः सकती ह, जिसः--शकति म.पतन‌ विदवःतरिकोडन . कर सकत

ई वह.=गतिःःउनकी,अपरती,- शकति नही ,ह ।. अनय एक महाशकति सव अपरतीःमपतरी, शकतिपात किए ह| उस.समय. उसी महाशकति तिरया को.मगतरतीरपः ममदशञन दात. किया था.। {दः

िदणणा ०1६४ ^ णी "शालाः ` दरलङतणिणष १०६63" 11. ~ "५ ससर न इस महाशकति ॐ सवलप कौ अपरिलय' कहा ह ५ पडित परवर मिलन इनकी जड-शकतिक सय म विवचना की ह ।'भकतिका अभाव दी उनकी इस परकार कौ विवषना करता ह 1 _ ` ` `

र न प

+ 1 + 1॥ ५." 4

“ टर सपसर‌ कहत ह~ ल6 ३8 ० 100 दत‌

क त नः

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यकतिकलपः] ,: तानतिकरगड [५३

अदर तवादियो न इसी महाशकति को जञानयोग स विलोडन करक ऊपरी दषट स एक. -अपव, अदवितीय चिनमय पदाय को दषट-लपम

ससथापित करिया था मौर उनक ` नीच उनही क आशय स दयप घः इस विरव--बरहमाषड ` की अननत शकति क कनरीभत पदाथ की.रकषा

करक विङवलीखा की सनदर मीमासा कौ थी । सासयकारो न रभा धस ऊपर क पदारथ. को षखष ` ओौर नीच क पदा को परति कटा हः। इसकिए तानतरिको की आराधय महाशकति ' धन दोनो की विशाङ समषटि ` होकर खडी ह । जड-अजड षर-अचर सभी इसी अननत

सतता क अनतरगत ह । इसलिए ईसी निगण समय म परीया, सगण

अवसथा म सतवरजसतमोमयौ ईः+तव रजोगणः. सषटि; सततवगण म सथिति भौर तमोगण मः-विनाश साधित :होतराः-ह 4; महातिरवाणतनतर स-उदधत करक, दस समबनध म.कछ--वणित (होः+- महादव (शिव) न कहा-था--- दहि, दवि ! लोग‌-तमहारी साधना स; बरहम-सायजम-को.तरातत

कर सकत ह, इसलिए. म. तमहारी; दी ~ उपासना; ;की नातः कहता-ह :1

` ह-रिव.! तमही -पबरहमःकी.--साकषात‌ परकति ,होऽःवमहार,ःहोनःस-दी जमत‌ की उतपततिःहई ह; जगत‌ की-जनती, हो + ह भदरः {महतत

..स परमाणपरयनत. गौर - समसत - चराचर सहित- यह जगत‌ तमस उतपादित हमा ह; यह निर जगत‌ कररी धीती स बदध, द । दमही समपण :वियाओ क आदिभत हो "मौर हमलोगो की जनम- भमि होः1 तमःसमण जगत‌-को अवगत हौ 7 किनत । तमको कोई भौ नही जान-सकरतीः।" तमः सरवदवमयी" भौर सवषकतिःसवङपिणी हो । तमही सथल; तमदीः सकषम, तमही :शयकत मौ र 7 बबयकतलवररिणी हो तम निराकारःहोकर ` साकरः हो; : तमहारःी परङतततक -स कोईभी

मवगत नहीहग-तमःसरवनसवरपिणी , गौराः सभी कीः परधाना जननी

हो; तमहार षशटःहोन स.सभी- तषट होतह तम षटि-क जदि स तमोखप- म अदकय भाव स विराजिता थी; तमही परबरहम की सषटि करन कीः वासना हो; तमही सः; जगत‌ उतपनन हभ ह । महततचव स

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। ५४ 1 | तानतिकगर [ शकति-उपासना

आरमभ करक महाभत परयनत निलिल जगत‌ तमहारी ही सषटिरद। सव कारणो क कारण परबरहम कवल निमितत मातर ह । बरहम सतयसव-

~~ ~~

कारण होकर रहती ह । महामति मधस न कहा ह :-

खप ओर सरवबयापी ह; उनहोन समपण जगत‌ को मावतत करक रखा

ह; व सवदा एक भाव स मवसथित ह; व चिनमय बौर सभी वसतओ स निति । व कछ भी कर नही ह; सतय भौर जञानसवरप आदयनत वजित मौर वाणी ओर मन स अगोचररह। तम परतरा

महायोगिनी, पम उसी बरहय की इचछा मातर अषलमबन करक इस चराचर जगत का सजन पालन गौर सहार करती ह ।#

यह महाशकति विदयया भौर अविदया-सवरप म मकति मौर बनधन काकारण बनकर रहती ह । यदि कोक कि एकही परकति बनधन भौर सकति का कारण करिस परकार हई ? उसका उततर यह ह किएक ही सनदर रमणी जिस परकार परियजन क सल का, सपतनी कदःखकागौरनिराशपरमीक मोहकाकारण हो जाती ह; उसी परकार महाशकति विदया ओर भविदयाखप स मकति भौर बनधन का

कण दवी महाभाग भवाराधनकारणम‌ । तव साघनतो यन बरहमसायजयमरनत ॥ तव परा परकतिः साकषात‌ बरहमणः परमातमनः ।

` तवततो जात जगत‌ सरवतव जगजजननी शिव ॥ महदादयणपयनत यदतत‌ सचराचरम‌ । तवयवोतपादित भदर तवदघीनमिद जगत‌ । तवमादया सवविदयानामसमाकमपि जनमभः ।

- तव जानासि जगत‌ सव न तवा जानाति कडचन । --इतयादि

(महानिरवाणततर, ४ उललास दखो 1} -

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यकतिकलप ] तानविकगद [ ५५ ८

. नितयव सा जगनमतिसतया समोहयत जगत‌ । सव परसनना - वरदा नणा भवति मकतय ॥ सा विदया परमा मकतहतभता सनातनी । ससारबनधहतशच सव सरवशवरशवरी ॥

--शरीचणडी `

वही भला' परकति महाशकति नितया .ह, जगनमति ह--गौर उनहोन समसत जगत‌ को मगध कर. रारह। व परसनन होन पर

मनषयो को मतत क लिए वरदान करती ह । व विधा ह, घनातनी- मौर सभी की ईदवरी मौर मकति ओर बनधन की हतभता ह ।

। तथापि ममतावतत मोहगरत निपातिताः। महामायापरभावण ससारसथितिकारिणः ॥ तननातर विसमयः कारयो योगनिदरा अगतपतः । महामाया हरशचतततया समोहयत जगत‌ ॥ . जञानिनामपि चतासि दवी भगवती हि सा । बलादाकषय मोहाय .महामाया परयचछति ॥

- तथा विसजयत विव जगदतचचराचरम‌ । ` सषा परसनना वरदा नणा भवति मकतय ॥

-शीषडी - जगत‌ की लथिति क समपादन क लिए उस महामाया क

भरभाव स जीवगण ममता-आवतत-परिपण मोहगतत म निपतित होत ह ।

दसरो की बात कया कह, जो जगतपति हरि ह, व ही इसी महामाया

„ हारा वशीकत रहत द । य सरवनदरियशषकति की नियनतरी द; इनका दशवय अचिनतय ह; य जञानीगण क चितत कोभी बलपरवक समगध करदतीर। इनक दवारादही चराचर परमसत जगत‌ परसतः य

प होन पर लोगो की मकिदातरी होती ह । | ॥

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५६] तानविहगर [ शकति-उपासना

तयतनमोहयत विदव सव विदव परसयत । . ` सा थाचिता च विजञान. तषटा ऋदधि परयचछति ।

वयपतनतयतत‌ सक बरहमाणड मनजशवर । महाकालया महाकाल ` महामारीसवरपया ॥ सव काठ महामारी सव सषटिरभवतयजा । सथिति करोति भताना सव काङ सनातनी ॥ भवकाल, नणा सव लकषमीवदधिपरदा गह । सवाभाव तथा लकषमीषिनाशायोपजायत ॥ सतता समपजिता परषपध पगधादिभिषतया 1 ददाति विततपतराखच मति घम तथा चभाम‌ ॥

इस दवी क दवारा ही यह विदव बरहमाणड मगध - हयता ह; वही इस विशव की सषटि करती ह; इनक निकट परारथना करन स तषट होकर जञान

ओौर समपद परदान करती ह । इस महाक दवारा भननत विशव परिवयापत द। य महापरलय कालः बरहमादि की भी मकसमात आतमसात‌ कर कती ह मौर लणडशरलयम ही समसत पराणीगण का पालन करती) ह,

किनत इनकी कमी भौ उतपतति नही होती ह (य नितय । लोगो क मभयदयकालम यही वदधिपरदा लकषमीरह । भौर अभाव क-समय जछकषमीकषप म विनाश करती ह । इनका सतवन करक पषप, गनध, धपादि दवारा पजा करन स वितत-पतरादि दान गौर धमस शभ- बद परदान करती ह ।> `

आराधिता. सव नणाम‌ भोगसवरगापवगदा । --शरीचण

` इनही महाचणडी क शरणापनन होकर इनकी आराधना कर सकन स भोग, सवग ओर मवि की पराति होती ह।**#

** महामाया की मारना का कारण गौर ततसाधनोषाय मतमणीत “शञानीग‌ रः” पसतक म मायावाद शीरषक निबनध भ विसतार स लिकलागयादह।

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यकतिकलप 1 तागतरिकस, $ [ ५७.

- एक मातर महामाया की आराधना करक उनफो असनन कर सकन पर जो मकति का हतभत तततवजञान उतपनन हना ह, आकञा ह कि- इसको

सभी समकष गय होङख । हम लोगोक जञानको वही. विषयरपिणी महामाया ससारसथितिकारण सः विषव करक मरमतानतपण मोहगतत म गि राती ह । वह जञान उसी जञानातीत महामाया क बर- .

दवारा आकरषण ओर हरण करक. जीव को सयकत रखता ह ! इस भरकारस व हस जगत को सथिर रखती ह। नहीतो कौन किसकाः-

ह- किसक लयिकया ह? यदि मायावरण उनमकत हयौ जाय, यदि मोह का चशमा खल जाय तव कौन किसका पतर ह, कौन -किसकी. कनया ह, कौन किसकी सतरी द । वही महामाया रप, रस, गध, सपश, शबद दवारा हाट बसा करक जीवगण को परङञध.करढ इस भावरपी

ह‌।ट काखल खटा रही रह । दस रप, रस, गध, सपश, शबद क परलो- `

भन जीव गपनको जोडकर घम रहा ह--इनक आकरषण म समपण जीव उनमतत ह । जीव का साधय नही कि यह‌ नशा, यह‌ आकल तषा निवारण कर पाव । तब यदि वह. विषयाधिषठातरी दवी उस परमविदया- मकति की हतभता सनातनी परसरन हो, तज भी जीव इस बधन स विमकतदहो सकता ह। इसीलिय परमतसवजञ

महशवर न कहा'ह :-

शकतिजञान विना दवि मकतिरहासयाय कलपत । अरथात‌ शकति उपासना भिनन मकतिकी आशा हासय जनक भौर

बथा ह । शवित उपासना उसी बरहमरपिणी महामाया की साधना

ह । उनकी साधना करक साधक परकति की जो सखलालसा ह, उसका ही उपभोग करता ह गौर मोहावतत को विनषट करताह । परकति

क रस का उपभोग करक मायाक बधन क जाकरषण की जकलता

कोःविनषट करक, शकतिसाधना म उततीण हो सकन पर दाधक बरहम-

सायजय की परापति कर सकतादह।

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ॐ ५८}. तानतिकगर [ शकति-उपासनाः

साधक परथमतः सदगर क निकट स दवी का मनतर गरहण करत हए

काय-मन-वाणीदवारा उनको आशरय लकर सरवदा उसस मनोविधान

की चषटा करगा तदगतपराण होकर रदगा स छीन होगा 1 सवदा

उसका परसग उनक गणगान ओर उनक नाम-जप भ समतसक रहगा } ` जो साधकोततम मकति की इचछा करगा वह‌ उनका भकतिपरायण होकर

उनकी पजादि क परसग म परीति परवक हदय स तललीन होगा । मपन-

अपन वरणाशरमादि ओर बदविहित गौर समसयनमोदित पजा-यजञादि

हारा उनकी ही अरचना करगा अरथात‌ कामनारहित होकर इन सक

अनषठाना को दवी की परीति क किए ही करगा । कयोकि - . जञानात‌ सजायत मकतिभकतिरञानसय कारणम‌ 1 धरमात‌ सजायत भकतिघमो यजञादिको ` मततः ॥

--भगवतीगीता

यशादिदठारा धमलाभ; धम त.भकति, भकतिस कञान गौर जञान स मकति कीगराति होती ह। ।

अतएव धरमा सभी ममकष, लोग यजञ, तपसया मौर दान हारा दवी की उपासना करग; उनक दवारा मशः जव भकति दढतरा होगी,

उसक वाद ही तततवजञान का. उदय होगा 1 उसी तततवजञान क दारा

मकति परात होगी । दसी परकार शासतरविहित कम स अनतःकरण निम होगा, तव आनमजञान उदीप होन स सदा इचछा होगीकि कितन दिनो भ परमधन की पराति होगी, तब समसत जगत‌ भौर सभी (सतरी पपरादि) क परति एणा होकर भौर उसक दवारा दवीक सचचिदाननद सयरप नितय विगरह भ मनोनियश होता ह भौर उसक लिए उपथोगी वदानतादि शसतर म मनोनिवश होता ह ।` गरपदश की

` सहायता स इन सव अधयतमशासतर की भालोचना करत-क रत उनक नितय कलवर का उसी बपार ननद सागरस किसी समयभी

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यकतिकलप ] तानतरिकगर [ ५९

अतवतप कालक लिषएभी अनतःङकरणका सपकहोतादह। उसी )

नगत‌ क समसत पदारथ अयनतरन सय सख का कारणरपस परतीत

होता ह।. उस किसी बसत क जभिलाषा नही रहती द, इस

लिए कामना कौ परितयाग‌ हवत ह । समबण जीव पदारथो को -दवी की सतता का निशचय होन नहली जीवो क परति परम यतन उपसथित होता ह। इसलिए हिसा रका परी परितयाग दहो जातय द। इसपरकार

भावापनलन होन स ही तततवविदया आविभता होती ह। इसम कोई सनदह नही ह । ततवजञान क उपसथित होन स ही उनका नितयाननद विगरह जो परमातमा भाव ह, उसी का साकषात‌ परतयकष-होता ह। उसौ स साधक की जीवनमकति की उपलरचधि होती ह ।

निग णा सगणा चति दविध। परोकता-मनीषिभिः 1 सगणा रागिभिः सवया निगणात विरागिभिः॥

-दवीभागवत

वही परबरहम रपिणी सचजिनाननटमयी पराजञ नित दवी को बरहम- वादी मनीषिगण न सगण भौर निगण भद सदो परकार बताकर. कीततन किया ह ; उसक बीच ससारासकत सकाम-साधकगण. उसक

सगण भाव को ओर वासनावजित जञानको वरागयपण निमलचता योगीगण निग णभाव को समाशरयपरवक उपासना करत ह । उसका कारण दवीकी वाणीक ठाराही मीमासित होगा। गिरिराजक परशन पर पावती न.कहा ह :--

“ह पितः ! सल सहलत मनषयो म स कोई गकष म भवितयकत होता ह । सहसर -सहसर भकतियकतो म स कोई मरा तततवक-होता ह । मरा जोरप परम सकषम, सनिमल, निगण, निराकार, जयोतिःसवसप‌,. सवबयापी अथच निरश वाकयातीत, समसत जगत‌ का दवितीय कारण ~ सवरप; समसत जगत‌ का आधार निरालमब विविकलतप, नितयचतनयः,.

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६१ | तानमिकगह [ चकति उपासनाः

-नितयाननदमय ह, मर उसी रप को मभकष वयकति दह‌-बनध विमकति क निमितत मवलमबन करत ह । ह राजन‌ ! मायामगध वयकति. सवगत

-अदतसवरप मर मगययरप को नही. जान सकता ह।.किनतजो -भकतिःपरवक.मरा भजन करा ह, व ही मर परमरप स गवगस होकर -माया जाल स उततीण होत ह । ह भधर ! सषषमरप सदश सथलरप सभी रम इस समसत विदव को, परिवयापर किमा ह । इसकिए समसत

रपही मर सथललप.म गणम ह । तथापि मरी दवी मति की आरा- -धना करनी. होगी, कारण वही शीघर मकति. दानम समथदह। -यथा:- ।

महाकाली. तथा तारा षोडरी भवनशवरी । भरवी बगला छिननमसता महातिपरसनदररी ॥ : धमावती च मातङखी बणामाशय विरकतिदा ।

--भगवतीगीता

“इन कई एक मतियो म स किसी भी एक मति को दढ भकति "परवक उपासना करन स शीघरही मकति की परापि होती ह। परथमतः

-करियायोग दवारा. उपासना करत-कसत जव गाढतर भकति का उदय होता ह, तब पररमातमासवलप मर सकषमरप म दढ विकवासक

दत कभी-कभी गवलोकित होकर जगत‌ की किसी भी रमणीय वसत को उसको अपकषा रमणीय ह, एता शषात नही होता । जगत‌ क किसी

लाभ को उसस अधिक बोध होता ह। उसस करमशः मह परा (होकर व साधक दःखालय अनितय पनरजनम को फिर भोग नही करत । मननयमना होकर जो वयकति मजञ सदा समरण करत ह, ओ उसको इस दसतर ससार सागर स अवशय ही उदधार करती ह । अननपरचता

होकर मर जिस रप काभजन कर, उसीसही मकति की उपरनधि होगी । किनद सतवरः मकतिलाभ क लिए शकतिमय रपका आशरय. कना कततवय ह । अतएव पिता 1 आप मर जिस किसी शकतिमय खप

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बकतिकलप ] तानतरिकगर [ ६१९.

का आशरय परवक उसीभही भवित सथापन करक सवदामकषमदही अनतःकरण का अभिनिवश करतो उसीस ही मन परापत करग 1

। निषकष यह कि-सथलरप स चिनतन न करक सदमलप स कोई हदय म धारण करन म समथ नही होता। इस सकषमरप क दशन मातर स मनषयगण मोकषधाम क अधिकारी होत ह! जन तक सथट- रप म चिनतन नपणय नही होता, तब तक सकषमकप म अनतकरण मन नही कर पाता 1 अतएव ममकष वयवितिगण परथमतः सथलरप

करा अवरमबन करक करियायोग ओर धयानयोगदवारा उसीरपक विधि-विधान स अरचना करत हए करम स मकषमरप का अवलोकन करत ह ।

यहा तक जितनी जालोचना हर, उसका साराश यह ह कि उपा- सना नही करन स मनषय सिदधि करी पराति नही कर सकता । कित निगण बरहम शरीर-रहित ह । इसङिए किस रप म उनकी उपासना हो सकती रह. । उसी चित‌-सवरप, अदवितीय, भायापरिशनय ओर

अशरीरी बरहय न उपासको की उदासना क सौकरय काली, दरा, मपरणा परभति सतरीरप भौर शिव, विषण परभति परषसपका परिगरह किया ह । सतरीमति की अरथात‌ दवी का अनतःकरण असयनत कोमर ह, इसलिए साधक की दगति दखन स सन ही दया-परबण. हो जाती ह। कित परष-विगरह अति कठोर तपसया करन पर दया

करत ह । अनय दवताओ क उपाक म कोई मकतिः लाभ करता ह, कोर अतर भोग-सख कोः परास.करता ह कित दवी क उपासको कोः भकति भौर मकति दोनो ही हसतमत ह । अतएव सभी को. महाशकति. दवी की उपासन करना करतबय ह,.कयोकि उसम शीघर ही फल-राभः.

होता ह । यह महादकति विदया मौर भविदयाशपम दविविधा ह। विदया गौर भविचा, दोन टी माया-कलपित ह ।. जो, बनधन का कारणः

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६२ ] ` तानतिकमख [ शकति उपासना

ह, बद अविचाहमौरजो कति का कारण, वह विदधानामस परसिदध ह । विदया कौ सवदा सवा करर, कभी भी भविदयाकीसवान कर । कारण भविदया कक दवारा बनधन उतपनन करकजञानको विनषट करती ह। जञनकनषटहोनसहीहानिहोतीदह; हानि होन .

वहीसहर, षहारहोनसही धोसभौरधोरसही नरक होता ह।

अतएव कमी भी अविदया की तवान कर । नो विदया ह, वही महा- . | माया रह, षणडितगण सदा उनकी सवा करग । इसी म अपन-अपन

, भधिकारानसार सजचिदाननदसवरपिणी दवी क बरहमरप कौ अथवा दवी कौ सथल मति की उपासना कर । दवी का वह‌ उककषट सकषमरप कोई धयान-घारण म नही खा सकता; कवल निमलचताः योगिगण

निविकलप समाधियोग स उम परपत करत ह । यथा--

` एक सरवगत सकषमकटसथमचल धरवम‌ । योगिनसत परपशयनति महदिवया : पर पदम‌ ॥ शररातपर तततव शाशवत शिवमचयतम‌ । अननतपरकतौ रीन दवयासतत‌ परम पदम‌ ॥

` शभर निरञजन शदध निग ण दनयवजितम‌ । बातमोपकवधिविषयम‌ दवयासतत‌ परम पदम‌ ॥

-कपराण

, --एक मातर अदवितीयः सरवतरगामी, नितय चतनय-सवरप कवल योगीगण ही उस निरपाधिक सवरप का दन कर पनि म समय होत ई। रकति-परिलीन, अननतम गलसवरप दवी क उस परातपरतततव

. बौर परमपद का योगीगण ही अपन हदय-कमल म साकषातकार कर

सकत ह । दवी का, बही अतीव निरमल, सतत विशदध, सरवदीनतादि- ` दोषवजिव, निगण, निरचन, कवल मातमोपरनधि क विषय परम-

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-यकतिकतप | ~ तानतिकगड [६३

धाम का एकमातर विम चता योगदवर परष ही दरशन कर -सकत ह ।*

अतएव साधारण लोगो क लिए काली-गादि सथख-रप की उपासना विधि बदधहरदट। म भी इस गरनथ म उस विषय म विसतत विवरण

. -करधा । ।

दवमति का तततव

भकत को मोकष परदानाथ, `उपासना क सौकरय क लिए भकत- -वतसल निराकार परजरहय न आकार परिगरहण किया ह।

सवषामव मरतयाना विभोदिनयवयः शभम‌ । सकल भावनायोगय योगिनामपि निषकलम‌ ॥

-लिगाचनतनव

अरथात‌ बरहम का करमयोग, जञानयोग मौर भकतियोगशारी मनषय का

` भावनायोगय सनदर शरीर द । इसकिए आवासयोगय रमणीय परीभी ह। वह परी परम रमय भौर सषपत ह । अरथात‌ सब लोगो की जिस परकार जागरतावसथा की अपकषा सवपनावसथा अधिकतर गपत ओर मधिक- "तर. आदचय भमि ह फिर सषसि अवसया भौ उसकी अपकषा गसतम ओर अतयाशचय रप म दशनीय ह; आदयाकषकति की परी भी उसी परकार

-गषतम अतयाधचरयहप म दकनीयह। वह परी चतदशदारयकत ह; सब परकार क रतनमय तोरण-पराकारसकल रलनोस विभषितदह) चतदिक मततमाला स परिशोभित ट। विचितर धवज-पताका ` सब अतयनत अलकत ह । आरकतनतर सदहसर-सहसर भरव खटवाग धारण कर

दवी क योगोकत साधनोपाय मर दवारा रचित “शञानीगख"

शसवक क “'साधनकाणड'' म दरषटवय ह। .

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६४] . तानतिकगर [ शवित उपासना

दवार-दश की रकषा कर रह रह । दवी की आजञा विना बरहमा, विषण ओर

महहवर भी उस दवार का समलघन नही करपात द परीमसभी कलप-वकष फल-एल क भार स ञकी शाखाओ सहित भकत लोग को धरमाथ-काम-मोकष परभति फल परदान करत ह| उस सविसतीण परी क उततर परदश म अतिनहद‌ पारिजात उदयान ह; वह उशयान सदादहीः

परफलल कम स समाकौण ह; विचितर भरमर-मालापषपस पषपक

भीतर उडकर बठ ह । वसनत ऋत‌ सवदा विराजमान ह; ओर मनद-मनद वाय सदा परवहमान ह । बरहमादि दवतागण नाना परकारसत

पकषीरप धारण कर मधर नदो म कषीगण गान करक काल-यापन करत ह । पव दिशाम चारतर एक सरोवरदह, उसक चारो भोर

सवणमय कमल कमद समह विराजित ह । व विचितर मधप-शणी-यकत होकर मद-मद वाय स सचारित । पलि दश विविध सनदर परषो स सशोभित द, चतदिक मणिमय सोपानयकत तीथचतषटयः सशोभित ह; परी क मधयसथ म नाना रलनोस विनिमित गौर सवरणवषठित मणिमय एकशत सतमभयकत ह; उस मणि-मनदिर क

, अभयनतर म एक सविसतीरण रतनरिहासन दशसहलर सिह क मसतक

स ददीपयमान ह । उस सहासन क ऊषर एक सदीरध शव शयना-

वसथा म सथित ह। उस शव पर महाकाली समवसथिता ह। वह‌ बरहमरपिणी सवचछानकरल कोटि-कोटि बरहमाणड कौ सषटि, सथिति

- मौर परलय का समपादन करती ह । विजया परभति चतःषषटि योगिनी उनकी परिचरया.करती ह । इस दवी क दकषिणभाग सदाशिव

अहाकाल ह, महाकाल क सहित महाकाली परफल चितत ससदा इचछानकल विहार करती ई । शसरमदवीक इसलखपक धयान का वरणन ह। यथा

मघादी शिरखर निनयना रकतामबर विशरती पाणिभयामभय वरञच, विकसदरकतारविनदसथिताम‌ ।

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यकतिकतप | . तानतिकगर [ ६५

नतयनत परतो निपीय मधर माघवीकमदय महा- कार वीकषय परकाशिताननवरामादया भज कालिकाम‌ ॥ जिनका वण मघतलय ह; लाट की चनदरलखा जाजजवलयमान ह,

जिनक तीन नक ह; परिधान रकत वसरह, दोनोहाथोम वर भौर अभय द; जो विकदित रकत पदम पर उपविषट ह, जिनक सममख पषपजात समधर माधवी. मचयपान महाकाल नतय. करत ह; जो महाकार क इसत परकार को. अवसथा दखकर हसती ह उस आया- काली का भजनकरता ह ।

प"ठक { इस समय दवी क इस खप का जान-सहित विशलषण करन ' म परबरहम की पराशकति का परिचय पाओग। ईसलएि यह रप करितन जञान-विजञान काः आभास दता ह; विचार करन पर विसमित अौर परकित होकर ऋषिगण को ससशरम स परणाम

करोग । सवत, पीत सव रगजिस परकार कषणवण म विदीन होति.

ह, उसी परकार सरवभत ही परकति भ विलीन ` रहता ह । इस कारण बह निग णाः निराकारा योगीगण को हितकारिणी पराशकति छषण- वरणा कहकर निरपित हई ह ।* नितय-कालरपा अवयया ओौर कतयाण- रपा उम काटी क अमततव परयकत कलाट पर चनदरकला चिहधको . कलपित किया गया ह। जिस कारणस व चनदर, सय गीर गगनि-

. खप नतर दारा कालसमभरत निखिल जगत‌ का सदन करत ह।

# पराशकति अरपा ह इसकए वणहीना ह ।. जहा सभौ वरणोका |

अभाव ह, वही निविड कषणवण होता ह, यह बात विजञानसममत ह ।

विजञान ओर भी कहताह कि हमारी आख जयोतिका धारण नही

कर पाती, इसी स निबिड इषणवरण दिखाई दता ह। इसीः स महाजयोति काटी कषणवरणा ह । किनत जञाननतर स महाजयोतिरय म दिारईदतीदह।

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६६ ] तानविकगर [ दवमति का तततव `

उसी कारण उनक नयन-रय की कलपनाः हई ह। व समपण पराणियो का परास करतहःमौर कालदणड दवारा चवण करत ह, इस चए सभी पराणियो का रकत उस महशवरी का रकत वसन ह। विपद -स जीव कौ रकषा गौर मपन-मपन काय म पररणा दना उनक वर मौर अभयसप ह । व रजोगण ननित विशव म अधिषठान करती ह, इसी कारण व रकत कमल ससथितौ ह । शनानसवरपा सभी लोगो की साकषी-सवरपिणी वह‌. दवी मोहमथौ सरापान कर कालोचित करीडकारी-काल को दख रही ह । मलपशदधि भकतवनद क हितानषठान क लिषए पराशकति का बहविध शप स करषित हमा ह। जस कि--

गणकरियानसारण रप दवयाः. परकलपितम‌ । । -महानिरवाणतनतर

उपासको क-कायो की सविधा क कएि गण मौर करियानसार दवी क रप की कलपना की गई ह ।,

उनदी सव मतियो भ स जिसको जिस मति की मभिलाषा ह अथवा उसर परीति ह, वही उसकी उपासना करगा । तर उपासना भभिनन-जञान स करनी होगी । इनम कोई उतकषट मौर कोई उनकी मपकषा निकषट ह, जो इस सयम जञान करता ह, वह वयकति रौरव नामक घोरनरकम जाता ह। दवतताोम एक की परवता । करन स सभीकीपरगसाहोती ह मौर एक की निनदा करनस सभी की निनदा होती ह । दवता परशसास सख का. अनभव नही करत . भौर निनदा स भीदःखी नही होत, किनत. निनदाकारी दवनिनदा जनित पापस नरफ जाता ह। अतएव साधक खचि-भद स धयान योग स पथक‌-पथक‌ आकति की उपासना अवरय करग किनत म सव माङतिथा परकतसप‌ म अभिनन ह, इस जञान को दद‌ रसङग । एक महामाया न ही लोगो क मोह क किए सवरी-परषमति सप म

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यकतिकलप ] तानतिकगङ ` ` { ६७

. भिनन-भिकन नाम मौर रप जवलमबन ` किया. ह; वसततः य भिनन नही ह । ।

वतक आदाशकति महामाया क विषय कौ आलोचना हई, उसी ` दव न सकषमरप स जीव क भआधार-फमर म करकणडकिनी को शकति- रप म गवसथित किया ह ।* वही कणडलिनी निरवाणकारिणी आादा- शकति महाकाली ह कलकणडकलिनी योगियोक हदय म तततवरपिणी भौर सभी जीवो क मलाधार म विदय.ताकार रपम विराजमान ह 1

योगिना हदयामबज नतयनति नतयमञजसा 1` - आधार सवभताना सफरनती विदयदाकतिः ॥

[णीति

साधना का कम

इस महाराकति क उपासको को शाकत कहा जाता ह । तनवशासवर भ उस महाशकति की उपासना-परणाली सविसतार लिखी गई ह। भतएव ` तनतरशासतर ही शाकत का ` परधान गरनथ ह । इसका अनयतम नाम भगमशासतर ह । भागम कित कहत ह ? यथा-

` आगत शिवववतरभयो गत चच गिरिजामख । ` मत शरीवासदवसय तसमादागम उचयत ॥

` ~ रदरयामक

जो शिवमख स निगत होकर पारवती क म म गवसथिति करता ` ह भीर जो वासदव -सममत ह, उस आगम कहा गया ह । .. `

# मकाधारपदम भौर कणडलिनी का विवरण मर दवारा रचित “योगीगर' परनय म विशदसप म .दिया गया ह ।

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६८ | तानतिकगर | साधना का करम

आगमनञासतर जव वासदव-सममत ह, तव इसक साथ वदका

कोई असामजसय नही-यह निशचित हमा । किनत मागमससत आगम ही समनना होगा । परमजञानी सदाशिव न असदागमकौ

निनदयाकीरहि। यधा-

आवाभया पिरित रकत सरा व सररवरि । वरणाधरमोचित धरममविचारयापियनतिः य । भतपरतपिराचासत भवनति बरहमराकषसाः ।

-भागमसहिता

भावारथ पहहकिजो वरणाशरमोचित धरम का विचार न करक

महाशकति दवी को मास, रकत, ओर मदय अरपण करदध, व भत, परत,

पिशाचसवरपर बरहमराकषस ह। इसी कारण शाकतो म भी समपरदाय- विभाग ह| शकति-उपासकगण (उपासय-मद स) काली, तारा, जगदधातरी, अशनपरणा परभति शकति-मति की उपासना करत ह ।

परथमतः उपासक सदगर स मनतर गरहण करग । दीकषारहित मनषय पश म परिगणित ह, इसीलिए अदीकषितो का समसत कायदही . वथा ह । यथा-

उपचार सहसर सत अचित भकतिसयतम‌ । अदीकषिताचन दवा न गहणनति कदाचन ॥

मदीकषित वयकति क भकति पवक सहसर उपचार दवारा चना करन पर भी दवगण उस अदीकषित की अरचना कदापि गरहण नही

करत ह ।

इसी कारण स यतनपवक गरगरहण करत हए साधक मनत रहण करग । शकतिमनतर का उपासकगण की दीकषा क साथ शाकताभिषक

होना कतबय ह । यथा-

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कतिकलप ] तानतिकगद [६९ अभिषक विना दवि कलकम करोति य । तसय पजादिक कम अभिचाराय कलपत ॥ अभिषक विना दवि सिदधविदया ददाति यः! तावत‌ कार वसद‌ घोर यावचचनदरदिवाकरौ ॥ .

। -वामकशव रतनतर

-अभिषिकतहए विना जो वयकति तानतरिक मत स उपासना करत ह, उनकी जप~पजादि अभिचार सवरप ह ) जो वयकति अभिषक- रहित दशच विदयाओ की कोई मनवरदीकषा दता ह, वह मनषय जब तक चनदर, सरय रग तव तक घोर नरक म वास करग ।

अतएव . शाकतो का परथमतः दीकषा सहित शाकताभिषक, उसक वाद परणाभिषक, तदननतर करमदीकषा लना कतवय ह । महादव न

कडाटः-- | करमदीकषाविहीनसय करौ न सयात‌ कदाचन ।

--फामाखथातनध

कलियग म करमदीकनाक विना कभी भी सिदधि नदी होगी । उनहोन ओर भी कहा ह-

यदि भागयवशादवि करमदीकषा च जायत । तदा सिदधिभवततसय नातर कारयाः विचारणा ॥ - करमदीकषाविहीनसय कथ सिदधिः कलौ भवत‌ । करम विना महशानि सव तषा वथा-भवत‌ ।

:. -कामाखयातनतर.

किसी क भागयवश यदि करमदीकषाहीती ह तब निशरयही .

सिदधि कौ पराति होगी- सनदह नदी द। करमदीकषा क विना करलि- यग भ किसी मनतर कीभी सिदधि नही होगी गौर जप-पजादि सभी... डवा होगी ; ।

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७०] . | तानतिकगद [साघना का करम

इस समथ किस पदधति क अनसार परवोकत तरिविधभाव मौर सपत-आचार की करिया समपनन करनी होगी उसी कौ आलोचना की - जञाय । `

` परथमतः गहसथाशरम म साधक. अवसथितिपरवक सदगर स मनतर ` दीकषा लकर पशभाव क अनसार वदाचार क दारा वदिक करम,

वषणवाचार वारा पौराणिक कम ओौर शवाचार दवारा समत कम करग । बाद म शाकताभिषिकत होकर दकषिणाचार दारा. साधना

. करगा । उसक बाद परणाभिषक क अनत म गहावधत होकर वीरभावा- चरसार वामाचार हारा यथाविधि साधना की उसनति करगा । उसक बाद सामराजयदीकषास दीकषित होकर वीरभावानसार सिदधानतावार

की साधना खा कायः .समपनन करगा । पनः महासामराजय की दीकषा . लकर दिभयभावानसार कलाचार दवारा साधना करगा । इसक बाद - दीकषा स दीकषित होकर दिवयभावानसार स साधना की चरमो- कषति समपनन करगा । इसत परकार साधनाकाय दवारा दिनयभावक परिपकव होन पर निषकरिय होकर कार यापन करगा । नीच ससकार- भद स साधनाधिकार की एक ताककिा दी जाती द ।

मनरदीकषा--मनतरदीकषा गरहण करक नितयक, नमिततिक करम, कामयकम भौर पशचाग परशचरण करगा अरथात‌ दषटदवता का जितना मनरलप ह उसका दशाश तरपण, उरका दशाश अभिषक ओौर उसका दशाश राहयण-भोजन गौर गरहपरखच रण करगा ।

शाकताभिषक--शाकताभिषक लकर वार, तिथि, पकष, मास ऋत, गयन, वतसर परशचरण करगा । नकषतर परइच रण, मरह- पररशच रण, करणपरशचरण, योग परशचरण, सकरातिपरशचरण इतयादि करगा ।

परणाभिषक-परणाभिषिकत होकर षटक अरथात‌ शानतिकरम, ` वशरीकरण, सतमभन, विदवषण, उचचाटन, गौर भारणकम, बरहम-

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यकतिकलप ] ` तानविकगख [७१

मनत जप; पादकामतर जप, रहसयपरशच रण, .बीरपरशबरण जओौर दशाणमनतर शरवण; वीरसाधना, चिता-साधना, योभिनी-साधना,

मधमति-स।धना, सनदरी-साधना, हिवा-बरि,; लता-साधना, इमदान-

साधना ओौर चकरसाधना . इतयादि करगा ।

करमदीकषा- करमदीकषा लकर ` ककार-कट-सतोतर अरथात‌ मघा- साननाजय सतोतर-पाठ गौर तीन दवतानो (काली, तारा गौर तरिपरा

दनी) का रहसय परखचरण करगा । .

साभनाजय. दीकषा-साजनाजय दीकषा लकर उरधवामनाय अधि-

कार, परापरसाद मनतर अरथात‌ ` अदधनारीशवर मनतरसाधना महयषोढा

अनतर जप करगा ।

महासाञनाजय दीकषा- महासाननाभयदीकषा लकर योग मौर

निगण बरहम की साधना करगा । ।

पण दीकषा-पणवकषा स सहज शञान पराति भौर सव-साधना

तयाग, सहज भावावलमबन । सोह, अह बरहयारिम, सव खतिवद

रहम, अयमातमा बरहम इतयादि अत भाव अरथात‌ जगत‌ मिधयागौर

बरहय ही सतय जौर वही शरहमहीमह इस मकार का नान तरात

करगा । ॐ

उपरोषत वयवसथाए पशचरउपासको, ` (शाकत शव, वषणव, सौर,

गाणपतय).कोकरनक रिएिहीर। ससकारभद स साघधनाधिकार

भरात करक करियानषठान करना होगा, नही तो फल की आकषातो दर

वरन‌ परतयवायभागी होना पडगा, सराघकगण इस बत को समरण

रख । यहा ववतनय यह ह कि शासतर म साधना-पनय असखय -परकार स

- वणित ह; उनम जो सिदधि पराति की इचछा करगा वह‌ गरषदिषट

पय का अवरमबन करगा । उसक विना भौर कोई उपाय ` नही द । कारण शासतर भ वयकतद कि ©

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७२] तानतरिकगर [ साधना का करम

पनथानो बहवः परोकता मनतररासतरमनीषिभि : । सवगरोमतमाधितय शभ कारय न चानयया ॥

-वागम --मनिगणदवारा बहविध शासतर, मतर गौर पनय अरथात साधना-

भरणारी कही गई ह । उनम गरपदिषट साघना-काय दवारा ही कवल शभ एल उतपनन होता ह, अनय परकार स नही होता ह ।

इस गरनय म पीछ कह गए साधना-कतप म हम जिन सव पथो कोपरकाशम एव गखपदिषट ओर शासतरसममतत ह; अतएव अनलमबन सवरप उस गरहण करक अपन-मपन गर दारा उपदिषट माग म शय करक साधनाकाय म परवतत होन पर निदचय ही सिदधि

भरात होगी । पराशकतिदवी न भगवतीगीता म सवयम‌ कहा ह-- जो वयकति दराचारी होन पर भी भनमय चिततस भरा भजन करता ह, वह सभी पापो त मकत होकर ससार-बधन स मकत हो जाता ह ।“ ~ | यपा ;--

अपि चत‌ सदराचारो त मामननयभाक‌ । ` सोऽपि परापविनिमकतो मचयत भवबनधनात‌ ॥

ओम‌ शानतिः भम‌

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तानतरिकगर दिषलोख अ -सवाचचलाचकछटन

गरकरण ओर. दीकषापदति

अपना.अपना वरणाशरमोचित धरम पालन (बरहमचरयादि तरत

आचार) ओर साघसग दवारा चितत-निमल होन स सदगद -अनवषण-

पवक साधक दीकषा परण करगा। कञघान रहन पर जिस परकार

, आहार गहण म अरचि रहती ह, उसी परकार परयोजन समन विना

किसी क अनरोधस मनतर गरहण करन पर भी साधना-विषय म अरचि

बनी रहती ह । आजकल दीकषागरहण हिनदसमाज म ददाकरम का एक

अग भर रह गया ह । गगरज की दीकषाकलिए विना कनिषठ मतर गरहण

नही कर सकता, यद बहत ही रमातमक धारणा ह । जनमजनमानतर

की सरति क फल स घरम मपरढतति होती ह । जयषठक यदिद

जीवन म सङति का उनमषण न हो, इसलिय कया भागयवोन कनिषठ

आधयातमिक उननति क लिए अगरज की परतीकषा करता रहगा ?

सामाजिक अथवा मौलिक आचार स यह नियम. परचरित रहन पर

भी आधयारमिक विषय म वह परयोजय नही रह सकता । भागयवान‌

वयकतियो म जब जो वयविति अपना-अपना करतगय समञषगा तभी बह

आधयातमिक उननति क किए चषटा कर सकगा--किसी का मल दखत

रहना उचित नही ॥ अतएव मानवजीवन कौ सारथकता अथवा भग-

वानक किए वयाकचता क उतपनन होन स शरीगरक मख स

मनतरादि क अशरगत होन स उनका अनषठान करक अनायास ही घोर.

ससार बनधन स मकति की पराति होगी । फिर अनय साततविकः

आचा क साथ धरमवतता चयवितिगण सदित दीकषा की कतमयता क

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= ~ ~ =-=

७४ ] - ` तानतिकगर [गखकरण मौर दीकषापदधति

- समबनध म आरोचना करगा । दीकषा रदित पराणी कौ मकति नहीहो सकती, यह शिवोकततनर का मनशान ह । योगरदित मतर भौर मतररदित योग दधि नही होता । इन दोनोक अभयास ही बरहय साकषातकार होता ह। जिस परकार (अधकाराचछनन) श‌ म आलोक की सहापरता की मावदयकता होती ह, उसी परकार मायापरि दतत आतमा भी मनत क हारा परकाशचित होती ह। अतव कलिकाल म परतयक वयकति भागमोकत निधान स दीकषा गरहण करगा ।

दिवयजञान यतो ददात‌ करयात पापकषय ततः । तसमकञति सा परोकता सवतनतरसय सममता ॥

5 ` --विकशवसारतनतर, षषठ १: जो दिवयजञान को परदान करताह ओर पराप नषट करता ह,

उसको तानतिक विदवान‌ दीकषाक नामस कीरतन करत ह । अदीकषित वयकति क भकतिपरवक सहसर उपचार हारा अचना

करन पर भी दवगण उती पजा परण नही करत ह । १ कारण स अदीकषित क सभी काय वथा होत ह इसीलिए अदीकषित गयकतिको पथकहागयाह। जो वयकति शासत म मनव दखकर गर की उपकषा ष कर उसका जप करता ह । उपतका फल तो दर की बात परतयत उतका सभी ड नषट हो जाता ह । अतएव पापनाहिनी महानिदया गरस यततपवक गरहण करक उनकी सधना करगा ।

कलगर स मनतर परहण करना करतवय द ।# किनत गरक वश -# क गद का मध मपन-अपन वश का पर नही # गर द मय अफ-मपन कश कायर नङ इनपर कचार

समपनन सतकौल ही कलगर ट । भकल भवसागर म सभी पडकर भरमण रत ह, इनम जिसको क मिला ह वही कलगर द । अदय ` विजयङषण गौसवाभी कहत ह--जिसकी कलकरणडणिनीशकति जागरत ह, बही कलगर ह । , सलिए गर को पाकर जो परितयाग करता ह उसक समान हतभागय भौर कौन ह । `

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साधनाकलप ] तानतरिकगर | [७५‌

म उपयकत यदि कोई न हो तव शासतर निदिषट जकषण दखकर ` गर अरहण करना चाहिए । तनतरशासतर अतीव दरगम चिषयद, इसलिए समयोपयकत गङ की ` गावशयकता ह । ओर कवल गड ` क उपयकत होन स दी नही होगा; दिषय की भी विरष उपयकतता आतनयक द । भनब की गति ओर कमपन क साय गर का आधयातमिक शावित. शिषय म सचारित होती ह। जो गखट, उनकी स शवितकी सचारकषमता रहन. की आवदयकता ह । बीज -सतज भौर भमिक ` सनदररप म जोत न जान पर दकषोतपतति की-आशा नही रहतौ द । दरशन-विजञान-चचा अथवा . गरनधपाठ दवारा यह . शबितसचार नही हो

सएता । शिषय क परति सवदना क कारणः गर की आधयातमिक शकति कमपन विशिषट होकर शिषय म सञचारिल होती ह। हसीकिए तनतर म कहाद:- ।

एकमपयकषर यसत गरः रिषय निवदयत । ` पथिवया नासति तददरनय यतवा चानणी भवत‌ ॥

। ~ जानसकलिनीतनतर

जो गर शिषयको एकाकषर मनव परदान करतरह, पथवीम इस भरकार का कोई नही द, जिस उस दान करन स उनक छण स मकत ` इभा जाय ।

जो वयविति गर को मनषयजञान कर, मनतर को अकषरावली

` कह गौर परसतरमयी मति को शिला कहकर उपकषित कर, वही वयकति

नरकगामी होता ह 1 गर को पिता, माता, सवामी, दवत एव आशरय

जान कर पजा करनी होरगी कारण शिव क रषट होन पर. भी .-गर रकषा करन म समथ ह। किनत गरक रषट होन पर भौर कोई रकषक नही ह । अतएव वाकय, मन, शरीर भौर कम हारा गर की सच

करनी होगी । गरक अहिताचरण करनख विषठाम कमि.होकर

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७६] तानतरिकगड [गखकरण ओर दीकषापदधति

जनम गरहण करना होगा । पिता न यह शरीर दिया ह सच, पर जब

जञान क चिना यह‌ शरीर धारण निरभक ह । तव जञान परदाता गरस

दःखसमाकल इष ससार म वदकर गीर कोई गर नहीह। मतर

तथागौ की मतय, गतयागी कौ दरिदरता एव गर भौर मनतर उभयतयागौ

को रौरवमजाना होता ह।` गरदव क निकट रहकर जो वयकति

अनय दवता की पजा करता ह बही वयकति घोर नरकभ जाता ह

भौर उसकी की हई पजा निषफल होती ह, मनतरदाता गर असत‌

पथवरतीहोतोभी उस साकषाद‌ शिवरप समकषना चाहिए, उसस

-भिनन गति नदी ह। वषणव कहत ट :--

यदयपि मामार गर शडिबाडी जाय । तथापि आमार गर‌ नितयाननद राय ॥

. जिस गर दवारा परमपट दिखाई दता ह-उस गरख-तलय नतो

विदयाहन तीथ भौर न दवता। जिस गरदरारा परम पद दिखाई

, दता ह, उस गड सदइय मितर नही ह भौर पतर, पिता, बानधव, सवामी परभति कोई भी उसक तलय नही हो सकता ह । गर का एसा पजयभाव कस हमा ? वासतविक रपम गरटारा जो परमपद दिखाई दता ह भौर बरहमसाकषातकार होता द, व अजञानतिमिरादरतत नव को जञानाञजन शलाका दवारा उनमीलित कर दिवयजञान परदानः करत ह,

उनस बढकर ससार म कौन गरियान‌, महीयान‌ मौर गातमीय ह ।

हम उसको भरित परदान नही करग तो किसको करग ?#

# आज क वहत स लोग वदधि क मालिनय, शिकषाक दोष एव असगगण स गर की परयोजनीयता को सवीकार नही करत ह । उनका विकषवास ह कि गरकररण हिनदमो का एक कषसकार मातर ह! किनत उनद यह समजञना उचित ह कि ईस कसलकार मानव हिनदसमाज म

जितन लोग शषठतव लाभ किए ह किसी सससकत समपरदाय मरस

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साधनाकलप ] = तानविकगर [७७

किनत दःख का विषय यह ह कि वतमान यग म गरभिरि एक

वयवसायरप म परिणत हो गया ह । व मनषय की मातमा को लकर,

पवितर धरम को टकर, बचचो का खल करत ह । धरमचकर क बाहर

रहकर कवर करीडा करत ह ओरय' सब गरगो की करीडा कौ गडिया

सदश य हिनदभो की आधयातमिक शमित कोनषट कर रह)

आधयातमिक शवितसमपनन नही होन स शिषय कीः आधयातमिक

दावित क लाभ की कोई समभावना नही ह। कव गरवब म जनम

गरहण करन बव ही अथवा शबदराशि मनथन करक बडी बभत का

आविषकार कर सकनक कारण ही व गर नही ह । गर आधयातमिक

जगच‌ का वयतरित ह । मौर जो आधयातमिक जगत‌ का मनषय होकर

. भरी लिषय म अपनी उननतिशकति का ` सशवार करना नही सीख ह,

व गड नही हौ सकत ह । उसी परकार गर स शिषयको करभी

काय नही हो सकता कवल अधकार म चतदिक‌ भटकना होगा । समय

रहत. सतक रहना जस सभी कायाम परयोजनीय ह, दसम भी वही

बात ह । अतएव दिषय का करतवय ह कि आधयातिमिक सचारण शितत

क लिए गरस मनत लना आवशयक द! मकतिकाजो एकमातर

उपाय ह--जो मातमोननति का एक मतर कारण ह, उस लकर खलः

करना शोभा नही दता 1 ।

अब बात यह‌ द कि सदमख को कटा पाया जाय ? सदगर को

` शरोषठ षयविति दिखाई दत द.कया? तब बलयवक ` ----- त स जसमक यपहणपरयाको को

कससकार कह कर. धषटता गौर मढता को वयो परकादित करत ह?

नयावहारिक यह ह कि किसी भी विदाम दिकषक क बिना साफलय

परापत नही हो सकला, तज किस साहस स गरक बिना परा बरहम

विचाकीशराति हो सकतीदह? मकति कया तमहार लिए इतनीः

सरक ह। फल भी उसी रप म उपलबध होगा ।

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७८ ] तानविक [गरक रण ओौर दीकषापदधति

किस परकार पहचाना जाय ? हम जानत रह; परयोजन होन पर इस परकार का गर अनक समय अपन स ही आकर उपसथित होत ह । सदगर की परापि करन क लिए मपन को सत‌ होना आवरयक ह । मौर सयः को दखन क किए जिस परकार मशाल जलान का परयोजन नही ` होता उसी परकार गर को षहचानन क किए विशष किसी उपदशकी आवरयकता नही ह । जिम माधयातमिक शकति ह उस दख करही जाना जा सकतादह। यह शकति मनषय-मातरमहीरह।. तव उस शकति क विकाश क किए चिततशदधि का परयोजन ह। उसक विना

गखनिरवाचिन क समबनध म शासर की भीः वयवसथा ह । यथा :--

शानतो दानतः कलीनरच विनीतः शदधवशवान‌ । , शदधाचारः` सपरतिषठः शचिरदकषः सबदधिमान‌ । ञाशवमी धयाननिषटरच तनतरमनतरविरारदः। निगरहानगरहः शकतो गररितयभिधीयत ॥

-तनवसार

--जो शानत (शरवण-मनन-निदिषयासनरप विषयातिरिकत सासा- रिक समपण विषयो स निगरहवान‌), दानत (शरवणादि विषयातिरिकत विषयो. स दस इनदरियो स निगरहवान‌), कलीन (भाचार-विनय परभति नवविध गण -समपन), विनीत शदधवशसमपनन, विशदधाचार, सपरतिषठ ` (सिदकारयादि दारा यशसवी) पवितर-सवभाव, करिया-निपण, सवदधि- „ समपनन; माशवमी, ईशवरधयन-पररायण, तनतर-मनतरविषय म साधना- पडित, गौर जो शिषय क परति शासन गौर अनगरह करन म समय उनक समान बराहमण ही गरपद क योगय हः। य सव लकषण जिस वयकति म. दिखाई दग उसी को गरपद दिया जाना उचित ह ।

-. गदतयागर क समबनध म हमार दश म जो ससकार परचरित दह, इर मनपर दातरा गद क समबनध म --पिता मथवा पितामह क गर--

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साधनाकलप | तानिकगर‌ ` [७९

पतक गर क समबनध म नही । मनतरगरहण करव. पर यदिजाना जाय कि व असनमारगी अथवा अविदवान‌ ह तो भी उनका परिवयःग नही करना चाहिए । किनत मनत गरहणक पव जानन पर कभी भी उस गरस ` मनतर गरहण नही करना चाहिए । मनतरगरहण माधयातमिक उननति का

कारण ह 1 समाजम परशसा पान क लिए नही 1# अतएव सदर

निरवाचित करक दीकषा-गरहण करना सभी का करतवय ह.।

जिनहोन पहल ही पतक गरम दीकषा गरहण कीट उनक कए

जगदगर सदाशिव न उपयकत गर बनान की विधि शचासतर म छिषि- बदधकीद.। यथा:ः-

मधलबधो यथा भदध: पषपात‌ पषपानतर बरजत‌ । जञानदनधसतथा शिषयः गरोगरवनतर बरजत‌ ॥

- मधलनध रमर जिस परकार एक शर स अनयानय कल पर

जाता ह उसी परकार जानलनध शिषय अनय गर‌ का आशरय गरहण

# समाज क भय स अथवा वशनाकष की आशका जानकर सनकर अनक. शिकषित वयकति दषतलय मख को गर बनात ह । कथा सस पाप नही दरोता ? ईइसीस नितय पतक गर परोहित कल की अवनति हई ह । उपयकत का अनसरण करन पर बाधय होकर उनको उ पयकतता की पराति कीचषटा करनी होगी । नही तो दकषिण हसत कावयापार बनद होगा । वश-परमपरा शिषयरप मौरसी समपतति भाग म वयाघात होनसही ओर निषचषट नही रह सकत; उपयकत जो ह उसकी चषटा होनी चाहिए । इसस उनकी उननति अवसमभावरी नहीतो

गरभिरी को छोडना होगा । गरकल की अधोननति क किए शिषय गण ही अधिकतरदायी ह । पापको परशरय दन स-कौन उतस विरत

होता ह। `

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८० ] तानतरिकगर [गरकरण ओर दीकषापदधति

करगा । अतएव दौकलित वयकति अनय गर बनाकर उपदश लगा ओर साधनापरणाली की शिकषा लया 1

जो वयकति आतमचकति सचारण करसकतरहवही गरर ओौर जिसकी आतमा म शकति सचाकति होती ह उस शिषय कहा जाता ह। ईसकिए शकति-आकषिका ओर सागराहिका की कषमता का

रहना आवकषयक ह । इसी कारण शासतर म उपयकत शिषय को ही

दीकषा दन की विधि दह । उपयकत शिषय का लकषण वथा :-

शानतो विनीतः शदधातमा शरदधावान‌ धारणकषमः । समरथशच कलीनशच पराजञः सचचरितो यतिः । एवमादिगणरयकतः शिषयो भवति नानयथा ॥

| । ~ तनतरसार

अरथात‌ शमादिगण यकत, विनयी, विशदध सवभाव, शरदधावान‌, धयशील, सवकम समरथ, सदवशजात, अभिजञ, सचचरितर ` ओर यतया- चारयकत वयित परकत रिषय शमद-वाचय, इनक विपरीत वयकति को -लिषय नही बनना वादिए।

गरता शिषयता वापि तयोवतसरवासतः। अरथात एक वतसर का "गर भौर शिषय एकतर रहकर दोनो क

सवाभावादि का निरणय करक मपना-अपना अभिमत होन पर गर मयवा शिषय बनीएग । ।

परवर जञान पिपासा, पवितरता, गरभकति अथवा अधयनयवसाय न ` रह पर शिषय जीवन की उपलबधि नही की जा सकती । धरम-लाभ

करनक लिए धम-कही ऊपर चिततससथापन करना हीगा; किनत कवल पसतक-पाठ बौर धरम समबनधी वकतवय सनन स ही उस काय की षिदधि नही होती । उसक किए पराण की वयाकलता . चाहिए । गर शकति का सगरह होना घादिए । शिषय क जीवन म गर की वशयता

| ५ |

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साधनाकलप ] ` ताचतरिकगश ` [ «८१

सवीकार करक इषटनिषठा की सहायता स धरमचरचाकरनाही सिदि

क पय पर जान का उपायदट। एक सामाजिक दायितयस भागकर

दीकषा गरहण कस फक की पराति किसभरकार होगी? भमिको उततमसखपस न जोतन स बीज वपन जिस परकार निरथक द, उसी

परकार अशदध चितत वाल वयकति कोदीकषा दन स भी किसी फल भरातति की आशा नहीकीजा सकती ह ! इसलिए जिनम धरम-जीवन

क लिए परकत वयाकलता उतपनन नही होती उनकी चिततशदधि क लिए उन रहमषय-पालन गौर साधसग करना चाहिए । उसक बाव निरवाचनपवक व दीकषा गरहण कर ।

जिनम जिस दवता की भकति का आधिकय हो उसको उसी दवता का मनतर दिया जाना चाहिए । नही तो चकरविचार करक मनत

. निरवाचन करना होगा। सिदधगर दिषय क जनमजनमानतर क मनव का निरधारण भी कर सकत ह। विया ओर मनव

मत वयकति क अनगामी होत ह मौर परवजनम क कायो का परतिपादन - करत ह । किस परकार पवजनम फो विदया का समदधार करना होता

द, नीच उसको लिखा गया द । यथा :ः-

वटपतर पररशकतिमनव, जदवतथ. पतर पर विषणमतर भौर वक पतर पर शिवमतर लिख । इस परतयक मतर को उललिखित सात-सात

पतरो पर लिखा जाना चाहिए । रकतचदनदवारा भौर ककमदरारा

शकतिमतर. शवतचदनदवारा विषणमतर भौर भसमदवारा शिवरमतर

लिखा जाना चाहिए । उसक बाद उस-उस दवता की पराणपरतिषठा

करक यथादाकति उपचार दारा पजा करग । अननतर शिषय ईस अरधपातर को गरहण करक- , |

ॐ भो दव पथिवीपाल सरवशकतिसमनवित । ` ममाचयख गहाण तव ` पवविदयाः परकाडाय ॥

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८२1 तानतिकगर [गरकरण ओर दीकषापदधति . शस मतर का पाठ करक सय को मधय दान कर । अधय यया--

. जच, दगध, कशागर, घत, मध, दभि, रकतकरवी ओौर रकतचदन । | इसको मबटाङग अरय कहत ह । इस परकारस मधय दान करक | कताञजलि होकर नमसकार कर ।

अननतर शिषय :-- शयः सोमो यमः कालो महाभतानि पच व । एत शभागभसयह कमणो नवसाकषिणः ॥ सरव दवाः शरीरसया मम मनतरसय साकषिणः । पवजनमाजिताः विदयाः मम हसत परदापय ॥

स मतर फ पराठपवक भतर लिखित एक पतर को उटाकर- "नखदव, मषको पवजनमाजित विदया शरदान कीजिए इस बोकर शशक हाय म परदान करग । यह पतरलिलित मनतर ही शिषय की पव-जनमीय विदया ह। स मनव को यथारीति शिषय को परदान करग ।

मनव रहणाभिलाषी पव दिनि को हविषयादि करक' दसर दिन | नितय करियादि क समाधानानत बराहमण होन पर शानाजञानङत . फातककषय फी कामना स एक सौ भठवार गायतरी का जप कर । तदननतर भाच- भन करत हए नारायण परभति दवतागण को गनध पषप परदान करक सकलप करग । सकलप यथा -

अद तयादि--जमक-मासि भमक-रारिसथ भासकर * ममक-पकष अमक-तिथौ ममक-गोतरः शरीमगक-दवशरमा, धरमायकाममोकषपरातिकामः मक दवताया इयदकषरि-मनगरहणमह करिषय ।

बाद म सकतप-सकठादि का पाठ करक गखवरण करग । यथा-- दाष जोट करक गरजी करग कि- साध भवानासताम । गद-

` साधवहमास । शिषय-अचयिषयामो भवनतम । गड -ओमचय 1

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साघनाकलप ] ` तानतिकगङ [ ८३. ,.

गघपषप गौर दरवाकषतत छारा गर का दकषिण जान पकडकर शिषय षाठ. करग-अदतयादि (दवशरमा षयनत परववद‌) मतसकलपित अमक दवताया इयदकषरि-मनतरगरहणकरमणि गखकरमकारणाय अमक- गोतरम‌ शरी असकदवदारमणिम एभिः पाययादिभिरभयरचय शरतवन भवनतमहम‌ वण । गर गम‌ वतोसमि । शिषय-- यथाविहित गखकम कर 4 गर-ओम‌ यथा जञानम‌ करवाणि ।

इसक बाद गरक दवारा सथापित घट, शालिगराम, वाणाकिग

सथवा वनदनादि दवारा ताजरपातरम यनत अकित कर निज-निज पदधति

करम स यथादाकति दवता की पजा करग जौर तातरिक विधानस होम करक जो नतर दिया जायमा उसी मनतर स सवाहानत करक अषटोततर-

दास बार पजित दवता का होम करग । उसक बाद शिषय को उततरा- रभिमख म उपवशन कराकर सथापित घट क जर स एक शत आठबार मनतर जप करक जल को शिषय क मसतक पर कलश मदरा दारा परदान करक अरभिषक करग । उसक बाद "ओभ सहलञार ह' फट‌" मनव स किषयकी रिखा बनधन करक मसतक को ऊपर कर मनतर को एकत माठवार जपग । इसक बाद शिषय क हाथ स एक अञजलि दान करा-

कर गर बोलग--अमक मनतर त ददामि, आवयोसतलयफलदो अवत । शिषय कहगा -- ददसव । शर परवाभिम ख होकर परदयमनरको शरणवपटित करक सातवार जप करग, इसक वाद कवर मनतरको एक सौ आठ बार जप करग । इसक बाद गरकछिषयकी दहम शषयादि नयास करन पर शिषय मसतक आचछादित कर परिचमदिशा भ मख करक वठ कर योनो हाथस गखक दोनो पदो को पकदडगा । तय गर पिषय क दकषिण करण ऋषिचछनदादियकत बीजमनतर सपषट करक तीन बार भोर एक बार वाम कण म उचचारित कर दग । सतरी भौर शदर क किए इस नियम भ विपरीताचरण करग । गहीतमनव शिषय तब भदणठिति होकर गर क चरण म परणाम करक उचचारित करमा-

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छ] तानविकगर [गरकरण ओर दीकषापदधकि

नमसत नाथ भगवन‌ शिवाय गररपिण । विदयावतारससिदधौ सवीकतानक विगरह‌. ।४ नारायणसवरपाय परमातमकमतत य । सरवजञानतमोभदभावन चिद‌घनाय त ॥ सवततराय दयाकटपतवि गरहाय शिवातमन । परतनतराय भकताना भवयाना भवयरपिण ।; विवकाना विवकाय विमरशाय विमरशिणा । परकाशाना. परकाशाय जञानिना जञानरपिण ।¢ तवत‌ परसादादह दव कतकतयोऽसमि सवतः ॥ भायामतयमहापाशात‌ विमकतोऽसमि शिवोऽसमि;च ॥

तब गरन िषयक हाय को पकड कर उततोलन करक मग कामनापरवक पाठ करग--.

उततिषठ वतस मकतोऽसि समयगाचारवान‌ भव। कीततिशरीकानतिपतरायरबलारोगय सदासत त, उसक बाद कषय गरदकषिणादान भौर अपन को कतकताथ समकः

कर पराषमनवर का एक सौ आठ वार जप करगा गौर गससचरिणी

शकतिलाभाथ गर क निकट तीन दिन वासर करगा । गर भी भातम- शकति रकषाथ एक सौ आठ बार मनतर जफग ।

ˆ दीकषादान टी भौर पदधतिया भी शासतर म दिखाई दती ह ५ सथान, काल, पातरा भी विचार दह। किनत उनका उदधरण विवचना बाहलय क भय. स अधिक मातरा म नही दिया गया । भागयवश यदिः कोई सिदधगर अथवा सिदधमनतर परात करताद तो उतत कछ भी बिचार करन का परयोजन नही ठ । उस कषम ही शिषय मनत गरहण कर ।

बहरतो. को सौभागयवश सवपन ही मनतर परासहौ नातादह। सवपन म मनतर पराप होन पर भी इत मनतर को सदगरस शिषय कोः

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साधनाकतप ] तानतिकगड । ` [५

फिरस गरहण करना चाहिए, कयोकि मातमा क दाकतिसचारक गौर

षएक आतमा का नितानत परयोजन ट । यदि सदगरकी परािनदहो तव

नधपन स भी उसको गरहण किया जा सकता ह । यया

सवपनलनघ च करस गरोः पराणान‌ निवशयत‌ । वटपतर कङकमण लिखितवा गरहण शभम‌ ॥ तरतः सिदधिसबरापवोतति चानयथा विफलः भवत‌ ॥

--योथिनीतनतर

" -जलपण कलस गर. की पराणपरतिषठा. करक वटपतर पर च कमदवारा भनवर छिखकर उकत. कलस म इस मनतर का निोप करमा । वाद म वटपतर सहित मनव -उततोरन करक सवय उस मनतर को गरहण करगा । नही तो फल नही मिलगा 1

गरक एकात अभावदहोनसही दहस रप मर शिषय अपन मापी नव गरहण करगा किनत गर की पराति कौ - समभावना रहन परर कभी भी शिषय इस रप म नही करगा । सवपन लबध मनव स सविशष विचा. -रादि करन का परयोजन नही ह ।

जो उधितरप भ दीकषा गरहण म असम ह व चनदर गयवा सय , हण कार म तीरथसयान म, सिदधशोतर भ, महापीठ म अथवा वाय म गर दवारा मनतर सनकर उपदश गरहण करन पर भी परतयावाय नही

दधोता ह।

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शाकताभिषक | शकतिमनत क उपासको की दीकषा क साथ साकताभिषक होमाः

कब ह । वामकषवर तनवर. भौर निरततर तनतरादिम कहा गया ह कि “जो भयकति मभिषक क विना ददाविचागो मस किसी विदयाक मनतर फी दीकाद तो. वह वयकति जबर तक वनदर-सयः रहग तब तकः नरकवासर करगा ।”' इसलिए -शाकतमातर का ही शाकताभिषक होना कततवय ह । शाकताभिषकका करम यथा-

सवसति-धाचनपवक सकलप करगा--"दय तदि. अमक-दवता- ` शरीतिकामः अमकसय शाकताभिषकमह करिषय ;

भरथम शदध जल दवारा-- > सहलरशीष"” मनतर स सनान कराकर वाद भ ॐ तजोऽसि शकरमसयामतमसि धामनामसि भरिष दक- मामनाधषट दवयजन दवयजनमसि" इस मनव स धरत लपन करग # वाद भ मसरवरण ककर ॐ अतो दवा अवनत नो यसत विषण- विचकरम पथिवयाः सपतधामभिः इस मनतर स शिषय क मसतक पर ढ सौर “दरपदादिव इस वदिक मनतर स उषणोदक भौर चनदन काः कष करग । उसक बाद चनदन, अगर, तिल गर आमलकी. गनधदरनफ

पषण दारा समिशरण कर उस अगो म विलपन करत दए-- `

ॐ उदरततयामि दव तवा यथषटः चनदनादिभिः । उदरततनपरसादन परापनयात‌ भकतिमततमाम‌ ॥#

हत मनतर का पाठ करग । ।

उदरतनानतर अगनिमील भादि चार वदिक मतरो दवारा सनानः करायग । बाद म रतन ससपषट जल लकर ऋमबदोकत पवमान सकत पाठ कर सनान कराव । मनत यथा--

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साधनाकलप | - तानतिकगख [ ८७

2 सरासतवामभिषिनचनत बरहयविषणदिवादयः ॥ वासदवो जगननाथसतथा , सकषणः परभः ॥ परदमनशचानिरदधशच भवनत विजयाय त। आखणडलोऽगनिरभगवन‌- यमो वनऋ' तसतथा ॥+ वरणः पवनङचव धनाधयकषसतथा शिवः । बरहमणा सहितः शषो दिकपालाः पानत त सदवा ॥ ` कीतिककषमीधतिरमघा पषटिः शरदधा कषमा मतिः । बदधिलजजा वपः कानतिः शानतिः पषटिशच मातरः ¢ एतासतवामभिषिञचनत धमपतयः समागताः । आदितयदचनदरमा भौमो बधजीवसिताकजाः ॥ गरहासतवामभिषिञनचनत राहः कतशच तपिताः। दव-दानव-गनधरव-यक-राकषस-पललगाः ॥ ऋषयो मनयो गावौ दवमातर एव च। दवपतनयो धवा नागा दतयाशचापसरसा गणाः ।४ असतराणि सरवशासवराणि राजानो वाहनानि च 1 ओषधानि च रतनानि कालसयावयवाशच य॥।

` सरितः सागराः शकासतीरथाणिः जकदा नदाः} एत तवामभिषिञचनत धमकामाथसिदधय ॥

. परणाभिषक `

शाकतादि पञचमनवो क उपासको का परणाभिषक होना करतशय ह +. परणाभिषक बिना करक का अधिकार नही होता ह । अभिषक क विना कवर मदपान करन स ही कौर नही होता ह1 जिनका -परणा-

` भिषक दभा ह, व कौलकलारक ह । परणाभिषिकत न होकर जो वयकतिः ^ 7

४ ॥

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८ ] तानविकगर [ परणाभिषक

कल-कम का अनषठान करता ह, उसका समसत विफल होता 8 + यषाः-

अभिषक विना दवि करकम करोति यः। तसय पजादिक करम अभिचाराय कलपत ॥

-- काभकषवरतनव

अभिषिकत (परणाभिषिकत) म होकर जो वयकति करकम का अनषठान करता ह, उसकी जप ओर पजादि मभिचार सवरप होती ह ।

अतएव तानविक साधक मातर ही उपयकत गहत परणाभिषिकत होग । परणाभिषक क उपयकत गर यथा--

परमहसो गरणा परणाभिषक समाचरत‌ । -- कौलाचनचनदिका

-जो साधक साधना स परमहसतव पराप होकर परकत सतकौल

पदवानचय हए ह-व ही परणाभिषक करन क लिए उपयकत गर ह ।

मौर परणाभिषिकत गड दौकषा भौर शाकताभिषक क मधिकारी ह । अतएव सिदधिकामौ तानतरिक साधक साकषात‌ शिवतलय कौर स परणा भिषिकत होगि । परणाभिषक का करम नीच विवव ह । यथा :--

अभिषक क पव दिन सरवविघन शानति क लिए यथाविधि पतसव दवारा विषनराज कौ पजा करक अधिवास करग मौर बरहमश कर- साधको को भोजन कराए । (वि >

दसर दिन शिषय परातःकतय समापनपवक सनान गौर नितय- करियादि समास करक जनमावधिकत पापराशिकषय क किए तिलकाचखन उतसग -करग । उसक नाद कौकलादि की तततिक कए एक भोजय उतसग करना भावयक ह । बाद म सरय परदान करक बरहमा, विषण, शिव; नव परह ओर .मावगण की पजा कर वसधारा दग । तब कम क अभयदय की कामना स इदधि-षादध करग ।

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सकधनाकतप | | तानतिकगङ [ ८९

उसक बाद गरक निकट जाकर परणान ओर अनमति छकर सभी उपदरवो की शानति क निमितत भौर आय, नकमी, बर ओौर आरोगय पराति क लिए यथा विहित ˆ सकलप करक वसतर, अलकार, भषण गौर शदधिक साथ कारण छारा जर की अचना करक

चरण करग ।

इसक ` अननतर गख धप, दीप, भति नानाधिध दरवयदरारा सस- ` ¶जजत मनोहर गह म चार अगली ऊचा, आधा हाथ दीरध-भसथ परि- मित मिदरीकी वदी की रखना करय । उसक बाद इस शह म पीत, `

-रकत, कषण, -दवत ओर इयामर वरण अकत‌-चरण दवारा समनोहर सबततो-

भदरमणडक रचना करग । वाद म अपन-मपन कलपोकत विधि अनसार सत मानस-पजा अवधि कारय-कङाप समापन करक यथारीति पञच

"ततव का शोधन करग ।

परनवततव का शोधन करक “फट‌' इस मनव स परकषालन भौर अकषत दवारा लित सवरण, रजत, तानन जया मततिका निरभित घट

. <2>/» दस मनव क पाठ क साथ सरवतोभदरमणडल क ऊपर सथापित करग ' इसक माद ““सवी"" इस. बीजमनतर का पाठ करक सिनदरर दवारा

शस धट को अकित करग । बाद म अनसवार स समपट करक “कष” ` क अकारानत परत वरणो क साथ भरमतर का तीन बार जप करक

मदिरा, तीथ-जल अथवा विशदध जखदवारा घट को पण करग । , उसक आद नवरतन (अभाव म सवण) इह घट . शिराना होगा । नादम गर ^" जीजमनभ पाठ -सहित षट क मख म कटदल, यजञदमर, भवतय, वकल ओर याम का पलकव सथापितकर । बादम शवी

दी” दस मनव का उचचारण करक एर गौर भातपतणडल समनत -सवणमय, रजतमय, ताननमय गौर मनमय रान पलजवक ऊपर रसग । उसक नाद वसवयगम दवारा दस चटनी भरीवा फा बनधनः

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९> ] तानविकगर [ परणाभिषक

करग । शकतिमनव म रकतवसतर एव शिव ओर विषणमनवर म धवत- वसतर का वयवहार करग । वाद म सवा सथी ही भ सथिराभव""- एस मनतर का पाठ करक धट की सयापना करग ।

` उसक वाद अनय एक घटम पञचतततव-सथापनापवक नौ पारतो ` म रखग । रजत दवारा वकतिपातर, सवणदरारा गखपातर, महाशख (नरकपाल) दारा शीपातर मौर ठाननदटारा मनय सव पातरो का निरमाणः करग । महादवी फी पजाम पाषाण,. काषठ गौर खौह निमित पाकत गयवहार मही करना चाहिए । ऊपर छिखित पातरो को निभित करन भ असमरथ होन स निषिदध पातरको छोढ‌ कर अनय पदाथो हारा पातरो

कानिमाणि करग । वादरम पातर ससथापन-करक गरगणो भगवती भौर आननदभभरवादि क तपण क बाद भअमतपण षट की अचना करग । वाद म धप दीप का परदरघन करक सभी भतो को वलि परदानः - करग । उसक बाद पीरदवतरादि की पजा परवक षडडगनयास करग । जाद पराणायाम करक महशवरी क धयान गौर आवाहनपवक यथा- साधय उपचार म इषटदवता की परजा करग । पजाकाल की अवसवा- नसार कभी भौ कपणता नही करनी चाहिए ।* सदग होम क, समयः

, * बनक गहसथो की महामाया की पजा म भाठहाय वसतर की

गयवसथा रहती ह कित वरणकाक म बाब की गहिणी बनारसी साङी

स पण कषरीर को ढक कर बाहर होती ह । किसी गहसथ कीः बाडी फी ` विधवा क किए आतप तणडल आन पर अतयधिक टटा होन स रड- कियो न पसनद नही किया तब बाब न परवजो दवारा सथापित दव की सवा क नितय नवय क छिए उकत चावर को भज दिया । हाय ! जो मनषय क किए अनयवहाय ह, उस ही दवता क किए वयवसथा हई ¢`

ईसीलिए दवता की कषा भी हम परवर परिमाण मभोगफरत ट! मख यह नही समकषत‌ ह कि इसपात म फाकि दन पर अयना असतरी ना.कमजोर रहगा ।

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साधनाकलप ] तानतरिकगर [९१ तक कम समापन क अनत म पषप, चनदन ओौर वसतर दवारा कमारी . कौल.मौर ककरमणौ की अरचना करक उनस शिषयक अभिषकक. कििए अनजञा कग बाद म गड शिषय क दवारा दवी फी पना करारयग ।, उसक बाद परव सथापित घट क ऊपर “ही शरौ शरी" एस मनवका जप करक-- ।

उततिषठ बरहम-कलस दवतातमक-सिदधिद । तवततोयपललवः सिकतः शिषयो बरहयतरोऽसत म ॥

इस मनतर का पाठ करक धट को चकाएग । इसक बाद हिषयः

क उततराधिम ख उपविषट होन पर परवोकत षट क मख ससथापितः पठनवपललव दवारा कलस स जल लकर निमनलिखित मनतर स दिषय

मसतक आर अग म सिचन करग । मनध यथा--

= सदादिव ऋषि, अनषटप‌ छनदः, आदयादवता, ॐ बीजः सभवपरणाभिषक विनियोगः । ।

गरशसतवामभिषिचञचनत बरहमाविषणमहरवराः 1 दरगालिकषमी भवानयसतामभिषिञचनत मातरः ॥

षोडकी तारिणी नितय सवाहा महिषमदिनी 1 एतासतवामभिषिचचनत मनतरपतन वारिणा ॥

जयदरगा विशालाकषी बरहमाणी च. सरसवती । एतासतवामभिषिञचनत वगला वरदा शिवा )।

, नारसिही च वाराही वषणवी वनमालिनी । ` ` इनदराणी वारणी च रौदरी तवामभिषिञचनत शकतयः ॥

भरवी भदरकाली तषटिः पषटिरमा कषमा । शरदधाकानतिरदयाचानतिरभिषिञचनत त .सदा॥: महाकाली महालकषमीममहानीकसरसवती । उगरचणडा परचणडा तवामभिषिञचनत सरवदा ॥

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+ ५७ ` तानतिकगर [ परणाभिषक

मतसयः करमो वराहकच नसिहो वामनसतथा । रामो भागवरामसवामभिषञचनत वारिणा ॥

` -असितागोरररचानतः करोधोनमततो भयङकरः । कपाली भीषणरच तवामभिषिञचनत वारिण ॥ काली कपालिनी कलला कखकलला विरोधिनी ।

विपरचितत महोगरा तवामभनिषिञचनत सवचछ #। -[इनदरोऽगनि शमनो रकषो वरणः पवनसतथा । धनदशच महशानः सिचनत तवा दिगिदवराः #+ रविः सोमो मङखलकच बदधो जीवः सितः रानिः। नराहः कतः सनकषतरा अभिसिचनविनत‌ त गरहाः ॥। -नकषतरकरण योगो वाराः पकषौ दिनानि च। 'ऋतरमासोऽयनसतवामभिषिजञचनत तः गरहाः ॥ रवणकष-मरा-सपि-दधिःदगध-जकानतकाः ॥ समदरासतवामरभिषिञवनत मनतरपतन वारिणा ॥ नगगा सयसता रवा चददरभागा सरसवती।

- -सरयगणडकी कनती इनतगगा च कौरिकी ॥ . -एतासतवामभिषिञचनत मनतरपतन वारिणा । अननतादया महानागाः सपणयाः पततरिणः ॥ तरवः कलपवकषायाः सिचनत तवा महीधराः । "पाताक-भनल-वयोमचारिणः कषमकारिणः ॥ “परणाभिषकसनतषटोसतवामिषिचछनत पाथसाः । दरभागय दरयशो रोगो दौमनसय तथा शचः ॥ विनयनतवभिषकन परबरहम सवतजसा । अलकषमीः कालकणा च उाकिनयो योगिनि गणाः ॥ :विनदयनतवभिषकन कारीनीजन ताडिताः ॥ ताः परताः पिशाचाइच गरहा यऽरिषटकारकाः ।

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साघधनाकतप ] तानविकगर [९३

विदरतासत विनशयनत रमाबीजन ताडिताः ॥ ¦ अभिचारङता- दोषा वरिमनवोद‌भवाइच य ।

मनोवाककायजा दोषा विनशयनतवभिषचनात‌ ॥

नदयनत विपदः सरवाः समपदः सनत ससथिरा: । अभिषकन परणन परणाः सनत मनोरथा+॥

हस मनतर स अभिषक करक साधक यदि पहल परवाचारी क

बहम दीकषित हए द, तव कौलगर फिर उसको उसी दीकषित मनत कोः

इस समय एकबार सना दग । अननतर गर, चिधय को आननदनाथानत'

नाम परदान कर क वार उसी नाम स पकाररभ गौर उपसथित कौरगण `

को सना दग यथा-एक वयकति का नामःथा दवारकाचरण परणाभिषक

क बाद गर न नाम रखा 'दरगाननदनाथ ।'” ५

इसक बाद शिषय यनव म अपन दवता की पजा करक पचतसवो-

वार स गर की पजा करगा । उपसथित कौरगण की भी पजा करन

का करतनय ह । बादम गरदव को ययाशकति रटनादिः दवारा दकषिणानत करक चरण को सपलपवक परणाम करगा । `

यथा :-

; शरीनाथ जगता नाथ मनना करणानिध । परामतपरदानन प रयासमनमनोरथान‌ ॥

` 'अननवर गरः कौलो स अनमति ` ककर सदधिसमपनन परामतपण ` बानपातर शिषय क हाय म समपण करभ । उसक बाद दवी का सवदय

` मषयान करक स‌ कसलगन भसमदवारा शिषयक चर.मधयम तिक‌ परदान

करग । . उसक बाद चकरानषठान क विधानानसार पान ओौर भोजनः

करग । | ॥ |

इस बीच सभी कायो को अरथात‌ सकलप, पना, होमादि अपन- .

अपन कलपोकत विधानानसार समपादन करग । परणाभिविकत ` गयकति-

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"९४ | तानविकगर [नितय.नमिततिक गौर कामय कम -तनवरोकत सभी साधनो का ही मधिकारी हो जाता ह । परणाभिषिकत -नहोन पर किसी भी परकार कामयकम का फलभागी नही हमा जा ` “सकता । विकषतः कलिकालम यह‌ अनशासन सविशष कारयकारी ह । तएव शिवोकत तनव क अनशासन क अनसार परणाभिषिकत न होकर अनधिकारी तनवोकत किसी काय क भनषठानरभ विफल मनोरथ होन -स शासतर को दोष नही दिया जा सकता; मथवा “शकलासतर मिथया” कहकर पाणडितय परकादच नही करना चािए । इस परकार दखन स ।

` कोई अभिजञ वयकति तमह विजञ नही कह सकता; वरन‌ अञच समनञकर म अवजञा छी हसी हसग ।

। राहमणतर जो कोई जाति हो यथाविधि परणाभिषिकत होन पर "भरणव मौर समसत वदिक कारयो म बराहमण-सदश अधिकार परापत कर "सकता ह ।

नितय, नमिततिक ओर कामय कम करता; म भोकता ह--इस परकार क अहङकारकासपनजो

बनधन करा कारण ह--जनम, मतय काजो कारण ह ओर नितय नमिततिक याग बरत, तपसया ओर दान तयादि कारयो क फलकाजो अनसधान ह--उसी का नाम काय ह। करमकाणड जो सकल परकार

" क कततवयाकरतगय करमो का जञान कराता ह वही नही, कवल इषटदायक ` "अयत‌ मङगलकर कम को ही समकषाएगा । जिन सव कारयो कदवारा इस रोक का दहितसाधन होता ह, उनही का नाम करमकाणडह। सीधी वात द-क-।-मन‌, भरथात काय गौर मनदाराजो कर किया जाता ह बही. कम ह । इस समय दखना होगा कि व कम कय कया मौर किस अकार उनका. निरवाचन किया भाता ह। शासतर कारो का कथन ह :-- ` |

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साधनाकलप ] ` तानविकयङ [९५

वदादिविहित कम लोकानामिषटदायकम । तदिरखदध' भवततषा सवदानिषठदायकम‌ ॥

वद, पराण, सनत इतयादि शासतर म निरषट जो सव कम ह, च ही मनषय क लिए दषटदायक ह मौर उनक विपरीत जो ‹कम ह नव ही मनिषटदायक ह ।

वदादि शासतर विहित कम तरिविध ह नितयकम, नमिततिककम नभोर कामय-कम । ।

यसयाकरणजनय सयाददरित नितयमव तत‌ । परातःकतयोदिक तात शरादधादिपिततपणम‌ ॥

जिस करम क नही करन स परतयवाय उलनन होता ह, उसी को ` -नितयकम कहा जाता ह--यया-- परातः कतय, परातःसनधया, पितशरादध "एव पितततपण इतयादि । परवयजञाधित ( बरहमयजञ, पित-यकष, दव-यजञ, . -भरत-यकञ, भौर च-यजञ ) कम को नितयकम कफहा जाता ह । भरयात `जिनद रतयह परातःकाल स सायकाल पयनत ससारी वयकति को नियमित जो एहिक भौर पारमाधिक विषय का करमानषठान करना होता ह, उनका नाम नितयकरम ह ।

नितयक शरषषटखप स समपनन होन क लिए सामयिक नियम स *भायदध किए गए ह अरथात‌ किस समय कौन-सा कारय करना होगा, उसकी भयवसथा दी गई ह । परातःकाल स सनधयातक चार पहर अथवा -बारह षषट रख गए ह । स वार परहर समयको आठ. भायोम "विभकत करन पर परति अश आधा परहर . अथवा डढ धणटा होता ह । शस डदषषटको बदध याम कहा जाता ह । समसत दिन क बीच आठ -अरदधयाम होतः ह । इसकिए सभी नितयकमो फो माठ भागो म विभकत करक एक-एक भाग को एकएक गदधयाम भर अनतभकत करक उसकी.

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९६ | तानतरिकगर‌ [नितय,नमिततिक ओर कामयक `

पदधति सकिविषट की गई ह । सरयोदय क परवाहन म निरपित समयम जो सब कम किए भात ह, उनका नाम परात-ङतय अयवा बराहयमहतत-

कतय ह । परातःकतय समाधान क बीच परति अदधयाम मः नितयक समपनन करना होता ह । |

मासादयवाज यत‌ किचिदरीज नमिततिक मतम‌ । वदधिशरादधादिजातषठियागकममादिकसतथा ॥

| - समति चिन करमोक लद मासनपलादि निरदिषट नही ह किनतजो

निमितताघीन र-वही नमिततिक कमम ह। वथा--ददिघराद, जातषटियाग ओर गरहण क किए दानादि। निमिततक किएजो करम ह, व ही नमिततिक कम ह।

यतकिञचित‌ फलमदिय यजञदानजपादिकम‌ ।. करियत कायिक यचच तत‌ कामय परिकीततितम‌ ॥। क „^

कामना पवक अरथात किसी परकार फल की आशञारखकरजो यजञ, दान, जपादि कम समपनन होत ह, उनका नाम कामयकम ह । यागयजञ, महादान, दवतादि परतिषठा, जलाशय परतिषठा गौर तरतादिः

करमानषठान करन को कामयक कहा जाता ह ।

निसयकम परतिदिन करन क लिए ह; नमिततिक कम निमितताकषीन- ह; दसकिए वह समय~विशष म करन को ह; कामयकम इचछाधीन ह। ओर इसलिए, वह इचछानसार करन क लिए ह। नितय, नमिततिक भौर कामययतरिविध करमो म नितयकम ही समा को जञातवय ह । इत कारण नितमकम काजञानन होन स कवल पशवादि क सदश आहार-विहार मातर होताद; इसलिए नितयकम क अनषठान काः उततमशरस शरान . होना जावसयक द । नितयकम यथाविधि समपनः

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साधनाकलप | तानतिकगख [ ९७

करनस इस ससारम यथाविधि सखी होकर नतम मोकष-लाभ किया जाः सकता ह! यथा--

वदोदित सवक करम नितय करयादतनदरितः । तदधि करवन‌ यथाशकति परापनोति परमा गतिम‌ ॥

-- मनसहिता, ४ मधयाय

--आलसय परितयाग करक परठिदिन वदोकत अपन-अपन आशरम-

विदित समपरण कमो का सपादन करना चादिए । कारण सामरया-

नरसार य समपण कम करन छ फरमायति की परषपति होती ह 1

इसि दखा जाता द करि समयकरप स नितयकरम-विधि का

जञान होना मावय ह । निषयकमी शथकति ठी साधना-काय म योमबता

रापत कर सकठा @ \ उसक विना दखरयो क किए सान-कारय म अगर-

शर होना कवल बनधया सतरी स सनतानोतपादन की वषटा करनक

समान विफल होता ह ।

दीकषागरहण करक आतमोननति क किए परतिदिन जिन सब कारयो का

अनषठान करना दोता द-व दी नितयकम ह । इस नितयक फो हौ

वधकम कटा जाता ह । सनान, पजा, सनघया-गायतरी, सतव-कवच पाठ,

` होमपरशति सभी कमो को ही वषकम कहा जा सकता ह । मनतर-

गरहण करक परतयक वयकति का इन. सब वधधरमो का अनषठान

करना कतवय ह । इसम योगाभयास चिततजण मौर बाधयातिमिक शकति

की उपलिनधि होती द । शाकत, दीव, वषणव, गाणपतय ओरसौरसभी

साधक को तानविक मतस वधकम का अनषठान करना होताद।

बराहमण वदिक कारयो का अनषठान करग । बहतो की धारणा ह कि.

कषणादिदवता-साधक क कम तानतिक नही ह--उनकी. यह भल

धारणा ह। सभी दवताओ की दीकषा ही तनोकत ह, तब कवलराग.

माग का भजन तनधातीत द। जो विधिपरवक भरात‌ मनवरदिदवारा

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.. ९८] | तानविकगड . [करम

इषटदवता का भजन करत र, उनह सभी फो तनवरमत स वह समपादित करना होता ह।

अतएव परतयक दीकषित वयकति परतयह विधानानयायौ सनान, पजा,

सनधयाहधिक परभति नितयकरम को समपादित करगा । नितयकम का. विधान हिनदमातर को ही जञात ह । तब कोई आनषठानिक निषठावान‌ हिनद स जान लना मचछा ह । उस विसतत विषय को परकाशित करना इस गरनथ का विषय नही ह। अपन-मपन गर ही शषा को उसकी शिकषा दत ह 1 तव उमको यथारीति समपादित करना चाहिए । नितय- नमिततिक करियाशील नही होन स कामयकम का फल नही परापत किया जा सकता । विकञष साधना भी उसक रा नही हो सकती । अतएव साधनाभिषावी साधरकमातर ही नितयनभिततिक करिणाभो का समपादन करना नही भलग 1 नितयनमिततिक मौर कामयादि सभी कम परकषट. रपम समपननकरन स असलीषप म किती परकार विशष साधना-काय भ मगरसर होन की मता उतपनन होती ह । तव जिसक मन म जिस भरकार"को अभिलाषा रहती ह, वह‌ उसी क भनसार साधनाम भरवतत हो सकताह। जिमकाजो दषट ह उसको उस विषयी ही साधना करना करतनय ह । साधनाः क अनत म इषट-सिदधि होन स साधक तव सभी परकारक साधरना कारयो को ही हसतमत कर सकता ह ।

. विशष साधना-पदधति की विदतति दना ही इस गरनथ का परतिपादय | विषय ह । दौकषगरहण करक भौर शाकताभिषिकत होकर परथम नितय | करिया का यथाविधि नितय अनषठान मरथात‌ नितयपजा, होम, तपण,

सनयािक, नानालप परशचरण परशति अनषठान को करना चाहिए । कम स जव साधना-काय म विशषरपस दढता उतपनन होगौ तव परणा-

भिषिकत होकर पिदोष साधनः-काय म परगतत होना चाहिए । इन सव कारयो म मनोयोग नह दकर जो, सवचछा स कामय-कम अथवा विशष

46

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साधनाकलप ] तानतिकगर | [९९

साधना का अनषठान करता ह, उनका शरम वयथ होताद। सभीसतदा

समरण.रखग कि नितय-न मिततिक करमो क अनषठानकारी क बिना कोई भी तनतरोकत साधना म सफलता नदी परापत कर सकता ह ।

अनतरयाग अथवा मानतिक पजा

दीकषा गरहण करक परतिदिन दषटदव कौ पजा करनीदहोतीद। इस दषटनिषठा गौर. भकतिकी इदधि होकर भगवान‌ म तनमयता

जनमती ह । किनत यह पजा-पदधति, मनतर ओर दवताभद स भिनन-

भिनन ह। इसकएि खभी परकार दवता की बाहय धजा-पदधति किपिबदध करना ईस सामानय गरनयम साघयायतत नही ह । अपन-अपन कलगोकत

विधानस सभी बाहयपजा का- समपादन करग । हमार दशम पटल-

गर शिषय को नादयपजा की पदधति परदान करत ह ।. उसस भिनन

पटति-परनयाटि म भी पजा-परणारी लिखित ह । अतएव हमन बाहय-

पजा क समबनध म कड नही लिखा ।

सभी परकार की बाहयपजामः ही अनतःपजा की वयवसथा ह अरथात‌ बाहयपजा करन स भनतःपजा भी करनी होगी । मानसपजा ही सभी परकारकरीपनागोम धषठ ह; एकमातर मानस-पजासतही सवाथसिदधि हो सकती ह; तव सव मानस पजा क अधिकारी नही हः

काय की दषटिस आग बाहयपजा का अनषठान होना चाहिए; बाहय-

पजाक साधी मानत-पजा करनी होती दह। इस पकार कछ दिन

जाहयपमाक अनषठान म जव अनतःपजाका सनदरलषम अभयास

होगा तब ओर बाहयपजा की बिलकल आवदयक नही होगी ; कवल

मानसपजा करनस ही इषटतिदधि होगी । यया-

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~

१००] ` तानविकगर { अनतरयाग

अनतःपजा महशानि बाहयकोटिफकल कभत‌ । - ` सववजाफल दवि परापनोति साधकः परिय ॥

--भतशदधि-मनतर

अरवत‌ एक बार की हई अनतःपजा कोटि वाहयपजा का फल.-

परदान करती ह; इस अनतःपजास ही साधक सभीपजाका फल परापत कर सकता ह ।

जिस कारण स उपचार क पराचय विना बाहयपजा निषफल होती

ह, ईसलिए अनतःपजाधिकारीक कलिए बाहयपजा विडमबना मातर

ह । वही जगदगर योगीङवर न कहा ह कि-

मनसापि महादवय नवय दीयत यदि। - यो नरो भकतिसयकतो दीरघायः स सखी भवत‌ ॥

मालय पदमसहखसय मनसा यः परयचछति । कलपकोटिसहसराणि कलपकोटिशतानि च ॥ सथितो दवीपर शरीमान‌ सावभौमो भवत‌ कषितौ मनसापि महादवय यसत करयात‌ एदकषिणम‌। स दकषिण गरमगह नरकाणि न पशयति ॥ मनसापि महादनय यो भकतया करत नतिम‌ । सोऽपि लोकान‌ विनिरजितय दवीरोक महीयत ॥

~ गनधरवतनव

जो मनषय भकतियकत होकर महादवी को मनःफलपित नव हारा १जाकरगव दीरघाय भौर सखी होत ह । जो वयकति मनः- कलपित पर की माला दवी को परदान करता ह, वह‌ शतसह कोटि- कठपकाल तक दवीपरम वास करक पथवी क सावभौमतव को परापत होता ह। भो दवी की मानस-परदकषिणा करताह, वह यमगहमनरकका दन नही करतादह। जो वयकति भकतिक साथ दवौ को मानस-

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साघनाकलप ] उानतिकगष ` [१०३

तभसकार करता द, वह भो छक को जीत-कर दवीक लोकरभ

जावाद। । ।

वाठक ! मानस-पजा कवी बयषठता सौर उषकारिता शायद

समकष णए रोगि । छानविक-साक परतिदिन यथाविधि एकमातर

अनतरयागर अथवा-मानस-प.जा का अनषठान करन स सरवसिदधि को उप-

बध द सकरगा । मनसप.डा शः यथा-- |

लभ आसन पर परबासय अथवा उततरसय होकर उपवकषन-प. वक

धप हदय म सधा-समदर का धयान रना होगा मौर इस बीच -सवण-

बादकामय, विकसित-कसमानबित, मनदार एव पारिजातादि पषप-इकष-

परिशोधित द, सरवदा हौ जिस इकषम पषय भौर फल उतपनन हो, इस `

परकार दकषयकत रतनदीप-या जिसक चतदिक‌ नाना परकार कसम-गरनय स

जामोदित, जिस सथान पर धरमर-समह विकसित कसमामोद स परहषट,

जो सयान समधर कोकिल गान स परतिधवनित, विकतित सभी सवरगीय

सवण पदभज जिसकी शोभा वदधन करत ह गौर जिस सथान पर मनो-

हर वसतर, मौकतिक माका गौर कसममालाककत तोरण-परिशोभित ह,

एतादश रतनदीप का धयान करना होगा ।

उसक बाद रलनदवीपाभयनतर भ चतदरप चलःशाखा-विशिषट

ससवादिगणतरय समनवित, पीत, कषण, शवत, रकत, हरित ओर विचितर

वणो क पषप विराजित कोकिल-भरमरादिपकषीगण-विमणडित कलपपादप

करा धयान करना होगा । इस परकार धयान करक उसक जाध भागम

रटनवदिका का धयान करग । |

उसक बाद उसक ऊपर भाग म बालारण-सदकच रतनवण रतन-

` निभित सोपानावलीयकत धवजगकत चतरा रामवित नाना रलालहत रलन-

.निभित पराकार वषठिति भपन-अपन सथान पर सथित लोकपारगण दवारा

अधिषठित करीडादीख सिदध, चारण, गनध, विधाधर, महोरय, किननर,

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१०२.] तानतरिकगर [ अनतरयाग

मपसरागण-परिवयापत, दतय मौर गीतवादयनिरत सर-सनदरीगण-यकत, _ किततरीगण-यकत, पताकालकत, महामाणिकय, दय ओर रतनमय- चामर-भषित, लमबमान सथ नमकताफलाककत चनदन, मगर भौर कसतरी दवारा षरिलिपत समहत‌ रकतमणडप का धयान कर उसक मधय म महा- . माणिकय-वदिका का धयान करना होगा ओर इस वदिका क मभयनतदर परातःसय किरणारण-परभम चतषकोण शोभित बरहमा -विषण-हिवारमक

` सहासन का धयान करना होगा । उसक बाद उकत सहासन पर परसन- पलिकानयास करनाहोगा। ` ।

उसक वाद सकलपोकतकरम स पीठपजा करक परत-पशरासन परः दषटदवता का धयान करना चाहिए । उसक बाद इषटदवता को रतन-

. पादका परदान करक उनको सनानमनदिरम जानयन करग ओर कपर, . अगर, कसतरौ, मगमद, गोरोचन. भौर कसमादि नाना गधदवय-सवा- सित जलदवारा दषटदवी क सवशरीरोदरतन करक उसम सगनध तल ` का लपन करना चाहिए । उसक बाद सहत कमभ जरत दवीको

सनान कराकर वसबरवारा शरीर मारजन-पवक वसतरयगल परिघान कारना चाहिए । बाद "म कवी दवारा कश ससकार करक ललाट

पर तिलक, कशमधयः र दर हाथम हायीदानत का शख, कयर, ककन, ओौर वलय, पादपदम नाना-रतन विनिरमित अगरीयक, नपर,

नासिका क अगरभागम गजमकता कानम रतननिमितत दल, कणठम रतहार भौर सगनध पषपमाला परदान करक सरवादधिम चनदन गौर सिहलक (गनधदरवयविशष) का कऊपन करना चाहिए । उरःसथल नाना कारकारयानवित ` सवण खचित कञचकी परिधान कराकर भौर नितमब पर रतनमखला पहनाना चाहिए ।#

# पञच उपासको म परतयक ही अपन इषटदवता क घयानानयायी- - भासन-वाहनादि की कलपना करग । म इस गरनय म दवीमततिको शकय करक ही सभी विषयो को लिपिबदध करगा ।

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साधनाकलप ] तानविकगर [ १०३

बाद म समाहित चितत स दवी का चितन करत हए भतशदधि एव

नानापरकार स नयास करक षोदशच उपचार स हदय-सथिता दवौ कौ

अरचना करनी चाहिए । उपवशनाथ रतनरसिहासन परदान करक सवागत

परन करना होगा । पादपदम पादय अरपण करना चाहिए । परसतक

अधयरपिण ओर पराभतरप आचमनीय स मखसरोरहम दग । मधपक

एष भिधा आचमनीय मखम परदान करना चाहिय) सवणपातरम

परिषक परमानन, कपिागौ क घरत~यकत सवयजनानन, सागर

तलय अमय मदय, पवतपरमाण मास, राशिङत मतसय, नाना परकार क

सवासितर जल ओर करपरादि मसललासयकत तामबर पर भति चय, , चोषय, लहय, पय चतधिघ मानस उपचार दवारा दवी की अरचना करग ।

अननतर आवरण दवता कौ पजा करक जप करना होता ह ।

रोकत मानसपजा गरपदिषट विधान उसक मतिरिकत शासतर म

भी मानस योग का विधान ह। यथा-

हतपशरभासन ददयात‌ सहसतारचयतमतः। ` पादय चरणयोदयात‌ मनसतवरधय निवदयत‌ ॥

तनामतनाचमनीय सथानीय तन च समतम‌ । आकाशतततव वसतर सयात‌ गनधः सयात‌ गनधतततवकम‌ ॥ चितत परकलपयत‌ पषप धप पराणान‌ परकलपयत‌ । तजसतततव च दीपाथ नवय सयात‌ सधामबधिः ॥ अनाहतघवनिरधणटा वायतततवञच चामरम‌ । सहसरार भवत‌ छतर शबदतततव गीतकम‌ ॥ . नतयमिनदरियकरमाणि चाञचलय मनससतथा । समखला पदममाला पषप नानाविध तथा ॥ अमायाचरभावपषपरचयद‌ भावगोचराम‌ ।

| 7 अनहकार अराग अमद तथा।

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१०४] तानतरिकगर [अनतरयाग

अमोहकमदमभचख दरषोकषोभकौ ` तथा । अमातसयमलोभच दशपषप विदरधाः ॥ अरहिसा परम ` पषप पषपमिनदरियनिगरहः। दयापषप कषमापपप जञानपषपञच पञचमम‌ ॥ इति पञचददोभावपषपः समपजयत‌ शिवाम‌ । सधामबरधि मासरौल . मतसयरौ तथव च ॥ भदराराशि सभरकषयचच घताकत परमानगनकम‌ । ककामतचच ततपषप पशच ततकषालनोदकम‌ । कामकरोधौ छगवाहौ -वरङि दतवा परपजयत‌ । सवरग मरतय च पाताल गगन च जलानतर ॥ यद यत‌ परमय तत‌ सरव नवदयारथ निवदयत‌ । पाताल-मतल-वयोमचारिणो विघनकारिणः। तासतानपि वलि दतवा निदरनदरो जपमारभत‌ ॥

साधक भपन हतपगर को भासनकपम कतपित करक उस पर . भरभिषट दवता को बठाएगा । उसक बाद सहसनारविगलित-अमत को

पादयलप म कलिपत कर उसक हारा इषटदवता क चरण को विधौत ` करगा । मन को भरघयरप म परदान करगा । परवोकत सहलारामत को भाचमनीय मौर -सनानीय, दहसथ भआकाशतततवको वसव, पथवीततव को गनध, चिततको-षप, धराणको धप, तजको दीप, सधासागरको मव, .मनाहत धवनिको षणटाकषबद, शगदतततव को गीत, इनदरिय चापलय फो वतय, वायतसवको चामर, सहसवारपसको छत, हस को मनव अरथात‌ शवास-पररवास को पादका मौर पदमाकार नादीचकर को पदम

भादठाक ङप कलपित कर' हम अनहकार, अराग, अमद, अमोह,

मदमभ, -भदर ष, अकनोभ, , अमातसरय भौर अलोभ इस भावमय दशपषप मौर मिसा, ददवियनिगरह, जञान, दया, भौर कषमा इस पचपषप को

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साधनाकतप ] तानविकगर [१०५

दशी को परदान करग 1 उसक बाद. सागरतलय सधा {म) पवततलथ

मतसय मौर मास नान। परकार सभकषय मदरा मौर सवरग, मरम, पाताल,

गगन ओर जलमजोजोसथानमजो जो परमय विदयमान ह उन सभी को नव भौर कामको छाग करोध को महिषरपम करिपित करक

विधनगण को पथक‌-पथक‌ बलि परदान करग । अननतर जप

आरमभकरग। . .

इस दविविध अनतरयाग दवारा मन को परिषकत रखकर एक चितत हो

करजिस करिसी एकको करनस हीहोवा ह। जपकी परणाली

यथा

मानसजषप की माला पचास वरण कीटोतीद। इसको गयन का

सतर शिब-शकति भौर गरनथि कणडलिनीशकति गौर मर नादजिनद । वण- मयी इस माला क जपन की परणारी यह कि परतयक वरण को मनतर ओौर विनदयकत कर कग यथा-कम भीजमनतर क । अकारादि हकारनत वरण म अनरोम एव हकारादि अकारानतवरणम विलोम--दोनो क ` मिलन एक सौहोताद। कष वरण मर अरथात‌ माला परिवतन की

अथवा जपारमभ की भयना जप . समाति की -सोमा अथवा साकषी ।

उसम मतर योग नही करग । इस परकार शत जप ओर अषटवग का - आदिभ,क,च,ट;त, ग, य, श इस अषटवरणम आठ जप ईस समह

स एक सौ आठ बार जपदहोतादह। साधक इचछाकरनस एक हजार

आठ वार भौ जप कर सकता दह, इस परकार मानस पजाओौर जप ` करक बाद म जपसमपण क अनत म परणाम करग--

सरवानतरातमनिखय सवातमजयोतिः सवरपिमि । गहाणानतजप मातरा काठि नमोऽसतत ॥

उसक बाद बरहमा, विषण, शद, ईशवर, सदारिव य पञदवता दवी क पयङकशप ह; उकत पय पर नाना परकार पषप विनिरमित दगधफन- ˆ

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व. = = रतः

१०६] तानविकगर [ अनतरयाग

निभ शयधाकी रचना कर उसम दवीको सखस शयन. कराकर

गमभीर होकर दवौ का पाद सवन भौर चामर वयञजन करना होगा ।

उसक वाद नतय, गीत ओर वादव वारा को परितषट कर पजाकी

साथकता क निमितत साधक होम करगा ।

अनतरहोम सदयसिदधिपरद ह । इसक अनषठान स मनषय चिनमयता

परापत करता ह। आघारपदमभ चिदागनि स साधक होम करगा ।

अनतरातमा, परमातमा, कनानातमा, इस आतमतरितयातमक, चतषकोण आाननदरप मखला एव विदलप शरिवलययकत नादविदरप योनियकत

चितकणडका चिनतन करगा । इस कणडक दकषिणम पगला, वाम- भाग इडा गौर मधयभाग म सषमना नाडो का धयान .करक धम

भौर अधरमरप म कतपित घत दवारा ययाविधि होम करगा ।

परयमर मलमनव, उसक बाद--

नाभौ चतनयषपागनौ हविषा मनसा स‌_चा 1 जञानपरदीपित नितयमननवततिज मयम‌ ॥

यह मनतर, बाद म चतरधयनत दवता का नाम, अननतर सवाहा, इस

अनव स परयमाहति दान करगा ।

इस रप भर परथम मलमन , वाद म~~

धरमाधिमौ हविरदीपत आतमागनौ मनसा स‌-चा ॥ सषमनवतमना नितय बरहयवततिज होमयहम‌ ॥ .

यह मनतर, इसक वाद . चतरयनत दवता का नाम, उसक वाद

सवाहा इस मनपरस दितीयाहति करगा । पनः मकमतर, बाद म-

परकाशाकाशहसताभया अवरमबयातमना स-चा। धरमाधिमकलासनहपणमगनौ उहोमयहम‌ ॥

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साधनाकलप | तानतिकगङ ` [ १०७

यह मनतर, बाद म चतरयनत दवता का नाम, उसक वाद सवाहा धस मतरस ततीयाहति दान करगा ।

अननतर मल . मनव क बाद-अनतनिरनतर-निरिनधनमधमान मायानधकार-परिपनथिनि सविदगनौ, करसिमिदिचदभतमरीचिविका- शभमौ विशव जहोमि वसधादि शिवावशञानम‌” यह‌ मनव, वाद चतथयनत दवता का नाम, उसक बाद सवाहा, इस मनत स चतरथाहति शरदान कर ।

इसक बाद “इदनत पातरभरित महततापपरामत परणाहतिमय वहनौ पणहोम जहोमयह" यह मनतर, ` पनः चदरयनत दवता का नाम, उसक बाद सवाहा, इस मनव स परणाहति परदान कर ।#

` # मनतर किस परकार भावपर गौर हदयगराही होत ह । पाठको की अवगतिक लिए कछ होममनतो का अनवाद दिया गया द। परथम मनतर-मरा नाभिसथित चतनयरप हताशन वरतमान जानदारा भरदीत हा ह । मन मनोमय सकदटारा धरमाधरमरप तक साथ

इनदरियदततिसमह को आदति दी। दितीय मनव--धमधिमरप शरतहारा समटीत मातमरप अगनिस सषमनापथ दारा मनोमय सरक‌

की सहायता स इनदरियदरतति समह को ` आटति परदान की! ततीय मनतर -मन परकाश मौर आकाशरप हसतदवयदवारा उनमनीरप खक‌ को सहायता स धरमाधिम मौर सनह-विकाशचषप त को आहति. दान

किया । चतर मन- जिसस अदभव दिगयजयोतिः परकाशच पाती दह, जो मायानधकरार दर कर हमार अनदर निरनतर परजजवकिति गौर भरदीस रहत ट, बही अगयकत समबित‌ रप अगनि सरभन वसमति स शिव परयनत समसत अगत‌ भौर सभी मायापरपञच को आहति दी । परणाहति मनव

हमारा भनोमय पातर आघयासमिक, आधिभौतिक मौर भाषिदविकः

सको तापरतरयरप तस परिपरिव करक भौर परणाति परदानपरवक दधम समापत किया । ।

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(1

०८ ] । तानतिकगर ` [अनतरयाग

इस परकार स अनतरयाग अरथाव‌ मानसपजा, जप ओर हौम करन

पर दही बरहममय होतादह। योगीगण को जहा तकर परकत जञान की

उषरनधि नही हती, वहा तक बाहय पजा करनी होगी 1

बाहयपजा परकरतवया गरवाकयानसारतः 1 वहिःपजा विधातवया यावजजान न जायत ॥

--व!मकडव रतनत

जव तक परकत जञान नदी होता ह तवतक गरकी आजञाक अन-

-शग बाहयपजा को कर का करतवय ह । योगीगण मौर मनिगण मानस-

पजाहीकरत ह; बाहय पजा नही करत ह; किनत गही साधक कवल-

मानसपजादवारा सिदधि कौ उपलबधि नही कर सकता । इसी कारण

स उनको बाहय ओर मानस पजा दोनो कोही करना भावशयक ह।

द सयान पर साधकको * मौर एक बात धयानम रखनी होगी

कि पजा क समय अक (गोद) मबारयहाथक उपर दाहिना हाय रखकर कारय करगा ।

सतरी-दवता का धयान क समय इसक विपरीत नियम अषचरणीय द । मानसिक जपक नियम को किसी अभिजञ साधकक समीप दख- कर गरहण करना अचछा होगा । शाकत-वषणवादि पशच उपासकगण मानसपजा क समय पवदशविध भावपषप दवारा इषटदवता की अरचना करग । यही तक साधक का अधिकार ह । कवल परणारभिषिकत शाकत इसक बाद लिखित उपचार क दवारा पजा कर सकग । मौर मानसपजा भौर जप क वाद होम करना एकानत करतभय ह । बिना जप की पजा जिस परकार विफल होती ह, उसी परकार होम नही करन सभीवह पजा कोई फल परदान नही करती ह । यथा :--

नाजपतः सिदधयति मनतरो नाहतसच फलपरदः 1 विभतिशवागनिकारयण सवसिदधिलच विनदति ॥

यय‌ = यका त य

=--- ॥

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ाधनाकलप | तानविकग | [ १०९

होम नही करन स मनतर कोई फल परदान नही करता ह ! होम करनस सभी परकार की समपतति की उपलचधि ओर सव परकार की सिदधि होती ह! साधकगण यथारीति अनतरयोग का अनषठान. करन सरसिदधि की उपरललवि कर सकग इसलयि अनतरयाातमिका पजाका करना सभी का करतशय ह गौर अनतरयाग सभी पजाजो म सरवशरषठ ह । यथा-- ।

अनतरयागातमिका पजा सरवपजोततमोततमा ।* न अकः अका नक, +

माला मिणय आर जय का कौशल : जप करत समय शदराकषादि माला अयतरा करमाखा उयवहत होती

ह । परष दवता क जप क किए करमालाम तजनी, अन।नमिका मौर .. कनिषठा का तीन-तीन पव ओर, मधयमा का एक परव साधक मरहण करणा भौर मधयमा क दसर दो परथोकोमरखपस कलपना करगा । अनामिका क मधय , पवस जप. आरमभ करक कनिषठादि करमस तजनी क मपव तङ जो दशपव ह, इनस साधक जप करगा । जन एक सौ आठ बार जप करगा तव परवोकत नियम स सौ आदि सखया क जप‌ पण होन पर; अनाभिका-क मर व स आरमभ करक कनिषठा क करमस तरजनी क मधय पव तक आठ परवम भाट बार जप करगा । ।

शकतिमनत क जपक किए करमाला अनःमिकाका तीन पव, कनिषठा का तीन पव, मधयमा का तीन पव भौर तजनी का मलपव - सारघक परहण करगा । शकतिभनतर क जप का यही नियम ह. कि उना-

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११० | तानवरिकगख [ माला-जप

मिका मधयपवस जप आरमभ करक कनिषटादि करमत मधयमा का तीन पव गौर तरजनी का भलपव इस दशपव स साधक जप करग) ।

भषटोततरशतादि सखयक जप करन क लयि परवोकत नियम स शतादि-

सवयक जप रक अनामिका क मरपव स आरमभ कर कनिषठादि

करम स मधयमा क मल पव तक आठ बार जप साधक करगा । तजनी छ

क उपरक दो परव को मड समनञना होगा । यथा-

' तजनयगन तथा मधय यो जपत‌ स त पापकरत‌ । ~ नारद-वचन

ओ यकति वजनी क अगर ओर मधय परवत शकतिमनतर का जप

करता ह, वह‌ वयकति पापकारी होता ह । इसको ही समसत तनवशासवो

स शकतिमाला कह कर अभिहित किया गया ह । शरीविदयादि क विदष- विशष जपम विशष-विरष अगली-पव गरहण करक छर-माला की

वयवसया ह । विसतार क भय स उसकी विवचना नही की जा रदी ह ।

करमालाक छपका यही नियम ह किजप क समय कर की मगलियाौ सद योडी दषो .भौर परसपर सदिकषट कर साधक उन

रखगा मौर दोरनौ हाथो को आचछादित करक वकषसयल पर साधक सथापित करगा । जप-कालम सव अगकियो को अचग नही करगा; शदध.लियो को नियोजित करन पर छिदरपथस जप निःसत होतादह

अरयात‌ जप निषफल हो जाता ह। भगी क अगरमाग म पवसधिस मौर मषलघनपवक जो जप करिया जाता ह, उत निषफच सभकञना चाहिए । करतल को योडा आक चित भौर सब अगखियो को टढा कर उसक समान दाहिन हाथ को हदय क ऊपर सथापित करक वसवरदवारा आचछादन करत हए जप करना होगा ।

सखया को धयान रखकर जप करना करतबय ह । शासरविधि- विदित सखया न रखन स इचछानकल जप करन स वह‌ निषफल होता

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साधनाकतप | तानतिकगद [ १११

- ह । दाहिन हाथम जप .करना होतार गौर बारय हास जप की सखया रखनी होती ह । परातयहिक जप करमाखास परशसत होता ह।

निवय जप कर करयात‌ न त कामयमवोधनात‌ । कामयमपि कर करयात‌ माराभावऽपि सनदरि ॥

--नितयजप करमालास समपनन करना ही कततवय ट। किनत कामयजप करमालादवारान करन अनय माला स जप करना परशसत होता ` ह। तब यदि कामय जपम माला का अभाव होतताद, तो अगतया करस भी निरवाह हो सकता ह । माला क समबनध शोसवरका विधान

यह हकि- । साधारणतः कामयजप ददराकष, सफटिक, रकतचनदन, बरी,

परवा, शङखः, पदयतरीज, मौकतिक ओर कशगरनथि क दवारा निमितत माला

वयवहत हो # ह । शानतिक परभति कारयो म ओर दवताभद स माला- गोका विहञष नियम र, १र साधारण जपम उलकिखित, नानाविध मालाओ स जिस मालाक माधयम स जप करन की इचछा साधक कय

होती दह गौर जो सलभ दह, उसी माला स जप कर। करमाला स

जण कौ अपकषा शङकमाला का जप सौगण, परवालमालास सहसरगण, सफटिक माला स दस सहलगण, मौकतिक माला स लकषगणः

पदमबीज -माला स दशलकषगण, सवगभाला स कोटिगण अधिक कशगरनयि ओर रदराक स अननतगण अधिक होता ह मौर शवत पदयवीज-निमित भालास अभित फल की घराति होती दह।

परसपर समान, नतो बहत सध, न तो बहत कश, कीटाण वध- रहित गौर अजीण अरथात‌ नतन सब मालाओ को विधि-परवक जलस पकषालित कर पञचग वयदवारा साधक भभिसिञचन करगा । उसक

बाद बराहमण कनया हारा करपसि सतर अथवा पट-सतर पवः ` तरिगणित करवा कर सव मालाओ को गरनथन करग । मरमनतर ओौर. .सवाहा `

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११२1 ` तानतिकगर | माला-जप

उचचारण करक एक-एक माला को गयत हए उम सतरको रगा-. `

एमा । माला दर रप स गथना चाहिय कि परसपर मख ओर पछ एक साथ सयोजित रह ।# सजातीय एक मालाटारा मर अरथाव‌ मधय मथवा साकषी का बनधन करगा । अषठोततरशत अरथात‌ एक सौ `

` आठ मणियो हारा माला-गपरनथन परशसत ह । . अननतर एक-एक माला

पकड करक हदयम भोम‌ इस मनतर का समरण करत हए उसम `

गरनथि परदान करगा । सवयम‌ परनयन करन पर दषट-मनतर शनत भनय वयकति क गरनथन करन त परणव समरण करगा । दवय यावतत न करक

बरहमरथि अरयवा नागपाशच गरनथि परदान करगा) -इघ परकार मणियोको रखग जिसस माला सरपति मथवा गोपचछ-सदश हो । गरनवि-हीन

मालदवारा कभी भी जप नही करगा। किनत मर गरनयि नदी होगी । इकष परकार माला परथित कर उसक बाद उसका शोधन ` करगा 1 यथा-

अपरतिषठितिमालाभिमनतर जपति जो नराः। सरव तननिषफल विदत‌ कर धा भवति दवता ॥

जो वयकति अपरतिषठित मालादहारा जप करता ह, उस पर दवता

कर‌ होत ह गौर उसका जप निषफल होता ह, इसलिए जिस माला हारा जप किया जाता ह, उसका ससकारकाय समपनन कर कना

चाहिए । ।

शभ तिथि, शभ वार, शभ नकषतर मौरशभलनम गरदव को . परणाम करक साधक गरढरारा अरथात‌ सवय माला का ससकार करगा । क~~

` #सदराकष का ऊपर. वाला भाग मख मौर निमनभाग पछ अनयानप.मालाओ काज भाग सथल होता ह, बह भागमल दभगौर जो भाग.सकमह, वहपह।

~~

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साधनाकलप | तानिकगह { ११३

साधक नितय-करिया समापन क अनतम सामानाषथ सथापित करक--

हौ --इस मनतर स पञचगवय म माला उटगा । उसक बाद शीतल जलहारा सनान करायगा । ।

सदयोजात परपयामि सदयोजाताय व नमः। भवऽनादि भजसव मा भवोदभवाय व नमः ॥

इस मनतरस पञचगगयदवारा मारजन करगा 1 उसक बाद ॐ

नमो जयषठाय, नमो रदराय, नमः कलाय, नमः काठतरिकरणाय, नमो बलपरमथनाय, नमः सरवभतदमनाय, नमो समराय--इस मनतर स पाठ करक, चनदन, भगर भौर कपरदरारा उकत मालाका

साधक ठपन करगा। अननतर सधप-वदधिसनतापम ॐ अघोरभयोऽय घोरभयो . घोरघोरतरतमभयशच सवतः सरवसरवभयो नमसतऽसत रदररपभयः यह मनव पाठ-करक मााको धप परदान करग । उसक बाद ॐ ततपरषाय विदमह महादवाय धीमहि, तननो रदरः परचोदयात‌" इस तदपरष-मनतरस जल सवन करक माला को गरहण करगा ।

बाद म नौ अदवतथपतरदवारा पदम रचना करक उसम मातका. गौर यरमनतर उचचारणपवक माला सथापित करनी होगी । उसक बाद माला म.दवी की पराणपरतिषठा करक परिथारगणक साय इषटदवता की पजा भौर मातका-वण दवारा अनरोम-विलोभम भाला का साधक अभि- मनवित करगा । उसक बाद ह सौ." इस मनतर स मख अभिमनतरित कर उसको दवता सवरप समञगा । उसक बाद अगनि का ससकार करक ..

एक सौ आठ वार होम करया मौर 'हतशषदवारा दवताक शदशयस साधक परतयाहति परदान करगा । होमकाय म अशकत होन स साधक

दविगण जप करगा । वाद भ ॐ अकषमाकाधिपत.ससिदधि दहिदहि . भ सवथ -साधिनी साधय साधय सरवसिदधि परिकलपय परिकलपय

[

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११९४ ] ताननिकगर [ माला-जप

` म सवाहा--इस पारथना-मतर र पाठ करगा । इस परकार स सससकत मालादरारा भप करन स साधक को सरवाभीषट की सिदधि होती ह। उसक वाद गर फी पजा करक उनक हाथस साधक माला को गरहण करगा ।

जप करन क पहल मालति जलाभयकषण करक "र" ही" अकषमा- लिकाय नमः' इस मतर समाला की पजा सःघक करगा | उसक वाद दाहिन हाय स माछागरहण करक हदयक समीप लाकर मधयमा गली क मधयभाग म समाहित चितत स सयापित करगा । मालाक सपर भागम अगठ को सथापित करगा भौर मघयभाग क अगवाकत भागस जपानतरककम स उस सचालित करगा । यदि अगठ स माला को चलाया जाय तो उषस जप निषफल होताह। बाए हाय स अयवा तरजनी स मथवा अपवितर मवसथाम माला को सपश नही करगा । भकति, कति मौर पषटि-कामना स मघयरमागी स जप करगा । एक-एक बार जप करक साधक एक-एक दाना को चलाएगा मौर जपकौ सखया को रखगा । सखया रखन क लएिजोजो दरवय मावकयक ह, व निमनलिखित ह। यथा-

तकषा कशीदः सिनदर गोमय करीषकम‌ । एभिनिरमाय वटिका जपसखयानत कारयत‌ ॥

कषा, कशीद, सिनदरर, गोमय, शषक गोमय हन दरनयोमस किषौएकक दवारा गटिका परसतत करक उसक दवारा जपसखया | साघक रखगा }

वसवदरारा दोनो हाथो को ढककर साधक दाहिन हायस सदा जप करगा । गखदवको भी माला न दिखाएगा । माला क जिस अश की मणि सय हो, उस अश की परथम भणि स जप आरमभ कर सकषम अ कौ अनतिम मणि पर जव समापत करगा । दस परकारस सकषमावधि

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साधनाकतप !] तानतिकगर [ ११५

सथलानत जप सहार नाम स पकारा जाताह। सवय बाए हाथस

माला का सञ नही करगा । जप क अनतम पवितर सथान पर माला,

को रया । सत क परान होन पर माला को नए सत गरनथित कर

सौ बार जप करगा । अदीकषित बराहमण भी यदि मालादधतादह, तो

माला को फिरस साधक शदध -करणा । हाथ, कणठ अथवा मसतक पर

` जपमाला को धारण नही करगा । यदि उर, चरण अथवा भघर स रय

अथवा बाए हायस अथवा मगमढङग स परिचालति हो, तब फिरर माका का ससकार करगा ।

अकारादि ह परवनत मातकावण सभी को वणमाला कहत ह। कष इसका मर ह । शिव-शकतयातमिका कणडलीसतरम यह परथित ह । बरहम- नाडी मधयवततिनी, मणालसतरक "समार सकषम बौर चघनवण चितराणी ˆ नाडी हस माला कौ परनथि-सवरपा ह । इसका आरोहण भवरोहण

एक सौ सखया मौर मषटवगम अठ सखया होती .ह, इसलिए यह एक सौ आठ कीहोतीदह। इस माला म एक वार मनधदरारा वण अनत-

रिव करक अरथात‌ -मनतर क बाद सानसवार ` एक-एक का वरणोचचारण ` धरवक वरणदवारा मनतर अनतरित करक अरथात‌ सानसवार एक एक-वण क

बाद मनोचारणपवक अनरोम-विखोम जप करगा। मररप चरम चण (कष) कभी भी परार नही करगा । सविनद वण उचचारण कर बाद म मनपरजप करगा । मनतरका जप एक‌ सौ आठबार करगा 1 पञचाशत- . वरणमथी मास दोबार सौ बार शौर अषटवरगम आठबार जप करनसदहीएकसौ अठ बारहोगा।अ,क),च,ट, त, प, य, श~

इस अषटवरणको ही अषटवग कहत ह ।

करमाला, जपमाला मथवा वणमाटा का जिस किसी का विधाना- नयायी जप करनस ही साघक को सरवाभीषट सिदधहो सकताःह1.

[न

क म न

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सथान-निरणय ओर जय का नियम . वरतमान यग .मतयधामक ससभय वयकति भी सथानमाहातमय

सवीकार करत ह । सथानभदस हतकम का फलाफल दिखाई दता द । इसीस तनतरशसवरकारो न विशष-विदष कारयो म विशव-विशष सथान

निषट करददियह। वाराणसी म जपकरन स समपण फर पराति

होती ह, उसका दविगण परषोततम कषतर म भौर उसका दविगण दारा ।

वती म, विनधय, परयाग गीर पषकर म सौगना; इसकी अपकषा करतोया

नदी क जलम चारगना, नदीनकणड म उसस भी चारगना, उसक

जारगना जललिश क निकट ओौर उसक दगना सिदध दव री-योनि म । ` सिददवरी-योनि का चौगना बरहमपतर नद म, कामरप क जलसथल बरहम-

. पतर नद कसमानदहीह; कामरप का सौगना नीलाचक पवत क मसतक

पर भौर उसका दगना लिग शरषठ दरक म ।

ततोऽपि दविगण भरोकत शलपतरादियोनिष । ततः -शतगण परोकत कामाखयायोनिमणडक ।\

` कामाखयाया महायोनौ पजा यः कतवान‌ सकत‌ । स चह रभत कमान‌ परतर शिवरपध‌क‌ ॥

-कलारणव

-ररक का दगना शोकपतरादि म, उसका सौगना कामाखया-

योनिमणडल म । जो वयकति कामासयायोनिमणडलम एक बार मातर जप पजादि करता ह इसलोकम "सरवाभीषट काभ करक परजनमभ शिवसव लाभ करता द 1

अतएव कामाखयापीठपकषा मनतरसिदधि काभ कक लिएभौर

कोर शरषठ सथान नही ह। असमदश. क अनक तनतरोकत साधक कामादयापीरम सिदधि लाभकिए र! किसीको साघनाकी सविधा ` नहोनस जिस किसौ महापीठ, उपपीठ मथवा सिदधपीठम साधक

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साधनाकतप ] ताननिकगर | ११७.

साधना का मनषठान कर सकता ह । पीठ सथानो म कितन-कितन महातमाओ का तपपरभाव एकतर हभा ह। इसलिए उसर सथान पर साधना क आरमभ मातरम ही बिलकल मन सयत हो जाता ह भौर शकतिकनदर का जागरण हो जाता ह । साधक सवलपकाल. ही सिदधि- काभ कर सकता ह किसी को पीठसथान पर साधना असमभवहोन ` वर तनतरशासतर न उसकी भी वयवसथा कर रखी ह । यथा--

गोशालया गरोगह दवागार च कानन । पणयकषतर तथोदयान नदीतीर च मनबरवित‌ ॥ धातरीविलवसमीप च पवतागर गहास च। गगायासत तट वापि कोटीकोटी गण भवत‌ ॥

. गोकचारा, गर का भवन, दवालय, कानन, पणयकष चर, उदयान, नदी-

तीर, आमलकी ओौर विलववकष क समीप, पवतगहा गौर गगातट इन

सभीसथानोमजप करनस करोढगना फलछ-परापत होता ह। इसस भिनन दमलान, , भगनगह, चतवर मौर तरिमसतक रासता मादि भ जप करन की विधि तनर-शासमम दिखाई दती ह। इनक अतिरिकत भी साधकगण शासनोकत परणाखीस पचमणडी आसन सथापित कर सपर

वठकर एव पञचवटी फी परतिषठा कर उसम बठकर मनरसाधना करत ह । बगदशम अधिकाश तानधिको न इस दविविध उणएायस मनतर जप कर सिदधिलाभ कियाद)

विधानानयायी दो चणडालो का मणड, एक गाल का मणड, एक‌

बानर का मणड भौर एक सप का मणड--इस पशचमणड क आसन पर वठकर जप करन स मनता सिदधि विषयम विशष सहायता होती ३ ।

-कोई-कोई फिर एक मणडका आसन की-ही वयवसथा करत ह ।

पञचवटी निरमाण करन क लिए दीरध-परसय म चार हाय सथान

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११८ 1 तानविकगर [जपका नियमः

(सोह वगहसत परिभित सथान) निदिषटकर एक कोन भ विलव,

दसर म शफालिका, ततीय कोन म निमन, चतरथ कोन म अशवतय वा

वट एवम‌ मधयभाग म आमलकी दकष रोपित करना होता ह ।* इस

सयान पर घारो दिशषागो म रकतजवाफल क दवारा उसक पाव

भाषवीलता किमवा कषणा अपराजिता वषठित करनी होती ह 1 मधय-

सथ तीरथसथान क पवितर रजदवारा शदध कर कना चाहिए ।

पञचवटी अथवा पञचमणडी जासन पर मनगसिदध वयकतिकदरारा

ससकत कर सकन पर अधिक सविधा होती ह । जो भी हो, साधकमण'

अपनी अपनी सविधा क अनसार उललिखित जो कोई सथान निरदिषटः

करफ (कमषकर म" उपवशनपवक सिदधि क लिए मनतर-जप

कर । महायोगीशवर महादवन शपधपवक कहा ह कि इस घोर कलि-

काक कवल जपदवारा ही.जीव सिदधकाम होगा, इसम सनदह नही ह \

यथा-- जपातसिदधिजपात‌ सिदधिजपात‌ सिदधिन सशयः ।

- शिववाकयम‌

जप शबद का अरथ मनतराकषर की आवतति) जप‌ धातक जप शबद निषपनन हमा ह । जप‌ घात का अथ मानस उचचारण ह, इस-

चिए इषटदवता का बीज भयवा मनन मन ही मन उचचारण करनका

नाम जपह। -मनसा यत‌ समरत‌ सतोतर वचसा वा मन समरत‌ ।

. उभय निषफल याति भिननभाणडोदक यथा ॥

# मतानतररम-

अदवतयो विलववकषशच वटो धातरी अशोककः । वटीपञचकमितयकत सथापयत‌ पञचदिकष च ॥

। --सकनदपराण

1

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साधनाकलय ] तानविकगर [ ११९.

मनदटी मन सतवपाठ अथवा वाकयदवारा--अरथा‌ दसरा सन पाव इस परकार मना-जप कर स बह सतव ओौर मनरजप भगनभाणड- सथित जल-सदश निषफल होता ह । ईसकिए साधक विधिपरवक जप करगा । जप भी योग-विशचष ह । इसीकए शासतरादि भ जप “जपयजन अथवा "ननतरपोग" क नाम स उललिखित ह ! जप तरिविध ह । यथा-

` मानस, उपाश भौर वाचिक ।

उचचरदथमदिशय मानसः स जपः समतः। जिहवोषठौ चालयत‌ किञचित‌ दवतागतमानसः ॥! किञचित‌ शरवणयोगयः सयादपाशः स जपः समतः । निजकरमागोचरोऽय स जपो मानसः समतः ॥

उपाशनिजकणसय. गोचरः परिकीतितः } मनतरमचचारयदवाचा स जपो वाचिकः समतः ॥

-- विददशवरतन

मनतरा समरणपरक मन ही मन मनता-उचचारण करन का नाम ` मानसिक जप ह । दवता क परति मनोनिवशकरक जिहवा गौर ओषठ किचित‌ सचालन परवक सवय ही मनतर शरवण कर सक, -इस रपम मनन उचचारण का नाम उपाश जप‌ ह । अपन कान स अधरावयरपम जो

मनतर-जप ह, वह मानस, अपन कानस जो गोचर जपद, वह‌ उपाश

ओौर वाकयदवारा मनत उचचारण को वाचिक जप कहत ह ।

उचच जपादविशिषटः सयादपाशदशभिरगणः। जिहवाजपः शतगणः सहसरो मानसः समतः ॥

बाचिक जप को अपकषा उपाशजपम दसगना, उपाशजपत मानस ` जपम सहसरगन अधिक फल होता ह ।

` साधक सथि र-चितत होकर इषटदवता का चिनतन करत हए दोनो ओठो को समपटितकर मनदवारा मलावण का चिनतन करगा । जप 9

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१२० ] | तानविकगर [ जप का नियम `

क समय जिह मथवा दोनो मोटो का सचारम नदी करगा । परीवा ओौर मसतक सथिरलपम रखगा मौर दततिको जिसततन दिखाई

द, उस करगा 1: साधक मनदर क सवर मीर वयजन वण का जनभति- पवक जप करन स सिदधिलाभ कर सरकता ह! अनिषयान मौर बाद म मनत का जप करगा । धयानमनडा समायकत साधक शीघर ततिदिटाभ

करगा । जो दवता जिस मनतर स परतिशादय ई, उस दवता का धयान

परवक जप करगा । जप का नियम द-

मनः सहतय विषयान‌ मनतराथगतमानसः 1 नदरत न विलमबञच जपनमौकतिकटारवत‌ ॥

जपकालभ विषयस मनको आहत अरथात‌ . आहतरपम उठा- कर मनञक गभ की भावना-सहित अतिदरत नही+ अति विलमब नही

अरथात‌ समान तारम जिस परकार मकताहार एकक बादएकगथा

जाता ह, उसी परकार साधक जप करगा ।

अतयनत मनदगति स जप करन पर वधाधि की उतपतति होतीह मौर अतयनत बर तगति स जप करन पर धनकषय होता ह। अतएव

` मौकतिक हार की तरह एक-एक अकषर योग करक जप करना चाहिय ।

यो वयकति जिस दवता का उपासक, वह तननिषठ, तदगतपराण, तचचितत एव तसपरायण होकर परहयानसनधानपरवक मनजप करना होगा ।

जापक सानारमम क पटल छिननादिदोषकषानति करक मननजप करगा । मनगर यथाविधि जप करनपर भी फललाभम विलमब होन पर

किसी मनधासिदध मभिजञ वयकतिदवारा आचाय शकरोकत भरामणादि सतत

उपाय-का अवलमबन पवक मनतर की शदधि समपादन करा लगा! शासतर मकिखादहकरिजपक परवसत न रहन स वह‌ जप निषफल हो जाता

द गौर'बादम न रहन स यह मनतर विशीणहो जाता ह। इसलिए

मत भिनन जप निषफल होता ह । इस कारण जापकगण मनत क पटल

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-साधनाकलप | -तानतिकगर [ १२१

मौर बाद म 2 इस सतमनग स जप करगा । जिन छोगोका ॐ क उचचारणम अधिकार नही व दः इस मनय को सतरपम भयवहार कर सकत ह |

नियमानसार नयास ओर पराणायामादि `करक साधकजप का अणडमभ करगा । जप रमापत करक भौ पराणायाम करना. होगा । मल~ भतर वम को धारण कर जप मौर पजादि क भी नही करनी चाहिए । -अललिन वस-परिधान, मलिन कशष भौर मलिन वदी धारण करबीर 'दौगनधययकत रलकर अरथात‌ मख परकषालनादि किय बिना जप नही करना चादिए 1 `

आलसय जमभण निदरा -कषत निषठीवन भयम‌ । नीचाङखसपन कोप जपकाल विवजयत‌ ॥

--जपकालम जालसय, जमभाई, निदरा ओर टढ-मट इग स

खटना कष त‌-पियास बोध, भय, करोध गौर नाभी क नीच का कोरईभी अब नही सपश करना चाहिए ¦

, इसपरकार होन स फिर आचमन, जदखनयासादि, पराणायाम गौर -सव, अगनि ओौर बराहमण-दशन करक साधक परवावशिषट जप का आरमभ करगा । यया-- `

अथाचमय चः परापतौ पराणायाम षड‌ ङगकम‌ । कतवा समयक‌ जपचछष, यदवा सरयादिदशतनम‌ ॥

ॐ मनम क छिननादि दोष की कषानति कमः उपाय ह-सत-निणय

मौर मनरददधि का सपत उपाय मर दारा रकठिठः 'योणीगर". पसतक क मनरकलपम सविसतार लिचितदह, इसी कारण यह फिर स उललख

` ही भा । परयोजन होन स उकत पसतक दख कना चाहिय ।

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१२२} ` . तानतरिकगर [ जप का नियमः

मौनी .मौर पवितर होकर मनःसयम भौर मनगाथ चिनतन-सहितत

अवयगरचितत स साघक जप करगा। उषणीष अथवा वम परिधान

करक एव नगन, मकतकश, सगीगणावत होकर, अपवितर हाय स

अपवितररप भ, बात करत हए कदापि जप नही करगा । बिना आसन

क. गमन कार, शयन कालम, भोजनकालम, चिनताजयाकरलित

चितत स गौर कर, धरानत अथवा कष घानवित होकर साधक भपनही

करगा । दोनो हो को ठक बिना अथवा कक सिरसो जप करनः

फा कततवय नही ह । पथ गौर अमङगलसथान, अनधकारावतत गरह,

सव सथानो भ जप नही करना चाहिए । चरमपादका पहन कर अथवा

कायया पर बठ कर जप करनस फल नही होता ह। दोनो षावोको

लाकर अयवा उतकटासनम भयवा. यजञकाषठ, पाषाण भौर भिदः

पर बठकर जप नही करना चाहिए । जप क समय बिलली, ङतता,.

मरगा, बक, शदर, वानर, गदहा इन सभी को दखन षर आचमन कर

ओर सपश करन पर सनान कर अवशिषट जप को समापत करना

` चाहिए । किनत गमन, अवसथान, शयन, शचि अयवा अशचि अवसथा

म मनतर समरण-सहित जापकगण मानसजप का अभयास करग ।

सवदा, सभी सथानौ म अथवा सभी मवसथाओ म मानसपजा कीः

जा सकती ह, उसम कोई दोष नदी ह । यथा--

[र

अशचिरवा शचिरवापि गचछसतिषठन‌ सवपननपि । मनतरौ कशरणौ विदधान‌ मनसव सदाभयसत‌ ॥

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साधनाकलप ] तानतिकगर | [ १२८

जप-रहसय ओर समपण-विधि साधनाभिलाषी जापकणण को यदि मनतरजप करक फललाभः

करन की अभिरखाषा ह, तब रीतिमत मननचतनय करक जप करग ।

मनतरम छिननादि नाना परकार दोष भौर मनभयका दह-मन सदाः

कषित रहता ह, इस कारण स शासतर म नानाविध दचोधन-रहसय उरछिखित ह । उसका यथापरवक समपादनन करपकनसजप की फठ पराति नही हो सकती । साकगण को इसलयि जप-रहसय स अवगत होकर जप करनकी विधि दी गई ह । जप -रहसय समपादन

परवक यथारौति जप करक विधिपवक जपसमरपण करनस जपस उतपनन फल अवदय परापत होगा । जप रहसय समपादनक वयतिरफम ज पफल नितानत असमभव ह ।

कया शाकत, कया वषणव, कया लव-समी को. जप रहसव समबादन करना करतवय ह । कललका, सत, महासत, करबोधन, मख

शोधन इतयादि अटठाइस परकार" का जप-रहसय करमानवय स एक क बाद एक‌ ययानियम समपादनपरवक जप क अनतमः विधिपरवक जप- समपण करना होमा । किनत दःख कातरिषयदह कि जपरहसय ओर

जप समपण विधि परायः कोई नही जानता। हम जापक-गण क

उपकाराय उत छिपिबदध करत ह । पाठकरगणोम जो मनवरजप करत ` ह, व जपरहसयो क समपादनम यदि समद भौरजप क अनत शषोकत परकारस जप समपगकरत ह तो उकषष शीघर फरलाभ भौर अनायास ही मनव की सिदधिहोगी इसम सदह नहीह। जप रहसयः

क नियम यथा :-

१. शौ च-परथम माचमन । बाद म जलशदधि भौर भासनशदधि ! वाढ ` म गर, गणश, मौर इषटदवता को परणाम ।

२. कपाट भजजन-ह मनतर का दवार जप!

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१२४ ] ` तानतिकगर | जप-रहसय

३. कामिनी-तततव- साधक हदय म करो भनन का दशनार जष ` करक कामिनी काषयान करगा । धयान, यथाः-

सिहसकनधसमारढा रकतवरणा चतभः जाम‌ । नानालङकारभषादया रकतवसतरविभरषिताम‌ । राखचकरधनरबाणविराजित करामबजाम‌ ॥

इस मनकरस उसका धयान-पजा समपादित करक वादम क बीज -दसवार साधक जप करगा 1

ह परफलल~--ली वीजमनतर का दशच वार जप ।

५. पराणायामादि~पराणायाम, भतशदधि, ऋषयादिनयास, करनयास . अगनयास तततव-नयास, गौर वयापक नयास ।#

६. डशकिनयादि मनतरनयास-तततवमदरादरारा मलाधार डा डाकिनय नमः, सवाधिषठान रा राकरिनय नमः, मणिपर ला लाकिनय नमः, अनाहत का काकिनय नमः, विशदध शा शाकिनय. नमः, आजञाचकर हा हाकिनय नमः -एवरम‌ सहसरार या याकिनय

नमः । .

७. मनतररिखा-निःसवास रोक कर भावनादवारा कणडलिनी को एक बार सह‌सरारम क. जाकर भौर शीघर मलाधारम साधक

छयगा । इस परकार बार-ब!र करत-करत सपमनापय विदयत

क सदशच दीरघाकार तज दिखाई दगा

ॐ ईन सव करियाम की परगारी अपन-जपन गरपदिषट पटल पर ` विदत द । अनावशयक विसतार क भयस हमन इसत सथान पर पदध

तियो को उदधत नही किया ह, तथा पराणायाम ओौर भतशदधि कौ अणाली मर दवारा रचित 'योगीगर' मरनधम दरषटभयः ह ।

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` साधनाकलप ] तानतरिकगर [ १२५

८. मनतरचतनय--सवीय बीजमतर ई' बीज (ई “मनतर ई} करक. हदयम सातबार साधक जप करगा ।

९. मनतराथ-भावना-दवता का शरीर गौरः मनतर अभिनन ह, साधक यही चिनतन करगा ।

१०. निदराभग--साधक हदयम ई: 'बीजमनव' ई' यह‌ मनतर दशनार जप करगा ।

११. कललका--साधक करी ह सवी हौ फट‌ . {स मनव का सातवार जप करगा । .

१२. महासत- की मनत का कणठ साघक सातवार जप करगा १३. सत-रएह ए मनव का हदय म सातव जप करगा ।

१४. मखरोघधन- साधक ही शीकरीमो भ गो जगीङगी की हसः मनतर का मखम सातनार अप कषरका। -

१५. जिललागकि~-भीधक वतसयमदरो को भाचछादित कर हतौ; इस मनतर का सातबार जप करगा।

१६. कररोधन-साधक करी ₹' की करमाङाम असतराय फट‌ इषः

मनतरका सातबार लप. करगा ।

` १७. योनिमदरा- मलाधार. बरहमरनधपयनत अधोमख चरिकोण मौर बरहयरनध स मलाधार -परयनत ऊरधवमख सरथीत तरिकोण अरथात‌ इष शपम षटकोण रपम भावना कर वादम साधक दस मष

„ कादश बार जप करगा । | | . १८. निरवाण-ॐ अ “वीजमतर' ए एवम‌ र. "बीजमतरः अ ~ ओ इस रपम अनलोम-विलोम नाभि . दशम साधक दद धार

जप करगा ।

१९ पराणतततव--अनसवारयकत परतयक माद वर दवारा वीचमतर समबट ।

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१२६ | तानतरिकगर ` [ जप-रहसय

श समपट करक मतर जप करगा।-

- २०. पराणयोग- ही 'वीजमतर' ॐ-इस मतर का हदय म साधक सातवबार जषकरगा |°.

२१. दीपनी- ॐ वीजमतर ॐ साधक इस मतर का हदयम सात

। बार जप करगा। -२२. अशशौचभग -हदयम ॐ वीजमतर ॐ इस मतर को साधक सात

, बार जप करगा। । २३. अमतयोग-ॐ ॐ ही इसः मतर का हदयम साधक सातबार

जप करगा ।

२४. सपतचछदा- कर कली ही ह ॐ गौ मतर का साधक हदयम दशवार जप करगा । ।

२५. मनतरचिनता-घाधक मतर सथान पर मतर का चिनतन करगा अरथात‌ राशरिम परथम दसदड क नीच निषकलसथानम (हदयम) मतर का चितन करगा । परवरती दसर दणडाभयनतरगः कलातीत सथानम - (जिनदसथानम) मरथात‌ मनरचकरक ऊपर साधकको मतरका चितन करना होगा। उसक वाद दसत दणडाभयनतर म

-कलातीत सथानम साधकमतर का धयान करगा । दिवस म .परयम दणडाभयनतरम साधक बरहमरनधम मतर का धयान करगा।

दवितीय दशदणडम हदयम मौर ततीय दशषदणड क मधयम मनशचकर भ साधक मतर का चिनतन करगा । दिवस अथवा रातरिकालम ` जिस समप जप करन म साधकः परदतत होगा, उसी समय सपतचछदा क बाद समयानसार निदिषड सथानम साघक मतरका -जितन करगा ।

-२६. उतकीलन-दवता क गायतरी फा साधक दकषबार जप. करगा । । |

-- ~= -----

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-साधनाकलप | तानविकगर [ १२७

२७. दषटिसत- नासागरम अथवा शरमण दषटि रखकर साधक दसबार परणव का जप करगा ।

२८. जपारमभ-सहसरारम गरधयान, जिहवामलम मनवरवरणका धयान ओर हदयम इषटदवता का षयान करक बाद म गदमरतिको तजो- मय चिनतन करगा । बाद म इस तीन तज की एकता सथापित कर, इस तज परभाव अपन को अभिननरप म समजञगा।

सक वाद कामकला का धयान कर अपन शषरीर क समान अरथात‌ कामकलाक रपम तरिविनद को ही अपना शरीर समकषकरजप ` आरमभ कर दगा ।#

कषाकत, दव, वषणव सभी को इसी परकार स जप रहसयका समपादन करना होगा । यह‌ जप रहसय शरीमद‌दकषिणाकाकिका दवी का ३ । अनयानय दवताओ का जपरहसय परायः इसी परकार कादहीदहः कवल कलटका, सत, महासत, मखशोधन भौर करशोधन, दवताभद नस पथक‌-पथक‌ होगा । मपन-जपन इषटदवता क य कई एक विषय

. पदधति परनथादिम दख जना होगा । पराणायाम ओर ११।१२।१३।२२

सखयाक विषय जप क आदि ओर अनतम करना होता द, उसक भति

रिकत ओर सभीको जपक आदिम करना होगा ।

उपरोकत अदरा परकारक जप-रहसय को एककवाद एक को समपादित कर हदयम ईषटमति क पाद-पदम को लकषय करक साधक जप का आरमभ करगा । जप क नियम ओर कौशचलादि इसस पहल कह गए ह । परोकत परकार. स यथासराधय जयकरक फिर कतलका,

महासत, शौचभग भौर पराणायाम कर यथाविधि साधक जप - करगा । - ।

` *कामकला तततव “योगी गरनथ म लिखा.ययाह। .

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१२८ ] -तानविकग [ नपरहसय

, जपरटसय-समपादन नही करन स जिस परकार जप फलपराष नही

होता द, उसी परकार विधिपरवक जप समपण न करन स जपजनिव तज कर भी नही रहताह । जप क अनत म जिस परकार सभीजपका

समरपण करत ह, उसस जपजनित तज साधकम कछ भी नही रहता ह । यदि जपजनित तज नही रहता तब जप-परशचरणादि करनका

परयोजन कया ह । अभिजञ तानतरिक सारधकगण जिस परणाली स जप

समपण करत ह, हम उसी का वितरण दत ह ।

जपसमात होन पर परथम ' ॐ रकतवरणा चतरभजा सिहाषढा गङख -चकर-धनरवाण-करा कामिनी ईस मतरस कामिनीका धयान - करक उनको साधक बीजरपा समकगा । बाद म गशदतत बीजभनव म जो कोई एक षण रदगा इस क बीज .क गभ क बीच ह समकञकर उस बीज क परसयक वण फा अनसवार दकर अनलोम-विलमङभद | साधक दसबार जप करगा । रथात‌ इस परकार निसकाजो बीज होमा, उसक परतयक वण म अनसवार यकत करक ईस परकार मनलोम- विलोमः करम.स साधक जप करगा । बाद म यह कामिनीरपा क

बीजक गभ. म ही जयोतिसतततत (हकी). मनवरकाजप करक इव कामिनी ओौर जयोतिसतततव एकीभत हमा ह साधक समकषगा । वह‌ जयौतिसततव जीतरातमा स पथक‌ नही ह। बाद म यह एकीभव जयोतिःसवरपा.कामिनी को सदहसनारम सथापनापवक बाहय-जप साक समरपण करगा । -अरथात‌ उकतरप करिया हारा तजोरप जपफक कामिनी'क गभ म जीवातमा क निकट सथापित करक-नाद म दवा क हाव म-

ॐ"गहयातिगहयगोपता तव गहाणासमतकत जपम‌ ॥ सिदधिभवत म. दव तवतपरसादात‌ तवयि सथित ५

-- दष मनतर का पाठ करक साधक जपकासमरपण करया । दवी

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साधनाकलप ] तानतिकगर [ १२९

मनतरको -जप-विसजनम गोपा-सथङ पर गोपरौ ओौर दव-सथान- पर `

दवि पाठ करगा । इस परकार करक जप-समप करनस साधकक

जपजनित तज की करमातरा की भी हानि नही होतीह । इस कारण

. शाकत, वषणव सभी का जप-सम‌पण करना करतवय ह । । ।

जो मनरजप कर सिदधिाभ करना चाहत ह, ब जपरहसय

समपादन मौर जप क अनतम जपसमपण करग, नही तो मनवरजपक

` फललाभ की आजञा नही ह । गौर भी नाना परकार की परणालयोस

जप करक मनरसिदधि की जा सकती ह । हमन. मौर भौ करई परणा-

किया आग किपिबदध किया द। ` ।

का अक

[| | 4 | 3, सनतराथ ओर मनतरवतनय

मनम जपस सिदधि-लाभ करन क लिए भनवचतनय करक मनतर

स परिजात सकरयथाविधि जप करना चाहिय । -मनतरसिदधि लाभ

करनक लिए मनतरनजो अकषर, भावम ह, जो छनदोबनधम परथित

` ह; उनका-उकती परकार जप करना होता ह । उसक होन स मनत स `

सिदधिकी उपशनधि की जा सकती ह। तनतरम कहा गया ह कि- `

मनोऽनयतर शिवोऽनयतर शकतिरनयतर मारतः 1

न सिधयनति वरारोह कलपकोटिशतरपि ॥ ` --गकाणव

. --मनरजपकालम मन, परमदिव, "सकतिः -एषः -वाय पथक‌-

पथक‌ सथानम रहन स . मरथातः-ईनकर एकतर सयोग नही दरोन.स सौ

-कलपम भी मनवतिदधि नहीहो सकती ह। ।

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१३० ] | तानतिकगख [ मनतरचतनय

य सम तयय समयक‌ रपस न जानकर कछलोग कहतरदकि

"मनतरजप करन स फल .नही होता द किनत अपनी चरदिप फल

नही होता ह, इस वातको कोर समञलना नही चाहता द । इसको

` दखकर जगदगर योगशवर कहत ह-

अनधकारगह यदरतन किचित‌ परतिभासत । दीपनीरहितो मनतरसतथव परिकी तितः ॥

-तरसवतीतनतर

--आलोकविहीन अनधकार गहम जिसपरकार कछभी नही

दला जा सकता ह, उसी रप म दीपनी-हीन मनरजप ड कोई फल

नही होता ह । भनय तनतरो म वयकत ह-

मणिपर सदा चिनतय मनतराणा पराणरपक 1 अरथात मनतरक पराणरप मिपर-चकर का सरवदा ` चिनतन करना

चाहिए । वासतविक मनतर का पराण मणिपर म ह, उसको जान कर

करिया नही करन स मनव कभी भी चतनय नही होगा; ईसकए पराण- हीन दह-सदश अचतनय मनतर जप करन स कोई फर नही होता ह । रिनत यह कि मनतर कापराण मणिपर म किस परकार ह, उसको ` कोई गरदव समजञा द सकतरहकया? मजानताहः कि गहसथो इस परकार का एक भी वयकति नही ह; योगियो गीर सनयासियो म

“अति गतप ह, जो कि उस सकत भौर करियानषठानस परिचित ह, तब दिखावदी ` माला--कषोा ऊकर कवल वाहयाडमबर भौर अनषठान करन त किस परकार फल पायग? किनत फितन गर दीकषाक साथ.शिषय को मनवरचतनयक उपायादि की शिकषा दत ह? फिर सदरामलम कदा गयादहकिजोःवयकति मनतरारथ नही जानता, उस

, शविदधि किस परकार मिञगी ? जिस परकार परशभावहीन वयकति पश- ` भाव का फल भोम नही-कर सकता, उती परकार मनवारथानभिकञ

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साधनाकलपः] ` तानतिकगड ` [१३१

वयकति जपफल परापत नही करता ह । मनतरा का अथ शबदाथ नही

‹ ह, मनतर क भावाथ कौ उपलबधि करनी चाहिए । इसकतए वह साधनासपिकष ह । मनव मौर दवता. का मभदजञान ही मनतरा ह।

यया-- ष &

मनतरीथ-दवतारप-वितन परमशवरी । . वाचयवाचकभावन अभदो मनतरदवयोः ॥

रदरयामल

इषटदवता की मति का चिनतन करन स अरयात‌ दवर -का शरीर जओौर मनतर अभिनन ह, इ परकर विच।रकरनस मनतराथ की भावना

होती ह । दवता का खप चिनतन ही मनतराथ ह । मनतर मौर दवता

वाचपवाचकलप म अभिनन ह; दवता मनतरवाचय ओर मनतरदवता का

वाचक ह, इसकिए वाचय विजञात होन स वाचक परसनन होत 1

इस रपम मनर.क अथ का परिजञान परापत कर जपन करन स मनत

की सिदधि नही होती अतएव सभी को अपन-अपन इषटदवता का,

जौर अपन-अपन मनतर का अशान होना जावरयक ह । शासतर म

मनतरा जञान का एक, उरछषट उदाहरण ह । उस उपाय स सभी को

सभी परकारक मनतरा कापरिजञान हो सकता ह। उसक दारा

मनतर का अथ अपन स ही साधकक हदय म परतिफलति होता ह।

नीचषकरमस लिखित ह । |

गरदतत दइषटमनतर पर साधक परथम विचार कर; मलाधारचकर

म कणडलिनीशकतिरप मः रहती ह । इनकी कनति अतयनत निमल

सफटिक-सदकच धभरवण ओर उसीसमनतरकी अकषरशरणी उस भद

म सथित द। भदध-महत इसरप चिनतन करक वाद रम चिनतन

करगा कि जीव मन क साथ सवाधिषठानचकर म गयाह। इस . चकर

म बनधककधमाखण वण लप म इषट दवता ओर मनतराकषरशरणी एक

होकर सथित ह । महरत इस रपम चिनतन करन क पदचात‌ मणिचक-

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१३२ | ,. तानतरिकगर ` [ मनतरचतनय

पर म भी सवचछ सफटिक सदश शभरवण एव मभिनन ह, ठसा विचार

` करना चाहिय इसक बाद साधक विचार करगा कि दवता बौर मनव सदसर-दल-कमलम सथित ह; उसका वण सफटिकशिका-सदश सशयभर ह । इसङ वाद हत-पदम म जीव का गमन होता ह; उसम भी घयान-योग स साक चिता करगा कि उसका वरण मरकत-मणिसम-परभ रथाम- वरण ह । उसक बाद विशदधचकर म इत परकार हरिदरण धयान

~ करफ साधक आजञाचकर म जाएगा । अरथात‌ मनतरमय इषटदवता का

साकषात‌ बरहमसवरपिणी भीर वण -चतषटयानरजञजिता ह । इस परकार धयान .करत-करत एक अनिरवाचयर प मयवा भाव याषिशरत, होगा । वह‌ अनिरवाचयशपर अथवा भाव जपमनतर का यथारथ अथ ह ।

इस रप म मनतराथ का निणय कर सधक बाद म मनतरयतनय कराएगा । चतनयसटित मनतर सरवसिदधिपरद ह। जो वयकति चतनय रहित मनतर जप करता .ह, उसक फक की आशचा निषफल होती ह । बाद म परतयवायभागी होना पडता ह । यद हमारी मनगढनत बात

नही ह । सासतरम ही कहा गया ह-

चतनयरहिताः मनतराः परोकतवरणासत कवलाः । फ . नव.परयचछनति ककषकोटिशतरपि ॥

--भतशयदितन

-अचतनय मनव कवर वणमातर ह; इसलिए शत-लकष-कोटि . जप भी फल परदानम खभरथ नही होता ह ।

ˆ अतएव जापक को जपय मनरफा चतनय करा दना चादय । मनतर .

समह वण नही ह; . नादरपिणी शबदबरहमदवी ही मनतरवाद की शकति ह ।* यह शबद जिस कक लिए जिस समह म एकतर गरथित

. # मर दवारा परणीत. “योमीगर” गरनयम मरशरतततव विकचद करक लिखया यया ह । उस पसतकक मनतर-कलप को दखो ।

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साधनाकलप -] तानविकगर .. .[ १३३

होकर योगवलारी ऋषियो क हदयत उतथित हमा था, वदी मःच- खपम गरथित होकर रहा ह, अतएव मनतरशबद एक अलीकिक कति `

ओर वीरयशाखी द; इसम सनदह कया? मनतर कशबद का अरथ यह

द कि-- .. मननात‌ तारयतभयसत स मनतरः परिकीतितः ॥

अरथात‌ जिसको मन समरण मातरत ही जीव भवबनधनस मकत होता ह, वही मनतर मामतत पकारा मयादह जिस परकारकष‌दर सरषप

परिमित मदवतथबीज क अनदर बहतकष कारणक रपम रहता ह,

परकति की -सहायतास उसी कारणस इष की उतपतति होती द, उष

परकार दव-दवी क बीजमनतरम उनकी सकषमशकति निहित रहती ह.

सनन म बणमातर किनत करिया हारा उसकी शकति को जगादन पर

जिस दवता का जो बीज ह, उकती दवता की शकति काय करगी सनदद

नही । अतएव भनतर को चतनय करना--इस बात का अथ यह ह कि

मनतर को चिचछकतिप समाखढ करना । अरथात‌ वणभाव अथवा अकषर

भाव दरीकत करक मनतर को चततन भावक रपभ परिणमित करना ।

मनतर चिवशकति समाशड होनस शासतरम उसको सचतन भर सजीव

मव कहा जावा द । अचतनय मनतर का नाम टपबीजमनतर ह । लपत-

बीजमनतर जपस कोई फक नही होता ह । यथा--

-“लपतबीजादच य मनवा न दासयनति फल परिय ॥"

मनशर-सचतन . करना अतिशव कठिन. साधनासपकष द । मनव-

वनय करन का. सकषिपत ओर सकितिक का अनक ह, विशषतः व

करियामय ह । गखक निकट सकत मौर शरियस अवगत होकर मनतर `

चतनय करनप शीघर फल परापत हो सकता ह । लासतरम मनचतनय

करन की बहविध परणाकिया ह, दम उसस कछ नीच लपिबद

करत ह। ' ,

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१३४ ] तानतरिकगर [ मनतरचतनय

मन ही मन एकागररपरम साघक चितन करगा कि वरण-समह मकषम

अनाहत शबदम रहता ह ओौर चितशकति की परोरणास सषमनापथस

कणठदश अतिवाहित होतता ह । उसक बाद साधक विचार करगा कि

मनतरक जो सव वण रह} य सव वण चतनयक साथ एक होकर शिरः सथ सहसरारषदयम अवसथान करत ह। सहसरदलपदमम चतनय का

परकाश ओर उसस मनतराकषरक चतनयकप की अवसथिति ह। इस परकारक चिनतनक बाद मणिपर पदम को उकती परकार चतनयाधिषठिति

मनतरक पराणरपम साधक समजञगा ।

सदहसराररप१ शशिवपरम चतरवदाःमक शाखाचतषटययकत पीत-

रकत-सवत-कषण गौर हरिदण अमलान-पषप-परिशोभित, समधर फला- नवित, भरमर ओर कोकरिलनिनादित कलपवकष का ओर उसक अधौ भागम रकतवदिका मौर उसक ऊपर पषपशययानवित मनोहर परयङक का धयान कर इस पयदकम कलकणडलिनीसमनवित महादव का साधक धयान करगा ओर उसपर तरिवरगदायिनी इषटदवता का मनतर जप करगा ।

स -मणडल लकषय करक उसक बीच इषटमनतर का अवसथान-- हस परकारषयान करक गौर मन ही मन साधक उसी मनतर का जपकरगा मौर समञगा कि गर साकषात‌ शिवरपिणी साकषात‌ बहरपिणीशकति उष अभद विराजमान ह, इस परकार धयान करन पर भी चतनय का भवश हो सकता ह ।

चितशकति अकषर उचचारण का मादि कारण ह। चितशकतिमही

सभी. वण आरढ रहत ह, अतएव मनतर जब षट‌-चकरशोधनदरारा (परगोकत मनतराथनिरणयक समान) अकषरभाव परितयाग करक चतनय

पर आरढ होता ह अरथात चतना शकति स समनवित होता ह, तब.

मनतरचतनय होकर रहता ह ।

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साधनाकलप | तानतिकगर [ १३५

साधक इस रप समकष कि चार करियाओोम स जिस किसीएकका

अवलमबन परवक मनतर भौर चितशचकतिकी अभद भावना करत-करत

उपयकत कालम मनव चतनय का अवदा होता ह । जिस चिनता की बात

कटा गया यह‌ एकागर धयान अरथात‌ विषयादिस मन कौ आहत करक

तलधारासदकशच अविचछिनन धयान । उस परकार धयान करत-करत

जाननदाश पात. रोमाच ओर निदरावश होता दह । . इसको ही मनत.

चतनय कटा जाता ह । मनतरचतनयस साधक का हदय नितयाननदण

होता ह भौर.दवदशचन होता ह। विषणमनवर, शकतिमनत भौर शिव

मनतर जपस मनतराथ जञान भौर मनव-वतनय को विशष आवशयक

सभकना जाय । यह अपन मनत नही कहत ह ।, शासर म कहा

गया ह-

मलमनतर पराणबदधया ` सषमनामरदशक । मनतरारथ तसय चतनय जीव धयातवा पनः पनः

। --गौतमीयतनव

~ मलमनतर को मलदशषम जीवरप म समकषकर मनतराय ओर

मनवरचतनय परिजञान परवक साधक जप करगा । । ~ ॥

योनिमदधायोगस जप मनथ मौर मनतरचतनयस परिवित होकर योनिमदरायोगस जप `

करनस अति सावर की मनतर-सिदधि होती ह । मनधराय मनदराचवनय मौर

योनिमदरास अवगत न होकर जपादि करनस पण फल की पराति नही

होती ह । यह बात तनटशारट म उकत ह। यधा--

10

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१३६] . ` तानतिकगर [ योनिमदरायोग स जप

“ मनतराथ मनतरचतनय योनिमदरा न वतति यः। शतकोटिजपनापि तसय सिदधिन जायत ॥

--सरसवतीतनतर

मनतराथ, मनतरचतनय, योनिमदरा न जानकर जप करनस सौ करोड जप करन पर भी मनगसिदधि नही होती ह । अतएव मनम सिदधिकाभी वयकति मनराचतनय कर मनाथस "परिचित होकर योनिमदरा बनधन कर साधक जप करगा । मनतरा भौर मनतररचतनय की बात पहल ही कही

गई ह, इस समय योनिमदरा का विषय विदत किया जाय ।

पशभावम सथित जो मनरह, वह‌ कवल वरण मानन ह, अतएवय सव मनगर सषमना वनि स उचचारित कर जप करन स परभतव की पराति होती द । कलारणव तनदर म कथित द कि जपकालम मन, परमशिव- शकति भौर वाय पथक‌-पथक‌ सथान पर रहनस भरथात‌ इनक एक सयोग नही होनस सौ करोड कतपम भी मनासिदधि नही हो सकती

ह। मन, परमशिव, शकति. भौर वाय को दकातमय समपनन करनक लिए योनिमदरा का परयोजन ह। |

मलाधारपदमक कनदमधय भिकोण, उसक वीच सलकषण काम-

वीज, उसक बीच कामवीजोदभत मनोहर सवयभखिग, उसक ऊपर वाल भाग हसाधिता चित‌कला, उसक नीच सवयमभलिङगवषठिता तजोरपा चिनमयी कणडलिनीशकति का साधक घयान करगा । अननतर

` आधारादि षट‌चकर भद करक तजोरपा कणडलिनी दवी का ' “हस” मनदर कदवारा परिचालिठ बरहमरनघरम लात हए तनतर भ सथित सदाशिव क सहित कषणमातर उपगता चिनता करक उकत शिव ओर कणडलिनी

सयोगोतपनन लाकारससदकञ पाटलवण अमतधारा स अपन को पलावितः गौर आननदमय समननग। । उसकर बाद परवोकत पयस बरहमनाडी- मधयगता. मणालमतरसननिभ चिनराणी नादी परथित अकषरमाला का

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साधनाकलप | तानतरिकगर ` [ १३७

चिनतन करक मनतदरारा सविनद वण भौर सविनद बणदवारा मनन मनत-

रिति फरक साधक अनलोम-विलोम जप करगा । उकत परकारत पचास

मातका वरणम साधक सौ बार जप करगा । जपक समय कष" कार-

प मरको कभी लदखन नही करगा । इस परकार योनिमदरा बनधजन.कर

जप करना चाहिय ।#

योनिमदरा-बनयन पराणायाम-मातरायोगम ही करना होगा । योनि-

मदरा एक परकारका योप ह । अभयासक दारा उसम सिदधि परपतकी जा

सकती ह । सदगर क निकट दख रत पर ओर उसक बाद ही उसका अभयास करना अचछा ह । नही तो उरकिखित शासतरोकत अशमातर पाठ कर अनभिनञ वयकति कभी भौ वासतविकरपम उस अनषठानम सकषम नही

, होगा । हम जापक भौर साधकगण की सविधाक किए योनिमदराम जप की परणाडी को अचछ ठङघस नीच विवरण दत ह । यह‌ गरपदिषट एव

बहसाधको क दवारा परीकषित भी द। जपकी इस परकार की उतकषट परणाङी हम भौर नही जानत ह । विधानानसार अनषठान कर सकन

पर ति अलयसमयम ही इसम सफलतापरापत की जा सकती

ह। योनिमदरायोगम जपकी परभाली इस परकार (

साधक साधनोपयोगी सथानम कमब, मगचम परभति आसन पर

पव अथवा उततर दिशा म मख करक उपविषट होन परधषादिकगधस

गह पण होगा गौर अपन भी आननदित होगा । इसक बाद अपन-अपन

# मर दवारा परणौत “"योगीगह” पसतक षटचकतादि का विवरण भौर जञानीगर पसतकम योनिमदरा-परणाङी को विशद कर जिला गया

द । साधको की पराथमिक शिकषाक लिए ““योगीगर"” पसतक का पाठ

करना कततनय ह । नही तो इस पसतकोकल अनक विषयः को समसन

भ कटिनाई होगी ।

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१३८ ] तानविकगर [ योनिमदरायोगस जप

सविधानरप भभयसत किसी आसन पर सथिररपम सीध उपवशन कर परयमतः बरहयरनय क शतदलपशय म गरदव का धयान, पना, परणाम मौर परारथना करगा । बादम पशचपराण, पचकरमनदरिय, मन, बदधि, इस

सपतदश को माधा रसवरप जीवसमा को मलाधारचकरसथित कणडलिनी - सहित एकीभत चितन करगा । मलाधारपदम गौर कणडलिनीशकति को माननहस दशन करत ए “ह इस कचचबीज उचचारण परवक दोनो नासिका छिदरस धीर-धीर वाग आकरषित कर मलाधार म चालित करत-करत चिनतन कर मकाधार-सथित शकतिमणडलानतरगत कणडलिनी जाग जाएगी । तब "हस" मनतर उचचारण परवक गहयदश आकशित कर कमभकटवारा वाय रोध करन स कणडलिनी उषवगमनो-

भमली होगी । उसी समय कणडकतिनी-शकति को महातजोमयी भौर! मनतराकषरो को उसम परथित समजञगा । उसी समधर. कणडकिनी एक मख सवाधिषठानरम रखकर दसरा मलदवारा दकषिणावरत मलाधार पदय क चतद चार बार धीर-धीर जप करगी एव साथ-स.थ आधार पदम सथित समसत. दव-दवी, मातरकावण भौर ततिरया परास करगा अरथात‌ वह‌ कणडलिनी-शकति उपक शरीरम लीन हो जायगी । तव पथरीबीज “ल मखम करक कणडलिनी सवाधिषठान म साक उठगा इस परकार मरघारपदय अधोमख भौर बनद होकर मलान हो जायगा । ।

साधकको इस सयान पर एक बातषयानम रखनी होगी;

पद समह भावना क समय उदमख मौर विकसित होत ह।.

कणडकतिनी चतनय काभ करक जब जिस पदमम जाएगी तव वही पदम विकसित रोगा । किनत जब जो पदम तयाग करगी तब उसी पदम मलाधार सदश भधोमख, बनद मौर मलान हौ जाएगी ।

ओर इन परणालियो की भावनादारा सनदररपम अभयसत दोन पर जब

कणडलि. उठगी, तव साधक सपषटसपत अनभव करग ओर दख सङग 1 कयौकरि वह जहा तक . उकठगी वहा तक मरदणड क भीतर

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साधनाकतप | तानविकगर [ १३९ .

सिर-सिर करगी । रोमा होया भौर साधक क मनम जप आननद ` फा अनभव होगा ।

मलाधारपदम को तयाग कर कणडलिनी सवाधिषठान षदभम आकर पव दिशाम मखकरक मणिपरम उठगी गौर इसर मखदवारा सवाधिषठानपरक षट‌ रलम दकषिणावततम छ बार धीर-धीर साधक जप करगा ओर साथ-साथ सवाधिषठानपदमसथित समसत दवदवी,. मावका- वण वततियो क परास करगा । र बीज जलम रीन होगा । तब “व "* इस वरण वीज को मखम रखकर कणडलिनी मणिपरम उठगो

बाद म कणडलिनी मणिपर. आकर परवमख अनाहतपदय म उततो- लन करगी भौर दसर मखदवारा मणिपरपदयक दकषदलम दरषिणावतत दशबार धीर-धीर साक जप करगा गौर साथ-साथ मणिषरपदमभ सथित समसत दवदवी मातकावण भौर वततयो का परास करगी। व बीज-अगनिमणडल म लीन होगा। तब “र यह‌ विबीज मखम रख कर अनाहतम साधक उठगा ।

इसक बाद कणडलिनी अनाहतपमम आकर परवमख विशदधपयम उततोलन करक दसर मखदठारा अनाहतपम क वादश दलम दकषिणावतत म धीर-धीर सधक बारह बार जप करगा भौर साथ-साथ अनाहत-

पम-सथित समसत दवदवी, भातकावरण . भौर दततिरया गरास करगी ।

र बीज वायमणडल लीनहो. जायगा । तव शय" इस वाय बीज क मख म रखकर कणडलिनी विशदधपदच म उठगी ।

इसक बाद विशदधपदयम माकर परवमख आजञाचकर म उततोलन करक दसर मखदवारा विश दधपदमक षोढशदलम दकषिणावत म धीर-धीर साधक सोलहबार जप करगा ओर साथ-साथ विशदधपदयसविति

समसत दभदवी मातकावरण सपतसवर गौर दतिरणा परास करगा; थ बीज आकाश मणडलम छीन हो जायगा । तव "ह" यह‌ आकाल बीज मखम रख कर कणडलिनी आजञाचकरम उठगी ।

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१४० ] ` तानतिकगर [योनिमदरायोगस जप

सक बाद कणडलिनी माजाचकरम आकर परवमख निरालमब पर भ उततोलन करक दसर मखदवारा दकषिणावतत आजञाचकर क दलोरभ

धीर-धीर साधक दो बार जप करगा गौर साथ-साय आाजञापदमसय सभी दवता मातकावण गौर गणो को. लीन करगी । ह बौजमनशचकरम कय परापत होभा। मन बदधितततव, बदधि परकति स ओर परकति कणडलिनीशकति क कषरीरम लय हो जाएगी । |

तव कणडलिनी सषभनामखम नीच कपाटसवरप भदध चनदराकार मणडल भद करक जितनी ही उठ पाएगी उतना ही करमःकरम स नाद,

, विनद, हकारादध मौर निगरालामबपरी गरास कर जगी अरथात‌ बह सभी कणडलिनी क शरीरम-लीन होगी । इस अदधचनदराकार कपाट का भदन होन स ही कणडकिनौ सवय उपर उठकर बरहय रनधरसथित सहसरदल-

कमलम परमपरष सहित सयकत होगी ।

माथाशकति कलकणडलिनी इस परकार सथलभत म परहति पयनत चौवीसतततव परास करक शिरभ-सहसरारम उठकर परमपरष क सहित सयकत ओर एकीभत होगी । तव परकतिपरष, क साथ रहसय समभत अमतधारादरारा कषपरबरहमाणडरप शरीरम पलावित हो सकगा ! उसी समय साधक समसत जगत‌ विसमत भौर बाहयजञानशनय होकर किस परकार

अनिवजनीय अभतपव आननद म निमगन होगा, उस लिखकर परकाश

करना साधय नही ह । वह‌ ननद बनभवक सिवाय मख स वयकत

करक उस समकषाया नही जा सकता । वह‌ अवयकत अपवभावको गकत

करन क लिप योगय भाषा नहीह। वह अनिदय अननभत भाव

सवय ह । साधारण को कमारी क सवामीसहवास-सख-उपलनधि

सदश उस आननद को समकषान की चषटा करना विडमबनामातर ह ।

जो सथलमति क उपासक ह, उनम जो शाकतरह व कलकणड- `

छिन को सहलनारम करक उसको गरपदिषट इषटदवता अरथात जौ

जिस दवी क उपासकरह, व कषडलिनीशकति को उसी दवी ओर"

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साधनाकलप | तानतरिकगर [ १४१

परमपरष को तषिदिषट भर कलपना करक दोनो को एकतरित

समरसय समभोग करग । गौरजो वषणव, व भी कणडलिनी परा-

रकतिरपिणी राधा ओर सहलञारसथित परमपरष को शरीकषण क

रपम कलपित करक दोनो का सामरसय उपभोग करग ।*

सहसरदलमपदम म कणडलिनीको महातजोमयी ममताननदमति

समनजञना चाहिए 1 उसक बाद सतरातमदर म निमजजित गौर रसापठत

` कर परमपरष क साय सामरसय समभोगपरवक फिर कषडकिनी को

यथासयान पर खाना होगा । इसी समय उनको महामतरपा आननद-

-मयौ समकञना होगा । कणडलिनी को नीच छान क समय साघक

"सोऽहम‌" मनतर उचचारण कर दोनो नासिकादवारा धीर-धीर भवास

छोडगा । एसा होन स वह नीच की ओर आएगा + परतयागमन क

समयम निरारमबपरी, परणव, नाद, विनद मादि उदगीण करजब

कणडनी आजञाचकर उपनीत होगी, तब उसस बदधि, मन, दवता,

` तरिगग, मातकावरण ओर पदमलयित, अनयानय सब सषट होकर यथा-

सथानम अवसथित रहग । कषडकलिनी निमन मखदधारा. वामावत म

धीर-धीर आाजञाचकरक दो दल म दो बार जप करणा। बादर

मनशचकर स ह" यह आकाश-बीज उतपनन होन पर, उस मखम रख

कर विशदधपदभ म उपसथित होगा ।

विशदधपदमम अन पर, उसस इः पदमसय समसत दवदवौ

मातकावण+ सतसवर अमतादि सषट होकर यथासथान पर सचित

होग । तथ कणडलिनी नीच क मखदवारा वामावरत विशरदधपदम क

बोडशदशम धीर-धीर सोलह बार साधक जप करगा । णह" बौजस

# यह‌ परकरियाको हमार सवकपोलकलपित सपस कोई वषणव सोच

तो व उनक परामाणिक गनय नारद-पचचरातरका ततीय अघयाप क ७०

ख ७२ शलोक तक दषटि दनख ही अपन शरमकरो समकष सकग |

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१४२] ` | तानतिकग [ योनिमदरायोगस जप

आकाशमणडल की सषटि होगी ' उपस य" यह‌ वायनीज उतपनन होन पर उसको मखम रखकर कषडकिनी अनाहतपदमम भाएगी ।

गनाहतपदमम उपसथित होन स शसपदममसथित समसत दवदवी

मातकावण भौर वतति सषट होकर यथासयान अवसथिति करगी ¦ तब कणडलिनी नीच क मखदवारा वामावतत म अनाहतपदमक दवादश दल मीर-घीर बारह वारः जप करगा। य बीज स वायमणडल को सषटि होगी । उधस ^र' यह‌ वललि-बीज उतपत होन पर उनको मलम रखकर कणडलिनी मणिपरपदम म उपसथित होगी ।

-मणिपरपदयम नान पर उसस इस पदमसथित समसत . दवदवी मातकावरण मौर इततिया सषट होकर यथासथान म ससथित होगी । तब कणडकिनी नीच क मखदवारा वामावरतम मणिपरपदमक दशदल

` धीर-धीर दशवार भप करया। र बीजस भगनिमणडल की ` ` सषटि होगी । उस ध" यह‌ वरण-वीज उतपनन होन स उस मखम, रलकर -कणडकिनी सवाधिषठानपदम म उपसथित होगी ।

सवाधिषठान-पदम भान पर उसस पदमसथित सभी दवदधियो का मातकावण भौर इकततिया सषट होकर यथासथान अवसथिति करगी । तव कषडकिनी नीच क मलञस वामवतत'म सवाधिषठानपदमक षडदलम धीर-धीर साधक @' बार जप करगा । य बीज स जररादि उतपनन होगी । उसत छ" इष पथवीनीज क उतपनन होन स उस मखम रख- कर ङणडकिनी मलाधारम आएगी ।

-मकाधारभ आकर उपसथित होन पर उस स ईस पदम क समसत दव भौर दवी, मातकावण मौर वततया उतपनन होकर यथासथान मव सथिति करशी । छव कणडलिनी नीचक मखदधारा वामावततम मलाधारम पदम क षत लम रीर-धीर साधक चार वार जप करगा । ल बीजस पथवीमणडल की सषटि होगी । तव कणडलिनी दसर मखदवारा शरहय-

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साधनाकलप ]. तानतरिकगष [ १४३

दवार रोध करत हए बखपवक निदिता होकर नीच. क मखरा:

, निःदवास-परदवास तयाग करगा । जीव फिर चरानति ओर माया-मोह

भ समगध होकर जीवक सप यथासथानम अवसथान करगा ।

यह परणाली कमभकयोग भावनादवारा. समपनन करनी होगी ।

कवल जपक समय सत-सयकत दषटमनर मन ही मन यथानियम

उचचारित करना होता ह । कषडलिनी सरवसवरपिणी ह, इसकएि उस `

उदबोधितत करन फी चषटा सभी को करना उचित ह.। करक‌णडलिनी

सभी दहम सभी क मलरपम मलाधारम अवसथिति -करती ह ।

मलाधार वसत‌ शकतिः. सहसरार सदाशिवः ॥

अतएव शाकत, वषणव, सौव, सौर, गाणपतय, बौदध, बराहम, पारसी

सिख, मसलमान, ईसाई परभति सभी . समपरदायभकत साघतकगण उप-

रकत नियमस कणडलनी की सहायतास जपः कर सकग । योनिमदरा

योग म.जप-सभी जपोम शरषठ ह, ईसका अनषठान मातरसही

कोई एसा विषय नदी ह, जिसस साधक सिदधि नही परापत कर सक ।

यथा :- +

योनिमदरा परा गोपया दवानामपि दभा । सकतत लाभात‌ ससिदधिः समाधिसथः स एवहि ॥

. -- गोरकषसहिता

यह योनिमदरा अतिशय गोपनीय ह; दवगण भौ इसको परातत नही

कर पात। इस मदराक अनषठानम समपण सिदधि होती ह भीर

समाधिसय हमा जा सकता ह । कयोकि-

योनिमदरा समासादय सवय शकतिमयो भवत‌ ।

सषङखाररसनव विहरत‌ परमातमनि ।

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१४४ ] तानतिकगर [ अजपा-जप

आननदमयः समभरतवा एकय बरहमाणि. समभवत‌ । . अह बरहमति वादरत समाधिसतन जायत ॥*

ठ -घरणड-सहिता

योनिमदरा का अवलमबन कर साक उसी परमातमास अषनको शकतिमय समजञगा अरथात अपन को परकतिरपा गौरी अथवा राधा अथवा परमातमा को परषरप शिव अथवा, कषणक रपम साधक समनञगा । उसस परकतिपशष मथवा तदातमक बरहमजञान होगा । तब

. समी-परपवत‌ अपन साथ परमातमा का शङगाररसयण विहार होता

ह, साधक इस रपम चिनतन करगा । इस परकारक समभोगस उतपनन परमाननदरसम मगन होकर परबरहमक साय मभदखपम मिलन हमा ह । दस परकार का जञान उतपनन होगा । उसस मही. बरहम ह" इस

रपरम अदर तजञान उतपनन होकर परबरहयम चितत छीन हो जाएगा ।

अवदय मभयास-कमस इस मदरा-बनधन भौर जप' की परणाली की शिकषा होगी। `

अजपाजपकी परणाली मलाघारपदम भौर सवयमभिग अधोमख रहन स चितराणी नाडौ-

मधयसथित बरहमनाडीका मख भी अधोमखम ह । दविमख विशिषट सादध-

तरिबलयाकति कलकणडलिनीशकति एक मख उस बरहमविवरय रख- कर बरहमदवार रोध करत हए सो जाती ह; भनय मख दणडाहत भज-

. निनी.क सदश ह; इस मखदवारा शवास-परशवास का सञचालन होता ह । वही जीव का निःरवास-परसवास ह । इवास-वायक निरगमनकालम हकोर भौर गरहण समय म सःकार उचचारित होता ह । यषा-

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साघनाकलप | तानतिकग । [ १४५

ह कारो निगम भोकतः सकारसत परवशन । -इवरोदय शासतर

_ इवास परितयाग कर यदि गरहण नही किया गया, तब उसकी

मतय हो सकती ह; अतएव ह शिवसवकप मथवा मतय ह। स-कारम

परहण, यही शकतिसवरप ह । इन दोनो क विसवादम जीवन की

रकना होती ह । अतएव यह शवास~पदवास जीव का जीवतव द ।

सोऽह-ह 'सपदनव जीवो जपति सवदा । --हसनउपनिषत‌

हसक विपरीत "सोऽह" जीव सदा जप करता ह । इस हस शबद

को ही अजपामनतर कहा जाता ह । जपो म मजपालप शषठ साधना

ह । साधक इस जपकी परणारीको अवलमबन करत हए सवत-उतथित

अश‌ तपव मलोकसामानय "दस" धवनि शर बण करक भपाथिव परमा-

ननद उपभोग कर सकता ह । मजपामनर जप करत-करत साक का सोऽह मरथातमदी बरहम ह यह‌ शञान उतपनन होता द। परतयक

इवासपररवासम यह‌ अजपाजप ह ॥ यथा :-

एकविकतिसहसरषटरताधिकमीरवरि । जपत परतयह पराणी सानदराननदमयी पराम‌ ॥ .विना जपन दवशि जपो भवति मनतरिणः । अजयय ततः परोकता भवपाशनिकनतनी ॥

--शाकताननदतरङकखिणी

--लितनी बार इवासपरदवासका सञचालन होता ह, उतन ही

आर हस" यह‌ परम तनतर अजपा जप होता ह गौर परतयक मनषय

का एक अहोरातरक वीच म २१६०० बार निःदवास वदत गौर

रहास अनतरम परविषट होता ह । यही मनषयका सवाभाविक जपः हः ?

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१४६ | बानतरिकगख [ अपजा-जप

भरतयक जीव क हदयम €स इख मनतरका पहोरहाद। हसः ह भीतरस सतयक अशको आकषित कर बाहरक जगम डउाकर

धरकति कौ परिपषटिको सञाधित कर दता ह मौर सः वाहरका रप 8 रख, गनध, शबद, सपरो-भौतर आकरषित कर सतथक साथ समबनछ सयापित करता ह) ह शिव परषः-सः शकति या परकति हस उवास रशवासक' अथवा परषपकतिका मिलन ह; इसलिए हस ही जीवातमा ह । मलाधारस हस शबद उठकर जीवाधार अनाहतपदमम धवनित होता ह । वाय-ढारा सचालित होकर अनाहतस हस नासिका होकर इवास-परशवासरपम बाहर जाता ह। अतएव जीव स सवतः

ही हस धवनि उठती ह। हस-वीज जीव-दह की भातमा ह, यह‌

हसघवनि सामानय चषटस साधकको सनाई दती ह । मनषयका अजञान तमसाचछनन विषय-विमढ मन उसकी उपलबधि नही कर पा सकता । सदगर को कपा स इसको जानसकन पर माला-जलोला ककर विडमबना नही करनी पडती ।

यह‌ भजपाजप मोकषदायी ह । इसकए उसक साथ गरदतत इषट-

मनतर मथवा अनय जो कोरट मनतर जप करनस शीघर ही साधकको मःचर-सिदधि परापत होती ह । अजपाजपकी परणाली इस परकार ह--

परथमतः साधक मन.सयम-पवक कशासन अथवा कमबलासनम अपन अभयसत जिस किसी आसनम सथिर भावस उपवशन कर बरहमरध क शतदलकमलम गरका धयान ओर परणाम करगा उसक वाद अपन-अपन पटलानयायी अगनयास, करनयास ओर पराणा-

याम कर अथवा परवोकत परणाली करमस योनिमदरा अवलमबन करक कणडकिनीशकतिको उदबोधन करगा ।~ कणडिनीक उद बोधित न होन स जप-पजा समसत वयथ ह । यथा :--

मपदम कणडलिनी यावनतिदरायिता परभो । तावत‌ किचिनन सिधयत मनतर यनवराचनादिकम‌ ॥

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-साधनाकलप ] तानतिकगर [ १४७

जागति यदि सा दवी बहभिः पणयसचयः । ततपर सादसमायाति मनतरयनतराचनादिकम‌ ॥

--गौतमीय तनवर

मलाषारसथित कणडलिनीशकति जव तक जगगी नही तव तक तरजप ओर मनतरादिस पजाचना विफल होय । यह बहत पणयपरभाव

-स वह‌ शकति दवी जगती ह, तव मनतर जपादिका फर भी सिदध होगा ।

इसलिए योनिमदरा बनधन कर अजपः जपका साधक अनषठान

-करगा ।* कयोकि उसस कणडलिनीद वी उदबोधित उधव गमनोनमखी हयोगी ।

मलापरारपदमङ भीतर जो सवयमभखगि ह, कणडलिनी सादध

तरिवरयाकारम वही सवयमभिगको वषठित करक मवसयान कयि ह । योनिमदरादवारा मलाधार आकञचित करक चिनतन .करना ठोगा । णडङिनीशकति जागरिता-जौर महातिजोमयी होकर उधवगमनोनमखी होकर मपकषा करती ह ! इस समय अपन मनवाकषरो को कणडकलिनी क शरीरम गरथित अरथाद‌ कणडलिनीरप सतर म मनतरो को मणि सदकच गरथित -चिनतन करना होगा } अतः साघक मन ही.मन इषटमनवर उचवारण-

सहित धीर-धीर अरथात‌ परककालम चिनतनदवारो इस कणडलिनीशषकति

को उतथापित करत हए सहसलारकमलकणिकाक मधयवरती प रमाननदमय ` 'परमातमाक सहित एकातमय करगा भौर रचनकालम इस ` शकति करो यथासथानम लाएगा । रचनकालरम भौर मनत उचचारण का परयोजन नही ह । |

इस परकार नि.वासर क साथ-साययथाशकति मनतर जप करक निःशवास रोध करत हए भावनादरारा कणडलिनी को एक बार सहसरारम

# मर दवारा परणीत “योगीगर' परनधम कणडछिनोच तनयका बहरविष सहन ओर सखसाधय कौशल लिखित ह । |

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१४८] तानतिकगङ [अजपा-जपा-

क जाएगा शौर उसीकषण ही मलाधधारम खाएमा। इस परकार

वारवार करत-करत सयमना पथ स विदय त‌-सदका दीरघकरार मज दिखाई दगा |

परसयह‌ इस परकार अपकरन स साधक मनतर-सिदधि परापत कर

सकता दह- सनदोह नही ह । नयासादिन करक भी साधक दिवारातर दायनरम, ग मनरम भोजनरम गौर ससार का कारय करत-करत अजपाः क साय दषटमन का जप कर सकगा । जीवातमाका द हतयागक पव दतत परयनत यह जपा पररम-मनतर का जप होता रहता ह + अतएव मदयक समय शानपरवक सः क साथ इषटमनतर का योग कर भनतिम ह क साय द हतयाग कर सकन पर रिषरपरम बरहमरोककी भराति होती ट।

शमशान ओर विता-साधना दीकषा-रहण करक साधक नितयनमिततिक कम का अनषठान करक

करत करमशः जव दरदषठ भौर कमिषठ हो जायगा, तब कामय-कमका अनषठान करगा । साधना क उचच~उचव सतर पर अधिरोहण कर क किए तानविकगरक निकद‌ अधिकारानरप ससकारस ससकत होना होताः ह । नही तो साधनानरप फल पाना कठिन ह । कलिकाल तनतोकत कामयकरम म वीर-सोधना शवषठ भौर सदयःफलपरद ह । उसम योगिनी भरवी, वताल, चिता भौर शव-~साधना सरवोतकषट ह । हम इस कलयः भ अविदया गौर उपविया की साधना-परणाछधी कः विवरण नही दग + महाविदया की साधना ही हमारा एकमातर लकषय ह । अतएव इमशान मौर चिता-साधना की परणी को ही हम इस समय किपिबदध करग 1 परणा

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{चिता-साधना | तनतिकगर | [ १४९

-भिषक ओर करमदीकषा गरहण करक वीरसाधना का अनषठान साधक

करगा । । ।

जो महावललाली, महानरदधिमान, महासादसी, सरकचितत, दया-

जी, सभो पराणियो क दितकाय म अनरकत द, वही इस काय क

उपयकत पातर ह । इस साघनाकालम साधक किसी परकारस भीत नही

होगा । हासय-परिहासय तयाग करगा मौर किसी दिञाम अवलोकन न

करक एकागरचिततत साधना का अनषठान करगा ।

` अषटमया चतदशया पकषयोरभयोरपि । कषणपकष विशषण साधयदरीरसाधनम‌ ॥

-वीरतनत

-- कषणपकष अथवा शकलपकष की अषटमी, अथवा चतद शो तिथि

स वीर-साधना किया जा सकता ह, "पर कषणपकष ही परशसत ह ।

साधक सादध परहर रातरि बीतन पर इमशान जाकर निरदिषट चिताम

अनवधयानपरायण होकर अपन हित साधनाय साधना का अनषठान करगा । साभिषानत, गड, छाग, सरा, खीर, पिषटक नाना परकारक

"फल, नव अपन-जपन दवताकी पजाक विहित दनय, इन सब को

पट स ही एकतर कर साधक उन सव पदारथो को इमकषान सथान पर

लाकर निरभयचिततस समानगणशारी असवरधारी बनधव क साय

-साधनारमभ करगा । बलिदरवय सात पारो म रखकर उनक चार पाघरो को चार दिशागो म गौर मधयरम तीन पातरोको सथापितत कर मनतर

नधाठ सहित निवदन करगा । गदभराता अथवा सवरत बराहमण को

आतमरकषा दर पर उपवशित कर रखगा ।

अरषसछवा चिता गराहया न त ससकारससकता । . च।णडाङादिष सपरापता कवर शीघरसिदधिदा 41

। -- तनतरसार `

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१५० |] , तानतिकगर [ साधधनाकलपा

साधनाकाययम अससकता चिता ही गरहणीया ह; ससकता अरथात जलसकादि दवारा परिषकता चितास साधक साधना नˆकर। चाणठालादि की चितास शीघर फल-परापति होती ह।

वीर~साधनाधिकारी वयकति शासवोकत विधानस चिता निहल- पवक अधय सथापित कर सवसतिवाचन भौर उसक बाद--"ॐ

मदयतयादि अमक-गोतरः शरी अमक दवशरमा अमकमनव-सिदधि- कामः इमशानसाधनमहम‌ करिषय...इस मनतर स साधक सकलप करगा । . उसक बाद साधक वसतरारकार परभति विविध विभषणो स विभरषित होफर परवाभिमल स उपवशनपरवक फटकारानत मल-मनरस चिता-सथान परोकषण करया । उसक वाद गरक पाद-पदमका धयान कर गणश, बटक, योगिनी, मातकागण की पजा करगा । इसक बादः “फट‌” इस मनतर स मातमरकषा करक-

यः चातर ससथिता दवा. राकषसाशच भयानकाः । पिशाचाः सिदधयो यकषा गनधरवापसरसा गणाः ॥ योगिनयो मातरो भताः सरवाशच खचराः सतरियः। सिदधिवाता भवनतवतर तथा च मम रकषकाः ॥

इस मनव स परणाम कर साधक तीन अञजकि-पषप परदान करगा

बाद म पवदिकषाम ॐ ह, समशानाधिप इम. सामिषाननबकि गहण गहण गहवापय गहलापय विघननिवारण कर सिदधि मम परयचछ सवाहा" इस मनतस शमशानाधिपतिकी पजा मौर बकति परदान करगा। दकषिण दिशा म “ॐ ही भरव भयानक इम सामिषानन सवाहा 1 (इम सामिषानन स सवाहा परयनत पववत‌) इस मनतरस

भरव की पजा भौर वकि, पशचिम दिशाम ^ॐ ह कालभरवः - शमरानाधिप इम साभमिषानन"“ ` “" "सवाहा 1 इस मनतर स काल- भरव की पजा गौर बलि मौर उततर दिशाम, ॐ ह महाकालः

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चिता-साधनो ] तानतिकगर , [ १५१

रमशानाधिप इम मरामिषानन"" सवाहा । इस मनतरस भहाकाल कौ पजा ओौर बलि परदान करगा । वाद मम तीन बलि चिताम-

2 कालरातरि महारातरि कालिक घोरनिःसवन । गहाणम ` बि मातदहि सिदधिमनततमाम‌ ॥ .

ईस मनतरस एक बलि काकलिकादवी को--"ॐ ह भतनाथ

समानाधिप इम -सामिषानन""--* सवाहा" इस मनतरम दसरा भत- नाथको मौर ॐ बर सवगणनाथ रमशानाधिप इम सामिषानन" सवाहा" इस मनभरस तीसरा गणनाथ को परदान करगा।. ईस

भरकार बलति परदाय कर पञचगवय गौर नकदधारा इमशानसथ असथयादि को परकषालित कर उसक वाद परीतवसत विनयास परवक वटपतर पर मथवा भजजपतरम पीठमनतर लिखकर पीतवसतरक ऊपर साधक सथापित करगा । उस पर -वयाधघरचरमादि क भासन को भादरत कर वौरासनम उपवसन पवक “र हर ही ही कालिक घोरदषट परचणड चणडनायिक दानवान. दारय हन हन शवशरीर महाविघन छदय छदय सवाहा ह फट‌ इस वीरादन मनतरस परवादि दस दिगाभो को कोषट निकषप करगा । इस परकार दशषदिशाओ की रकषा करक उसम उपवशन करक साधना करन स कोई विधन-बाधा नही हो सकती ।

साधना क समय साधक यदि किसी परकारभयस कातरहोततो शीघर सहद‌ वरग उसक भयका निवारण करगा । सहदगण सदा इस परकार सतक रटगा, जिसस साधक किसी परकार भय विह न हो । यदि साधक भसहयभयस विहवल हो जाय तो उस रिथतिम वसतरस साधकक नत गौर करानोको वाध दना कततवय ह । कारण.यहहकि ¡ बह क दखत अथवा सन न पवि।

उसक वाद कपरमिभचित सवत आकनद मौर सवत वडलाका रही बतती परसतत करक परदीप जवलित कर उस सथान पर साधक रखगा

५ बाद ॐ दवयसतरभयो नमः, इस मनव स असपरपजा करक साधकः

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१५२ ] तानतिकगर [ साधनाकलप

अपन अधोभाग म इस परजवलित परदीप कोपरोयित कर रखगा 1

हत तसमिन‌ महादीप -विषनशच परिभतय - तनतरसार

--इस परदीप निरवापित होन स साधन नानाविध विघन उप-

सथित हो सकत ह

उसक वाद भपन-मपन कलपोकत विघनिस नयास-समह गौर भत- शदधयादि करक इषटदवता. की पजा समापन पवक “ॐ अचचतयादि अमकगोतर शरीममकदवशरमा अम कमनवसिदधिकामः अमकमनत- सयामकसखयजपमह करिषय" इस मनतरस साधक सकलप करगा । अननतर अपन हदयम दवताका धयान करक मनतर जप आरमभ करगा ।

जप का विधान-इस परकार रह)

एकाकषरी यदि भवद‌ दिकसहसर' ततो जपत‌ । दाकषरऽषटसहलः सयातरयकषर चायतताघकम‌ ॥ अतःपरनत ` मनवजञो गजानतकसहसरक । निशाया वा समारभय उदयानत समाचरत‌ ॥

- तनतरसार

साधक का मनव एककषरी होन स दस हजार, दवि-अकषरी होन आठ हजार, तीन-अकषरी होन स पाच हजार गौर चतरकषरी होन, स अथवा उसस मधिक अकषरी मनव होन स अठारह इजार सखया का

जप करना होगा । रातम जारमभ करक सरयोदय तक जप करना, करतवय ह। ।

यदि.ञरधी रात तक जपकरनस भी साधक क दख न सक ` ` तब “2 दग दरग रकषणि सवाहा” इस जयदरगा मनतरस सरषप मौर--

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चिता-साधना ] ` तानतिकगर | [ १५३

ॐ तिलोऽसि सोमदवतयो गोसवसतपतिकारकः । - पितणा सवगदाता तव मरतयाना मम रकषकः ॥

भत-परत-पिशाचाना विषनष शातिकारकः ॥।

` ईस मनरका पाठकर तिर को इशानादि चतषकोण निकषप करना होगा । उसक बाद परमोपिवशन-सयानस सात कदम गमन कर उसी सथान पर उपवशन परवक फिर इषटदवता कौ पजा कर जप करगा । यदि जप करत-करत कोई माकर “वर गरहण कर” इस बात करो कट तब . दवता को परतिञाबदध कर अभिलषित वर को साधक गरहण करगा । जप क आदिम, जपक मधयम गौर जप क अनतरम साधक बलि परदान करगा । जपक आदि-मधय अथवा अनत समय म दवी जब बलि परारथना कर तभी साधक. महिष अथवा बकरा का बि शरदान कर । यवपिषट दवारा महिष अथवा बकरा परसतत कर बि-

` शरदान कततवय ह । जब दवी नर अथवा हसती वलि की पराना करर तब ““दिनानतर म बलि परदान करगा दरस परकार की परतिशञा कर सवगह फो साधक गमन करगा । दसर दिन धानयपिषट मथवा यव~ पिषट दवारा नर मयवा हसती परसतत कर परवोकत मनरस खदगदारा

साधक छदन करगा । योगिनीहदयम जखाद कि जपक अनतरम अखलिगरदान कर वरगरहण परवक सददवग क साथ हषटचितत सवगह को गमन कर मपन दाकति-अनार गर, गरपतर अधरवा गरपतनी को दकषिणा शरदात कर ।

समापय साधन दवि दकषिणा विभवावरधि । गरव गखपतराथ ततपलनय वा निवदयत‌ ।। `

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शवसाधना

तनवरक नामस जो भौ सिकोढत ह, व एकवार तनतरशासवर की

परयालोचना करन पर अपन चरम को समकष पा सकग ओर विसमित

भौर सतभित होकर ससममान नमसकार करग । साधना क इसरप की

रकषट पनया गौर साघक कौ रचि क भदस सवभावानयायौ साधन.

पनया मौर कोई शासतर परकाश नही कर परतिदह। कलिक अलपाय जीवगण जिसस अति अलप समयम सिदधिलाभ कर सक, तनपरन उस विषय म विकष कतितव दिखलाया ह । अधिकारी हो सकन पर

साधक एक ही रात म बरहमविदया म सिदधि परापत कर सकता ह । वीर-

। साधना उसका दषटानत ह । महार क सवविधा सरराननद ठाङरन' एकरात म ही शवसाधना करक बरहमसाकषतकार कियाया। हम नीच उसी शव-साधना कौ परणाली पर विवरण परसतत करत ह ।

वीर साधनाकारी साधक शनयगहम, नदीतर, निरजन परद, विलव

मर अथवा इमशानसमीपसथ वनपरदशम शव-साधना करगा । मथवा

शासतरोकत विदहिव दिन म शचव-साधना करना कततवय ह । यथाः--

अषटमयाञच चतरदशया पकषयोखभयोरपि । भौमवार तमिनलाया साधयत‌ सिदधिमततमाम‌ ॥

-भावचडामणिः

- षण अथवा शकलपकष की चतरदशी तिथि म मङधखवार की

रात म उकत साधना करन स साधक उततम सिदधि राभ कर सकता

ह 1

शव-साधना म षणपकष - ही विशष परजसत ह । साधक पवस छि

विहितः शव सगरह करक रखगा । विहित शव यथा :--

यषटिविदध शलविदध खडगविदध जकमत 1 बसनतिदध सपदषट जाणडालञचाभिभतकम‌ ॥

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शवसाधना | ताचतिकगर ` ` [ १५५.

तरण सनदर शर रण नषट समजजवलम‌ । पलायनविशनयनत ` सममखरणवतिनम‌ ॥

। । -भावचडामणि

जो वयकति यषटि, श गौर खडगाघातस शराण परितयाग किणः

ह! जलम गिरकर मर ह, वजराघात मयवा सपदशन स जिसकी

मतय हई द--इस परकार चणडाऊ जातीय मतदह को इस काय म शव

बनाना चाहिय । अनयानय कषदर शव. साधारण कम सिदधयः

नियोजित हो सकता ह । बराहमण क शव का भी इस काय म साधक

परितयाग कर । जिस वयकतिन परलायनन कर सममख यदधमपराण

विसरजन किया ह, उसका . शरीर भी शव-साधना काययम भरहसत ह

इस परकार का शव तरण वयसक. ओर सनदर होना आवशयक ह।

कषव इस परकार सलकषणाकरानत न होन स उसका परितयाग करना चाहिय । यथा--

सतरीवशय पतितासपशय नयवज ` हि तवर । अवयकतकिङख कषटी वा बदधभिनन' शव हरत‌ ॥ न दरिकषमतचचापि न पय षितमव वा। सतरीजनञचदश रप सवधा. परिवजयत‌ ॥

--भ रवतनतरः

जो वयकति सतरी क वरीभरत, पतित, असपशय, दरनीतियकत, रमशर. विहीन, कलीव, कषठरोगाकरानत अथवा बदध क शव वजित ह दरभिकष

सख मत गयकतिका शरीर अगराहयह। सयमत शव विहितहि। बसी

अथवा गलित ` चवदारा साधना करन स उसस कारयसिदधिनदीहो

सकती ह । इसचलयि उकत परकार काशव गीर सतरियोका मतशरीरः

इस कारय म साधक गरहण नही करगा । कभी भी आतमघाती का

शरीर शव-साधना म साधक सवीकार नही करगा । परवोकत सलकषणा , करानत शव-सगरह करक साधक साधना का अनषठान आरमभ करगा ।

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१५६ ] तानविकगर , साधनाकलय

साघक मासभकत वलि क लिए तिल, कश, सरषप ओौर. धप

"दीपादि पजा का उपकरण ओर सामगरी सगरहपरवक शव-सा ।

-परवोकत जिस किसी सयान को मनोनीत कर उस सथान पर जायगा ॥

-चादम सामानयाधय सवापन परवक साधक परवाभिम‌ख होकर "फट‌" इस

अनतर क परवम अपन-अपन बीज मनव उचचारण कर याग-सथान

अभयकषण करगा । वादरम पवदिशाम गर, दकषिणदिशा गणश,

पशचिमम बटक मौर उततरम योगिनी को अना कर शरमिर ४

दारय हन हन शवशरीर महाविषन छदय छदय सवाहा ह -फट‌"” इस वौरादन मनध को लिखि कर-- ।

य चातर ससथिता दवा राकषसाशच भयानकाः । .

पिशाचाः सिदधयो यकषा गनधरवासपरसा गणाः ।

योगिनयो मातरो भरताः सरवाङच खचराः सतरियः ।

सिदधिदाता भवनतवतर तथा च मम रकषकाः ॥

स।धक इस मनपरस तीनवार पषपाञजलि परदान करगा । बादम

` 'शमधान-साधना क किलित करमस पपदिशाम इमशानाधिपति, दरणिण-

"कट‌ ईष सदशन मनपरस कषिलावनधन कर सव हदयम हसत ससथापन

-चट चट परचट परचट कह कह वन वन बनध बनध घातय धातय

। ह फट‌” यह मधोरमन उचचारण करक “आतमान रकष रकत” रहकर

साधक जातमरकना करगा । उसक वाद अपन-अपन कलपोकत परणायाम

सनयदरगामनरस. बतदिक सप विकषप गौर--

ह ही ही कालिक धोरदषटर परचणड चणडनायिक दानवाय `

“दिशारम भरव, पदिचिम दिकषाम कालभरव, उतत रदिशाम महाकालभर । की पजाकर साधक. बलि परदान करगा । इसक बाद “ॐ सहसरार ह

पवक “3४ ही" सफर सफर परसफर परसफर घोर घोरतर तनरप

-भत-शदधि ओर विविध नयास कर “ॐ दग दग रकषणि सवाहा” इस

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शवसाधना ] ` तानतिकगङ [ १५७

ॐ तिकोऽसि सोमदवतयो गोसवसतपतिकारकः । पितणा सवगदाता तव मरतयाना मम रकषकः ॥ भतपरतपिदाचाना . विषनष शाोनतिकारकः ॥

इस मनतर स तिल विकषप परवक सगहीत शव क निकट साधक ममन करगा 1 |

जाद म दवसमीप उपयदान कर ““3ॐ% फट‌” इस मनतरस शव क

ऊपर अभयकषण..करत दए “3ॐ ह मतकाय. नमः फट‌” इस मनक स पतीन बार पषपाञजलि परदानपरवक शाव सपडापवक साधक परणाम

करगा । बादम-

ॐ वीरश परमाननद शिवाननद कलदवर । अननदभभरवाकार दवी-पददाकर ॥ वीरोऽद तव परपयामि उततिषठ चणडिकाचन \।

साधक इस मनतर स परभाम करगा । . उसक भाद "ॐ> ह मत- काय नमः" इस मनतर स परकषालन करक सगनधि जखवारा शव कोः सनान कराकर वसवरहारा शवदारीर को मारजन, धषदधारा शोधन ओर दवशरीर चनदनदारा अनकिति करगा । इसी समय शवदारीर

यदि रकतवण धारण करताद, तब साक को भकषण करता द यथा-

रकताकतो यदि दवि' भकषयत‌ कलसाधकम‌ । ---भाववडामणि-

बादम शव क कटिदकष को पकड फर पजा क सथान पर छाना होगा । बाद कचच दवारा शयया रचना कर उसक ऊपर पवसिर करक कशषव की सथापना करगा । सक बाद शव क मख म जातिफल,- खादिरादियकत तामबर परदान कर मधोमख कर रखगा । शवपषट चनद- नादि दारा अनकषन कर बाहम स कटिदश परयनत चतर मणडल.

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१५८ ] , तानविकगर [ साधनाकलप

-लिखगा । चरल क मधय रम अषटदरपदम‌ भौर चतरदार अदधत कर.

-पदम क मधय म “$ ही फट‌”. इस मनतर क साथ जपन कलपोकत पीठ

अनतर लिखना होगा । बाद म उसक ऊपर कमडादि आसन सथापित

करगा । वाद म शवक समीप जाकर शव का कटिददा धारण करगा ।

सत शव यदि. किसी परकार उपदरव करता द, तव उसक गातर

चनिषठीवत परदान करगा । यथा--

` मतवा शवसय साननिधय धारयत‌ कटि दशतः । यदयपदरावयततदा ददयाननिषटीवन राव 14.

--भावचडामणि

इस परकार करन पर शव शानतभाव धारण करगा । तबफिर

-अकषालनपवक जप क सथान पर छाना होगा| बादम साधक.जपः

सयान.की दशदिशा म बारह अगल अशवथादि यजञकाषठ परोयित

कर पवादि करमस दशदिकपालो को पजा ओर बलि परदान करगा।

"पजाकाकरम इस परकार द । यथा-

परवादि कम स “3ॐ# ला इनदराय सराधिपतय एरावतवाहनाय वजरहसताय शकतिपारिषदाय सपरिवाराय नमः'" इस मनतरस पादादि उपचार वारा, अचना करक “ॐ ला इनदराय सराधिपतम

- म "बि गह गह गहणाय ग हवापय विधननिवारण कतवा मम

सिधि परयचछ सवाहा एष माषबकिः इनदराय सवाहा" इस मनवस सामिषाननदवारा साघक वलि परदान करगा ।

"ॐ रा :अगनय तजोऽधिपतय मषवाहनाय सपरिवाराय

शकतिहसताय सायधाय नमः' इस मनतरस पादयादि उपचार स अचना

कर "38 रा अगनय तजोऽधिपतय" इतयादि पववत‌ मनम पाठ कर

-अगनय सवाहा क कर साधक बलि परदान करगा । |

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वसाधना | तानतरिकगर [ १५९

“ॐ मा यमाय परताधिपतय दणडहसताय भटिषवाहनाय सपरिवाराय सायधाय नमः" दस मनतर स साधक पादयादि उपचारः हारा अचना कर “ॐ मा यभाय परताधिपतय" इतयादि परववत‌ नमनतर पाठ कर “यमाय सवाहा" कहकर साधक बलि परदान करगा ।

ॐ कषा नि ऋ तय रकषोऽधिपतय असिहसताय अशववाहनाय सपरिवाराय सायधाय नमः" इस मनतर पचादि उपचार स अरचना -कर “ॐ कषा निऋतय रकनोऽधिपतय '” इतयादि पववत‌ मनतर पाठ -फरक निरः तय सवाहा” कहकर साधक वलि परदान करगा 1

"ॐ वा वरणाय जलाधिपतय पाशहसताय मकरवाहनाय सपरिवाराय नमः: इस मनतर स पादयादि उपचार स अचना कर "ॐ वा वरणाय जलाधिपतय” इतयादि परववत‌ मनतरस. पाठ कर “वरणाय सवाहा" कहकर साधक पाठ करगा ।

“ॐ या वायव पराणाधिपतय" हरिणवाहनाय अकशहसताय सपरिवाराय सायधाय नमः' इस मनतर स पादयादि उपचार स अचना कर “39 या बायव पराणाधिपतय इतयादि परववत‌ मनतर पाठ कर “वायव सवाहा” कहकर साधक बलि परदान करगा ।

“ड सा. कवराय यकषाधिपतय गदाहसताय नरवाहनाय सप- रिवाराय सायधाय नमः" इस मनतर पाादि उणचार दवारा अचना करक ॐ सा कवराय यकषाधिपतय” इतयादि पववत‌ मनत पाठ करक ““कवराय सवाहा" कहकर बक परदान करगा ।

“ॐ हा ईशानाय भताधिपतय शलहसताय वषवाहनाय सपरिवाराय “सायधाय नमः* इस मनतरस पथयादि उपवारस अरचना | करक सायधाय नमः" इस मनवरस पादयादि उपचारस अचना करक “ॐ हा ईलानाय भताधिपतयः* इतयादि पववत‌ मनतर पाठकर “ॐ ह

इकषानाय सवाहा कहकर साधक बि परदान करगा ।

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१६० | , तानविकगख ` [ साधनाकतफ

"ॐ आ बरहमण परजाधिपतगय हसवाहनाय पद‌महसताय सपरिवाराय सायधाय नमः इस मनतर स पादयादि उपचारस अचना कर “3४ आ बरहमण परजाधिपतय इतयादि परववत‌ मनम षाठ करक

साधक “बरहमण सवाहा कहकर बक परदान करगा ।

“ॐ ही अननताय नागाधिपतय चकरहसताय रथवाहनाय सपरिवाराय सायधाय नमः'* इस मनरस पायादिस अचना फर "४ ही अननताय नागाधिपतय इतयादि पववत‌ मनव पाठ कर ““अन- नताय सवाहा" कहकर साधक बलि परदान करगा ।

इस परकार इनदर, अगनि, यम, निकछति, वरण, वाय, कवर,

ईशान, बरहमा मौर अननत इन दशदिकपालो की पजा गौर बतिभरदान कर ““एष माषबकिः ॐ सरवभतभयो” इस मनपरस सरवभत-बलिगरदानः करणा । उसक बाद मधिषठातरोदवता चतःषषटि योगिनी गौर डाकिनीगणको बलि परदान करनी होगी । सामिष-अननदवारा भी दवतामो को वलि दनी होगी ।

बाद म साधक मपन निकट पजादरगयादि गौर किचित‌ द रपर उप कत उततर-साघक फो ससथापित करक मारमभम मलमनतर, वादरम

“ही फद‌ शवासनाय नमः" इस मनधरस साधक शव की अचचना करगा । बाद म “ही फट‌”. इस मनतरक उचचारण पवक अदवारोहण-सदश शवः की पीठ पर बठकर अपन पदतक क नीच कतिपय कश साघक निकष करगा.जौर शव क कश परसारण परवक सटिका बनधन करफ गड,. गणपति गौर दवी को परणाम करगा । बाद रम पराणायाम मौर कराङख- नयसादि करक परवोकत वीरारदन मनतरस दसदिशाओो म साधक लोषट. निकषप करगा ।

, बाद म “ज तयादि अमक-गोतरः शरीगमक-दवररमा अमक- दवताया: सनदशनकामः अमकमनतरसयामक-सखयकजपमह

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। अ ] तानतरिकगर [ १६१

करिषय" इसमनबस सकलप करक “ही आधारलकति कमलासनाय नमः” इत मनव स साधक भासनकी पजा करगा । बाद म अषनी बा भोर अषय सथापित करकषव को टिकाम साधक पीर पजा करगा। बाद साधक अपनी कषमताक अनसार षोडशोपचार, दशोपचार

अथवा पञचोपचारस अपन दषटदवता की पजा कर शजभखम सगनध जलदधारा साधधक.दवी का तपण करसा ।

सक वाद साधक दहावस उठकर शव क सममख खडा होकर “ॐ

वकषोम भव दवजञ वीरसीदधि दहि दहि महाभाग इताशरय- . परपयणः” इस मनतरस पाठ करगा, उसक घाद पटसशरदरारा शवक.दोनो चरणो को बाधगा । म मनतरस सखवकचरीर को ददतास

-वधिगा ।-बदम- ।

“ॐ मदररो भव दव चीरसिदधिकतासपद । ॐ> भीम भवभयाभाव भवमोचनभावक ॥ चराहि मा दवदवश शवानामधिपाधिप ।'

हस मनतर का पाठ करत हए शव क पादमलम धिकोणयनतर साधक

'शिखना । गाद म शवक ऊपर वर कर कवक दोनो हाथो को दोनो ओर परसारित कर उसपर ककी रखगा । साधक उस भसतत कश क ऊपर. जपत. दोनो कावो.को सयापित कर. फिर तीन वार पराणायाम

कर‌ शिरःसथित शकल-दादशच दर (भतानतरस शतदर) पदमम गरदव

-क[ ओर अपन हदयरम दषटदवी का चिनतन करत-करत दोनो होठो को

समधटित कर षव साधनोपयोगी विहित भाकादवारा निभय चिततस

` भीनी होकर सकलवानकतार साधक जप करगा । परवोकत एमकान-साधना

क फरमानसार भनतराकषर कौ सखया क भाधारपर जपसखया का सकलप कर जप करना चाहिय | यथा--मनतर एकाकषरी होन पर दश.सहसर

, सखया सदभलप करक जप करना पडगा इतयादि दमशान-साधनम

` किलत ई ।

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१६२ ] तानतरिकगर [ साधनाकलय

इस परकार जप करन स भी यदि अरदधरानि परनत कछ दषटि- मोचर न हो, तब परववत‌ सषप मौर तिल विकीण कर अधिषठित सयान ` स सपद गमन कर साधक फिर जप आरमभ करगा । यदि जपकालम किसी परकारका भय उपसथित हो अथवा आकरारास यदि कोई बलि परायना कर, तव उसस साधक कटगा-

“यत‌ परारथय वकितवन दातवय कञजरादिकम‌ । दिनानतर च दासयामि सवनाम कथयसव म ।**

“दिनानतर तमको कञजरादि का बलि परदान करगा; तम कौनदो गौर ममहारानामकयाह? उस मञच बतामो। इस उततर को परदान फर फिर निरभय चिततस साधक अप कर सकगा बाद

यदि मधर वाकयस भपना नाम बतकराता ह, तव फिर साधक कटगा-- “वम अमक इति सतय कर” अरथात‌ “तम मकषको वर परदान करोग इसपरकार परतिजञा करो ।"” सपरकार परतिजञा बदध कराक साधक अपना मभौषट वर परातिङक किए परारथना. करगा। ओर यदि परतिजञापाशस

-बदधन दहो मथवा वर परदानन कर, तव एकागरचिततस साधक फिर जप भारमभ करगा । . किनत यदि परतिजञा करक वर परदान करन क लिए सममत हो, तव साधक भौर जप नही करगा । बाद म अभिरषित षर

परदम करक हमारा काय सिदध हमा इस परकार समकष कर.शव की शटिका मोचन परवक शव परकषालन भौर शव को सथानानतर रखकर . शवष पादबनधन को मकत करगा भौर पजा-दवय जरम निकषोप कर शषवको जल म. डार दगा अथवा भग म परोयित करक .साघक सनान

, षारगा।

` वाद म साधक आननदित चितत स अपन घर जाएगा भौर दसर .

दिन पवरतिषम‌ त, वि परदान करगा । यदि दषट दवता कञजर, भरव, .नर अगरव शकर बकति की परारथना कर, तव दवता कौ पराथना

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शवसाधना | तानतिकगर‌ [ १६३

क अनमारविषटकनिभित वह अभिरषित वलि. “अगरिमरातरौयषा यज- `

मानोऽह त ग हवनतविम बलि” इस मनधस परदान करक साधक उपवासी रहगा । ।

दसर दिम साधक परातःकतयादि नितयानषठय करिया समाति कर

एञचगवय पान करगा ओर पचीस बराहमणको भोजन करायगा ।

शकत होन पर. बीस, अषटादश भयवा दस तक को सखपा होन परभी

दोष नही होगा ।

यदि न सयादविपरभोजय तदा निधनता बरजत‌

तन चललिधनतव सयाततदा. दवी परकपयति ॥ -भावचडामणि

--यदि बराहमणभोजन नहो. तब साधक निरधन होता ह; विश

षतः दवी भी कपिता दोती ह । बराहयणभोजनक अनतम सवयम‌ साघक

-सनान आर भोजन करक उततम सथान पर वास करगा ।

इस परकार मनतरसिदधि परतत कर चिराचधि मथवा नवरातरि परयनत

गोपन कर साधक रखगा; किसी परकार भी मनतरसिदधिका विषय परका-

, चित नही करया । मनतरसिदधि लाभ करक यदि साधक सतरीशयया पर

गमन करतार, लो वयाधि पीडित होया; यदि गान सनता दह तब

बधिर भौर वतय दखन पर अनधा होता ह, मौर यदि दिनम किसीस

भी बात करताद, तञ साधक मक होतादह। षनदरह दिन तक इस

परकार सवकम परितयाग कर रखगा । कारण साधकक शरीरम पनदरह दिन तक. दवता रहत ह + यथा :-- ।

““पञचदशदिन यावद दवसय ससथितिः । न सवीकाय गनधपषप वहिरयाति यदा तदा-॥ तदा वसतर परितयजय गहणीयादसनानतर ।

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[१६४ तानतिकगर [ साधनाकलप

गो-तराहमण-विनिनदाञच न करयाचच कदाचन ।, दजजन पतित कलीव न सपशचच कदाचन ॥ दव-गो-बराहमणवादीच परतयह ससपरोचछचिः । परातनिवयकरियानत च विलवपतरोदक पिनत‌ ॥

तनतरसार

जो खाक क शरीरम दवता रहत ह, उसी कतिपय दिन तक गनध अथवा वषप गरहण नही करगा भौर विस समय बाहर जाएगा तव

- परिधय वसतर छोडकर अनय षसव धारण करनाहोगा। कभीगो अयवा बराहमण की निनदा नही करगा; दजन, पतित मौर कछीष मनषय

को सप नही करगा; परतिदिन शददह होकर दवता, गो, बराहमण

परभति का सप करगा । परतिदिन भराठःकालम नितयकरिया समापत कर विलवपतरोदक परान करगा । इन नियमो का पालन नही करन स साधक

-की विशष कषति होती ह. । | बादम मनतर सिदधिक सोल दिन गगा-सनान कर सवाहानत

ममन उजवारित करक ““अमकदवता तपयामि नमः” इस मन- स तीन सौ बारस अधिक दवी का तपण करगा । बादर साधक जल

दवारा तरपण करगा । सनान मौर सषपण किए विनाकभी भी साधक. दबतपण नही करगा । उसक बाद गरदकषिणा परदान कर मचठिवराव- धारण करना होगा ।

इतयनन विधानन सिदधि परापनोति साधक । ह भकतवा करान‌ भोगाननत याति पर पदम‌ ॥

--चनवसार

इस परकार क विधानम शवसाधनाम साधक सिदधिल।भ करन पर

होक भ परणाभिीषट होकर विविध भोग परापत करक अनतम बरहमषव ` लाकरसकताह

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शिवाभोण ओर कलाचार कथन

वनतरोकत-वीर साधना की परणाीस किप परकार इमलान-साधना

आर शाव-साधना करक अति भतप कालम मनतरविदधिहोतीद, उस

लिखा गथा । इस परकार अनय किसी शासतरोकत साधनास सिकिलाभ

कभो भौ समभव नही ह । इसलिए तनवोकत साधनाक विषयम भालो-

चना फरमस विसमयत हदय भकति-विनत हो जाताह। जो तनतरक

भरमस अथगत न होकर भोहि टढी करतरह, व तनतरशासतरानभिजञ

& - इसम सनदह नदी द । हम दस बार कषाचार विधि को लिपि-

दध करग । पाठक ! समाहित चिततस उलक ममस अवमत होकर

भावावधघारण करग 1

कलाचार समपनन होनक लिए साधकको सकतिक साथ कलाचारो

को पालन कशना होता ह, नही तो. भरतयवायभागी होना पडता द । सनधया, षनदन, पित-तषण जौर पितशवादध जिस परकार नितय ह, उसी

परकार कलसवको का कलाषार भी नितय ह; भतएव साधक सयतन

कलावारका पालन करगा । विकलिषतः जो वयकति शिवतवरापिका

वाभो परदान नही करता द, वह‌ गयकति कभी भौ कलदवताकी अरचना

का अधिकार नही भाष कर सकता ह । हसलिए शिवाभोग निवदन

कर वाकषक जगदमबा की तषटि का विधान करगा । `

वशरपा शिवा दवी यो नाचयति निजन । . कषिवाराषन तसयाशच सरव नहयति निरिचतम‌ ॥ जपपजा-विविधानि यत‌किचित‌ सङतानि च ।

शहतवा कषापमादाय शिवा रोदिति निरजन ॥ -- कलचडामणि

जो साकषक पशरपिणो दिवदवो को निजनम भरयना नही करता

ह, रिवाराव ठारा उसका समसत पणयकम विनषट हो जाता ह, इसम

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१६६] तानतरिक गर [ साधनाकरलष

सनदह नदी ह । शिवाभोग नही दनस शिवा साधकक जप, पजा मौर

अनयानय सकतादि गरहणःपरवक शाप परदान करक निजनम रोदन करती

ह ॥

<कारी-काली यह वोलककर आहवान करना आरमभ करनसही

विवारपधारिणी मङखलमयी उमा साधकक सथान पर गमन करती

द; उनको अननदान करन स शीघर भगवती परसनन होती ह ।

साधक सायकाल विलवमकम, भरानत र अथवा दमशानम जाकर दवी

को आहवान कर “ॐ गह दवि महाभाग शिव कालागनतिरपिणी

शभाशभफल वयकत बरहि गहध बलिनतव=' शल मनवस साधक मास परधान नवच परदान करगा । उकत भोग यदि एकमातर शिका भकषण करती ह, तम कलयाण होता ह, भौर भगवती साधक पर परितषट

होती ह } यदि शिवा भोग भकषण करक मखोततोलनपवक इशनिकोणा- भमख होकर ससवरम षवनि करती ह, तब साधषककता निशचय शभ

हीगा। मौर यदि शिवा भोग गरहण नही करतीरद, तव साधकका, भमगक, मवहयममावी ह । यथा-- ।

“यदा न गहयत नन तदा नव शभ भवत‌ ।

इस परकार होन स उकत दोष की शानतिक जिए साधक शानति सवसतययनादि कराएगा । जिस किसी परकार कारयानषठान कालम शिवा- भोग परदान करक इस परकार शभादयभस मवगत हमा जा सकता ह ।. जो साधक यथाकरम पलशकति, पकषीरकति मौर नरशकति की पजा करता ह, उसक समसत कम विगण होन पर भी मगलकर होत ह । इसि यतनपवक सवरश की पजा कलसाधककौ अवशय करनी चाहिए ।

, “ साघकगणको समयाचारविहीन दोनस साधक कोटिजनमम भी ` . षिदधिलाभ नही कर सकता ह । जो मनषय कलशासतर भौर कलानार

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हिवभोग ओर ककाचार ] तानतिकगर [ १६७ भनवतती होगा वह‌ सभी विषयो उदार-चितत, बसणवाचारपरायण,

परनिनदासरिषण भीर सरवदा परोपकार-निरत होगा । कलपञ कल-

बकष मौर कलकनया का दकञन .कर दवी भगवतीक उद‌ रयत साधक परणाम करगा । साधक कभी भी उनक विसर कोई उपदरव नही

करगा ।

कलवकष-शटषमातक, करञज, ` विलव, अदवसथ, कदमब, निमब,

घट, गललर, आमलकी भौर इमली ।

कलप -ष, कषोमदधरी, जमबकी, यमदतिका, कबरी, शयन, भकाक.ओौर कषण मारजार । । ।

कलकनया - नटी, कापालिक, वशया, रजकी, नापितागना, भराहयणी, शदरकनया, गोपालकनया नौर मालाकारकनया ।

कलद, कल गौर कलकनयाओक सगम कलाचार समपनन साक किस परकार वयवहार करगा शासतरम उसका विशदषरपस वरणन

&1 गधरा दशन कर महाकालीको` सलाघक परणाभ करगा मौर अनय कलशक ददन होन स-

“ॐ कशोदरि महा चणड मकतकशि बलितरिय । कलाचार परसननासत नमसत शङकरपरिय ॥।

साधक इस मनतरक. उचवारणसहित परणाम करगा । यदि किसी

समय पवत, विपिन, निरजन सथान म, चतषपथ अथवा कलामधयम दव- योग स गमन करना हौ तब उस सथल पर एककषण रहकर -भनधजपसहितः

लमसकार करक यथासथान पर गमन करगा । यदिः दमशषान अथवा शव.

का दरशन होता द, तव उसका अनगमन परवक परदिकषण कर--

` "ॐ घो रदरषट करालासय कोटिशबदनिनादिनि ॥ शनोरघोररबासफाक नमसत चितावासिनि ॥

ध १2

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१६८ | तातरिकगर | सानाकलय `

हस मनतरस साधक परणाम करगा ! रकतयसतर जयवा रकतषय वरान"

करक भमिषठ होकर तरिपराभविकाक उद शयस साधक शरणामपरवक-- |

। “2 वनघकपषपसकाश चिपर भयनाशिनि । भागधोदयसमखनन नमसत वरवणिनि ५

साधक इष भनतरस पाठ करगा । यदि कषणवसतर, कषणपषपः राजा, राजयरष, परङग, ` मातङग, रव, शासतर, वीरपरष अथवा

कलदका दरशन होता ह, तब -

"“2ॐ जयदवि जगदधातरि तरिपरादय तरिदवत । भकतभयो वरद दवि मरिषाधनि नमोऽसत त ॥“

. इस मनवका पाठ कर साक परणाम करमा । मयनाणड, मतसव

अववा सनदरी सवरीका दलन करनस--

“ ® घोरविधनविताकषाय कलाचारसमदधय ।

नमामि वरद दवी मकतमालाविभषिति ¢ रकतधारासमाकीणवदन तवा नमामयह‌) सवविधनहर दवी नमसतः हरवललम ॥।"*

दस मनतरक पाठयरवक. भ रवीक उद‌ शय परणाम कर मनत जप

करना दोमा-- .

एतषा दञननव यदि नव परकत, शकतिमनत परसकतय तसय सिदधिन जायत ॥

- यदि.कोई पराधक इन समसतका दशन कर काय नही करता टः तब. वह शतिमनतरस सिदधिकाभ नही! कर सकता ह ।

, यहा. तक कलाचारक समबनधम जो आलोचना हई, उसस पाटकका धिय टट सकता ह। किनत सभादित-वचिततस चिनतन करन पर साधक दखमा-कि इन सब सामानय विषयौ. म गभीर जञानका आभासि निदित

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41 कराचार कथन | ` ` तातरिकगड ` [ १६९

ह । जो धिसनधया करक अथवा समाजम जाकर निदिषट समयपर धटी

दखकर अथवा . ससाह एक दिन चचम जाकर धरमानषठानकी पराकाषठा

का परदरशन करत ह, व इसकी मरममोपलनधि किस परकार कर सकत ह ? साधक जितनी ही उशचति करगा, उतना ही अधिक समय. भगवानक

- यान तनमय रहगा । हसीक कषासतरकारगण जितन अधिक सभय तक

माधकका मन शषटदवताक चरणोम रगा रह, उसका उपाय कर वि

क । इसी कारणस परवोकत इल, परय, पकषी, वखन पर ही साधक अपन

दषटदवताको समरण कर परणाम करगा । विरषतः ऋऋषिभणन इन सर

पश, पकषी, बलादिक मधय विशषदकतिका भी परिचय दिया दह । भौर

जब समसत पराणिोको दखनस ही. भगवानकी गात मन आएगी तय

साधक सिदधावसथाम उपनीत होवा ह । दसीत वषणव साधकोनि कहा

ह-- जो-जो नशरस दिखाई पडता ह, उसस हरि सफरित होत. ह 1"

कलाचारी साधक शकति-अश-समभरता रमणीक साय किस परकार

वयवहार करगा, इस समय उसीकी आलोचना की जाय । वाठक ! उसक पषनस समकष पा सकगि कि तनतोकत कलाचारका साधना मयादि-

पान कर रमणीक साथ रग करना नही ह, वह--

रमणौको जननीतवन परिणत करनका कौश मातर ह । तनतर- `

कारो न समकषायाया कि वद-पराणानयायियो क उपदशका मतदहकि

आसगलिषपाका परितयाग करना जीवक लिए दःसाधय दह, वह‌

नला-- वह‌ आशर तषणा, जीव मन करन पर भीनी छोड

सका। कारण जीव मातर ही रमणौकी आविषट शकतिस अनपराणित ह । उसी कौशलस रमणी परिचरया कर उतक शरणागत हौ उसकः साथ . आटमसभिशवरग कर परकतिका कोमल बाह-बनधन छिनन .करना होगा.

भावाकपिणीको जय कर पा सकन पर अधयासकिकछि राजयम रक

पद भी अगरसर होनका उपाय नदी द । जीवक सादधय नही णा

अथवा अनय उवायस रभणीक भाकरवणस अपनी रकषा कर सक। वज .

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, ` पजादिका अनषठान विदत ह । कलाचारीका रमणीक समबनधम परविष

१७० | तातरिकगक [ साधनाकिलव

-जाताह कि कवल शिश वालक ही एकमाभर अपन भायततम रमणी फो रख सकता ह । बालकक समीप रमणी की समसत माया भौर कोक धय हा ह । रमणी शिदय की दासी होकर सवदा उसक सख सवासपय

क किए भयसत रहती ह । जननी सनतान.को छाती लकर जगत को भरल जाती द; सनतान को दखन स ही सनह-रसम अभिषकति हो सयल

मकम उठा लती ह। उस समय कोई अभिमानका भाव नही रह . जाता-~-सनदरी, यवती अथवा रसवती किसी भी परकार वालक

किए आदरणीय नही ह । इसीस तनरासपरकारन रमणीको एणा करक उस जननी का सथान दिया ह। रमणीको जननीतवम परिणत करक आधयातमिक राजयक दरगम पथक परधान विषनको अपवारित कर खा ह। चिनतनदील पाठक भकति-नशनहदयस तनतरशासतर षी भालोचना .करमतः हमलोगो क वाकयकी सारथकताको उपरनध कर

विसमयस अभिभत होगि । हमन तनवर समबनधम नीच किञवित आभात दिया द । परथम तनतर कटा द--

सतरीषमीप कता पजा जपशच परमईवरि ॥ कामलपाचछतगण समदीरितमगययम‌ ॥

-- समयत

सतरीक समीप जो पजा करनी होती ह, वह कामरपकषाभसौपन

अधिक भौर अकषय फल-परद.ह। ।

इसलिय रमणीको जगजजननीका अश समकषकर, उसक समीपम

भावकी रकषक लि किस परकार आदश दहि, तनवशासतरस उफ

सारा उदत किया ह । ।

कलाचारी साधक सरवभरतक ` हितानषठानम नियत नियकत रहगा नमिततिक -कमका परितयाग कर नितयानषठानम ततपर रहगा । भपत

दषटदवताङ चरणो म समसत करमफल अरपण करगा । मनवाजचतप

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कराचार कथन | ताधिकगर [ १७१

अशनदधा, अनय मनतर पजा, कलसनी निनदा, सवियोक भरति करोध भौर उन पर परहार इन समसत कायो का बदधिमान‌ वयकति परितयाग करगा । समसत जगत‌को सतरीमय दखगा । अपनको भी सतरीमय दखगा । जञानवान‌ वयित घयय, चोषय, लदय, पय, भोजय, गह‌, सख कि सभी वसत सरवदा

यवतीमय समकषगा । यवती रमणीक दरशन करन पर समाहित हदयस परणाम करशा । यदि दवात‌ कलक दशन होता ह, तब शीघर दवीक उद‌ दय स भानस गनधादि दवारा -पजा करक गरदवको ` परमामपरवक “कषमसव” कह कर परारथना करगा । इस परकार कतसिता, भरषटा अथवा षटा रमणी को नमसकार कर साधक उस इषटदवता सवरप समञञगा । सतरियो क अपरिय कारयो को सभी परकारस साधक परितयाग करगा । सतरियो को दवतासवरप, जीवनसवलप भौर शरषणसवरप समकषगा । सवदा रमणीक समरभिवयाहारम रहगा ।. शकति ही शिव, शिव ही

शकति, ` बरहयारकति, विषणशचकति, इनदरशकति, रविशकति, चनदरशचवित गरहगण शकतिसवरप-अधिक कया कहा जाय--यह समसत ही शकितिका सवलफद। इपलिए कित इगत कमीभीसतरीका दलन नदी करगा । काम भावतसवरोक अगोका दरशन करनस जगञजननीका अपमनि द । कारण ~

यसया गङख महशानि सरवतीरथानि सनति व। -नारीक अगोभ सभी तीरथ वासकफरत ह, इसकएि नर-नारी

पवितर तीथ सवरप ह ।

शतौ मनषयनदधिसत यः करोति वरानन। न तसय मनतर-सिदधिः सयादविपरीत फल मत ॥

-- उतत र-तनतर जो साधक नारीलपा शकतिको मनषय समकता ह, उसकी

मनतरसिदधि नही होगी । वरन‌ विपरीत फललाभ करगा-।

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^~ ॥ /

१७२] , तातरिकगर { साधनशकतयाकल |

शकतयाः पादोदक यसत पिवदभकतिपषणगरभः + . उचछिषट वापिभञजीत तसय .विदधिरखणडिता ॥

--निगम-कलयदरम

` भो कररावारी भकतियकत चिततस नारीका पदोदक मौर भकता", वरव भोन करता ह, उपकी सिदिका कोई खणडन नदी कर‌ |

धकता ह । ,.

अतएव नारीको जगदमडाकी विकतष शकति परकाश समकषर

साक उसक परति भकति गौर शरदधा रखगा । चरमम नारीरी तिदाभौर

भारी पर परहार नदी करगा । सतरीमति म शरीभीजगनमावा सवय रहती ह यह बात समरण न रखङर भोगय यस.विशष कठकर सकाम .भाक

सतरीशरीर दशन घ धीधरीजगनमाताकी अवमानना होती ह मौर इस

, मनषय का अष जफतयाण आकर उपसथित होता ह.1.इषस सभी सतीः

पति साका जगदमबा की भति ह । सभी जगनमाता की जगतमालनी

मौर आननददायिनी शकति का विशष परकाश ह । इसस दरगासतसती

दवतान न कहा ह- |

। विदयाः समसतासतव दवि ! भदाः

सवरवः समसताः सकला जगसत ।

तवयय परितममबयतत‌

का त सततिः सतवयपराषरोकतिः ॥

। --माकणडय-पराण

- ह दवि ! तमही जञानरपिणी हो, जगतकी जितनी षठ-कनि।

विधाय ह--लिसत रोगो का अशष परकारस जञानोदय हआ हष

सीम टी परकाशित हो; तमदी जगतकी सभी सवीमतिक जो सप ह

उनम वतमान हो । तम अतरनीया हो, वाकयातीता हो--सतव कर

मडार अननसगण का उलटख कौन कब किया या कर परएना ?

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कलाचार कथन | - तातरिकगर { १७३

किनत हाय ! जान-बकषकर कितन रोग शरीजगनमाताका विशष परकार स आधाररपिणी सतरीमतिकरो हीन-बदधिस. कषित नतरस निरी- कषण कर दिन क भीतर शत-सहसर बार उनकी अवमानना करत ह । कितन वयकति दवी-बदधित सवी-शरीरको दखकर- यथायथ सममाजग.दकर हदयम आननद अनभव करन ओौर कतारथ होन क लिए उदयम करत ह ? पदयबदधि स सतरीशरीर को अवमानना कर भारत दिन-दिन अधःपतन कीओर जा रहादह।

पाठक ! समकष, तनतर रभणी-सशक रगम वयभिचार-सोत वदधि-करम की शिकषा नही दती ह । जो शासतर अपन तक सतरीमय भावनाकरनको

कहता ह, उसक दवारा पाशव भावका विसतार किस परकार होगा? भरवततिपण भानव सथल-रप-रसादिका उसकी भोगयवसत क भीतर ठीक- ठीक आनतरिक शवदधाका उदय कर दिया जाय तब वह कितना भोग

करगा । इस तीवर शरदधावलस सवतपकार म ही सयमादि भआधयातिमक भाव का अधिकारी होगा--सनदह नही ह। इसीस तनतर कलाचारक अनषठान -विषयम सतककर साघककफो कहत ह -

अरथादवा कामतो वापि सौखयादपि चयो नरः । किगयोनिरतो मनतरी रौरवम‌ नरकम‌ वरजत‌ ॥

--कमारीनतनव

जो चयकति कोई परयोजन सिदधिक निमितत, सखक निमितत भथवा कामक वल सथी ससरग म निरत होता द, उसका रोरव नरफम पतन

होता हि ॥ ।

अभी कोई भी कया कटगा, तनतर एसदशम वयथिचारकी दिकषा दता

द 2 यदि सम समन चिना अपन मतरबका सिदधिकरनकतदहो, तो तनतर शासका कया दोष ह? अब शकति सवय करक साधक उसको. उपद दगा, तब उसको कनयासवरपा समकञमा भीर पजाक समय भाता

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१७४ | तातरिकगर | साधनाकलप

समननगा । अनयानय उपचपरो क समबनधम भी इस परकारका रहसय निहित ह । रमणीको ठकर अनय नानापरकारकी साधनाको भौ विधि

ह । किनत व अपरकाशय ह । ठगस आलोचित नही हई । विशषतः काम-

कामना कलषित जीव उस न समजञकर कससकार क भयस नाक सिकोड कर वठग इसीलिए निरसत हआ ।*

कलाचारी साधकक महामनतरक साधनाक विषयम दिक‌-काल-नियम,

जप,पजा अथवा वलि का काल-नियम कछ भी नही ह, य यथचछाभावस समपनन कर 1 वसतर, भसन, दह, गरह, जल परभति शोधनकी आवशयक.

ता नही, परत मन जिसस निविकलप हो, उस विषयम साधक चषटा

करगा । साधक वयथ समय नषट नही करगा। परनत दवतापजा,

जपमनतर ओर सतव पाठादि दवारा समय यापन करगा। जप ओौर यजञ सभी कालम परशसत ह, यह जप-यजञ सभी दशो ओर सभी पीठोम

करतवय ह, इसम सनदह नही । मानसिक सनानादि, मानस शौच, मान-

सिक जप, मानसिक पजा, मानसिक तपण परभति दिवयभाव क लकषण ह । काचारी क पकष म दिवा, रातरि,सनधया अथवा महानिशा+* आदि कही भी कछ विशष नही, सभी समयदहीशभदट। सनान किए विना

, अथवा भोजन करलनपर भीसदा दवकी पजा करगा । महानिशा कालम अपवितर परदशम भी पजा करक मनतर जप किया जा सकता द।

मर दवारा परणीत “शञानीगर" मरनथ म सतरी-परषसबनध म

- आधयातमिक तततव “नाद-विनदथोग‌ शीषक निबनध. म विशद कर लिखा गयादह ओर परोमिकगर' गरनय म शछगार-साधना परभति गहय

तततवका विवरण परसतत किया गया ह।

करातम दो परहरक वाद दो महरत तक महानिशा, यथा-- |

अददधरातरात‌ पर यचच महततदयमव च। सा महारातरि रदिदषटा तद‌दणडमकचयनत व ॥

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कलाचार कथन | , तातरिकगर [ १७५

जो कलाचार इस निखिर जगतको शकतिरप म नही दख सकता ह, वह‌

नरकगामी होता ह । निजन परदशम, शमशान, विजनवनम, शनयागार म, नदीतीर पर, एकाकी निःशक हदयस सदा निहार करगा । कल- बार, क राषटमी, विशषतः चतदशी तिथिम क र-पजा अतीव परसत ह 1 कलवार, करतिधथि ओर कलनकषतरम पजा करनख शीघरः ही अभीषट वर लाभ कर सकता ह । अतएव-

. एव कलवारादिक जञातवा साठकः कम करयात‌ । | - -- यामल

साधक क कवारादिस परिचित होकर करमानषठान करगा । क रमाग सरवदा गोपन करगा । निजन सथान पर ही करकम का अनषठान करना होमा, लोगो क समकष करना विधय नही । यहा तक कि पशपकषीक समकष भी कलकाय का अनषठान करना शासकटरारा निषिदध ह । कारण, - -भकाश होन पर सिदधिकी हानि होती ह । कलाचार परकाशच करनस मनव-नारा, कलहिसा मौर मतय हो सकती ह । यवा-- ।

भरकाशानमनव नाशः सयात‌ परकाशात‌ फ दिसनस‌ । भरकाशानमतयकाभः सयानन. परकादय कदाचन ॥

। -नीलतनतर

अतएव साधकका कभी भी कलाचार परकाचच नही करना कततभय

ह । वरन‌ पजातयाग करगा, तथापि आघार वयकत नही करगा । यथा वर पजान करतशयान च वयकतिः कदाचन ।

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पञच-मकारस कालीसाधना

शकतिपजाक परकरणम मय, मास, मतसय, मदरा ओौर मथन-य

पचचतततव साघनासवरप परसिदध ह । पखततवो क .वयतिरक होन स यह

पजा पराणनाशकारी हो सकती ह; विशषतः उसन साधककी अभीषट

सिदधि होना तो दर रह पद-पद पर भयानक विधन घटत। द । शिलाम शसयवीज बोन स जिस परकार अदकर नही उतपनन होता, उसी परकार पचततव वजजित एजास कोई फल परापत नही होता । आदिदव महादवन

कहा द-- ककचार विना'दवि कषकतिमनशतरो न तिदधिदः.। तसमात‌ कलछाबाररतः साघयचछकतिसाधनम‌ ॥

-महानिरवाण-तनतर

द दवि ! कराचरिगयतिरक शकतिमनत सिदिदायक नही होता । ` फलाचारभ रत रहकर शकतिसाधना करनी चाहिय ।

पच-मकार की साधना का करम हस परकार ह- साधक परातःतयादि -नितयकमम सभाषनपववक गोपनीय श

कशासन जयवा कमबलासन विसतत कर अथवा उततर दिशा होकर- सकनध, मसतक, मरदणड परभति सर ढग स रखकर सथिररपभ अपन अपन अभयसत किसी भी. आसनम ( सिदधासनादिम ) बठगा । परथमत अपन मसतकम शकलशतदलरम गरदवका धयान करत हए य पराना भौर भरणाम करगा । वाद म "ह" मनतर उचचारण परवक इडा गौर पिगला की इवासवायको एकतर कर धीर-धीर वाय माकपित कर सकोच- परवक “'हस" मनव उचचारण कर कमभक करना होगा । यही कला चारी अतसय-साना ह इस मटसयसाधनास कल-कणडलीनीशवितसरपा कारीदवी, जयकर उदवगमनोनमखी होगी ।

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कारीसाघना | ताभिकगस [१७७

वादम कणडलीनीरकतिको इवासक सहार हदयसय, अनाहत-

पदमम लाकर अनतरयागकी परणारीस पजा, जप, ओर होपकारय

समपादन करगा । बाद चिनतन करगा कि सहसनार-मदापदम-करिकाक

` भीतर पारदतलय सवचछ बिनदरप शिवक सथानकी यही कखचारी

मदरासाघना ह । । ।

उकत दिवका भवन सख-दःख-परिरनय ओर सववकारीन फल-

पषपाककत सवरगीय तर-परिशोभित ह । उकत भवनाभयनतरम सदा-

शिवका मनोह < मनदिर ह । इस मनदिरक भीतर एक कलपपादप ह।

यह पादप पशछभतातमक ह; बरहम ओर तीन गण इसकी शाखा, चारो

वद इसक दत, रकत, पीत, ओर कषणवण पषय ह । उकत परकारक

कलपतसका धयान करक--इसक अधोभाग रतनवदिका उसक ऊपरक

भागम रतनाककत, सगध मसदारमषप-विनिभमित पयदध मौर _ उसक

ऊपरक भाग विमल-सफटिकधवल, सदीघ भजशाली, आननद-विसफा-

रित नतर, समरमख, नानारतनाककतदह, कणडलाककत-कण, ररनहार

ओौर लोहितपदमसकपरिशोभितवकषःसयल, पदमपलाशतरिलोचन, रमय-

मजी रारङकत चरण, शबदबरहममयदह-ईइस परकार साधक दवादिदव

शिवका धयान करगा । व शबदरपक सदश निरीह ह, उनका कोई ,

कायय नही ह । . बादम हतपदमस षोडशीतलय सथिरयौवना पीनोननत-

पयोधरशालिनी, सववि मङकारपरिशोभिता, पणणशशधरसनदर-

मखी, रकतवरणा, चनलनयना, नानाविध रलनालकता. तपरयकत-

पाद-पदम, किकिनीयकत-कटिदशष, रलतककणमडितभजयगकाकिनीः

कोटि-कनदप-सनद र-विगरह, मधर-मद-मनदहासययकत-वदना , इषटदवी

को सहसरारम साधक शिवजीक चयि लाएगा । बादर चिनतन करगा,

पराशकति काम-समलकासविहारिणी रपवती भगवतीदवीक मखार-

विदक गधस निदधि शिवको परबोधित करक उनक समीप म ब

कर शिवका मलपदय चमबन कर रहीरद। दस परकार . धयानकाल `

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न नि

१७८ ] ताचिकगख ` [ साघनाकलय

साक समाहित चिततस ओौर मौनी होकर चिनतन करगा । यही कला- घारीकी मास-साना ह ।

उशक बाद साघक चिनतन करगा कि दवौ रिवजीक सहित भाछि-

गिता होकर, समरी-पदष सदश सगमारकत हद । इस समय सधी वयकति अपन को शकति सहित अभिनन भावना कर अपनको आननदमय गौर

परम सलली-समनञगा । यही कलाचारीको मथन-साधना ह । ` इसक बाद जिहवागरदारा ताल-कहर रोध करत हए समी-परषक

` सदश शिवदाकतिक भगार-रसपरण विहारस जो सधाकषरण होता ह उसी सधाधाराक दवारा सरवाग पलावित हो रहा ह, इस परकार शयाननिषट

होकर साधक रहगा । यही कलाचारी की मच-साधना ह ।

इसी समय साधककी अवसथा नशा सदश हो जाती ह-शरीर सिरम चककर भान रगता ह । इसस निसतरगिणी अरथात‌ निरववात जलाशय सवशचनिरचला समाधि उतपनन होगी । नारीसहवासक समय

. शकरवहिगमन-समयपर शरीर ओौर भनम जिसपरकार अनिददशय माननदका - बनभव होता ह । भौर अवयकतभाव बना रहता ह, साधक समाधि-

` कालम उसर अपकषा कोटिकोटि गण मधिक आननद अनभव करता ह ।. शरीर गौर मनक जो अवयकत गौर भपवव भाव ह--वह वयकत

~ करनम असमय ह ।

बादर दसी परकार दिवयकलामत पान करा कर फिर कणडलिनी फो करसथानरम {. मलाधारपपरलय बरहमयोनिमणडलरम ) जाएगा \ बार-

` बार इसी परकार करना होया । यया-

` पीतवा पीतवा पनः पीतवा पतितो धरणीतल । उतथाय च पनः पीतवा पनजनम न विदयत ॥

-- कलारणव तनतर

--इस परकार वार-वार दरणडलिनीशकतिको कलामत पान करानस साधघकका फिर पनरजनम नही होता ह ।

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कालीसाघधना | तातरिकगर ` [१७१ .

पाठक ! इस मथक नशास बारनवार नद'मा पर गिरनानही ह।

भखाधारस कणडकिनीका बार-बार सहलारम गमन ओर कखामत पान,

यही साधना सरवशषठ ह; इसक अनषठान इस परकार कोई भी विषय

नही ह, जिसस सिदधि की उपरनधि नदी की जा सकती.ह । इसीस तनतरम कहा गया ह--

मकारपचक कटवा पनरजनम न विदत । । --पचच.मकारकी साधनास साधकका फिर जनम नही होता ह ।

उकतविध साधकक गगातीथम अथवा चणडाराकयरम शरीर-सयाग करन सर भी निदचवय बरहमपदकी पराति होगी । कारण-- ~

एवमभयसयमानसत अहनयहनि पारवति । जरामरणदःखादमचयत भवबनधनात‌ ॥

--ाकताननदतरयिणी उकत साधनारम अभयसत होनस साधक जरामरणादि दःख ओर भव-

अनधनस मकति काभ करता ह ।

इस परकरार परक‌ति-परषयोग अथवा शिव-शकतिका मिलन ही तनवोकत पशच-मकारकी काली-साधना ह । किनत यह‌ अतिसकषम परणारी

ह; तनतर सथरपशच-मकार की परणाली ह । तब साधनाक सकषमतततवो म

उपनीत न हो सकन पर परकत-फकको परास नही किया जा सकता ह +

सीस तानतरिक साधक कहत ह-- -

भङजित तादर मनोविकार, मसथि चमम करछि सारः याग यजञ वरत नियम करछछि कत पराणपण ॥ गियाछि रमशान, भसमरभषित करछि गध, वसछि. चितार भग, सार करछि महापातर, तातभो पिता नाहि भक, मा-टि-मोर गा-टि ना तोक जड निरषाय पडछिर भाई, कल पाज बल कमन ॥!

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१८० ] तातरिकगर [ साघधनाकलप

कल पानका उपायकयाह?

शशरीनाय कणन सई जान भिलन, अनतरयाग जग य जनः परमतततव जञानर षयान रोध कर पवन;-- इतयादि ।

तव दरल पवन रोध करत हए अनतरयागिकी सकमसाना ही परकत साधनाः ह। इसस साधक की सरववाभीषट सिदधि होती दह, तब भोगासकत जीवको सथलक भीतरस ही जाना होता ह। इसीस तनतरम `

सथरपच-मकार भो दिलाई दता ह । सथर पच-मकारस काङीसाघना . इस परकार ह-

साधक यथावि परातःकतय एव परात॥, मधयाहन गौर सायकाल की वदिक भौर तातरिकी सधया समाप कर भकतियकतचिततस अवसथान करगा । उसक वाद यथा समय दवीक चरण का रमरण करत-करत पजामणडपम परवश करक अरयजलस गह विदध करगा । वादभ साधक ` दिवय- दषिदरारा भौर जलगरकषषस गहगत सभी विघनो का विनाश करगा । अगर, कपर गौर धपादि दवारा गह गनधमय करगा । बादम अपन वठनक लिए बाहरम चतरनन भौर भीतरस तरिकोणाकार मणडल लिखकर अधिषठातरी दवता कामरपा की साधक पजा करगा । उसक बाद मणडल क उपर वाल भागम गासन बिछाकर--

“वटी भाधारशतय कमरासनाय नमः'' इस मनरस आसन पर एक पषप परदान कर वीरासनम साधक वठगा 1

उसक वाद परथम “ॐ ही अमत अमतोदधव अमतवषिणि अमतमाकषयाकषय सिदधि दहि कालिका म वकामानय सवाहा” दष मतरत विजया (भाङग)को शोधन करक उसी सिदधि (भाङख) पातरक ऊपर सात वार पलमतरका जप करक आवाहनी, सथापनी, सनि- . रोधिनी भौर योनिमदराका साधक परदरशन कराएगा । उसक बाद तततव-

(मदरा की सहायतास सहरदल कमलम विजयादवारा गरक उददशय तीन बार तरपण करगा । वादम हदयम मलमन जप करक ^ वद वद

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कारीसाघना | ताचिकगर ` . [ १८१

वागवादिनी मम जिहवागर सथिरीभव समवसतववशकरि सवाहा” इस मनवक पाठपनवक कणडजिनीक मखम इस विजयाक दवारा आहति भदान करगा ।

उसक बाद साधक बाए कानक ऊपर "ॐ शरीगरव नमः” दाहिन कानक ऊपर “ॐ गणशचाय नमः भौर ललाट पर ५“ओ सनातनी काङिकाय नमः" कहकर परणाम करक अपन दाहिन भागम पजाका दरवय मौर वाम भागम सवासित जल भौर कलदरवयादि रखगा । बादम-- यथाविधि अघय सथापित करक जरस पजादरनयादि परोकषण मौर अभिसिचन करगा । "रफ" इस वदभिबीजदवारा वदधि को ठढकगा । उसक वाद करशदधिक लयि पषप-चनदन गरहणपरववक "करीः" मनतर उचचारण करत हए हाथस वषण भौर परकषिपत कर “^फट‌"”

मनतरस छोटिका ( तदी ) दवारा दिगबनधन करगा । उसक वाद भरतदधि* दारा दवताका आशरय कर मातरकानयाम करगा ।

परथमतः कर जोड कर “असय मातकरामनतसय बरहयकषिरगायतरी-

चछनदो मातकासरसवतीदवता हलो बीजानि सवराः शकतयो. मातरका- नयास विनियोगः” इस मनतर पाठपवक मसतक पर हाथ रखकर

शरहमण ऋषय नमः, मखम ॐ गायतरीछनदस नमः, हदयपर-ॐ मातका

सरसवतय दवताय नमः, गहय -चय जनभयो बीजभयो नमः पाद पर-- ५ 9 ७ „9 „०

= > 9 9 & 9 ०७

भमरजौ कनिषठाभया वौषट‌-म यरलवशषसहकष अः करतल- पषठाभया असतराय फट‌-- इस परकार साधक करनयास करगा । ।

# मर दवारा रचित ““योगीगर ओर ` ञानीगर"” दोनो परयोम विषाद रपस भतशदधि की मनत-परणाली चलिसली गईह।. इसलिए इस

सथान पर फिरस नही किलली गई ।

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१८२] ` ` तातनिकगख [ साधनाकलप

वादम-मकलगधडञआ दयाय नमः--द च षज कष

` म' ई शिरस सवाहा--उट ट ड ढ ण ठ रिखाय वषट-रतषव

धन कवचाय ह--गो पफवभम गो नतरतरयाय वौषद‌--मयर 9 , 9 „9 9

धगनयास करगा । उसक वाद मातका सरसवतीका-

` पवावललिपिभिषविभकतमखदोः पनमघयवकषःसथला । ` ~ भासवनमौलिनिवदधचनदरशकरामापीनतगसतनीम‌ ॥४ मदरामगण सषठादयकलस विदयाशच हसतामबज- । विशराणा विशदयरभा तरिनयना वागदवतामाशचय १

इतका धयान पाठ करक साधक षटचकरम मातकानयास करगा ९ भर मधयम ह कष, कणठसथित षोडशदलम--भ आ दईदञऊऋ छ `

जशष ट ठ; नाभिसथित दशदलम -डटणतथदधनपकफ, लिगि , भरम-षददरभ- ब भ म य र र गौर गदयदशरभ-चतदरदलम-- व श

व स दस रपस साधक नयास करगा । . वादरम रक, मख, चकष, करण नासिका गणडदरय, मोषठ, दनत

एततमादख, मखविवर, बाहसधि भौर अगरसथान, पदसधि मौर अगरसयान, पाषवदश, पषठः नाभि, जठर, हदयस आरमभ करक दकषिण बाह गौर

` दकषिण पद गौर" हदयस आरमभकर वाम बाह भौर वाम पद--इस शषरम जठर भौर मखम यथाकरमस साधक बहिरनयासि करगा ।

` उसक बाद "ही" बीजदवारा, १६।६४।३२ सखयाम अनखोम- - विकोमकरमसर तीतरवार साधक पराणायाम करगा ।* उसक बाद अपन.

, अप. कलपोकत करमस ऋषयादिनयास करगा । दसक बाद हदयपदमम `

ˆ ` . शगराणायामकी परणाली मर दवारा रचित *“योगीगर"" परथम जिदी अर द। - -

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काठीसाघना | .. ` तातरिकगस [१८३

आधारशकति, कमभ, शष, पथवी, सधामबधि, मणिदरीप, पारिजात -

दस, चिनतामणि-गह, मणिमाणिकयवदी जौर पदमासनका साधक ` नयास

करगा 1 उसक बाद दकषिणसकनधम, वामसकनधम, दकषिणकटि ओर

वामकटिभम धरम; जञान, वरागय मौर रशवययका करमशः नयास करगा +

बाद आननदकनद, सय, सोम, हताशन मौर आदवरणभ अनसवार

योग करक सव, रजः भौर तमः मौर कशरकणिका ओौर पदसम-

दायरम मगा, विजया, भदरा, जयनती, अपराजिता, ननदिनी, नररसिही

` मौर वषणवी--इन आठ पीठनायिकाओ का साधक नयास करगा ।

इसक बाद अषटदलम आग असिताङग, रर, चणडः करोध, उनमतत, भयकर,

कपाली, भीषण मौर सहार इन अषट भरवोका नयास करगा +

,ॐ

उसक बाद ओर एक बार परवोकत विधानस पराणायाम करना होगा । `

उसक बादम गनध पषप गरहण कर कचछपमदराम धारणपरवक वही

हाय हदयम धारण करक-- `

ॐ मधागी शिखरा तरिनयना रकतामबरा विभरती । `

पाणिभयामभय वरञच विकसदरकतारविनदसथिताम‌ ॥

नतयनत परतो निपीय मधर माधवीकमय महा-

काल वीकषय परकाशिताननवरामादया भज काकिकाम‌ ॥''

“ इस मनवानयायी धयान करगा; भौर. धयानक पषपाको अपन

मसतक परदान करत हए भकतिभावस साधक मानसोपचार कौ धजा

करगा ।

मानसपजा ओर अनतरयोगकी परणाली इतिपमव बणित ह; इसलिए.

स सयान पर फिर पनरललिखित नही हई । ।

यथाविधि मानसपजा समास कर साधक बाहयपजा करगा ।

परथमतः विदषाय सथापित करगा । अयपातर तीन. भाग मय मरौर

एक भाग जदरारा पण करना होता ह । विषाषय सयापित होनस

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(द ~~

१८४] ताधरिकगख [ साधनाकलप

उसका कफिचिनमातर जल परोकषणीय पारम परकषिपत करक उसी जलस अपन को ओौर पजादरवयो को परोितत करगा । गौर जबतक पजा ,

समापत न हो जाय, तव तक विशषाघयसथानानतरित नदी करगा ।

उसक बाद मनतर किख कर कलस सथापित करगा । साधक अपन

वाम भाग एक षटकोणमणडल लिख कर उसम एक नय दगा, उसक

बाहर गोलाकार मणडल लिख कर उसक बाहर भागम एक चतषकोण

, मणडल अकित करगा । उसको सिनदरर, रज या रकतचनदनदवारा ङखिना

होगा । बादम “अननताय.नमः' इस मनतरस परकषाचति आधार उकत

मणडलक ऊपर सथापित कर “फट‌ इस मनवस परकषालिति करस

आधारक ऊपर सथापित करगा । करस सवण, रजत, तासन, कासय,

अथवा मततिका निमित होगी । बादम साघक “कष'' स आरमभ करक

अकार परयनत वरणम विनद सयोग करक मरमन पाठ करत-करत

कसको पण करगा । - बादम दवीभावस सथिरमना होकर माघार- कणठ ओर उसम धिषठित मथक ऊपर वदधिमणडल, अकमणडल गौर सोममणडल की पजा फरगा । इसक बाद रकतचनदन, सिनदरर, रकत-

माला गौर अनरपनस कलसफो विभषित करक ““फट‌”” मनतरस करसम

ताढना, "ही" मनरस अवगटित ओर दिवयदषटि दारा करस दरशन, “नमः” मनरत जक दाराः सभी अभयकषित ओर मल मनतरस तीनबार करस चनदन लपन करगा । वाद कसको परणाम कर उसम रकत-

पषप परदान करत हए मद शोधन करगा । परथमतः-- एकमव पर बरहम सथलसकषममय धव । कचोदधवा बरहमहतया तन त नाशयामयहम‌ ॥

भययमणठलमधयसथ , वरणाखयसमभव 1 „ अमावीजमयि. दवि चकरशापादधि चयस ॥

वदाना परणवो -बीज बरहमाननदमय यदि ।

तन सरतयन त दवि बरहमहतया वयपोहत ॥

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काीसाधना ] ताचरिकगड [ १८५

इस मनतरका पाठ करक वा वीव व वौदः बरहयशाप-

विमोचिताय सधादवय नमः” कह कर साघक दसबार मनव जपगा । बादम “ॐ शा शीश द शौ शः शकरशापविमोचिवाय सधादवय नमः" इस मनतरका दसवार जप करगा । वावम ही

धरीकरा कर कर करौ करः कषणशाप विमोचयामत खावय सवाहा इस मनधरका दशबार जप करगा । इस परकार शापमोचन कर समा-

. हित हदयस आननदभरव ओर भरवीकी पजा करगा । बादम करसम उकत दवदवीदरयक सामजञजसय गौर एकयरपम घयान . करक अमत

ससकति हभा ह, एसी भावना करक उसम बारह‌.बार मलमनतरका जप

करगा । बादम दववदधिस मलमनतरस मक ऊपर तीन वार पषपाञजलि

रदान कर वादनपवक धप-दीप परदान करणा । बादभ मास लाकर सममख-शनिकोणमणडलक ऊपर सथापित कर

“"फट‌* इस मनतरस अभयकषित करत हए पचात “ध” वायबीजम मभि- मनतरित करगा ! वादभ कवच अवगणठित कर “फट‌” इस मनतरस रकषा करगा, पशचात‌ “व” इस मनतरस धनमदरा दवारा अमतीकरण करक--

ॐॐ-विषणोनवकषसि या दवी शकरसय हदय या च । मास म पवितरीकर तदविषणोः परम पदम‌ ॥

इस मनतरका पाठ करगा । बादम इस परकार मतसय गौर मदा चछाकर एव उस सशोधन करक- |

8 यमबक यजामह सगरछचि पषटिवदधनम‌ । उरववासकमिव बनधनामतयोमकषीय मामतात‌ ॥

इस मनवका पाठ करक मतसय गौर-- |

भनतदविषणोः परम पद सदा परयनति सरयः दिवीव चकषराततस‌ । कभवदिपरासो विपणयवो जाखवासः समिदधत विषणोरयत‌ परम पदम‌ ॥

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१८६ | तातरिकगर [ साधनाकलप

इस मनरका पाठकर भदराशोधन करगा ! अथवा कवल मल-मनवरस पच-तततवका शोधन किया जाता ह, उसस कोई परःयवाय नही हीता ह) किनत पशचतततवक शोधन न करनत सिदधिहानि होती ह ओौर दवी करदधाः हो जाती ह । यथा-- “.सशोधनमनाचरयति 1" ( शरीकरम )

अननतर गणशालिनी सवकीया रमणीको ( कारण, परकीया रमणीः

कलिकाल गराहय नही ह, उसस परदारका दोष ठोता ह--यही तनका

शासन ह ) लाकर “ए कली सौः तरिपराय नमः इमा शकति पवितरी कर सवाहा" * इस मनतरक पाठ-परववक सामानयघय जल स अभिषक करगा । यदि उसकी दीकषा न हई हो, तव उसक कानम माया-वीज सना दगा 1 पजासथानम कोई परकीया शकति उपसथित रहनस उसको पजा करना कततवय ह ।

इसक बाद पवलिखित मनतरम एक तरिकोण, उसक बाहर एक

षट‌कोणमणडल भौर उसक बाहर चतषकोणमणडल लिखगा। बादम षटकोणमणडलका छ कोणो म हवा हीह ह हौ हः इन छ मनतो भ उनकी अधिषठातरी दवीकौ पजा कर तरिकोणमणडलक ऊपरवाक भाग रसषाकिति पातर. रखकर धमरा, भचचि, जवालिनी, सकषमा, जवालिनी विसफरिगिनी, सशरी, सखपा, कपिला मौर हवयकवयवहा इस वलजि-

दशकलाक परतयक शबदरम चतरथी विभकति योग कर अनतम ““नमः”” शबद

रयोग-पववक उनकी पजा करगा । बादम “म वलजिमणडलाय दश- कलातमन नमः” इस मनतरस वधिमणडलकी पजा करगा । उसक बाद

अरधयपातर लाकर “कट‌” मतरस विदोधित कर आधार पर सथापितः करत हए वरणवीजकी पषव ही योजना कर सयकी तापिनी, धमरा मरीचिः जवालिनी, सषमना, सकषमजाकलिनि, भोगदा, विशवा, बोधिनी सननिरोधिनी, धरणी मौर कषमा इन बारह कलाभोकी अचचना साधक

करगा । उसक बाद “उ सययमणडलाय दवादकचकलातमन. नमः” ` इ मनवत पाठ कर अधयपाशरस सरयमणडलकी पजा करगा । बादम

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कालीसाना ] तानिकगख { १८७

साधक विलोम मारकावरण गौर उसक अनतम मलमशर उचवारण-

पवक करससथ सरादवारा विशषाधय जलस तीन भाग परण करगा ¢`

याद षोडशी-वीजाशचयस अनम चतरयनत नाम उचचारण करक मनतरक

अगरता, मानदा, पजा, तषटि, पषटि, रति, धति, शशिनी, चनदिका, काति,

जयोतसना, शी, परीति, अलका, परणा गौर परणामता इन षोडश कलागोकीः

पजा करगा-। वादम “ॐ सोममणडलाय षोडशकलातमन नमः

` इस मनतरस अरधयपारसय जरस सोममणडलको पजाः करगा । बादम दरवी, मकषत, रकतपषप-इनको गरहण कर “धी” इस मनतरस निकषपः

करत हए तीरथका आवाहन करगा 1 उसक बाद कलरस-बबराहारा `

अवगणठन करक असतर-मदरादवारा `रकषण करगा, पदात‌ धन-मदरादवारा अमरतीकरणपरववक उस मतसय-मदरादवारा आचछादित करगा । बाद दख ..

बार मकमनतर जप करक -

भखणडकरसायनदकर परसधातमति । सवचछनदसपफरणामचर निधहि कलरपिणि 11

. अनगसथामताकार शदधजञान कलवर ।

अभततव निधदयसमिन‌ वसतनि किलिननरपिणि + तदरषणकरसयञच कतारधय ततसवदपिणि। ` भतवा ककामताकारमपि विसफर कस ॥

बराहयाणड रससमभतमरोष-रससमभवम‌ ।

आपरित महापातर षीगषरसमावह ॥ अहनतापतरभरितमिदनतापरभामतम‌ ।

परहनतामय वहञौ होमसवीकारलकषणस‌ ॥ इस पाच भनतरो दवारा सरा अभिमनवित करगा । वावम उसम हर‌-

पारवतीजीका समानराग धयान करक पजानतभ धप-दीप परदशन करगा ५

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१८८ तातरिकगर [ साधनाकलप

उसक बाद साधक घट ओर शरीपातरक मधयसथलम गरभोग बौर -शकतिपातर सथापित करगा । योभिनी-पातर, वीरपातर, वकिपाचर, आचमन- यातर, पायपातर भौर शरीपातर, इन छ पातरो म सामानयारवयसथापनाकी मरणालीस सथापित करगा । वादम सभी पातरोको तीन अश मदयदरारा पण करक इन सभी पातरोम माषपरमाण शदधिखणड निकषप करगा 1 उसक बाद बाए हाथक गढ गौर अनामिकाकी सहायतास पातरसथित -मरा ओौर मासखणड गरहणानतम दाहिन हाथस तततवमदराक दवारा सरववतर

तपण करगा । परथमतः शरीपाचरस परमविनद ककर आननदभरव भौर

भरवीक लिए तरपण करगा। बादम गरपातरसथ सरा गरहणम गर

एतनीका तरपण करगा । वादम शकतिपातरस मच .गरहण कर अङग मौर

आवरण दवताभोी अरजवना करगा । उसक वाद योनिधातरसथित अमत-

डरा बागधघारिणी बदधपरिकरा कालिकरादवीका तपण कर बटकोको

उलि परदान करगा ।

परथमतः साधक अपन वामभाग सामानय मणड रचनपरववक

उसकी पजा करक ममा सादि मित साभिषानन सथापित करगा ।

भग वाङमया, कमला गौर बटककी पजा करक मणडलकी परवदिशाभ रख दगा । इसक वाद “या योगिनीभयः सवाहा" इस मनरस मडलकी दकषिण दिहञाम योगिनीगणक लिए भौर परिचिमम कषतरपालकगणक लिए

अलि परदान करगा । उसक बाद मणडलक उततरम गणशको बि परदान

-कर मधयसयलम “ह शरी सतभतभयः ह फट‌ सवाहा” इस भनतरस -सरवभतोक लिए बलि परदान करगा ओर परवोकत परणालीस एक निवा- -शओग दगा । यही पचखमकारम काटी साधनाका चकरानषठान ह ।

उसक बाद चनदन, गर भौर कसतरीबासित मनोहर पषप करमम-

दादरारा हाथम धारण कर उसको अपन हदय-कमरम सथापित कर "“समघागी""""" दवीका पववोकत धयान फिर स पाठ करगा । वाद -सहसार नामक महापगमम सषमनारप बरहयवतम दवारा हदयसवित इषट-

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कालीसाधना ] तातरिकगर ` [ १८९.

दवताको लकर बरहत‌ निःशवासवतमम उनको आननदित कर दीपक रजजवकित दीपानतर सदश करसथित पषपम दवीको सथापित करत हए यनतरम अथवा दवीपरतिमाक मसतक पर परदान करगा बादम

कताञज होकर पाठ कर ।

ॐ दवशि भकतिसलभ परिवारपमनवित । यावततवा पजयिषयामि तावाततव ससथिरा भव ॥

उसक बाद मावहनी मदरादरारा चकर कालिकदवी परिवारादिभिः सह इहागचछ इहागचछ इह तिषठ इह तिषठ इह सननिघहि इह सननिरधयसव मम पजा शहाण '” इस मनवरका पाठ करक दवीका आवाहन करगा । बाद म “सथा सथि सथिरा भव यावत‌ पजा

करोमयहम‌” कहकर परारथना कर दवता की पराणपरतिषठा करगा । 2 “आ ह करो शी सवाहा मादयाकालीदवतायाः शराणा इह

पराणाः, ॐ मा ही करो शरी सवाहा आदयाकारी दवतायाः दवतायाः जीव दह सथितः, ॐ आटी करो शरी सवाहा, आदाकारी दवतायाः सरवनदरियाणि, छ आ हीकरो शरी सवाहा आदयाकाली वाङमनरचकषशचोचरघराणपराणा इहागतय सख चिर तिषठनत सवाहाः" इस पराणपरतिषठाका मनतर परतिमा होनपर यथायथ सथानम नही तो यनतमधयम तीन बार पाठ करक कलिहान-मदरादवारा पराण-परतिषठा समापन करक कताञजलिगपखम ““भ काकि सवागतनत ससवागत- मिदनतव' इस भनतरका साधक पाठ करगा । उसक बाद दवताकी शदधिक किए मरमनवोचारण धरववक विशषारघय जलस तीन बार परोकषण

करगा । बादभ षडङगनयास दवारा दवता क अगो म सकरीकरण‌ कर आसन, पाच, अ चय मधपक, सनान, वसन; भषण, गनध, पषप, धप, दीपः नवदय, पनराचमनीय, तामबर, आचमन, नमसकार इस षोड शोपचारम

अकतिभावस यथाविधि अचना करगा । बादभ पञचतततर निवदन

करना होगा ।

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१९० ] ताचिकगख [ साघनाकलप.

परथमतः परणपातर हायदारा धारण करक मलमत उचचा रणपरवक

दवी कालिकाको निवदन करत हए कताजलि होकर-

"ॐ परम वारणीकलप कोरिकलपानतकारिणि ।

गहाण शदधिसहित दहिम मोकषमवययम‌ ॥

, इस भतरस परारथना करगा। बाद म सामानय विधानानसार

-सममखभ मडल ङिलकर उसम नवयपण पातर ससथापित करगा । बादभ

उसका परोकषण, अवगणठन, रकषण ओर अमतीकरण कर मरमनबरदारा

„ सातवार अभिमनवितत करत हए अघय जलस दवीको निवदन करगा! । ` भरथम मलमनतरोचारण कर ““सरवोपकरणानवित सिदधाननम‌ इषट-

दवताय नमः” कहकर ““शिव इद हविज यसवः' इस मनतरस पाठ फरगा । उसक वाद पराणादि मदरादरारा शराणाय सवाहा, अपानाय सवाहा; ` समानाय सवाहा, उदानाय सवाहा भौर वयानाय सवाहा' इस मशरका पाठ

कर दवी फो हवि परदान करगा । वादम बि हाथस पर फललपकज- ,

. सदश नवदमदराका परदशन कराकर मलमनतरस मचपरण कलस पाना निवदन करगा ।

` वाद शरीपातरसय अमतदवारा तीनबार तपण करगा । भअवकषषभ साधक मखमनरस दवी क मसतक, हदय, चरण, गौर सरवाङगम पच . ४

पषपाञजलि परदान करगा । उसक बाद $ताजलिपट म दवी क निकट “तबाव रणदवान‌ पख-

यामि नभः” यह‌ कहकर परायना करगा । उसक वाद अगनि, नऋतय, चाय, ईशान-सममख भौर पचात‌ भागम यथाकरम षडङघ की पना करगा । गडः परमग, परापरगर गौर परमषठीगर इस गरपकतिक मौर कलगरकी साधक अचना करगा । वादम अमतदरारा उनका तपण करगा ।

१, *

भगरक गर उनक गर गषपकति. नही ह । मनतरदाता-गर, मन- | ` पररमगर, पराशकति-परापरगर भौर परमशिव -परमषठीगर दस परकार तसतरासतर न गरपकतिका निरदश किया ह।

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"णि 1 तातरिकगख [ १९१

वाद अषटदल पदमक दलमधयम अषटनायिका गौर दलागरम भषट- आरवकी पजा करनी होगी । उसक बाद आदिम “ॐ भौर अनतम नमः" शबद जोडकर इनदरादि दशदिकपारकी पजाकर बाद उनक

असतरौ की पजा करगा । अनतम सरवोपरि दवीकी पजा करक समाहित ` चिततस बजिदान करगा । ।

परयमतः साधक दवोक जाग सलकषण पश ससथापित करक अघय जलस पभरोकषित कर धनमदरास अमतीकरण करत हए छागको-- ॐ छगपकषव नमः" ” यह‌ कहकर, इस मवदवारा कमस--गनछ, पषप, धष, दीप, नवदय ओर जल दवारा परजा करगा । अननतर पशचक कानम “2 अशपाशाय विरह विडवकमण धमहि तननो जीवः परचोदयात‌ इस पापविमोचनी गायकरीको सना दगा । `

बादम खडग ककर उसम कली-बीजस पजा करक उसक अगर गम वागिशवरी .जौर बदहया, मधयम लकषमी-नारायणकी मौर मल उमामदवरकी पजा करगा । मनत म ॐ बरहयविषण शिवशकति यकताय खडगाय नमः-इस मतरस खडगकी पना करगा । बादरम महावाकय उचचारणपरवक पश उतसरग करक कताञजकपटभ यथोकत . विधानानसार शभयमसत समपितम‌" इस मतरका पाठ करत हए पञयबलि शरदान करक दवीभकतिषरायण होकर तीवर परहारस ओर एक आधातस पशको छिनन करगा । सवय अथवा सहदवगक हसतस पशबलि होनका

करतवय ह, शतरहसतस सहार होना उचित नही ह । बादम कवोषण" `

रधिरबकि ॐ बडकभयो नमः इस मतरस निवदन करक सपरदीप शीष- अङि दवीको निवदन करदगा । कवल ककाचारी साधक कलकरमक अनषठानक किए इस विधानस बलि दगा। इसक बाद होमकाय आरमभ करगा । ^

परथमतः साधक पनी दाहिनौ दिशाम बालकादवारा चतहसत परि- भित चतषकोण मणडल रचना कर मलमतरस निरीकषण कर "फट‌" इस .

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१९२ | तातरिकम‌₹ [ साधनाकलतप

मतरस ताडित कर उकत मतरस परोकषण करगा। वादम सयणडिलम परदश

परिमित तीन परागगर गौर तीन उदगर रवा रचित कर-परागगर तीनो

रखाओोक ऊपर यथाकरमस विषण, शिव ओर इनदर मौर उदगर तीन

रखाभो क ऊपर यथाकरमस बरहमा, यम ओर चनदरकी पजा करगा +

उसक बाद सयणडिलतरिकोण मडल की रचना कर उसम “"हसौः' शबद

कविगा, वादम तरिकोण क बाहरी भाग म षटकोण भौर उसक बाहरी भागम इतत,रचना कर वहिःपरदशम अषटदल षपद‌म लिखगा 1 वाद

भलमतर का पाठ कर परणवोचचारण-परवक पषपाजलि परदान करत हए होमदरवय मलमतर दवारा परोकषित कर. अषटदल पदमक बीज-कोषम मायावीज क उचचारणस आधारशकतिकी पजा करगा । बादम यनवः क अगिकोणस आरमभ कर यथाकरम चतषकोण धम, जञान, वरागय |

मौर एदवयकी पजा कर मधयभाग अननत ओर पदमकी पजा करगा । बाद म यथाविधि कलासदहित सय ओर सोममणडलकी धजा कर परागादि कशरक सधय सवता, अरणा, कषणा, धमरा, तीवरा, सफरिगिनी, ` रचिरा भौर जवालिनीकी यथाकरमस पजा करनी होगी ।

उसक बाद साधक ऋतसनाता नीलकमलरोचना वागीइवरीको वागी- शवरीक सहित वदभिपीठम धयान करगा । मायावीजस उनकी पजा करक बादम यथा-विधि अगनिवीकषण करत हए फट‌ मनव स आवाहन करगा । उसक बाद.“ॐ वह योगपीठाय नमः” इस मनवस पाठ कर अगनि उदधत कर मलमतर मौर कचबीज (ह) का पाठ करगा । इसक बादः 'कवपदभयः सवाहा" इस मतर क पाठपरवक करवयादश तयाग करगा, बादरम बीजमतरस अगनिवीकषण कर कचबीजस वदधि वषठन करगा ।. इसक बाद धनमदरा दवारा ममतीकरणकर हसतदवारा अगनि उदधत करत

हए परदकषिण करमस उसको सथणडिलोपरि भरामित करगा । बादम जान दयार तीन बार भमि सयश कर शिव वीजका चितन करत हए अपनः मखस य नि-यतरोपरि उसको सथापित करना होगा । पदचात मायाबीजः

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कालीसाधना ] तातरिकगर ` [१९३ उचचारण कर चतरथी विभकतिक एकवचनानत वलिमतिशबदनत म नमः योग करत हए उसका भौर ॐ र वदधिचतनयाय.नमः कहकर वदिचतनय की पजा करगा ।

उसक बाद मन ही मन नमो मनतर स वहजिमति ओर बरहमचतनय की कलपना करक ` "ॐ चित‌ विगर हन हन दद‌ दह‌ पच पच सरवम‌ जञापय जञापय सवाहा" इस मस वदधि परजजवलति करगा बादम कतालजकलि पटम-

ॐ अनन शरजजवलित वनद जातवद .हताशनम‌ः । सवरणवरणममल समिदध सवतौमखम‌ ॥"

इस मनवको वोलकर जगनिकी बनदना करगा । बारदभ वहनि सथापित कर कशदवारा सथणडिल आचछादित करगा । बादभ दषटदवताका नाम उचचारित कर वदिका नाम रत हए “ॐ वशवानरजातवद इहा- वह‌ लोहिताकष सववकरमाणि साधय सवाहा" इस मनवस अगनिकी अभयचना ओर हिरणयादि सजिहवाकी धजा करगा । बादम चतयनत एक वचनानत सहसराजचि शबदक अनतम “ॐ हदयाय नमः” कहकर ` मललिक हदयस षडग मततिकी पजा करनी होगी ।

वादम बराहमी परभति अषटशकतियोकी पजा करगा । बादम पदमादि - अषटनिधियोकी अरचना कर इनदरादि दशषदिकपालकी पजा करगा । इसक

जाद वचनादि भसतरसमहकी पजा कर परादश.परमाण दशपतरदय गरहण करत हए तम सथापन कर । धरतक वामाशम इडा दकषिणम पिगला

ओौर मधयम सषमनाकी चिनता कर समाहित चिततस दकषिण भागस आजय गरहण करक अगनिक दकषिण नतरम “ॐ अगनय सवाहा” कहकर .. आहति परदान करगा । इसक बाद वामभागस धरत गरहण कर "“3ॐ सोमाय सवाहा" कहकर अगनिका वामनतरम होम कर मधयभाणस धत गरहण कर अगनिका रलाटनतरम “ॐ अगनीषोमाभया सवाहा” मनवत होम कर फिर दकषिणभागस धत गरहण परवक “2ॐ> अगनय सविषटि- कत सवाहा“ कहकर मखम आहति परदान करगा । उसक बाद. ॐ .

१३ ५

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-> 4 * "लज --~----~------ -~------------------------------------------~~ ~

१९४ | 9 तातरिकगड [ साधनाकलप

, चदवानर जातवद दहावहावह लोहिताकष सवकरमाणि साधय

सवाहा" इस मनरस तीवबार उचचारण कर गाहति परदान करभा ॥

जाद अगनिस इषटदवताका आवाहन कर पीठादिसहित उसकी पजा

करगा मौर मलमनवम सवाहा पब योग कर पचीस बार आहति दगा ।

इसक वाद अगनि, इषटदषी ओर अयनी आतमा - इन तीनौका चितन

करक आहति परदान करगा । बादम "ॐ अगदवताभयः सवाहा”

कहकर अङखदवताका होम करगा ।

` इषक अननतर अपन उद दयस तिक, आजय ओर मधभिशवित पषप

अथवा वितवदल या यथाविहित वसतदरारा यथाशकति बाहति परदान

करगा । बषटससयास नन आहति दनका विधान नही ह । उसक बाद सवाहानतमलममवरत फलपगरसमनवित रतदवारा परणाहति परदान

करगा । वादम सहार-मदरादारा अगनिस इषटदवीकी आवाहनपवक

इदय कमलम रकष। करगा । वाद “शषमसव" इस मनवस अगनिको

विसजन कर दकषिणानत अर भचछिदरावधारण करगा भौर होमावशष-

दवारा कलाटम तिरक धारण कर जप आरमभ करगा ।

परयमतः मसतक ग, हदयम इषटदवता मौर जिहवाम तजोरपिणी

। विथाका धयान कर इन तीन पदारथ तजहारा एकीभत आततमादवारा

सपटित कर मलमनतर जप करत हए मातकावण सपटित कर सपतवार

समरण करगा । साधक अपन मसतक मायाबौजका दसवार जप करगा;

. बाद दसवार परणव `जप कर हतपपमम मायावीजका सतार जप

करगा । परिदोषभ तीन बार पराणायाम कर जपमाला गरहण -पवक--

“ॐ मल म।र महाम सरवशकतिसवरपिणि 1 चतव गसवयि नयसतसतसमानम सिदधिदा भव "+"

इ मनरका पाठ करणा । वादम पजा क शरीपातरसथित असलत-

दवारा मलमनबतत मालाका तीन बार^तपण करगा । बादम यथाविधि

सथिर मनस मषटोततर सहञच मथवा एक सौ भाठ बार जप करगा । बाद

` ओओ फिर पराणायाम कर शधीपातरसथित जल बौर पषपादि हारा--

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कारीसाघना ] . तातिकगख [ १९५ "ॐ गहयातिगहयगोपतरी तव गहाणासमतङकत जपम‌ । सिदधिभवत म दवि. तवतपरसादानमहशवरि +”

इस मनपरस जप समापन कर दवीको वामकरस जपफल परदान

करगा । उसक नाद भरतलम दणडवत‌ निपतित होकर परणाम करगा मौर जाद म कताञजलि पटत सतव मौर कवच पाठ करगा । इसक बाद भरदकषिण कर विलोम मनवस विशषाचय परदान-पकक “इतः पव पराण-

बदधि-दहधरमाधिकारत! जागरत‌-सवपन-सषपतिष मनसा वाचा कमणा हसताभया पदभयामदरण दिना यत‌ समतम‌ यदकत यत‌कत तत‌भवम‌ बरहयापणमसत" इस मनवस पाठकर आतमसमरपण करगा ।. उक बाद ' अ{खा(कारीपदमभोज अरपयामि ॐ ततसत‌” इस मनतरस दवीक चरणो म अघय परदान कर कताञजलि होकर इषट दवताक निकट पराना करगा । बाद म “शरी शरीमाय” इस मनरको उचचारण करगा ओर यथाशकति पजा करक इषटदवता को विसरजन करक सहार-मदरादवारा पषप गरहण कर घराण करक हदयम सथापित

` करगा । उसक बाद ईशानकोणम सपरिषकत तरिकोणमणडल लिललकर

उसस निरमालय पषप भौर जल-सयोगस दवी की पजा करगा । बादम साधक बरहमा, विषण भौर शिव परभति दवतागो को नव

वितरणपरवक कलाचारी सद समभिवयाहारस सवय गरहण करगा । चकलाचारी साधक, यनव अथवा परतिमम पजा न कर कमारी भयवा शोडशी रमणीशकतिकी ही यथाविधि परजा करता ह। किनत उसका विधान अतिशय गोपनीय, विशषतः जनधिकरारी पञक निकट अशलीरता भरभति दोषदषट होगा विवचना कर उसक परकाश भ कषानत हमा ह । ` भरयोजन होन पर तनतरका गस-साघन-रहसय की शिकषा साधकणोद सकता ह । पच-मकारस इषठप जा कर परसादःगरहण परभति कायय चकरानषठानकी भरणारी स करनी हीती दह, इसलिए इस सथान. पर फिर उसो नही छिखा गया।

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तनतरोकत चकरानषठान

कलाचारी तानतिकगण चकर बनाकर साधषना करत ह । तनवरासतरम

भ रवीचकर, तततवचकर परभति बहविध चकरानषठानका बहविध विधान ।

दिखाई दता ह । साधको मपराय दोपरकारक चकरोका अनषठानदहीः

करत हए दिखाई पडता द । परथम बरहमभावमय तसवचकरक विधानका

वरणन किया गया ।

यह तततवचकर चकरम शरषठ ह,-- इसको दिवयचकर भी कह

जाता द । कलाचारी भरवीचकर मौर दिभयाचारी तततवचकरका अनषठान

करगा । तततवचकरम बरहयजानीका ही अधिकारह, दसरो का नही यथा-

बरहमभावन तततवजञो य पदयनति चराचरम‌ तषा तततवविदा पसा तततवचकरऽसतयधिकारिता ।!

सवबरहममयो भावरचकरोऽसमिसतततवसजञक । यषामतपथत दवि तः एव तततव चकरिणः ॥

-जो इस चराचरको बरहमभाव म अवलोकन करता ह, बहीः ततववित‌ परष ही इस चकरका अधिकारी ह । समसत ही बरहयह; इस परकार क भावमय वयकति का ही तततवचकरम अधिकार ह।

। इसकिए परबरहमका उपासक, बरहमजञ , बरहयततपर, शदधानतःकरण, शानत, सरवपराणीक -हितकारवम निरत, निविकलप, दयाशील, ददबरत भौर

सतयसकलप साघक--दइस रपम बरहमजञानी वयकतिगण ही इ स तततवचकरका अनषठान. . करगा । इस चकरक अन षठानम धटसथापन नही; पजादिका ` बाहतय भी नही ह । इस ततवकी साधना सरवतर बरहमभाव ह । बरहमम-

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` चकरानषठान ] तातिकगर [ १९७

नतरोपासक गौर बरहमनिषठ वयकति चकरदवर होकर बरहयजञ साधकगण~सहित तततवचकर का अनषठान आरमभ करगा । उसका करम इस परकार ह-

रमय, सनिमल ओर साधकोक स खजनक सथानम विचितर आसन छाकर तिमर आसन को कलपना साधक करगा । चकरशवर उसी सथान

म बरहमोपासको सहित बठकर तततवो का जाहरण करत हए अपन सममख.

भागम सथापना करगा । चकरशवर सभी तततवो क आदिम "ॐ यह मनम

सौ वार जप करग । उसक वाद ॐ हसः” इस मनतरको सातबार अथवा तीन वार जप कर समसत शोधन. करग । उसक वाद बरहममनतरदवारा वही सभी दरवय परमातमाको उतस कर बरहयजञ साघको क सहित एकतर पान-~ “भोजन करग । इस तततवचकरम जातिभद वरजन कर , इसम दश, काल अथवा पातर का नियम नही ह । यथा--

य कवनति नरा मढा दितयघङग परमादतः। कलभद वरणभद त गचछनतयधमा गतिम‌ ।' .

--जो मढ नर दिगयचकरम भरमवशतः कलभद, वरणभद परभति करतादह, वह निशचय ही अधोगतिको परास होता ह।

अतएव दिवयाचारी बरहमजञ साधकोततम यलनकी सहायता स धरमि काम-मोकष परासिकी कामना स तततव चकरका अनषठान करगा ।

बरहमारपण बरहमहवितरहयारनौ बरहमगा हतम‌ । बरहम व तन गनतवय बरहमकम तमाधिना ॥

-- तततव चकरका अनषठान कर-जो अपित हमा ह वहबरहयह,जो

अरपणपववाचय ह वह भी बरहयदवाराहत हो रहा दह, अरथात अगनि भौर

होमकरता भी बरहय ह! इस रप भ रहमकमम जिसक चिततम एकागरता उतपनन होती द- व ही बरहमलाभ करत ह।

दिवयाचारी बरहमजञ साधक-सदश कलाचारी की कलपजापदधतिरम चकर का भरायोजन ह; वि शषपजाक समय साधकगणकाः चकरान ठान

करना अवशय करतवयह।

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. ` १९८] तातरिकमस [ साघनाकलप

कङाचारीका अनषठय-चकर भरवीचकर नाम स खयात ह। मौर जो इस चकर म वठकर पराधानय करत हः अरथात‌ चकरान षठानादिका आयोधन पर भरति करत ह, उसको चकरशव र कहा जाता ह ।

यह‌ भरवीचकर शरषठसशरषठह; सारातसार द! एकवारमातर इस

चकर का अनषठान करक सभी पापोस मकतहआ जा सकता ह) नितय

इसका अनषठान करन स निरवाण-मकतिराभ होता ह । यथा-

नितय समाचरन‌ मरतयो बरहमनिषठामवापतयात‌ ।

भ रवीचकरक विषय म उस परकार कोई नियम नही ह; जिस किसी

समय बतिदभकर भ रवीचकरका अनषठान कियाजा सकताह। इसक

दवारा दवी शीघर ही वाछित फल परदान करती ह । इसका विधान इस परकार ह--

कलाचारी साधक सरमय गततिकाक ऊपर कमब अववा मगचमाकिः , का आसन डालकर "कटी फट‌” इस मनतरस आसन सशोधनपरवक उस-

पर वठगा 1 बादम सिनदर, रकतचनदन अथवा कवल जलदवारा तरिकोण गौर उसक बाठरक भागम चतषकोण मणडल लिचगा। बादम उस मणडलम एक विचितर चट, दधि, आतपः दणडर, फल, पललव, सिनदर .

तिकयकत ओर सवासित जलपण कर परणव (ॐ) मनतर पाठ करत . हए सथापित करगा ओौर धप दीप परदशन कराएगा । उसक बाद गनध

पषपदवारा अरचना कर इषटदवताका धयान करगा ओर सकषप पजा- पदधतिक अनसार उसस पजा करगा । बादम साधक अपनी इचछाक

` अनसार. ततवपातरको सममख रखकर “"फट‌'* इस मनतरस परोकषण करर दिजयदषटि दवारा अवरोकन करगा । बादम अचियनतरम ( मदयपातरम } गनधपषप परदान करक--

` “नवयौवनसमपना तसणारणविगरहाम‌ । ` चाशहासामतोद‌दधासोललसदरदनप कजाम‌ ॥

=

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चकरानषठःन 7 ताचिकमर ८१९९

नतयगीतङतामोदा नानाभरणभषिताम‌ ।

विचितरवसना धयायदट राभयकरामबजाम‌ ॥ इस मनतरस आननद रवीका गौर--

“करपरपरघवल कमलायताकष -

दिवयामबराभरणभषितदहकःमतिम‌ । वामन पाणिकमलन सादयपातर,

दकषण शदध¶टिका दधत. समरामि} इस मनतरस आननदभरवका धयान करगा । धयानानतम उसी मदयपाघरस दोनो दव-दवीकी समरसता विशषरप

चितन करगा । उसक बाद “ॐ आननदभररवय आननदभरवाय नमः" इस मनतरस गनधपषपदवारा पजा करत हए अलियनस “ॐ आ ही करो सवाहा" इस मनस एकत आठ-वार जप करक मदय ` शोधन ` करगा । बादम मासादि जो पाया जाता ह उनही सभीम “ॐ आ ही करो सवाहा" हस मनतरदवारा सौतरार अभिमनित कर शोधन करगा । बादम समसत तततवको बरहममय भावना कर दोनो आख बनद करत हए दवीका निवदन करक पान भोजन करगा ।

चकरमधय वथाराप चाञचलम वहभाषणम‌ । निषठीवनमधोवायः वणभद विवरजयत‌ ॥ कररान खला परन‌ पापाम‌ नासतिकान‌ कखदषकाच‌ ३

` निनदकाच‌ कलशषासवराणा चकराह.रतर तयजत‌ ॥ । -महानिरवाणतनत

--चकरमधयम रह कर दथालाप अरथात‌ इषटमनतरजपादि गौर षदढति-

अनसारफ विना अनय करिया, . अनय परकारस भालाप नही करगा,

चशचलता परकाश नही करगा । भक‌ ही फकगा, मधोवाय निःसारष. ` १4 0) ॥ ।

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२००7 । तातरिकगर ¢ साधनाकलप

भौर जाति विचार नही करगा । जनर, खल, पशचाचारी, पापी, ` नासतिक, कलदरषक ओर कलशासतरनिनदरकोको चकरम नही बठन दगा ।

परणाधिषकात‌ कौल सयाचचकराघीशः कलाचकः । `

| --महानिरवाणतनव

-जिनका परणाभिषक हमा ह व ही कौल, कलाचक गीर चकरा- धीशवर होग । भरवीचकर आरमभ होनस समसत जाति दविजशरष होती

ह । फिर भ रवीचकरस निदतत होन पर सरववरण पथक‌ अरयात‌ जौ जाति थी वही होती ह । भरवीचकरक मधयम जातिविचार नही होता ह-- उचछिषटादिका भी विचार नही ह । चकरपधयगत वीरसाधरकगण शिवक

सवरप ह । इष चकरम दश काल नियम अथवा पातर-विचार नही ह ।

चकरसथान महातीथ ह; इसलिए तीरथ समहस शरषठ द । इस सथानस

पिशाचादि कररजाति दर पलायन कर जाती ह, किनत दवतायण आ जात ह । पापौ वयकतिगण भरवीचकर ओर शिवसवरप साधकगणका

दन करनस पापमकत हो जात ह । जिस किसी -सथानस मथवा जिस किसी वयकतिदवारा महत दरवय भी चकर मधयसथ साधकगणक हायम अरपित होनस ही पवितर हो जाता ह। चकरानतगत कलमारगावलमबी `

साकषात शिवसवरप साधकगण को पापारका कहा ? बराहयणतर जो कोई

सामानय जाति कलघम माधरित होनस ही दववत‌ पजय हो जाती ह।

प रइचरयाशतनापि शवमणडचितासनात‌ । चकर मधय सकजजपतवा ततफल ल मत सधीः ॥

। --महानिरवाणतनबर

--शषवासन, मणडासन, अथवा चितासन परर आरढ होकर सौ परशचरण करनस जो फल पराया जाता ह-भरवीचकरम बठकर

एकवार मातर मनतरजप करन स वही फल होता ह । इसलिए कलाचारी साधक परतयह भ रवीचकरका अनषठान करगा ।

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'चकरानषठान ] । तातरिकगर [ २०१

परवोकत परकारस भ रवीचकरस पजादि कर वाद पान-भोजनादि करगा । परथमतः अपन वामभागम पथक‌ आसन पर अपनी शकति को -ससथापित अथवा एकासन पर बठकर सवरण, रौपय, काच मथवा नारि"

यरमाक-निमित पानपातरक दकषिणम माधारक ऊपर सथापित करना होगा । पानपातर पच तोलास कम करन.का नियम नहीहफिरभी

अभाव पकषम तीन तोका किया जा सकता ह । उसक बाद महापरसाद

-लाकर पानपातरम सधा (मच) ओर शदधिपातरम मतसयमासादि परदान

-करगा । उसक बाद समागत वयकतियो सहित पान-भोजन करगा ।

तनवरशासतरका उददशय मदयपानम मततता म नही ह; दहसथ शकति- कनदर उदबोधन करना ही उदशय ह। परथम आसतारणक लिए उततम शदधि गरहण करगा ।

बादम-

सवसवपातर समादाय .परमामतपरितम‌ । मकाधारादिजि हनता चिदखषा कलकणडलीम‌ ॥। विभावय तनमखामभोज मलमनतर समचचरन‌ । परसपराजञानमादाय जहयात‌ कणडरीमख ॥

--कलसाधक हषटमनस परमामतपरण अपना-अपना परगरहण कर मलाधार आरमभ करक जिहवाक आग तक कणडलीनी का 'चिनतन करत हए मखकमलस मलमनतर उचवारणपरवक परसपर आजञा -अहणक अनतम कणडलिनीमखम परमामत परदान करगा ।

सषमनापथम इस मदयको सचालित करना होता ह । इसका. कोशल -गखमखस रिकषा लकर करमाभयासस आयतत करना होता ह। इस परकारक कौराल गौर एकतान चितनस कणडलीनीशचकति उदबोधिता "होती ह, किनत यदि अतिरिकत सरापान घटित होता ह, तब उपस छरषरमावरमबियो की सिदधिहानि होती ह । यथा-

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-२०२] तातरिकम९ [ साधनाकलफ

यावनन चारयदद‌षटिरयावनन चाजयनमनः। तावत‌ पान परकरवीत पञपानमतः परम‌ ॥ |

। -महानिरवणि-तनक

, जिस मय तक दषटि धणितत मौर मन चचल नही होता तब तकः सरापान का नियम ह, इसक अतिरिकत पान पडपान-सदश होता ह ।

इसकएि सरापानस जिसको शरानति उपसथित होता रह, वहः पापिषठ कौल नामक जायोय ह । तब दखा जता ह, कवल कणडलिनी- शकतिको उदबोधित भौर शवतिसपनन रखनक किए तनतरम मदयपान की वयवसथा ह । चकर सथितत कलशकतिगण मदयपान नही करग ।

सधापान कलसतरीणा गनधसवीकारलकषणम‌ ॥

--महानिरवाण तनकर '

कलरमणीगण कवल मदयका आघराणमातर सवीकार करगी, पान नही करगी । इस परकारक नियमस पान भोजन समाघानतम अनतिम-

तसवकी पराघना करगा । यह करिय! अतिगहय ह मौर जधरकारय विदया गौर अदलीलता दोषशका क कारण साधारणक निकट परकाड "नही

कर सका , उपयकत गरक निकट मौखिक शिकषा कनी होगी । शषतततवोः की साधनाम साधक उरधवरता होता ह भौर परकति जयी होकर आतम समपतति लाभर कर जीवनमकत हो सकता ह ।*. '

पाठक ! रिकषिताभिमानी अशिकषित वयकतिगण पच-मकारक विश. षतः मचच ओौर मयनक नामस सिहर जात ह ओर तनतरशासतरकानामः

` ही सनकर एणास.नाक सिकोडत ट । किनत तनवरशासरकार कया उनकी । अपकषा अधिक सवचछाचारी गीर उनमागगामी य ? उनको कया मय भौर

#मर दवारा रित “शञानीगर" ओर ` शरमिकगड"” परयोम इस साधना परणी को चिञचा गयाह।

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। चकरानषठान ] तातरिकयर ` [२०

मथनका गण जञात नही थ। अथवा भोगसख ही एकमातर मानयक शरयः: ओरपरयः ह, कहकर इस परकारका विधान कर गए ह ? नितानत विकत-मसतिषक वयकति अथवा वातलक अतिरिकत गौर फोई सामानय चिनताशील वयकति भी साहस नही पाएगा । तनवशासतरो की समयक‌. आलोचना करनस ही व अपन-अपन भरमको समञन पा सकग । मथमत

तनतरशासतर मथन तवम सवीय अरथात‌ विवाहिता नारीको ही गरहण ` करनका माद दिया ह । यथा-

बिना परिणय वीरः शकतसवा ससराचरनर‌ । परसतरीगमिना पाप परापनयाननातर सचयः ॥

, , -महानिवाणतनपर --बिना परिणय शकतिसाधना करन स साधक परसतरीगमनक

पापका भागी होताद।

उसक वाद 'कलिक मनषय सवभावतः कामदवारा विधरानतचितत गौर सामानय वदधि-समपकन होत ह, रमणीको शकति कहा जाता द, व इसस अवगत नही ह,व उस कामोपभोगया विलासक वसत.

शपस ही जानत ह,* -- यही कहक र तनवकारो न वयवसथा को ह-

अतसतषा परतिनिधौ शषतततवसय पारवति

यान दनयाः पदामभोअ सवषटामनतरजपसतथा ^

। -महानिवणतनध

-- कामकामना-कलषित जीवक पकषम उनतिम तततवक ( मथनः तचवका ) परतिनिधितवम दवीक पादपदमका धयान मौर इषटमनतकए

जप करना होता ह।

ओर मदयपानक समबनधम कहा ह--

गहकारय कचितताना गहिण परबल करौ :

आयततवपरतिनिधौ ` विधय मधरतयम‌ ॥

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२०४ | तातिकगख [ साघनाकलप

दगध सिता माकषिक विजञय मधरतरयम‌ ।

अचिरपमिद मतवा दवताय निवदयत‌ ॥

--महानिरवाणतनतर

, ~ परवल कलिकालम गहकाय -जासकतचितत वयकतिक पकषम मय.

“पान अविधय ह । मक परतिनिधिक सथानपर दगध, सिता चीनी) गौर मध, य मधरय मिककर मदय-सवरप करत हए दवताका निव-

दन साधक कर दगा। उचचाधिकारीक किए मदयक सथानपर अनकलपकी वयवसथा की

गई द । विशषतः व सकषम पचमकरारकी साधना करनम समय ह : कवल मातर पापाचारी भोगी, कामक गौर मदयपो क लिए तनतरोकत सथल -पचमकारकी षयवसथा ह । पहल ही कहा ह कि साघनाशासतर सभीक

किए ह ~ जञानी-अजञानी, सत‌-मसत‌, अचछ-वर परतयक वयवितकः लिए ह । कव ममाजक कछ साविकाचारी, निषठावान‌ वयविति धरमाचरण करशा गौर शष सभी मधःपतनम पहचग, शासरक इस परकारकी

सकीरण वयवसथा नही हो सकती ह। इसी कारण जिस परकार परकति

हो.उसी परकार साधनापरणाली यकतिसगत ह ।

भगवानको कौन नही चाहता ह ? किनत रधचितत भोगसखरत वयकति करतलसथ सखक दरवयको फककर भगवतपराकतिजनित भावी खकी कलपना “ नही कर सकता ह । किनत यदि ददचितत सिदध तानविकगर कहत ह-- “बाप ! शरावपीकर, रमणी को गरहण कर

ओर निराभिष भोजन न करन पर भी मकतिकी पराति की जा सकती

-ह, इसलिय ` तनथरपरखमकारकी वयवसथा दिया ह। यह दखो, मन मास खाकर भी सिदधि कीः पराति की ह।'' मदयप सनकर मवाक‌

होगा ।' सरापान करक धरमाभ होता ह, यह सनकर उस आननदस गरक चरणो भ शरण ककर कटगा- "भगवान‌ ! कवल सरापान नही "छोड.सकता ह, नही.तो जो करग उस करगा । कह द, किस परकार

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चकरानषडिन ] ताभिकगर । [ २०५.

भगवान‌कौ पा सकता ह । गरन तव उसस कहा--“भर आशरमम चलो । जब-तव अशोधित गौर अनिवदित सरा नही पा सकत हो ।

माताका परसाद‌ जितनी इचछा हो-पी सकत हो ।” शिषयन सवीकार शिया । गरन पजानतम परसाद दिया । शिषय आज पजामणडपम साधको क साथ मदयपान कर इषटमनवर जप करनलगा। एक दिनही मः

शरितनी उननति हो सकती ह । जो गयकति अनयदिन मचपान कर वार गनागहम अथवा नद माम पडकर शकार-बकार बकता रह‌, माज वहः

` मदक नह म गरका चरणम पडकर "मा मा' बोलकर रोता ह । करमः. ` माताक नामस उसकी परकत भकति ही सचारित होन लमी; -गर भीः अवसथाको समकषकर धीर-धीर सराकी सातरा हास करन कग । जब दखा फि शिषयक हदयम भगवत‌ भकतिकी एक अचछी मौर गरभीर . रखा अकित हई ह, तव मद-सशोधन का; शापविमोचनक मनतरो कोः शिषय को समकञा दिया । उसस शिषयन समजञा कि सरापान कर जब पितामह बरहमा, दतयगर शकराचायय तक न विशरानत चितत होकर

कितन गदित, कारययो को किया ह, तब मनषय जो सरापान करक अधतःपतनकी ओर जाएगा--इसम सनदह नही ह । भगवतपरातिकी - आरा ककर आज शिषय मदयतततवको समकष कर मदयपानस निरसत ह ।

तनतरिकगर इसी परकार वयासकत, लमपट मौर शराबीकोः , परवतति का पथस चछडाकर निदततिमारग पर चलन रग । मप साधना

की परणालीस करमस साध हो गया । इसी कारण तनतरशासतर परम. कारकौ वयवसथा ह । नही तो सातविक निषठावान वयकति ततरोकत

साधना करन जान पर' मदयमास उस समय गरहण करगा, यह‌ विशरानत ओर बालकक अतिरिकत अनय कोई विषवा नदी कर सकता द।. सततवपरधान बराहमणक समबनधम तनतर कहा ह-- `

न ददयाद‌ बराहयणो मदय महादवय कथचन । वामकामो बराहयणो हि मदय मास न भकषयत‌ ॥ हमणो हिम त

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२०६ | ताधरिकगड [ साघनाकतप

बराहमण कभी भी महादवीको षय परदान नही करगा । कोई बराहमण

चामाचारत मयास भकषण नही कद सकता ।

"एतत‌ दरवयदनानत शदरशपय"' अतएव तमःपरधान आचार-विचार- ॥ा

-विमढ, भकतिहीन, भोगविकासी शदरको ही मदयादि दान विदित हि।

` वाठ ! समकषो कि किस लिए मौर किसक लिए तनवन सवल पचम-

कारकी वयवसथा की ह! नही तो वासतविक रपम सरापान करन स

ही मनषय सिदधि परापतकर सकता ह, तब ससारक सभी मदयपः खिदि

लाभ कर सकत ह! भौर यदि सतरीसमभोग दवारा मोकषलाभ हो, तब

जगतक सभी जीव. मकत हो गए होत । इसीलिए कहता ह कि तनतरकार चया इतन मढ ह-कि म जित समकष सकता हि-तनतरकार क

मसतिशकम कया वह‌ परवद नही कर सकता ह-- इसलिए कहना होगा--

सरवाधिकारी जनगणको अशवय दनक कएिही तनतरकी यह उदार

शिकषा, ह 1 इतनी बाल कहन पर भौ यदि कोई मदयप ओर रऊमपटको

` शतानविक साध" नाम स रमकषता ह--उसक किए दोषी कौन ह ? विशषतः उ परकार दषभवदधि-विशिषटकी बात सनन स अनिषटकी

ही समभावना ह। तनतर की कराचारपरथा साधधनाका चरम मागद।ः

इसलिए गपन-अपन अधिकारक अनसार साक कलाचार मारशका

अवलमबन करगा । इस साधनाम सिदधिराभ करन पर साघक शीघर शिव- तलय गतिलाभ कर सकता ह । सव -धम शनय कलि की परघानताक समय-

-. अ एकमाचर कलाचाखपरया ही सरवोककषट ह । यथा--

बहना किमिहोकतन सतय जानीहि कालिक । इहामतरसलावादय कलमारगो हि नापरः ॥

, ~ महानिरवाण -तनतर . -जधिक कया कह--सतय समनो कि जो कलपदधति क चिना

रदिक गोर पारतरिक सखजाभका भौर उपाय नही ह । । ।

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मनतरसिदधिका लकषण मनतरसिदधि हो जान पर साधकक जो जो लकषण परकरा भात रह

रह भी शासतरकार निदकित कर गय ह । यथा- ।

हदयमगरथिभद ङच सववियवदधनम‌ । आननदाशरणि पलको दहावशः कलदवरि । गदगदोकतिदरच सहसा जायत नातर सशयः ॥

। -तनबसार - जपकाल हदयगरौथि भद, सभौ अगो कौ वदधिषणता, भाननदःध,

दहावश ओर गदगद‌ भाषण परभति भकतिचिहघ परकाश पात ई--सनदह, नही ह, इसस भिनन गौर भी नानाविध लकषण परका पात ह ।

मनोरथसिदधि ही मनरसिदधिका परधान लकषण ह। साक जव जो अभिराषा करता ह, बिनाकषट अभिलाषाक पण होनस ही जाना जाता

ह कि मतरसिदधि हई ह। इसीको मतरसिदधि कहत ह । मतयहरण, दवता- "दरशन, दवताक साथ वाकयालाप, मतरका ककार-शबद भवण परभति ` नलकषण मतरसिदधिस घटित होत र ।

| सकदचचरितऽपयव मनतर चतनयसयत । . ` दयनत परतयया यतर पारसपरय तदचयत ॥ `

-- तनतरसार `

च तनयसयकत कर मनवस एकवार मातर उचचारण करनस ही परवोकत भावो का विका होता ह।

जिस वयकतिको मनतरकी चरमसिदधि होगी, वही वयकति दवताको दख सकता ह, मतयको रोक सकता दह, परकायपरवषच, परपरधरवश भौर शनयमारगम विचरण भी कर सकता ह भौर सरवतर गमनागमनकी षकति

=

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२०८ |] तातरिक [ साधनाकलप

होती ह। कवरी दवीगण सहित भिरकर उनकी बातको सन सकता ह । भषठिदर दख सकता ह मौर पाथिव ततवको जान सकता ह । इसी

सप सिदध परषकी दिगनतवयापिनी कीति होती ह, वाहन-भषणादि बहत दरवयो की पराति होती ह मौर एसा वयकति बहत समय तक जीवितः रहता ह । राजा भौर राजपरिवारवरग को वशीभत रख सकता ह,

` सथानो पर चमतकारजनक काय परदरशन कर सखस काखयापन करता ` ह। वष रोगोको दखन मातरस ही रोगापहरण गौर चछिनिवारण होताः

ह । सभी शासतरोम भतयनतसलभ चतविघ पाणडितय लाभ कर सकता ह। विषपरभोगस विरकत होकर मकतिकी कामना करता ह, सव

परितयागशकति भौर सववशीकरण कषमता उतपनन होती ह; अषटाग-

योगका अभयास होता ह । विषय भोगकी इचछा नही रहती ह । सरव-

भरवक परति दया उतवनन होती ह; गौर सरवजञता शकति परार होती ह । कीति भौर बाहन-भषणादि काभ होता ह; दीरघजीवन, ` राजरियता, राजपरिवारादि सरवजनवातसलय, लोकवशीकरण, परभति रडवय, धन- समपतति, पतरदारादि समपद परभति सामनय गण मनतरसिदधि की परथमा-

, वसथाम परापत होत ह । साराश योगसाधना मौर मनव साधनाम कोई परभद नदी ह,

` कारण उदददयसथान एक ही ह; कवर पथकी विभिननता मातरह। वासतविक पकषम जो परकत मतरसिदधि परात करत ह, व साकषात‌ शिव-

तलय द, इसम थोडा भी सदह नदी ह । यथा- -सिदधमनतरसत यः साकषात‌ स शिवो नातर सशयः ॥ । -- तनतरसार

इसकिए मतरवित साधक परवोकत जिस किसी पदध तिका अवलमबन ककर मनछरसिदधि छभर कर जीवनमकत मौर अतम शिव-सायजय पराकत होगा अथवा निरदणि मकतिलाभ करगा। यगशासतर ओर यगावतार

महापरभ. चतनयदव “करिकालम एकमातर मर या नाम-जप कर सकन पर‌ ही सरवाभीषट सिदध होगा--सदह नही ह" यह बात परचारित कयि ।

(मन

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तनतरकी बरहमसाधना

जिस नलासमन वयषटि दवदवीस भला बरहमशकतिकी सथल साका- रोपासना पञचतततवकी साना.गहसथादि चार आाशरमोकी इतिकरतनयता मौर धरमाधम परभति समसत विषय वणना की ह; वही वशसतर बरहम ` जानम कया अदरदरशी था? तशसम कया कछ सथल आनषठानिक करमभ ही परिपरण ह? कभी भी नही । इसीन परथम हमको सनाया ह कि बरहमषदभाव ही उततम साधना ह मौर अनयानय भाव अघम ह+ यथा-

उततमो बरहमसदभावो धयानभावसत मधयमः+ -महानिरवाणतनत

वगकषासमन. समङञाय। ह कि बरहयजञान बिना मनय किसी उपायस मकतिक पराति नही हो सकती ह । यथा--

विहाय नामलपाणि नितय बरहमणि निचल ।

परिनिरिचततततवो यः स मकतः कमबनधनात‌ 11 ` न मकतिजजपनादधोमादपवासशतरपि । बरहम वाहमिति जञातवा मकतो भवति दहभत‌ ॥

आतमा साकषी विभः पणः सतयोऽध तः परातपरः । दहसथोऽपि न दहसथो जञातवव मकतिमाग‌ भवत‌ ॥ बाककरोडनवत‌ सव नामरपादिकलपनम‌ 1 `

विहाय बरहयनिषठोः यः स मकतो नतर सशयः ॥ मनसा कलपिता मतिन णा चनमोकषसाधनी । सवपनङनधन राजयन राजानो मानवासतदा ॥ `

९४

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` २१० | तातरिकगर [ साघनाकलप

मचछिराधातदारवादिमततवीशवरबदधयः ।

विरशयनतिसतपसा जञान विना मोकष न यानति त ॥ आहारसयमकरिषटा ययषटाहारतनदिलाः ।

बरहयजञानविहीनाइचननिषकति त तर जनति किम‌ ॥

वौयपणकणातोयतरतिनो मोकषभागिनः 1 . सनति चत‌ पननगा मकताः पदयपकषिजलचराः ।।

---- महानिरवाणतनतर

_ जो वयकति नाम ओर रप छोडकर निच बरहमक ततवस परिचित

हो सक, उसको फिर कमबनधनम नही पडना होता ह ।. जप, होम अर सकटो उपवासोसि मकति नदी होती ह, किनत “मही बरहय ह," इस

जञानक होनस दहीकी मकति होती ह । मातमा साकषीसवरप, .विभ, -पण, सतय, बदरत ओर परातपर,- यदि यह जञान सथिरतर हो तब जीवको

मकति परात होती ह । रप मौर नामादिकी कलपना बालरकोकी करीडाक सदश ह; जो बालयकरीडा छोडकर बरहमनिषठ हो सकत ह, व निःसनदह

मकतिकाभक. अधिकारी ह । यदि मनःकतपितत मतति = मो- साधनी हो तव सवपन खनध राजयस भी छोग राजा हो सकतिरह। मततिका, शिका, धात गौर काषटादिनिमित मततिम ईशवरजञानस जो.

आराधना करत ह-व वयथ कषट पातर । कारण जञानोदय नही

होनस मकतिको पराति नही हो सकती ह। रोगमि आहारसयमस गिषटदह अ पवा आहार गरहणम परणोदर हो, किनत बरहमजञान नही होनस कभी भी निषकति नही हौ सकती ह । वाय, पण, कण मथना जलमौतरषी

कर वरत धारणम यदि मोकष लाभ हो तव सप, पश, पकषी गौर जलवर ` जनत सभी मकत हो सकत । ।

पाठक ! दख कि तनतरक इन वाकयोभ कया अमलय उपदशा निहित ह । वदानत उपनिपदरादि क नदश तनतरशासतर भो विशषरप कहता ह

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अहयसाधना] , तातचिकगर [ २११

कि बरहयजञानक अतिरिकत ओर किसी उपाय जीव मकतिलाभ नही कर सकती ह । तव तनवम सथर करमानषठानकौ वयवसथा कयो ह ? उसक उततरम हमन परव ही कहा ह कि शासतरका उपदश सावजनीन ह; कवल

मातर समाजक कछ उननत हदय वयकतिक लिए शासतर परणीत नही हमा {ह । अधिकारानसार जिसस सरव परकार लोग शासतरोपदशम करमोननति -अवलमबनपरवक अगरसर हो सक तनतरम भी वही वयवसथा हई ३ । इस- `किए बरहमसाधना विना तनतकी यावतीय साधनाकी विधि वयवसथा सभी -करमनजी गी मनषयोक किए द । यथा--

यद यतपऽठ महामाय नणा कमनजीविनाम‌ । निःशरयसाय तत‌ सव सविशष परकीरतितम‌ ।

-महानिरवाणतनव ह महामाय ! करमानजीवी मनषयगण क लिए तमन मङञम जो-

जो जिजञासा की--मन सभीको विसतारक साथ वततखाया! कारण -ओीवगण कमक वयतिरक कषणादध भी अवसथिति नही कर सकता ह--उनम कम वासना नही रहन पर भी उनको कमवाय कषित -करती ह । करमक भरभावम जीव सकल गौर दःख भोगता ह; कक वदा .नगीवकी उतपतति ओौर विलय होता ह। इसीलिए तनतरशासतरम लप सदधि नयकतियोकी भदकतिकी उततजना मौर दषमडततिकी निदततिक किए -साघना समनवित बहविध करमोकी बात कही गई ह ।

यह कम शभ ओर अदयभ-भदस दविविध ह--उसम मभ करमा- नहान करक पराणीगण तीवर यातना भोगत रह! ओर फलवासनास जो शभ करमम भदतत होत ह, व भौ कम-शहखरस आबदध हो इह गौर पर लोकम बारमबार गमनागमन करत द । जब तक जीवक शभ अथवा सशभ करमकरा कषथ नही होता ह, तन तक सौ जनमोम भी मकति नही ददोती ह । पशय जिस परकार लोह मथवा सोनकी शङखलाम बदध होता ह, उसीक समान जीव शभ अथवा अदभ करमम आबदध होता द । जब -तक जञानोदय नही होता, तव तक सतत करमानषठान गौर शत कषट `

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२१२ ] तातिकगर [ साधनाशटलय

सवीकार करनस भी मोकष-पराति नदी होती ह। जो निरम सवभाव

ओर जञानवान‌ ह- तचवविचार मथवा निषकाम करमदारा उनका तततव

जञान परकाशित होता ह । बरहमस आरमभ कर तण तक जगतक समपण

पदारथ मायादरारा कलपित हए ह; कवल एकमातर बरहम ही सतय ह; इसको

, जान सकनस मकतिकी पराति होती ह । यहा तक जितना भालोचित हमा उसक बाद बोध होतादहकि

ओर कोई तनवको बरहयजञानहीन कर आडमबरपण करमानषानकी

पदधतिस परण शासतर कहकर उपकषा नही करगा । तनहाका परधान उद शय,

जीव बरहमजञान परापन कर मकत हो । तब उस जञानको परापत करनक लिए

कया एकवार बरहमभावका चिनतन करनख-उसकी साधना होती ह ?

ततवजचानकी पराति ही समधिक कठिन द; जो मधयातम विषयम मख ह,

व किष परकार उस भावका अनभव कर सकत ह ? मख वयकति जिस

परकार कागयक रसको गरहण करनक लिए वण परिचयस मारमभ कर

वयाफरण परभति शिकषा गरहण करता ह; उस परकार जो अधयातम-

तततव अनभिजञ ह, उघक लिए दवतापजास आरमभ कर बरहमोपासना `

तक जाना होता ह । दवताकी सकषम अदषट सकतिको जय न कर सकन

पर बरहमोपासना किस परकारक कराई जा सकती ह ? किनत दवताकी

आाराघनास मकति होती ह, यह बात तनतरशासतर किसी सथानपर नही

लिलली गर ह|. तव दवताकी माराधनासि मवितपथ अगरसर हमा

जावा ह । वही.अधिकारीभदत साधनाभद कर उननतिकी ओर अगरसर

होना होता ह। इस परकार करमकषय कर बरहयजञानका अधिकारी होना .

होवा ह.1. . तनमशासमरम ही वह अधिकार विशद कर वणित हभा ह ५

` यथा-- योगो जीवातमनोरकय पजन सवकञखयोः 1 सरव बरहम ति विदषो न योगो न च पजनम‌ ॥

बरहाजञान पर जञान यसय चिनल विराजत । किनतसय जपयजञाचसतपोभिनिवमवरतः ॥

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, हयसाधना ] | तातरि कगर [ २१३

सतय विजञानमाननदमक बरहम ति परयतः। सवभावाद‌ बरहयरतसय कि पजा-धयान-घारणा ॥ न पाप नव सकति न सवरगो न पनरभवः । नापि धययोन वा धयाता सरव बरहयोति जानतः ॥ अयमातमा सदामकतो निङिपतः सरववसतष ।` कि तसय बनधन कसमानमकतिमिचछनति दजनाः ॥

। -- मरहानिरवाणतनन

-जीव ओर आतभाक. एकोकरणका नाम योग; सवक भौर

ईशवरकी एकय पजा ह; किनत दरयमान सभी पदाथ ही बरहम ह- इस शरकार जञान होनस योग अयवा पजाकी भावरयकता नही ह ! जिसक

-अनतरम परबरहयजञान विराजित द, उसको जप, यजञ, तपसया, नियम

मीर वरतादिकी कोई आवशयकता नही ह । जिनहोन -सभी सथानो एर ` नितय, विजञान भौर आननद-सवरप . अदधितीय बरहमपदाका दशन किया , ह, सवभावतः बरहमभत कहकर उनकी पजा भौर धयानघारणाका भाव-

यक नही ह । सभी बरहममम ट, इस जञानक उदषनन होनस पाप, पषय, सवरग, पनजनम, धययवसत ओर घयाताका परयोजन उसको नही रहता

ह । यह अतमा सतत विमकत ओौर सभी वसतशस निलति ह, इस

` जञानक उतपनन. होनपर भौर करमोका बनधन अथवा मकति कहा ? . अब बोध होता ह कि पाठक समकन पाए ह कि आतमजञान ही

-तननका चरम उदश ह भौर वह‌ आतमजञा परापन होनस पनः पजादि कछ का ही परयोजन नही होता ह। छनत जब तक वह‌ आतमजञान शरा नही होता ह, तब तक पजादिका परबोजन होता ह, किसी पदारथ ` . का अनसनधान करनक लिए ही माडोककी आवषवकता होती ह, किनत शरपतिक बाद उस पदा पर फिर गालोककी भवशयकता नही रहती द । यथा- ।

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२१४] तातिकगर [ साधनाकलप

अमतन हि तपतसय पयसा किम‌ परमोजनम‌ ।

। --उततर-मःनए `

जिस वयकतिन अमतपानसत वतति, भराद कौ ह, उसलको दधका परायोनः कयाह?

अतएव साधकमणको परथमतः तनतरोकत दीकषा गरहणानतर परवोकत करमः

स जप, पजादि करत-करत करमकषय होकर जञान का विकास होगा- तमी बरहसाधना करो । जिन वयकतियो न पण दीकषा परसकी ट-

व हौ वयकति बरहमोपासनाक अधिकारी ह । बरहयसाघना का बह‌रफ

६।- शाकत, शव, वषणव, सौर एव गाणपतय-य पञच उपासकोकष

समपण ब ही बरहयोपासनाका अधिकारी ह । मकतथाभिजाषी साधषक

बरहय गरक निकट जाकर उनकर च रणकमलकः। धथानप वक भकति भाक

स पराथनाकरग कि-

करणामयदीनश तवाह शरण गतः ।

ततपदामभोरहचछाया दहि मधनि यशोधन ।1"“ * इस परकार पराथना कर रिषय यथाशकति गरकी पजा करगा; बाद

म गरक समभल कताञजलिपटस शानत होकर रहा ।

गरदव तव यथाविधान यथोकत शचिषयलकष णी परीकषाक साय” पव-मख अथवा उततर मख होकर आसन पर वटकर शिषयको अपनी वई दिशाम वडाकर करणाप वक हदमस अवलोकन करग । वावम साघककी इषटसिदधिक लिए ऋषिनयास कर शिषवक मसतक पर (हाय

कि करणामय } ह दीवजबो क ईदवर ! म आपका दारणागत इमा ह । ह यकनोधन, नाप मर मसतक परर अपन चरण कमल की छाय दान कर 1"*

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बरहमा धधना ] ` तातरिकगर [ २१५

रकलकटर) एक सौ .जानार मतर जप करग । बराहमणक दाहिन कान, जाति क वाए कान म सात बार "ॐ सचचिदक बरहय इस मनतर को सनाएग । इसम पजादि की अपकषा नही ह, कवर भावर मानसिक . सकलप करना: होगा. । ..

उकक बाद गरक ` पादपदम परतित होन स गर उसको समदष परयकत-

{उततिषठ वतस, मकतोऽसि बरहमजनानपरो भव । जितनदरियः सतयवादी बलारोगय सदासत त ॥** -

इस मनतर का पाठ-प वक उतथान कराएग । वाद म बह साधकषरष उठकर गरको बथाशकति दकषिणा परदान करग । वादम गर की शाला ककर दवदराषदशच भमणडल विचरण करग ।

जो बरहममनतर गरहण करव ह, उसको आतमा मनतरगरहण करन भावस

ही तनमय हो. जातौ ह. सत‌, चित‌, भाननदसवरप परबरहम, सकरब-

लकषण भौर तटसथलकषण दवारा यथावत‌ जञय होत ह । तब जो खरीर- निषठ आतमतव बदधिरहित इस परकार सब योगीलोग कतक समाधि. योगदवारा--जो सततामातर, निविशष मौर वाकय एव मनक अगोचर र;

जिनकी सतताप मिथवाभरत तरिखोकी - सतयतवकी परतीति होतीदह, बही .

परबरहय.सदरप परकट होत द । इस रप म सवरप लकषश क इरा बरहयको `. जानन पर साघनाकी अवकषा नदी रहती ह; कवल बरहमभावरभ कनम होकर चछानकरल भरमणडल म धमग । उनका उपदशच उपनिषद भौर वदानतादि गरथ म वणित ह। सनयास ही उसकी एकमातर सान ह ।#

ओर जिषस यह विरव उतपनन ह; जात-बिशव जिसम भवसथान करदय ह

वतस! उठो, तम मकत हो गए हो; तम भरहयनान षराकणहो जागो, पम सतववादी मौर जितनधिय होगो; सवदा तमहारा बर भौर आरोगब अकषतरपष रह । ।

भभर हारा रचित "परमिकगर “भ वह‌ विकषदलपम वशिढ ह ।

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1

२१६1 तारिकगर [ सपधमाकलप

भीर परलय-कारम यह. चशव र जगत‌ जिसम ऊय परात होता ह.“ दइस - रपम तटसथशकषणदवारा -वदच बरहाकी साधना ही इमः इस निबमधम ` विवत करग ।

बरहममनव पर हम या उसकी साधना आयास नही ह. उपवास नदी ह; रीर समबनधी कोई कषट नही ह; आचारादिका नियम नही दह; मदरामौर नयासका परायोजन नही ह; दिषा मौर काकादिका कोई बिचार नही ह । दरयमनवम तियि, नकषतर, राशि मौर चकगणनाका नियम

नी ह भौर किसी परकार क ससकार की भी अपकषा नही ह । यह मनत सरवया सिदध ह; इसरम किसी परकारक विचार ढी वप नही द।

: बहजनमाजितः पषयः सदगरयदि रभयत । तदा तदरकतरतो लबधवा जनमसाफलयमापनखात‌ ॥

-महानिरवाण-तनतर --बहजनमाजित पणयफलत यदि जीव सदगरको परात करताद, .

तब उसी गरक मखस निरगत यह मनत परापत करन स ततकष णात‌ जनम. सफक होता ह । ।

यह‌ परहामन परण करनस ही दही बरहममय होता द। इसकिए उसकी सनधया,आहधिक, साधनानतर, धद, तपणादि की मवषयकरता ही ह । उसका कक मपनस टी पवितर होता ह; पितरोग माचनदस ` वतय करत ह । साधना का कम इस परकार ह--

, - बरहममनरक ऋषि सदारिव ह; छनद अनषटप ह; उस मनव रता. निरमग सरवानतरयामि-परमबरहय चतवग फलपरातिक छिए विनियोग करभ । साटक समाटित चिततम उपवशन करक ऋषयादिनयास करगा । यया-~

शिरसि सदाशिवाय षय नमः--म खभ. भनषटपछदस नमः-- दि सरवानतयामि-निग ग-परबरहमण दवता नमः--धरमाथ ती

` बिनियोगः। गाद म "2 सचचिदक बरहय” इस पव. समहो

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नर हासाधना ] तातरकगख . { २१७

-करमानवय उचचारण कर समाहित चिततस करनयास गौर मगनयास

करगा । उसक बाद मखमग अथवा परणव जप करत हए ८।२२।१६

-सखयाम तीन बार पराणायाम करगा । बादम-

शहदयकमकमधय निविशष निरीह हरिहरविधिवदय योगिभिरधयानगमयम‌ ॥

जननमरणभीतिधररि सचचित‌ सवरप ।

सकलभवनबीज जरहयचतनयमीड ॥* ` इस धयानमनवरङ--पाठपवक वचतनय-सवरप बरहमको हदयकमल-

"मधयम धयान कर मानसोपचारय पजा करमा + पथवीतततकका ` गनध,

आकादयतततवका पषप, वाय ततवका धष, तजतसवा दीप गौर अङतततव . का नवदय कलपना करक उसी परमातमाको परदान कर मानस जप करन होगा । ।

उसक बाद बाप जा वारम करगा । गनष-पषपादि वसवराखकारादि मौर भकषयपयादि, पजा का सभी दरवय--तरहयमनवारा सशोधन करक ¦ दोनो नधो को निमीलनप कक मतिमान‌ जधकति सनातन बरहयको धयान करत दए परमातमा को सशपगश करगा । सशोधन गौर समपण मनतर

इस परकार ह-अरपण अरथात‌ यञपातर अरहय, हवि अरथात हवनीय दरवव, `

जिसको अपण करना होपा बहनगहय, घरिनि अरथाच जिस. अरपण करना होगग--- वह भी बरहम जौर जो शादति भरपण करत ह, वह भी बरहम

ह । इस परकार जो बरहमम चितत एकामररपस सथापित करत रहमवषही

# जो नानारपभदजलनब ह, जो वचषटा-रहित हः नो बरहया-विषम‌-

, दिवजीक दवारा जञय ह, ज योबिधो ढारा घयानयमम ह; ` जिनस जनम ओर मतयका भय दर होता ह; जो नितयसवलप भौर न-सवरपरट;ःजो

-निखिक भव नक बीजसवरप हः, उनक सदश चतनयसव रप बरहमको .

दय कमलम धमान करताह।

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२१८ ] तातरिकगर [ साघनाकलफः

रदधनो पर होत द । बादम यथाशकति बरहममनव जप कर दोनोनवर

उनमीजन-शरवक “बरहमारपणमसत” इस मनवरस तबरहयको जप समिति करत हए सतव कवचादि पाठ करगा ।

बादम भकतिभावत-

“ॐ नमसत परम बरहय नमसत पर मातमन 1 निरगणाय नमसतभय सदरपाय नमो नमः ॥*

इस मनरका पाठ कर परमातमाको साधक परणाम करगा। इम परकार जरहयकी पजा कर आतमीय सवजनोक सहित महापरसाद गरहण

करमा 1 षरबरहमकी ¶जक समय भावाहन भी नही भौर विजन भी नदी।

सभी समय सभी सयानोम ही बरहय-साधनाहो सकती ह । बरहमसमरण भौर." महामन जप ही उनका परातःकरतय ओर सनधयाहजिक ह।

सनात हो अथवा असमात हो, भकत हो मथना अभकत दो, जो कोई मवसथा अयवा जो कोई काल हो-- विदखदध चिततस ही भरमातमाकी षजा करगा \ बरहयापित वसत महापवितरकारी भौर बरहयनिवदित. वसत

-भोजनम बराहयणादि वका विचार नही; उचछिषटादिका विचार भी

नही।। इपरस कालाकाल अथवा शौचाशलौचका भी विचार नही। सभी कायोकि परारमभ "“ततसत‌ इस वाकयका उचचारण साधक

, # परवरहमका सतन-- .

ॐ नमसत सत सवलोकाशरयाय नमसत चित विशचरपातमकाय । नमो ततवाय मकतिपरदाय नमो बरहमण वयापिन निरगणाय ॥ तवमक रणय तवमक वरभय तवमक जगतकारण विशवरपम‌ । तवमक जगतकततपातपरहत तवमक पर निषफल निविकलतपम‌ ॥ भयाना भय मीवण भीषशाना गतिः शराणिना पावन पावनानाम‌ । महोनवः पदाना नियनत तवमक धरषा पर रशनक रकषकाणाम‌ ॥ पर" परभो ` सरवरपाविनारिनननिररब सरव नदरियागमय सतय । मचिनतयाकषरवयापकानयकततततव जगदधासकाधीडा पायादपायात‌ ।

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नतय ताधना ] तातरिकगर - [९१९

करगा । सव कामोम “बरहमारपणमसत कहमा । इत अति दसतर घोर पापमय कलियग बरहममनरकी साधना ही एकमातर निसतारका उपायः

ह । इसरिणए बरहमसाघधकन परातःकाकम परातःङतय समाधा कर तरिकाः सधया गौर मधवाम परवोकत पदधतिस पजा करगा ॥ |

` अरहयसाधक सतयवादी, जितनदरिय, परोषकारषरायण, निविकारविततः

भौर सदाशयः होगा) सवदा जरहयपरतिपादक वाकय शरवण करगा,

रहयाचिनता करग, ओर सवदा बरहमतततव -जिजञस होगा । सवदा सयत

चितत ओर दढवदधि होकर समपरण बरहममयकी भावना. करगा । अपतकोः

` भी बरहमसवरप समञषगा । तरहममनतरस दीकषित होनस ही. सभी जाति.

जराहयण सदकच पजय हो जाती दह ।

परबरहमोपदशन विमकतः सवपातक: । गचछति बरहमसायजय मनसयासय परसादतः ॥

--बहानिरवाणवनतर

- जरहवमनतम उपदिषट वयकति मनतरक परसाद सवपापस विनिमभकतः होकर जरहय-सायजय परापत करता ह ।

इसलिए बरहजञ गरक निकट बरहममनतरका उपदश लकर अपनको मरहणसवहप समसत हए दश, काल, सथान, खादयाखाय, जाति-कर भौर

विधि-निष ओर विचार-दनय होकर इचछानरप‌ भमणडलम विकरणः रता फिरगा।

तदक समरामसतदक जपामसतदक जगतसाकषिरप नमामः ।.

सदक निधान नि राकमबमीश भवामबोधिपोत शरण जजामः॥ परमातमा बरहमा यह सतोव जो सयत होकर पाठ करत ह, व बरहय

साधजवको परा होत ह । बथा-- ।

यः पठत‌ परयतो भतवा बरहमसायजयमापनभात‌ । निव णतनपरः

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तनतरोकत योग ओर मकति

बरहममनरक उपासकगण सवदा बरहमविचार करग । मनधम ही धति . शनदर रपस बरहमविचार परदशित हा ट, उनक पाठ करनस तनरक

माहातमयका समयकरपस अनधावन कर सकग ।# तनतर एक भमषय ` शचासतर ह, यह समकष सकनस भकति-विनजन-हदयस तनरकारक उद‌ पवको नमसकार करग । बरहममनवरक उपासकगण पवकति भरणाखीस तततयचकर का

अनषठान फरक भी बरहयसाधना कर सकग । कारण दिभयभावावरपबी साधक ही एकमातर बरहममनवरकरा अधिकारी ह । व इचछा करनपर धरबोकत -माधयातमिक पचमकारदवारा भी बरहमोपासना कर सकत ह । नीतो -साषक सहज भावको परातिक पव ही योगावलमबन करक भो बरहातनभ- यता परापत फर सकता ह , हमन इतिपव मनयानय बरनथोरभ योयकी -ककियाका विवरण दिया ह। तनतरशासतरम भी बहविधि योगका अभास दखा जाता ट । हम बरहमसनमयताको परातिक ` उपायसवषप

ननरहासतरस योयकी परणारीका नीच विवरण दत ह।

साधक उपयकत आसन पर सथिर भावस बठकर गर, गणश ओर दषटदवताको -परणाम करगा । बादम परक योगस हसरपी जीवातमाको -कडलिनीक शरीरम लय करायगा । बादम कमभकयोगस कलकटजिनी- शकतिको सिरभ - सहलञारम ठ जायया । कणडलिनी गमनकाल करमसः चौबीस तततव भरास कर जायगी, अरथात‌ तततवसमह उसक ररीरभः. खय

भरात .होया । उसक बाद कणडलिनीको सहसरदल कणिकानतपत

` %वदानतलासतरानयायी बरहमविचार मर दवारा रचित “ञानीगर” -गनथम. घौर तबरहाजञानकी परापनिका उपाय “"परमिकगर"* गरनथम विशद षछिखा भया ह।

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योग अर पकति] तातरिकगर [२२९ ,.

बिनदरपम परमशिवक साथ एकातमय पराप करायगा । उसपर निसतरग जजाषय सदश समाधि उतपनन हो “मही बरहय ह" यह रान उतपनन

होगा ।

सधक मलाधार कणडलिनीको तजोमयी, हदयम जीवातमा भौर सदललारम परमातमाकफो तजोमय रपम चिनतन करगा ।` बादभ इन तीन तजोकी एकता कर उनम बरहय।णडको . खीनक रपम समनगा । उसक

बाद इस जयोतिरमय बरहमहीरम ह, इस चिनतनम तनमय हो जाएगा

मौर कछ चिनतन नही करणा । एषा होन पर शीघर बरहमजञान समदधत.

होगम । | । योनिमदरायोगम कणडलिनीशकतिको सहननारभ उतथापित कर इषट--

दवीक रपम कषिवक सहित मिलन करायगा । उसक बाद व सतरीपरष सदबा सगमासकत होकर आननदरसस आलष हए ह, यह चिनतन करत ` हए मपनको उसी आननदधाराम पलावित समकषकर धयानपरायण हो जायगा : उसक होनस “म ही वह ह" यह‌ अदरतजञान उतयनन होगा । ` `

अवदय गशमखस योगक कौर अवगत होकर अभयासदवारा इस योग'की शराति करनी होगी । इषटदवताको आतमास अरभिननभाव चिनतन करन स साघक तत सवरपता की पराति कर सकता ह । मर हदय- दवतात मरी भातमा भिनन नही ह; दोनो ही एक पदाथ ह, म बदध नही . ह--मकत ह । साधक सबवदा इसी रपम चिनतन करगा । इसस दवता क सारपय की पराति होती ह । साधकक उकत परकारस अभिननरपम दिव का चिनतन: करनस शिवतव, विषणका चितन करनस विषणतव ओर शकति ` क चिनतनस शकतितवकी पराति करता ह । परतिदिन इस परकार अभिनन

चिनतन-अभयास कर सकन पर साधक जरामरणादि दःलमण भवबनधनत मकतिलाभ कर कता ह । जो साघक धयानयोग परायण ह--उसकी ` पजा; मया, जपादि की आवशयकता नही ह; बह एकमातर धयानयोगक-

बरत ही सिदधि शाभ कर सकता द--सनदह‌ नदी ह । यया--

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२९२ ] तातरिकगर [ साधनाकर

विना नयासविना पजा विना जवः परषकरियाम‌ 1

धयानयोगादभवत‌ सिदधिरनानयथा खल पावति ॥।.

निस परकार फन ओौर तरगादि समदरस उठकर मौर समदर लीन

होता ह, उकी परकार जगत‌ भी आतमास उतपनन ह मौर आतममि दी भविीन ठोता ह । इसरएि म घी तमाप अभिनन ह । ।

अह बरहमासमि विजञानादजञानविरखयो भवत‌ 1 -सोऽहमितयव सचिनतय विहरत‌ सरवदा शरिय ॥

--गधरव-तनतव

म बरहमम अभिनन ह--इस परकार जञानक उतपनन होन स अजञानका

` शय होता ह । इसलिए साधक सरवदा योगपरायण होकर मही बरहय

ह" इस परकार चिनतन करगा ।

यथाभिमतधयानादवा ॥ --पातञजल-दशन

जिस किस मनोजञ वसतक मनम होन स मन परफटक होता ह, एका रताक अभयासरक किए उसीका साधक धयान करगा । धयय वसतम चितत “वयय अभयसत होनत सरवतर ही चितत परयोग मौर उसम चितत तनमय कर सकगा । तव सभी परभदभाव मनस बिदरित हो शएकागरभाव ससथापित होगा; मातमजञान की परापति होगी ओौर अनयानय बाहय चषटा

. भी रह जाएगी । यया--

यदा पञचावतिषठनत जञानानि मनसा सह‌1 वदधिशच न विचषटत तामाहः परमा गतिम‌ ॥

जव वदधि रनत बरषटारदित होती ह; जव पाप-पणय घरमाधम सख- ःखादि सभी दतभाव विरोहित होकर मन निशचल होता द, तव जीव ४ अत बरहमजञान समदित होकर परमगतिको परापत होता ह 1

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चग ओर मकति ] ताचिकगर [२२३

इस परकार जब तततवजञान उतपनन होकर वरागय उपसथित दोश, तनः

सब कर परितयाग करक सनयास धमका अबलमबन करन की तनमरलासव ओ विधि दी गई द ' यथा-

। तततवजञान समतपनन वरागय जात अदा । तदा सरव परितमजय सनयासाशरममाशरयत‌ ॥' ।

-महानिरवाण-तनतर , तब दखिय, वदिक शासतरादिस किसी विषयम तनरसासतरकी

"निकषटता परमाणित नही होगी; वरन अनक विषयो म अनयानय दासतरो म -तनकरका दी धाधानय दखा जाता ह । निदततिमागम भी तनतर थषठासन परापत कियाद ।* ।

इसलिय तनवरशासवरकी विधि-~वयवसथा सब कवल बरहयजञानक चिय दद । जञानोदय होन स भरमरप अनजञानस निवतति होगी । भजञानकी निवतति

नन स माया ममता, शोक, ताप, सख, दःख, मान, अभिमान, राग,

नष, हिसा, करोध, मोह, मातसय परभति अनतःकरणकी समपण बतिरया -निरोध हो जाएगी । तब कवर विददध चतनय मातर की सफति होती रहगी । इस परकार कवर चतनयसफति पाना ही जीवदशचमि जीवनमकति "एव अनतम निरवाण धरामि कहा जाता ह। तदिन कमकाणडदवारा य ` अनय रपम मकतिकी समभावना तनवर म कहीभी नही दिखाई दतरी नवरन‌ तनर न कहा ह--

यावनन कषीयत कम जभाञचदयभमव वा । तावनन जायत मोकषो नणा कलपरातरपि ॥ ` यथा रौहमयः पाजञः पादी: सवणमयरपि ! तथा वदधो भवजजीबः कममभिसचाशभः शभः । .

-महानिरबाण-तनव

# निवततिमाम का अरथात‌ सनयासाशरमकी करतवयता -साधनापरणाली परभति मर दारा रवित “शरोमिकगर"म विसतार सहित किसी गईह षः

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२२४ ] तातरिकगर [ साधनाकलफ

` जव तक सभ मौर सभ कका नाश न हो, तव तक सौ कलयम ` शमी मनषय की मकति नही हो सकती । जिस परकार शलल लौषप होः अथवा सवरणमय हो, दोनो परकारक शछखकस बनधन किया जाता द, उसी. परकार जीवगणका शभ जयवा मभ वोनो परकारक करमो .क दारा बनधन होता ह ।

कवलजञानहीमकतिकादहतह। वह जान किस रप म उतपकत . होमा + (

जञान तततवविचारण निषकामनापि करमणा । जायत कषीणतमसा विदषा निमरातमनाम‌ ॥

--महानिरवाण-बनकर

-तततवविचार गौर निषकाम करमानषठानदवारा आवरणलकति समपनन तमोरारिक करमशः विदरित होन स हदयाकाशञ निरमल होकर तततवजनानका उदय होता-द। |

तनरशासतरक. मतम तततवजञान पराति, का उपाय इस परकार ह- परथमतः गहसथाशरम भवसथितिपरवक गरदवक निकट मनवदीकषाकः दीकषित होकर पञभावानसारस हौवाचारदणरा समत कम करगा । बाद शाकताभिषिकत होकर पशचभावानसार दकषिणाचारदवारा साधना करगा । उसक वाद परणाभिषिकत होन क बाद गहावधत होकर वीरभ-

वानसार वामाचारदरारा साधना करगा । बाद म करमदीकषास दीकषित होकर वीरभावानकतार वामाचारदवारा ययाविधि साधनाम उननति लाभ

करगा । उसक बाद. सामराजयदीकषाम दीकषित होकर वीरभावानसार ` सिदधानतचाररारा साधना काय समपनन करगा । उसक बाद महा- . साचराजयदीकषास दीकषित होकर दिवयभावानसार कलाचारदवाराः साधना -करगा । अनत म पणदीकषा स दीकषित होकर दिवयभा- मनर ककाचारदयरा साधना को उलषबरि करगा । इस भवसव ह `

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योग गौर भकति ] ताचरिकगर [ २३५

शही होन पर उसको अपण कवावधत अयवा अपण बरहमावधत कहा - जाता ह । तब इचछानसार कब गहम अथवा कब तीरथम विचरण करगा

अरयात‌ परिवराजक होगा । यदि गहम न रह कर सरवथा सनयासाशरम

मवलखमबन करना होता हो, तब परण कशवावघत अथवा पण बरहयावघत होकर दिवय भावानसारस ककाचारदवारा साघना करक परमहस षटोगा 1

इसक बाद दिवयभावस परिपकव होन स ह सावधत. होकर योगी होगा ।

योगसिदधि होन स ही तततवजञान परकाशित होगा, तब गौर क नही

करगा; समाधिसत होकर कषितितलम वकषकोटरभ अथवा परवतयदाम .

निषकरिय होकर समय वयतीत करगा ।

सरवथा माया-ममताशनय होकर ससार परितयाग करक गिरिगहाम

वास करना सहज वयपार नी ह, इसक किए धीर-धीर सभी ससरगो - `

को छोडकर निजनम वासरकर वरागयाभयासत करगा । जिस वयकतिकी

साधना म सिदधि लाभ करन की इचछा ह, बह वयकति परथमतः निजनम

शदधाचारत शदधासन पर उपविषट होकर शरीरको ससथिर करगा । .. उसक बाद बदधिको निषचर कर अपन इषटदवताक परति भकतिस मनको परिपरण करगा । बदधिदटारा समसत जगद‌क अनितय बोधस इषटदवताओो भ अथवा आतमाम खय समकषगा । तब यह‌ ससार दषटदवतामय थवा

आतममय दरशन होगा ओर अपन को अभिनन सभकषगा । यह ससार सब

इषटदव अथवा आतमाम रय हो जाएगा तब कवल निदराभग होन पर जिस परकार समरण होता ह--उसी रपम यह ससार कवल समरण मातर.

रहगा । भरतिनियत इस अवसथाक अभयास वशतः जब मन जौर बदधिको इषटक शरीच रणोम अथवा आतमाम लय करक दीरघकाल अवसयान करन .

की कषमता उपसथित होगी तबः सचचिदाननद भौर जीवनमकत होकर

वनभ अथवा निरिकनदरम सवतर ही दवमय, बरहममय अथवा आतममय

रपम दखत हए इचछानसार अवसथान कर सकगा ।

ददद ----------- नन

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२३६] - तातरिकगर [ साघनाकलप

आतमनयभदव विभावयशनिद जानातयभशष . मयातमनसतदा ।

` . यथा ज नारितनिधौ यथा पयः

कषीर वियदरपोभनयनिङ यथानिलः ॥ जब साधक इस समसत अबत‌को अपन सवरपसहित अभदभावम

समहगा, तब जिस परकार समदरम परविषट जलम जल, दगधम परकषिपत दगध, महाकाशम षटाकाषच दौर महावायरम यनतरोतकषिपत वायमिधरित .

` होकर अभदरपरम परतीत होता ह । उसी परकार वही साधक परमातमाक

साथ अपन को अभदरपम जापर सकत ह ।

हसङिए‌ शासवम जौवणमकतिका रकषण दसरपम निदश किया ` . ह कि-जिस परकार अहशकिरणमाली दिवाकर अपनी किरणोक विसता दवारा चराचर हमाणड परकाशित करक सरवतर ही अवसथान करत ह । इस रपभ जनानविषषिषठ शो परष द, व ही जीवनमकति नामस पकार जत ह । यथा--

एव बरहम जनत अरवमखिल भासत रविः । ससथितः सरवभताना जीवनमकतः स उचयत ॥

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परिशिषट विशष नियम

तनवरशासवर किस परकार मोकषलाभका पथपरदरशक ह, उस बोध होता

३ कि पाठक भलीरभाति समकष पाए ह । . इसस तततवजञान मथवा बरहय.

शान भौर उसक काभका उपाय जिस परकार परदरशित हआ द, उसस कोई निरपकष साधक वदानतादि अपकषा तनतरको किसी भी विषयम

` भअदरदरशी नही कह सकता ह । तब तनतरस अनभिजञ की बात धतवय नही ह । वरन इसस सगण-बरहय-अथवा साकार ईशवरोपासना एव सथल दवदवी की जिस परकार सहज साघनापनया विकत ह, उसपर विचार करनस शतमखस तनवरकारका गणगान करना होगा । हमन

साधनाकलपम उस विशषरपम साधारण वयकति को गोचर कराया ह । इसक अतिरिकत तनम जो सब ङगरकम जौर अरविचयाकी साघना शयकत हई ह; परवम ही कटा गया ह कि हम उकषको अविदया-विभोदहित भानव समाजम परचार नही करग । तब कितनी करमानषठान पदधति ओर साघनाकौशल परिशिषटम गयकत करता ह, जो गहसबामी मानवगणक नितयपरयोजनीय ह । सामाभय साधनास शासतरम विशवास होगा मौर धन-धानयादि लाभ कर ओौर निरोग होकर सखस ससारम कारयपान कर सकगा । ओौर कितन तनतरोकत उपायस दरारोगय रोगपरतिकारकी विधि भी विवतत होगी । पाठक ! साधना करक-रोब-

भकत होकर सदन ही तनतरशासवरकी महिमा -समशषनम सम हो सकग । तब उन अनषठानोस लाभ उटानक छिए शाजनोकत ` कितन विशष नियमो को जान रखना आवदयक ह, नही तो फर नही होगा ६.

नीच नीयभो को किपिवदध किया जाता ह 1 ।

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२२९ | ताकरिकगह [ परिशिषट

अदीकषित वयकति सवा सिदधिक किए कवल कामयकमका अनषठान

-करक फल कौ पराति नही कर सकगा । दीकषित वयकति करमशः परणाः भिषक ओर करमदीकषा ससकारस ससकत होकर बादम कामयकरमकाः अनषठान करगा । परथमतः साधकक नितय -नमततिक सव काय परकषट-

रपम समपनत करजछन पर, किसी परकार विरष साधनाम अगरसर

होनरभ कषमता उतयनन होती ह । तब जिसक मनम जिस परकार कीः

अभिलाषा होती ह, वह‌ उसक अनरप साधनाम परत हौ सक। ` जिसका जो शषट ह, उसका उस विषयम साधना करना करतवय ह।

साधनानतर इषटसिदधि होन पर साधक तव सभी परकारस साघनाकायो कौ हसतगत कर सकता ह ।

साधारणतः घाधना दो परकारक ह--परटतति गर निदतति । परवतति

` साधना का उदददय यह ह कि इस ससारम स समदधिका भोग कर अनतम सवरगादिको परापत करना ह; निदतति साघनाका उददशय यह ह

कि इस ससारक सख भौर समदधि की दचछा परितयाग कर अनतरम कवल भोकषलाभ.फरना ह । इन दो परकारक साघरननोम जिसकी जिस परकार दति द, वह उख परकारस काय करता ह । निवतति साधना- ककष वयकतिकी भोग-समहा नही रहन पर भी उसको परवतति साधना- `

` काय समापनानतर निडतति-साधनाकायम नियकत होगा । अरथात‌ साधनाकाय सव जिस परणालीस विनयसत हए ह, व सभीक करन योगय-ह 4 उनम किसी की भोगसपहा रहती ह अथवा किसी की नही रहती ह--यही कवल परभद ह; किनत पदधतिक अनसार सभीको चरना होगा; न -चलन पर परतयवाय होगा भरथात इषटसिदधि नही होगी । यह कारण ह कि मन की परसननता नही उतपनन होगी; इसकए

इरह होगा । इसकिए तनतरका उपदश यह‌ द कि जब तक सषारसस-सयहा परिरपत न हो तब. तक गहसथाशरमम अवसथितिपवक नितय, नमिततिक भौर कामयादि सभी करम साधक करगा । उसक बाद

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चविरष नियम ] ताधिकगर [ ३९९

आगसपहाका अवसान होनस निदतति धमसाघनाक लिए सनयासाघमका

अवलमबन करगा । इह रोकम सख भोगक ङए जो सव वदविहित कम, ससार.फी परदततिक हत उस पदतति-धम की. साधना कटा जाताह ओर सखारनिवततिक हत विधास उसको निवततिधमका

, साधना कहा जाता ह । परवतति कमक सशोघन दवारा दवतलय मरति की पराति होती ह बौर निवतति कम की साधनादरारा भतपरपचका

अतिकरमण कर मोकष-जाभ होता ह । यथा-

सकामाइचव निषकामा दविविधा भवि मानवाः। अकामाना पद मोकषो कामिना फलमचयत ॥

--महानिरवाण-तनर

--इस ससारम सकाम मौर निषकाम यह दो शरणीक मनषय ह ।

इनम जो निषकाम, व मोकषपदक अधिकारीह। गौरजो सकाम &, ब ससारम नाना परकार की भोगयवसतका भोगः कर अनतम सवग- -लोकादिको परापत होत द । इसङिए सकाम वयकतिगण ही कामयकमका

अनषठान करमा ।

नितयनमिततिक करियावान‌ वयकति करमदीकषा अथवा परणाभिषक ससकार लाभ कर कामयकरमका अनषठान करगा । शाकत, दवादि पचच उपासकगण ही कामयकरमक अधिकारी ह । ओकार-उपासक . अथवा

, सनयासाशरम की कोई वयकति कभी भी कामय-करमका ` गनषठान नदी करगा । जो नितयनमिततिक कमसाधन न करक फल-राभस पररनध शोकर कवर मातर फामय-कमका अनषठान करता ह व मधिक शरात ह । कारण नितयकरम वयकति ही साधनता म योगयता परापत कर सकता

द, उसक अतिरिकत अनयक लिए साघनाकोरयम भगरसर होना कवल अनधया सपरीस सनतानोतपादन की चषटा सदश विफल, होता द । दसरए य साधनाकारयम आकानरप फर न पाकर शासतर की निनदा करन खमत ह । उसस दसर भी निरतसाह हो जतह। अतएवकिसीभी

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६३० ] तातरिकगर [ परिकषिषठ ,

साधनाकायभ फल लाभ करन की ञाडा रखनस सयतन नितयकरमका अनषठान करगा । एकमातर नितयकरम ही कामयकरमका अधिकारी ह।

- नितयनमिततिक करमानषठानकारी वयकति फलकामना कर जिस किसी कामयकरमक अनषठानम फललाभ कर सकता ह! दसरो की बह आशा दराशा-मातर ह । साधक सतयवादी, सयत गौर हविषयाशी होकर साधना कारयका अनषठान करगा । दवालयभ, वनभ, नदीतीर

पर, पवत पर, इमशानरभ, वरक दकष क मलदश अथवा जिस किसी निरजन सथानम गोपनीय ठगस पराधना करनी होती ह ।

साधनाक बिना कोई शानतिकरम, सवसतययन, पजा, होम अथवा सतवकवचादि क लएि भी परवोकतिरपस अधिकारीका परयोजन ह। नही तो फल लाभ नही होगा । मौर दीकषित बराहमण बिना तनतरोकत

यन-मनछा अनय कोई वयवहारम नही ला सकता । बराहमणक न रहनस शदरादि जाति अपन गर अथवा परोहित दइवाराय सब काय करा कग । गर भौर परोहितक अभाव अनय बराहमणक दवारा भी कराया जा

सकता द । शदरादि जो दीकषागरहण क वाद परणाभिषिकत हए, क सवथ ही सभी काय कर सकत ह । शदर परणाभिषिकत होन पर किसी

भीजातिक शदरही वयो न हो, बराहयण-गण-सदश सभी काकि

अधिकारी होग भौर परणवादि सभी वदमनतर उचचारित कर सकग । इसलिए अभिषिकत वय मौर शदरगण सवय पदवादकत काय करग, उसभ कोई वाधा नही । कित नितय, नमिततिक करियाहीन आचारशनषट वयकिक दारा कभी भी सफलकी आशा नही । यथा--

असत तावत‌ परो धरमः परवधरमोऽपि नशयति । शाभमवाचारहीनसय नरकाननव निषकतिः ॥

-- महानिरवाणतनम

-भो मभपरोकत आचारहौन ह, उसका तततव करमक कलपि धम दर रह, . पवखलचित धम नषट होया बौर उनक नरक स उदधारकय उपाय नही द।

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विदोष नियम ] तातिकगख . [ २३१

इसकिए परवोकतरप अधिकारी वयनिति पशचादकत साधना भौर

शानति कम भनषठान करगा । इसरोको फएल-लाभकी भाश नही ह ।

अनधिकारी वयकति साधना क अनषठान करन स विडमबना भोगगा

ओौर शासतरम अविदवासौ होकर जीवन विषमय कर दगा । उपयकत ससकार परापत करन पर यथाविधि भचार पालन करन पर साधना

भौर जप-प जादिका अनषठान. करन स निषचय‌ ही फक परात कर

सकगा--दिव वाकयम सनदह नही ह । हम भी बहत , बार पदचादकत ।

विषयो कौ परीकषा कर फर परास कयि ह । इसीस भोगासकत. मनषयो क लिए नीरोग गौर दीरघजीवन छाभका उपाय भोर भोग ओर भोगय

वसत सगरहक उपाय नीच . किसचजा र ह । पाठकगण ! तनतरोकत

साधनाका अधिकार परासकर करमानषठान-पवक शासरकी परीकषा करटः

उसस सवसय गौर निरोग दह परात कर भोग -सखस जीवन अतिवादिव

कर सकमा ।

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योगिनी-साघना

भरवी, नायिकादि अविदया गौर योगिनयादि उपविदया की साधनानि इस ससार म शयातिपरतिपततिक साथ राजाक सदश भोगविलासम कालातिवाहित की जाती ह । किनत अविदयासवी वयकति अनतम नरकरम अवदय जाता ह । विशषतः विष रीत बदधिकता उदय होकर मनोवासनाकी

परणताम भीविषन उतपादन होता द । दशपरसिदध काला पहाड दवता, धम,

गो गौर बराहयरणोकी रकषक किए मषटनायिकाको साधना करक किस

. परकार दवता भौर धरमकी रकषा की घी, बह किसीस भवदित नही ह ।

इसलयि अविदया-विमोदित भानव समाज भविदयाकी साघनादिको वथकत करना मगलजनक नही ह । तब उपविदयादि साधनाम वह‌ भय नही ह । वरन उस. साधनाम परदततिपण भोगवासनाक नाम महाविययाक साधनाका अधिकार परतत किया जाता ह। वही इस

योगिनीका विवरण द रह ह ।

शासतरादिभ कहा गया ह कि योगिनीगण जगजजननी दगदमबाकी

सहचारणी ह । इसकिए योगिनी-साधना करक जिस परकार भोगवासना को धण करिया जाता &। उसी परकार फिर उनकी सहायतास दषट-

साकषातकार लछाभकी भी सहायता भरात की जाती ह । इसीचिए भतभावव भवानीपति पराणीवरगक हितसाधनाय योगिनी साधनाका परकाषछब'

किया ह\ योगिनीकी धचना करक कवर धनपति हए द । इनकी अरचना करनस मनषय राजय परापत कर सकता ह । सब योगिनि

` जराठ परधान ह । उनक नाम ईस परकार ह, - सरसनदरी, मनोहरा; कनकवती, कामशवरी, रतिसनदरी, पथमिनी, नटिनी ओर मधमती । इनरमस एककी साधना भानव अञष सख गौर समपततिका मधिकारी

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(विहोष नियम ] तातिकगड [ २३३

दो शयाति परतिपततिक साथ ` दीधकाल ससार यतराका. निरवाह कर

-सकता ह । इस परथम सभी योगिनियोकौ साधनापदधतिका विवरण.

दना असमभव ह । हम कवल सवशरषठ मधमती योगिनी की साघना

-परणाीको इस सथल पर वयकत करग । जिस किसी एक योगिनीका -साधना करनस ही मनोनाछा पण होगी । तब सवसिदधि-दायिनी

मधमती दवी अतिगरहय ह । एकमातर इनकी सधना स मानव का

सरवाभीषट सिदध हो सकता ह ओर साधना भी योडी सहजनसाघय हो सकती ह ; इसी स हम मधमती दवी की साना-परणाी को परकाशित

कर रह ह।

धीमान‌ साधक हविषयाशी भौर जितनदरिय होकर योगिनीकी

-साधना करगा । इस साधना क लिए वसनतकाल उपयकत होगा ।

उजजट परानतर वापि कामरप विशषतः --डारमतन

` उजाड अथवा परानतर म साधक इस साधना को करगा, विोषतः

-कामरप म यह सिदधि का विकषष फलपरद होता ह । इन रब सथानो

सच कोई एक सथान पर भी योगिनीका धयान करक उनक दरशनक लिए -सभतसक हो सयत चिततस इस साधनाको करग । एस परकारक विधान

को करन स निदचय दवीका दशन परापत कर सकत ह । जोदवीःक

सवक, व ही इस कारक अधिकारी ह । बरहमोपासक सनयासीगणोको

इस कायम अधिकार नही ह । यथा-

दवयाइच सवकाः सव पर चातराधिकारिणः। तारकबरहयणो भतय विनापयतराधिकारिणः ॥

धीमान‌ साधक परातःकाल गारोतथान कर सनानादि नितय िया

खमापनक अनतम ““हौ"” हस मनवत, आचमनकर “सहार ह फट‌”

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२३६ ] तातरिकगर [ परिशिषट

इस मनधस दिगबनधन करगा । वादम यथोपयकत सथानम साघनाका

आयोजन कर पजा दरवयादि लाएग । उततर अथवा परम खस जिस

किसी आसन पर बठकर (दस कारयक लिए रगीन कमबलासन परशसत}

भप म कक मदारा धयानान यायी मधमती दवी की परतिमति भकितः

कर उनक वाहरी भाग म अषटदल पदम लिखगा । इसक बाद माचमन

भगनयासादि करक. “सयः सोमपाठ परवक सवसतिवाचन करगा । उसकः

बाद सरयय सथापित कर परणाम करगा। वाद म मलमनवरस १६।

६४।३२ सखया स तीन बार पराणायाम कर-ादी ह. इ ही हः" भनरदवारा अगनयासर जीर करनयास करगा । उसक बाद भजपतरपर इस अकित मतिम जीवनयासटारा पराण-परतिषठा ओर पीठ दवता

आवाहन कर मघमतीका धयान करगा ।

8 शदधसफटिकसकाशा नानारतनविभरषिताम‌ । जीरहारकभर-रतनकणडलमणडिताम‌ ॥

इस मनरका धयान कर मलमनतरस दनीकी पजा । मलमनतर | उचचारण परवक पादादि परदान कर धप, दीप. नवदय, गधपषप मौर

तामब निवदन करगा । पजादि सामानयपजा परकरण की परणारी सः

समपपत करगा । बादम पजा समास कर फिर पराणायाम एव अग भौर करनयासः

: समापन करक योगिनीका धयान करत हए जपक नियमान सार समात विततय षदटननवार साक जप करगा । उसक बाद फिर दवीक हाथम

जपफल समरपण ओर भकतिभावस साषटाग परणाम करगा । मधमती दवी

का मतर -यथा-- “उही आगचछ अनरागिणि मनपनिय

। सवाही" यह‌ मन गरक निकट स मन लन स अचछा होता ह ।

यह साना कषणयकष फी परतिपदा तिथिस आरमभ कर गघ, पषप, धप, दीष, नवादि उपचरारस तरिसधया दवी की पजा भौर एक सदल

छप करया । द परकार एकमास पजा भौर जपकर प णिमा तिषिक

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विष चियम |] तातरिकजर {२३५

भरातःकाम षोडदोपचार स साधक दवीकी पजा करगा । बादम एत भरदीप ओर धप परदान कर दिवारातर मशाका अप करता रहगा । रात

भ दवी साधक को नानारपस भय दिखाएगी ) उसस साधक भयभीत

न. होकर जप करता रहगा । दवी साधक को भी ददभतिजञ जानकर

भरभात समयम साधक क निकट आगमन करगी । तब साघक फिर.

भकतिभावस पादादिदटारा पजा, उततमचदन गौर सगधित पषपमाल ` भरदान करत हए दवी को माता, भगिनी, भारया अथवा सखी समबोघनः कर वरगरहण करगा । जाद म दवी साधकको भभिरषित वर परदानः कर परसथान करगी ।

योगिनी-साध नाम सिदधिकाभ करन स दवी परतयहरातम साधकक- निकट आकर रति र भोजन दरवयदवारा उसको परिपोषित करती रहती ई । दवकनया दानवकनया, नागकनया, यकषकनया, गघवकनया, विदय धरकनया, राजकनया, भौर विविध रतनभरषण भौर चरवथचोषयादिनाना भकषय दरषय भदान करती दह! दवी को भारयाङपि स भजन करन पर

साधक अनयसतरीक परति मासकति परितयाग कर, मनयथा दवी करदधाः होकर विनाश कर दती ह1यथा--

अनयसनीगमन तयकतवा" अनयथा बशयति धवस । ,

--भत-डायर

साधक दवीक परसादस सरवजञ, सनदरककवर भौर शरीमान‌ होकर निरामयदहस दीकालतक जीवित रहता ह । सव गमनागभनकि' `

शकति उतपनन होती ह । सव, मतय भौर पाताकम जो सब वसत विदय

भान ह, दवी साधककी आनञाक अनसार उन समसतको काकर रसः अपण करती ह मौर परतिदिन परायित सवरण-मदरा उस परदान. करती द । ` भरतिदिन जो पाएगा, उसको समपणरपस वयय करगा ; किचिनमाकतः अवशिषट रहन पर भी दवी कपिता होकर भौर कर परदान. नह

कररभी ।

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२३६1 ` तातरिकगर [ परिशिषट

रम, सादध तया दवी साधकनदरो दिनदिन । । वसार

` साधक इसी परकार योगिनीसाधना कर परतिदिन दवीक सदिव ऋीडाकौतकादि करत हए सखस जीवन-यापन करता रहता ह ।

हनमददवको वीरसाधना

योगिनी-साधना करक जिस परकार भोग-विलास किया जाता द, ` उसी परकार हनमत‌ साधना करक शौय-वीय लाभ करक पथवीभ अपना आधिपतय सथापित किया जा सकता ह । उसी कारणस म हनमद‌ बकी -साघना-परणारी भी. विदत कर रहा ह । गरह साघना-परणाली महापणय 'जनक.मौर महापाप-नाशक ह । हनमद‌ वकी साघना अतिगदय भौर -मानवक किए शीघर सिदधिपरद ह-- जिसक परसादस अरजन चरिलोकजयी ए च । यवा-

एतनमनरमरजजनाय परदतत हरिणा परा।

अयन साधन कतवा जित सव चराचरम‌ ॥

। --तनरभरार --इनमत‌ साधनाकरा मनतर परवम धीहरिन अरजनको पदान कषिया

"आ । अथनन दसी मनमरकी साघनास चराचर जगतसको जय किया धा।

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हनमतसाधना ] तातरिकगर [२३७ गरदवक निकट हनमनमतर गरहण करक नदीकरल पर, विषण-

मनदिरम, निरजन अथवा पवत पर एकागरचितत होकर साधना करगा ।) “ह पवनननदनाय सवाहा" यह‌ दशाकषरहनमनमनर मनषयक लिए '

कलपदधकष सदश ह । हनम वक अनयानय मनतरौ म स यह मना धषठह,

आदयफल परद ह ओर अतयनत सहज साधय ह । अनयानय भरनतरो-सदर-

इस मनतर यनतर, पजा अथवा होमादि नही करना होगा, कवर मातर

तपस ही सिदधिकी पराति होगौ । साधनाकी परणाली दस परकारकी ह-

साधक बराहयमहकतम उठ कर सधया-वनदनादि नितयकरिया समापन.

करक जनतम तीरयावाहनपवक आठ बार मलमनभरका जप करगा । उसक बाद उस जल दवारा मपन मसतक पर दकशषबार अभिषक कर दो वसतरोका परिधानकर नदीतीर पर अथवा पवत पर बठकर “णा थगषठाभया नमः" इतयादि परकारस करनयास भौर “हवा हदयाय नमः इतयादि परकारस अगनयास करगा । उसक बाद अ-कारादि षोडशः सवरवरण उचचारण फर वाम नासापटम वाय परण, क-कारादि. म-कारानत पचीस वरणो को उनवा-- रित कर कमभकः भौर य-कारादि कषकारानत नव वरणोको उचचारित ` कर दकषिण नासास वायः रचन करगा । इस रपम दकषिण नासास परण, दोनो नासा परटो क धारणस कमभक ओर वाम नासास रचन” करगा । इस परकार अनलोम-विलोम करमस तीन बार पराणायाम कर भावणदवारा भगनयास परवक धयान करगा ।

धयायदरण हनभनत कोटिकपिसमनवितम‌ +.

धावनत रावण जत दषटवा -सतवरमतथितम ।1.

लकषमणञच ` महावीर परतित रणधतल.।

` गखब करोधमदपाय गहीतवा गरपवतम‌ ॥४

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२३८] । तातरिकगख [ परिदिषट

हाहाकारः सदरपशच कलपयनत अ गतवयम‌ ।

आबरहयाणड समावापय कतवा भीम ककवरम‌ ॥*

इस धयानानयायी हनमद बका चिनतन करत-करत उनका परवोकत

अनम यथानियमस छ हजार बार जप करगा । जपक अनतम फिर तीन

चारः परणायाम कर जप समरपण करना होगा ।

इस भरकार छ दिवस जप करक सातव दिवस-दिवारानि वयापी

` . जप करता.रहगा । हस परकार एकागर चिततस दिवाराचनि मनतर जपनस

रात बौय भाग म महाभय परदशन पवक निडचय हनम व साधकक

. शषमीप आण । यदि साध भय छोडकर दद‌ -परतिजञ हो सक तव साधक

` को अभिलषित.वर परदान करक रहग । यथा -

विदया तरापि धन वापि राजय वा दातनिगरहम‌ ।

ततकषणादव चापनोति सतय सतय सनिशचितम‌ ॥ - --तनशरसार

शराधक विदया, धव राजय शमथवा राचनिगरह जो कछ अभिलाषा ,

करत परात कर ठभ--सनदह नदी । बादम साधक वर परापत कर यथा-

मख ससारम विदार कर सकगा ।

# हनमान रणमधयगत एव कोटि-कोटि कपिगण स परिदरत । य

रावणकी परराजयक लिय दौड थ, उनको दखकर रावण सतवर खडा हो

गया था। महावीर लकषमण भमिपर पतित द, उनको दख न य करोधत

भरकर महापवत उतपाटन परवक सदप हाहाकार धवनिस चिभवनको

कमपित कर विष ह । य बरहमाणडवयापी भीम कटवर परकाराकर अवसथित

द । नस इ भाव का चितन करत-करत जप करना होगा ।

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सरवतता आभ

- हम पट ही कह ह कि महायोगदवर महादव योग ओर शनम- शशासटाक वकता ह । योगलासजम सकषमसाधना भौर तनतरशासम सथल- साधना का विषय वणित हजा'ह । योगाभयास कर जिष परकार आतम- जञान लाम मयवा अलौकिक शकति का लाभ होता दह,.उसी परकार

. "तनरोकत साधनाभ भी इषटदवताक परसादसत मकतिका कारण जञान -अथवा अमानषी शकतिका लाभ होता ह। तब योगरकी सकमसाधनाम -मातमशकति का विकास होता ह भौर तन की सथलसाघनास आतमा ` "की वयषटिराकतति सथल मावरणस आवत होकर दवतारप भ शकति परदान `

` -करती ह, यही भभद ह । नही तो योग जौर तनतर एक ही पदा ह- -सकषम ओर सथलम विभिनता । जगत‌ म जितनी भिनन-भिनन शकतियो का विकाश दखा जाता ह, सभी एकमातर ` आतमा की शकति द । सकषम -कारण-सथरम काय । इसी स योगाभयासम अपनी ही सकमशचकतिका विकास होता ह गौर तनतर की साधन। म वही सकषमशकति-सथक दवता क रपम आविभत होकर साधककी काय सिदधि कर दता ह। रमाण

सवरप हम तनगकी साघनाकरी विभतिकौ उपलबधि क उपायका विवरण ¦ द रहरद। तब जिस शकतिलाभस जगत‌का अपकार होता द, हम

उसकी ओर दषटि नही डालग । उदधत वयकतिक दायोम शाणित असतर , -जिस भरकार भयपरद ह । उसी परकार असयत चितत वयकतिकी शचकति

आसि बिषजजनक.ह । उसी पर विचार कर हम ङरशकतिक खाभक ` उपाय पर परकाश नही डाल रह । कव मान तनत क पराधानय

साधना . करई एक मगल जनक शकति-विकासक अथवा लाभ क उपाय को किपिकदध करिया । ।

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२४०.] तातरिकगर [ परिविषट

विभति-लाभक लिए तनवरशासतरम पिशाच भोर कणपिशाचीक मनव भौर साधधनाकी परणाटी ह । पिशाचकी साधनाम मानव पिशाचलवषलाभः

कर रहता ह । किनत कणपिशाचीक मनतरजयम वह भय नही ह अयच

सवन हमा जा सकता ह । जो कोई परन हो उसका ओर साधकक

कानम .पिदयाची "बोर दती ह । इसलिए उसको साधनाम मनषय कीचर

ही सवचता परापत कर सकता ह । यथा--

एव मनतरो लकषजपतो भयासन ससबितः।

सारवजञघ' छभतडविरणनियत पशाचिकी भकतितः ॥

व | --तनवरसार

कणपिशाचीकफा मनम एक लाख जप कर भगवान‌ वदवयासन शीघर

बरवञता परा की थी । इस नयास, पजा, होम मौर तपण किए विना

मातर जपदरारा कणपिशाचीकी साधनाक उपाय पर परकाश शरत ह ।

अयानय मनरपिकषा परचालिखित मनव ही धषठ गौर शीघर फलपरद ह ।

"की जयादवी सवाहा” दस ममरको यथारीति गरहण कर

नियमानसार परयमतः एक लाख जप करगा । साधक एक श गोधिकाकोः

भरकर उसक ऊपर यथाशकति जयदवीकी भजा करगा । जबतक वह

गह गोधिका जीवित नहो जाय, तब तक जप करता रटगा । जब दखगा

कि वह गह-गोधिका जीवित हो गई ह, तव भौर जप करनका परयो-

` जन नही ह । तव समनन लगा कि मनवरकी सिदधि हो गरई। इस मनतर

सिदध होन पर साधक जव मन ही मन कोई परशन करता ह, तब दवी

धा जाती ह गौर साधक अपन पीछ भत गौर भविषयतक विषयम

. सव कठ लिखा हमा पाता ह ।

` छनवरम ओर भी एक परकारका कणपिशाची मनतर ह उसकी साघना-

परणोरी मौर भी कठिन ह । मर-यया-- ही कणपिशाचिम करण

. कथय ह फट‌ सवाहा" । रातरिम धीमान साधक दोनो १ परदीपतलः

महन फर इख मनरको यथा नियम एकागरविततस एक लाख . जपगा ;

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दिवयदषटि लाभ] ताधरिकगर (२५१. इसः-मनतरम पजा अयवा घयनादिका परयोजन -नही ह + इस परकार जप

. करतस ही उकत मनतरस सिदधि परात कर सकता ह । तव साधक सरवजञ हो .. . जातादह.।

इस साधनम . सिदधि-परात करन. मनषयक भाव, .भत; गौर भविषयतक विषयम साधक सब जान सकता ह ।

दिवयरषटिः लाम

धीमान‌ साधक - यकष दवकी मति निरमाण कर ॐ नमो शराय सदररपाय नमो बहरपाय नमो विशवरपाय . नमो विशवातमन नमसतत‌- परषयकषाय नमो यकषरपाय नम एकसम नम एकाय नम एकरीरवाय नम एकयकषाय नम एककषणाय नमो वरदाय नभः-तद तद सवाहा"--इष

मनरको सयतचिततस एक हजार आठ बार साधक जप करगा।

` इस परकार सिदधि-लाभ कर दिवयदषटि लाभक जिय सधना करनी होगी ।

| परथमतः हिजजलदधकषका पतर सगरह कर गहम ससथापित करगा। उसक बाद चिता, रजकशरह अथवा तसकरणगहस ““3ॐ> जवलतिविदयत सवाहा” . इस मनतरस अगनि गरहण कर परवसथापित पतरम `अगनिको भरजवलित करगा बादभ “ॐ नमो भगवत वासदवाय ` बब -शरीपतय सवाहा" इस मनरस वतिका अभिमनतरित करक 2 नमो भगवत सिदधिसाधकागर जवर उव पत पत पातय पातय बनध बनध सहर

५६

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२५२] [र ततरिकगर [ ¶रिषिषट

सहर दरधय दललय निधि मम'* इस मनतरस साधक परदीप भरजवकित

करगा । “2 र मनसिदध भयो नमो विदवभयः सवाहा इस मनवस . कनजड परसतत करक “2 कालि कालि महाकालि रकषव मञजन नभो

विषवभयः सवाहा" दस मनतरस अभिमनवित करगा । हम जचञखनदारा

चकष बलित करनस दिवयदषटि परात होती ह ।

। सवण शलाकादवारा उकत कजजल. "ॐ सरव सरवसदित सवौषधि भरपाहित विरत नमो नमः सवाहा” इस मनतरस चकषम अजन परदान

करगा ।

इस अजनक परदान मातर ही साधकको दिवयदषटि परात हो

जामगी । तब धोरानधकार रातम दिवा भाम सददा समसत वसत वखी . घाषटगी । सिदध, चारण परभति सकषमदवयोनि, भ-खिदर ओर गततघनादि

दिखाई दगा ।

-अदशय होनका उवाय

नितयनमिततिक करियावान‌ साधक पवितर होकर “रातम शमानम

1 बठकर नग होकर “ॐ दौ" ही सफ" मशानवासिनि सवाहा" इस

-मनवफा चार लाख जप करगा । दसम सनतषट होकर यकषिणी साधकको

पादका परदान करगी ।

तवावतो वरोऽदशयो विचरद‌ पथिवीतङ । -कामरतन-तनतर

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-अदखय होन का उषाय ] तातचिकगर । [ द

उस पादका रा पददधम आडत कर समसत पचची पर विनरण -करनस भी उसको कोई दख नही सकता ह ।

आकनद तला, शिम तला, करपास तला, पटसतर ओर पदमसतर इन “पनचविध दरवयो दारा पाच वतति साधक परसतत करमा । उसक नाद पाच मनषय-मसतककी खोपडियो म सथापित कर नरतनदधारा इन पाच -दीपोको .जलाएगा । उसक बाद दसर पाच नरकपालोको जाकर इन . "पाच दीपो की रिखास पथक‌-पथक‌ कजञजखपात करना हौया । नाद `

डन पाच परकार कजजलोको एकव कर "ॐ ह फट‌ काकि कालि मास- चोणित खादय खादय दवी मा पशयत मानषति ह फट‌ सवाहा" इस -मनवस एक हजार आठ बार जभिमनतरित करगा । इस कञजचक दवारा

चकषको अजित करनस बह वयकति. दवताओको भी नही दिखा द -सनता द । ““कवरलोकयादकयो भवति" अरथात‌ विभवनम उसको कोई

नदख नही सकता ह ।

यह‌ साघना-काय ` उमशानसथ लिवाकयम ही करना परशसत ह.

नदमशशानम शिवालयक अभाव जिस किसी दिवालयम करना होया ।

नडस अदशय कारिणी विचाको परास करनस अपन दी अधिकार परासत होना चाहिए । इसक कयि रातम निशाचर का धयान करत दए वामहसत-

दारा ॐ नमो निशाचर महामहशवर भम परयटत सरवरोकलोचनानि चनधय बनधय दवयाजञापयति सवाहा” इस मनवको एकागरचिततस जपमा ।

` अदयकारिणी विचा लकषजापय परयचछति ॥ ` --कामरतन-तनतर

यह अददयकारिणी चिदया लकष जपस सिदध होती ह 1 षाटठक 1.

विधिका उललघन कर तनतरोकत कारयक फल लाभकी आदान कर ! `

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, पादका-साधना

वीर साधकः ककतियि गौर कलनकषतर यकत मगलवारको गाधी ` रातक समय निमबकाषठ दमशानम परोथित कर उसी सथान पर बठकर

. ^ महिषमरदिनि सवाहा ही" मथवा ‹ कली महिषमदिनि सवाहा ॐ“ इस महिषमरदिनी मनतरस एक जाखर आठ वार जप करगा ओर समशनानम

रहकर एक सहल होम करगा । वादम उस मिमबकषटको उठाकर

उसम पादका अकित करनी होगी । वादम दरगाषटमीकी रात इस निमबकाषठको मशानम निकषप पवक उसक ऊपर शव सथापितत कर यथाविधि पजा करगा । इसक बाद उसी रमशानम बठकर एक सदन

आढ वार जप फर मातगणक उद‌ शयस बलि दकर काषठका आमनतरण करगा । आमनवणका मनर-

` "गचछ गचछ दरत गचछ पादक वरवणिनि । मतपादसपदमातरण गचछ तव शतयोजनम‌ ॥. `

इस मतरस आमनरण कर उकत निमबकाषठम पाद-सपरामाघरस साधक

अरभिकषित सथान पर उपसथित होगा । महततम ही शतयोजन पथः अतिकरम किया जा सकता ट । इस पादकाकी साधना कर साघकगण अति अतप समयम पथवीक एक परानतस दसर परानतम विचरण कर सकत ह । .

करवाक-मर, भिरिमाटी,. सनधव, मालतीपषप, शिवजटा ओौर भमिकषमाणड सबको सम परिमाणम ककर उततमरपम पषण करगा । नावम उस .ओषध “ॐ नमो भगवत रदराय नमो हरित गदाधराय भरासयःशरासय -कलोभय कषोभय चरण सवाहा" इस मनतरस अभिमनवित

करषा । `

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, वादका-साघना ] तातरिकगर ` [ २४५

तलकिपतपादः सहसा सहरयोजनम‌ बरजत‌ । । --कामरतन-तनध

इस ओौषधिदरारा पादकपन करनस सहसरयोजन तकर गमन कर `

सकगा सनदह नही । ॥ ।

तिलक तलक साय आकोडढकषक भकलको पकयएगा 1 बादम “ॐ

नमशचणडिकाय गगन गगन चालय वशय हिलि हिलि वगवाहिनी

सवाहा” इस मनवस यथाविधि अरभिमनतित कर वह‌ तर पादस जान - परयनत लपन करनस बहत दर तक अनायास ही-गमनकियाजा सकता ह ।

पाद सजानपयनत छिपतवा दराद रारधवगा भवत‌ । ~

अरथात‌ इस तको पादस जान तक कपन‌ करनस उपर-नीष वहत | शरतक अनायास ही जाया जा.सकता ह ।

छ (9

अनावषटिहरण

यथाविधि वरणदवकी पजा कर उनक मनतर जप" करनस निशचय दी दषटि होगी । पजाकता नियम इस परकार ह-

परथमतः सवसतिवाचन कर साधक सकलप करगा । उसक बाद गणशादि पच दवताओकी पजा कर यथाविधि -भरत-शदधि, पराणायामः; अगनयास, करनयास समापत कर‌

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२४६ ] ` तानविकगर । { परिशिषट

ॐ पषक रावततकरमषः पडावयनतम‌ वसनधराम‌ । वि-दगजजितसननदधतोयातमानम‌ नमामयहम‌ ॥

यसय कशष जीमतो नदः सरवादधसनधिष । ककषौ खमदराशचतवारसतसम तोयातमन नम+ ॥

. इख धयानमनतरक पाठानतम अपन मसतक पर पषपदान भौर मानसो-

` पचार स साक पजा करगा । बादम अघय सथापन भौर फिर धयान

कर वशणदवक आवाहनपरवक यलालकति उनकी पजा करगा, वादः

जपका अनत करना होगा । जपक साथ चिनताचचकति, करियाशकति भौर

इचछादकतिक सयोग होनका परयोजन ह । इसीस जपक पव ^शरजापति-

कषिसतरिषटप‌ छनदो वरणो दवता एतदराजयमभिवयापय सदषयथ जप ` विनियोगः” इस मनवरको पाठ कर इस तरिखकतिको सथिर करना,

हौवा ह । बादम नदी, अभावम पषकरिणीम नाभि तक जलम खड दोकरः

९4 ब" इस मनतरका आठ सहसर बर जप करनस निशचय ही

दषटि होयी ।

मकम परविषट होकर “८ शरी ह” इस मनतरक जप आरमभ करन

विना पजा भौर धयानक भी दषटिपात होता ह ।

० © क

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अगनिनिवारण

गरहम भाग ऊगन पर सरति जर ( जिसकरा-तिसका सरया हमा भी .जर होनत कोई कषति नही ) ककर-

“उततरसया दिगभाग मारीचो नाम राकषसः।

तसय मतरपरीषाभयाम‌ हतो वदधिः सतमभ सवाहा ।“

इख मनपरस सात बार अभिमनतरित कर अगनिम निकषप करगा ।

उसस जितनी वगशाली आग कयो न हो, शीघर ब जाएगी ।

(१) ॐ ही महिषमदिनी अगनिको सतमभन कर, मगध कर, भद

कर, अगिन सतमभय उट‌ । (२) ॐ मततक ठीट छयदन म कटीर- मषसी आकिपयागनाय मदीयत शनक विजञ मनतरी ही फद‌ । |

इन वो मनतरम जो कोई एक मनतर यथानियम दससहलरबार जप

करनस मनषय जवलनत भगनिम परव कर सकता ह, उसस धरीरभ किसी सथान पर तजका अनभव नही होता ह । महाराज ठाकरकी

काकीसथ बाडीकी घटना भौर ठाकाक डा० तरणी बाकी भगनि-

, करिया जिसन दखी ह, उनक निकट ओौर इस विषय भ सतयता क

परमाणका कोई भरयोजन नही ह । अधिकारी वयकति साधना कर इसकी

सतयताकी उपरचधि करगा । `

1

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४ सरथवशचिकादिका विषहरण ।

साप आदिक काटन पर तनवशासवरक अनसार मनव परयोग कर आरोगय किया जाता द। किनत उसस परव मनतरपरयोगकारीको विष-. हरागि मनतरत सिदधि शराति करनी होती ट । विषहरागनि मनतर यथा-

“ ख स” 1 उकत मनरकी पजा परणाली इस करपम- सदाचार समपनन वयकति सामानय पदध तिक नियमक अनसार परातः-

कतयादि कर-शिरसि अगनय ऋषय नमः--मख पकतिछनदस नमः- ` इदि मगन दवताय नमः--गहय ख वीजाय नमः--पादयोः बिनदजञकतय , नमः इस रपभ ऋषयादि नयास करगा । बादम खा बगषाभया नमः-खी

तरजजनीभया सवाहा-- ख मधयमाभया वषद‌-स अनामिकाभया ह-खी कनिषठाभया वौषट‌-खः करतलपषट(भयामसताय कट‌. इस परकार करनयास गौर खा हदयाय नमः-ली शिरस सवाहा--ख शिखाय वषट‌--ख कव चाय हलो नतरतरयाय वौषट‌-खः करतलमपषठाभयामसतराय फट‌ इस परकार अगनयासकर वशवानर पदधतिक नियमक अनसार इस मनतरका धयान भौर यथाशकति पजादि करगा । उसक बाद "ख ख" दस, मनतर स यथाविधि बारह राख जप कर पङचरणाग होमम इतदटारा.

बारह सहलन आहती परदान करनी होगी । इस परकार विषहरागनि-

` भनतरका“परषचरण कर रखनस जव-तव सपदषट रोगीको आरोगय किया. जा सकता ह । - `

करिसीको सापि काटन पर उकत साधक अपन बाए' करतलम पनचदक अकित"कर उस पशमको पवतवरणरप समकषकर आरः उस पदमकी करणिका. मौर परदलम “ख” इस नीज को चििगा; भौर बादम रकतवरणः ओौर. -अमतमयरपम . चिनतन करगा; उसी हाथ दवारा सप करनस विष विनषट होगा । इस परकार हसतदवारा विष पीडति गयकतिको

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-सरप का विषहरण | तातरिकमर [ २४९

-सपश कर एक सौ आठ वार विषहरागनि मनतरका जप करनस सभी

परकार क विषका नाश हो जाता ह।

ॐ नमो भगवत गरडाय महनदररपाय परवतरिखरकारखपाय

-सहर-सडर मोचय मोचय चालय चारय पातय पातय निनविष निषविष,

विषमपयमत ˆ चाहारसद रपमिद पराजञापयामि सवाहा, नमः रल लल

बर वरदन दन कषिपकषिषप हर हर सवाहा इष गरडमनतरका पाठ,

-करस भकषित सथावर विष अमततलय हौ जाता ह। विषाकत

अननपानादि भी इस मनतरका पाठस निशचय भमतवत होगा ।

सपरण वनतयञच नागरि बागभीषणम‌ । जितानतक विषारिच अजित विरवरपिणम‌ ॥

गरतमनत खगशचऽठ ताकषय करयपननदमम‌ । अरथात‌ सपरण, विनताननदन, नाग-शतर, सप-भीषण, दामन-विजयी,

-विषारि, अजय, विशवरपी, गरतमान‌, खगनदर, ताकषय जौर करथपननदन +गरदसतवोकत य बारह नाम जो वयकति परातःकालम गानोतयान कर सनान कलम अथवा शयन कारम पाठ करतादह। उस पर किसी

-अरकार विष अपना परभाव नही डा सकता ह ।

विष नाकरमत तसय न च हसति हिसकाः।

सगराम वयवहार च विजयसतसय जायत ॥। । | ल

छस पर विषका परभाव नही पड सकता ।. किसी परकारका हिल

-जनत दशन नही कर सकता भौर सवतर उसकी विजय होती ह ।

, "ॐ कषः सवरपः ॐ हिकति हिलि भिक भिक चिकि चिकि हसफः ;ॐ हिलि हिलि च हसफः बरहमण फः इनदराय फः सरवभयो सफः*" इस. मनतरस

-बदिचकादिका विष नषट होता ह । ।

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२५० ] तातरिकगर [ परिशिषटः . “ॐ गरिठिः"” इत मनतर स मषिकादिका विष नषट होताह। `

. ^9हाही हः सवाहा ॐ गणडस ह फट‌ इस मनव स लतताः (मकडी) का निष नषट होता ह ।

“® तमो भगवत विषणव सर सर हन हन ह फट‌ सवाहा" इस मनतर स सभी परकारक कीट-विष विनषट होता हि।

तनय य सव विषय इतन विसततरपम लिला हभ ह कि उसको: - एकसथान पर किखनस परकाणड एक पसतक हो सकती ह । हमन भितन- भिनन विषयो भ स एक-दो उदषत किया ह । विषय-विसतारक भयस सकषप समापत किया ह ।

षणम

शलरोगका परतिकार ` शखरोग महावयाधियोमि परिगणित ६। बयरवद-शासतरम इस रोक-

को “इचछाधय'” नामस रिखा गया ह । तनतरोकत उपायस इस रोगस- यकत हभा जा सकता ह । करियावान‌ तनरोकत साधकदरारा इस रोगका ` ` परतिकार होना चाहिए । । |

अभिनन साधक परथमतः आचमन भौर सवसतिवाचनकर--““ॐ>- भ तयादि बमक-गोरसय शरौ गसक-दवशरमणः दररोग~परतिकार-काम- - नाय भमक मनव सह ( मयत लकष वा } जपम करिषयामि !*.इस - मनरका पाठ कर साधक यथारीति सकलप करगा । उसक बाद शिव-- कगिम "मबकपजा पदधति क विधान स यथाशकति पजादि ह मौदषटमः धिवतमः शिवो नः समना भव परमोबरहमा आयाकनिधायः हतत वान आचारपिनाक विभरदागटि" इस मनवत सथिर-विततः

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= 1 मनतर ] ताजिकमर [ २५९.

एकतान मानसस जप करगा । जितनी सखयाका जव सङकलप किया गा द, उतनी सखयाका जप करना होगा । सकलपक समय जपयः अनरका उलकख करना होगा ।

मनरका परयोग करन स शररोग अति सरकतास आरोगय होताः हिः 2, यह‌ बात परनथकारक परिचित वयकतियो को समलञाना नही होगा ।

अबतक चार-पाच सौ रोगी गरनयकारक निकट आरोगय दए ह, इस को व जानत ह । जिन लोगोन परसिदध चिकितसकणणतत परितयकत शल- रोगस गरसत अकरमणय वयकति सख ओर सवासथय कौ जादाको छोडकर ` मतय की कामना करतय व किस परकार नवजीन भरा किए, उस

बहतस गयकतियोन भरतयकषरपस दखा द । यदयपि उसकी परयोग-परणाछी ` विभिनन ढग कीर; किनतएक दही शासतर की वयवसथा ह। इसकिए

एस भनवरस भी उसी परकारका फल परापत होगा--सनदह नही । सवय

दिवन का ह-

साकचानमतयोविमचयत किमनयाः कषदरिकाः करियाः ।

इस मनदस साकषात‌ मतय का निवारण किया जा सकता ह-कषदरः काय साधन सनदह कया ?

= © न

, सख-परसव मनतर

निमनलिखित दो मनतरोस कोई एक मनव दवारा किञचित‌ जलः बभिमतरित कर उसौ जलको पान करान स अतिशीघर गौर सखर

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२५२ ] ' तातरिकगर [ परिशिषटः

` परसव हो जाता ह । परतयक मनतरका आठ वार जप कर जल अभि

` अनवित करना होता ह ।

१-ॐ मनमथ मनमथ वाहि वाहि लमबोदर मख म सवाहा ।

` ए-मकताः पाशा विपाशाशच मकता: सयण ररमयः।

मकतः सरवभयादगभ एदय हि मारीच सवाहा ॥

। परसव वदना उपसथित होकर बहत विलमब होन पर दशचमकाक

थोडा उषण “कवाथ परथम मनरक दवारा जभिमननित कर गरभिणीको

पीनक लिए दगा । इसस गरभिणी ततकषणात‌ सखस परसव कर सकती

ह। किसी परकारकी यातनाका अनभव नही करगी ।

अ भ ह वमसतिमतय” इस मनतरस मतिकागहम बठकर जप"

करगा । इसम परसति अकलश परसव करनम समथ होगी । यह हमार

बहत परीकषित ह । डाकटरोक हाथो नयसत पवक कल-जनोकी लजजा-

शरणास सिर सपानस पव इस परकरियाका अवलमबन कर दखिय; धन ,

मौर लजजा दोनोकी ही रकषा होगी ।

~~~ -

मतवतसा दोष शानति.

जिस रमणीकी सनतान-परसवक एक पकष, एक मास अथवा एक

यषक वाद नषट हो जाती ह, उसी ना रीको मतवतसा कहा जाता ह ।

यथा-- - । गभसजातमातरण पकष मास च वतसर । पतरो तरियत वरषादौ यसयाः सा मतवतसिका ॥

--शरीदततातरयतततर

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मतवतसा दोष शानति] तातरिकगर [ २५द'

नारी क -मततरतसा ढोष उनपनन होन स साघना-रहसयवित‌ तानविको क. वारा उसकी शानति करानी होती ह । जिस-तित वयकतदारा करमा- नषठान करानपर कल परातिकी आदा नही ह. परनत परतयकायभ।गी होना होगा । मतवतसा दोषकी शानतिक किए इस रपस करिया करायग :--

अगहन अथवा जयषठ मासकी पणिमा तिथिम गहकषन-पकक एक

तरतन कलसी गगाजलस पण कर उकत गहम सथापित करगा । कलसीको शाखा, पलछव भीर नवरतन दवारा सञोभित कर सवणमदरा परदान करत

` हए षटकोण मणडलम ससथापित करगा । बाद एकागरचिततस इत कलतसीक ऊपर दवीकी पजा करगा । बाद पषप, धप, दीप, नव मतसय; मास मोर मदयादि दवारा भकति-सहित'बराहयी, माहशवरी, कौमारी वषणवी, वाराही, इनदराणी इन छ मातकाओकी षटशोणम धजा करगा । उरक बाद परणव (3) उचचारणपरवक दधि ओर अनन दारा सात पिणड सतत करगा । छ मातका गण क छ पिणड परदान कर सपतम पिणडको.

, पवितर सथान परर निकषप करगा । उसक बाद अपन गहम लौटकर

वाछिका भौर कमारीगणको परीतिपरवक भोजन कराकर दकषिणा परदान

कराएगा । इन सब कमारियो क सनतषट होनस ही दवता परसनन होत

ह । उसक बाद नदी म कलसी विसजन कर आतमीयो क निकट शम

ारथना करगा । निमनलिखित मनतरका उचचारण करक जप एव पजादि करना

होगा । यथा--"ॐ परम बरहम परमातमन अमकी-गरभ दीरधजीविसत कर कट सवाहा ।”

पजाक अनतम समाहित चिततस सकलपानयायी निदिषट सखयाम इस .मनतरका जप करगा ।

परतिवषभिद करयादीघजी विसत रभत‌ । `. . िदधियोगमिद सयात नानयथा शकरोदितम‌ ॥॥ `

--शरीदततातरयतनतर

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२५४] तातरिक [ परिकिषट

--शरतिवष इस परकार एक बार दवतारचना करनत भतवतसा -रमणीका पतर दीजीवी होता ह । यह िदधियोग 8करोकत ह, इसलिए नकोई भी अरविशवास नही करता ह

गहीतवा शभनकषतर तवपामारगसय मकम‌ । गहीतवा रकषणामल एकवणगवा पयः । | पौतवा सा विभरत गरभः दीरघजी विसतो भवत‌ ॥

। --भीदतत तरवतर शभनकषपरम अपामारगकी मल गौर लकषणामलका उनतोलन कर एक-

"वरणा यायक दधक साय पषण कर पान करगा । इसस सतरियोको गभ “रहता ह गौर वह गभरसथ पतर दीरघजीवी होता ह । इस ओौषधक सवन

, क व परवोकतमनवका जप करत हए परशचरण कर लना होगा । मतवतसा -दोष शानतिक लिए उपयकत साधकक निकटस कवचादि सगरह कर सकन "पर विकष लाभ होता ह। भारतवषम इस सतयका परतयकष बहतस

दयकतियोनि किया ह ।

बनधया मौर काकबनधया परतिकार जिस रमणीको किसी समय कोई सनतान-सनतति नही उतपनन हई

ह, उम बनधया कहत ह । पराचीन कालम दवादिदव महादवन दततातरय -मनिक निकट वनधया सवरियोकी सनतानादिक जनमनकी विधिका परकाकचन किया ह ।. हम भी उनही परीकषित उपायोको विवत करत ह । आशा करत ह. सनतानक अभावम जिस गहसथक गहम निराननद रहता ह- व -सदाचारखमपनन साधको दवारा इस विधिक भावलमबनदवारा शीघरही "तरमख दकर गहम आननदका परवाह कर सकगा ।

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बनधया परतिकार] तातरिकगर ~ [{ २५५

` परादा वकषका एक परतर किसी यरभवतौ रमणीक सतनक दषदवारा "पषण कर ऋतकालम पान करना होया । एक सपाह तक इस गौषधको -धरतयह पान कर शोक, उदवग, चिनतादि परितयाग करना होमा १ ङलक मबद पतिसग करनम उस नारीका गभ सचार हो जायगा । उकत -भौषधक सवन करनम `द, शालिघानयका अनन, भगकी दार परभति -रपाक दरवय अलप परिमाणम जाहारक रपम गरहण करना होया ।

नागककषरका चरण सदयोजात गोदरध सहित एक साह तक भरतवह‌ सवन करना होगा । गौषधिक सवनक अनतम त बौर दघ कना -चादिए उसक बाद सवामी सहवास करनस ही वह रमणी अभवती होगी । परथमोकत नियमोका अवदय पालन होना चादिष ।

“ॐ नमः सिदधिरपाय अमकी पतरवती कर कर सवाहा”

दस मनत साधक परशचरण करक उकत मौषघोम स जो कोई एक -मौषध उकत मनतरस एक सौ जाठवार मभिमनतित कर दनस अवर सक बाद पान करन सर मवशय ही फलकी पराति होगी । भनतरपत न करन स "करभ विघन भी होता ह ।

परव पतरबती या सा कवचिदधनभया भवद‌ यदि । काकबनधयात सा जञया चिकितसा ततर कथयत ॥

--भीदततातरयतन शलो रमणी एकवार एक-मातर पत परसव कर‌ ओर गभ नही धारण

नकरती ह, उसको काकबनधया कहत ह । इस काकबनधयाक दोषकी लानति .फाः उपाय तनतरशासवम वणित हजा ह । यथा-

` ` भपराजिता लता, भरक सहित उतोरकर भसक दघस पषण कमगत ` ए भक नवनीत सहित ऋतकाल रमणी खाएभी । अथवा रविवार

` -को पषय नकषतरम अशवगनधाका मक उतोर करक सक धक साय पषण -कर परतयह चार तोका परिमाणम एक सतताहतक खाएभी । उकषक वाद

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२५६] ` ` तातरिकग [ परिशिषट ` पतिखस करगी; सस सतरियोका काकबनधया दोष नषट होकर दीघजीवी-

होगा । यथा--

सपताहाललभत.गरभ काकवनधया चिरायषम‌ । -तनतरकोष-

. -सदाचारी साधक ॐ नमो शकतिरपाय असया गह पतर कर कर सवाहा ।* इपर मनतरत परथमतः परन रणका एक सौ आठबार मनतर जप

` „ कर ओषध पान करना होगा । उकत मनतर दवारा भौषध अभिमनवित- करनस फल छाभकी भा नही कौ जा सकती । ; ततकछासतरभ इस .-भरकारकी परकरिया बहत दिखाई दती ह । विषय `

` विसबारक भयत -ठमन मार करई एक की ही परीकषित भकरियाभोको उदधतत किया ह \ |

बालक-ससकार

` सवभाव-~नियम अथवा दव उपायस सनतान परात कर यटि वह‌.

दीषनीवी, नीरोग सचचरितर गौर पणडित न हो तो इसस पिता-माताक `

मनक कणटकी अवधि नही रहती । गसद‌ परदवारा माता-पिता नितय

भोगत ह । तसपशासतरन मानवक उस अभावको भी पण करनका

, ` उपाय कर दिया ह। पशरक जनम गरहण करनक बाद उस भरकरणका

अवलमबन कर जातपतरका ससकार काय समपनन करनस--पतर पणडित,

कवि, वागमी परभति नाना सदगण समपनन होता ह । नीच उसकीः

परहरिना.दी जती ह)

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चाछक-ससकार | तातरिकगर [ २५७

तरक जनम ठत ही--नाीचछदक परव--पिता सवणदधारा पवका

शशलावलोकन कर घरम जाकर गर, पचदवता मौर तारिणीकौ षजा -कर बसधारा (धाराहोम) दगा । उसक वाद पचाहति परदान कर कासय

{ शक ) पातरम समानाश छत, मध लकर उसक ऊपर “ट” इस मनतर

` छाात बार जप करना होगा। बादम दाहिन हाथस अनामिका गणदवारा इस त भौर मधको ककर ““ही आयरवरचो वक मषा

वदता त सदा शिशो” इस मनतरका पाठ करत-करत शिदक मखम दना

धोया । इत शियकी आयददधि. होती द । इसलिए इसका नाम भय- जनन ह । इस समय पिता मन ही मन शिशयका एक गस नाम रखगा

इसक वाद बालककी जिहवा तीन बार दकषिण हाय दारा मजित कर पिता सवत दरवा अथवा सवरणशलाका दवारा मध ककर वालककी जिह “वागभवकट‌” भरथात “लीदधी शरो दधी हसाः' इस मनवा पतयाकारस लिख दगा । -गसविघा होनस भयवा मापतय रहन स अपन दषट मनतरको लिख द । इसस बालक सतयवादी, जितनदरिय,

कवि बौर वागमी हो सकता ह) यथा-

कविरवागमी भवत‌ पतरः सतथवादी जितनदरियः । --- तनतरसार

वासतवम यह वागभवमनरवागीशतवपरदायक ह । यह मनव पर-

, इरण परवक म भयकतिक मसतकपर हाय दकर एक सौ आठबार जप

कलप वह मख कनि हो सकता ह भौर जिहधाम नयास करनपर वकता हसकताद।

बिहवाया नयषनादवि मकोऽपि सकबिभवत‌ 1 ~ गनधनतनध

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२५८ ] | तातरिकगर [परिशिषट

वयःपरापत महामख वयकति उपयकत रपम परयोग कर सकनपर जब मरखरवको दर कर सकवि होता ह तब लिशकी तो वात ही नही । इस. किए नवजात शिका वागभवकट मनारा ही ससकार करना करतवय ह । ससकारक अनत म नाडीचछदन होना आवशयक ह । किसी बाधाविषन.

वद नादीचछदक पव ही उकत अनषठानको न कर सकनस तीन रातम

समपनन किया जा सकता ह । पिताक दर दशम रहनस बारकक पितवय अथवा मातल भी उसको कर‌ सकत ह । अनयक दरारा नही होगा ।

उसक बाद कलधरमक अनसार गयारह दिन अथवा एक मास शभा*

शौचक वाद अवसथाक भनसार यथाशकति उपचारदवारा कलदवताकी पजा करगा ' बादम फिर शवतदरवा, कश अथवा सवणशलाकादारा

परवोकत वाग‌भव वालकक बषएम लिलि दना होगा । उसस बालक

वाकयोचारणम समथ होन मातर फवितव समपनन होता ह ।

बादम माताक करोड कशक ऊपर शिशयको रखकर बराहमणो सहित

- समवत होकर“ पतर कामयत कामजानामिहव हि, दवभयः पषणाति ` सरवमिदम‌ सजजननम शिवशानतिसताराय कशवभयसताराय रदर भयः उभाय शिवाय शिवयरस"""हस मनतर का पाठ करत-करत कश भौर सवण दवारा जलछठिटक कर शानति करनी होगी । बादम रिश को गोदम ककर -

बरहमा विषणः शिवो दरधा गणशो भासकरसतथा । शरो वाय कवररच. वरगोगितवहसपतिः। शिशोः चभ परकवनत रकषनत पथि सवदा ॥

इत रकषामन फा पाठ करना होगा । उसक बाद गोदम शिशको कछ दर बाहर काकर “हवी तचवकषदवहित परसताचछकर मचलवरन‌ पशययम‌ शरदः शत जीवयम‌ शरदः शणयाम शचरदः शतम‌" इस . मनरका पाठ करत-करत शिगको स दशन कराकर शहभ जावा होा । इस दिन बराहमको पजोपकरणः मननवसतरादि गौर दकषिणा दन की विधि ह ।

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-जवरादिकी लानति ] तातरिकगर } २५९ उकत काय गट, धरोहित, वथा तनताभिजञ बराहमणक दवारा समपनन

होना चाहिय । सदाचारी तानविक साधकक दवारा शानति काय करा -सकन पर मौर अचछा होगा; तनतरम भी वह‌ वयवसथा द-

शानति कयीदराककसय बराहमणः सह‌ साघकः ।। -मटरोगरताराकलप

इस नियम आयजनन जौर ससकार करनस बालक सरवपरकार

-महत पदवाचय होगा, उसम सनदह लश भी नही ह ।

जवरादि सब रोगो को शानति

नकषतरदोषस उतपनन अरथात‌ विपरीत नकषतरस जो रोगोतपनन होता ह, वह असाधय होता ह ओौर परायशः उसका परतिकार नही होता ह। विशष परकार कौ चिकितसा करन पर भी फलपरातति नही होती ह । तनवरािजञ सदावारसमपनन साधक दवारा आग कह जान वाक ई अनषठान कर सकत पर साधय होता द अरथात‌ परतिकार होता ह। नीच परकरियाओ को लखाजा रहा दह।

जवरगानतिक लिए परथमतः सकलप कर “आगसतय ऋटषिरनषटष‌

छनदः कालिका दवता जवरसय सदा शानतय विनियोगः" इस मनवक

रमस ऋषयादिनयास करगा । उसक बाद-

2 कवरसत मख रौदर ननदिमाननदिमावहन‌ । जवर मतयभय घोर जवर नापयत धरवम‌ ॥

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२६० } तातरिकगर [ परिशिषटः

इस भनतरको हजार अथवा दस हजार बार समाहित चिततस

जप कर आसरपतर दवारा होम करनस सवविध दषित जवर ततिएचय ही

. शानत होता ह ।

सथिरचितत होकर मन ही मन मनतराथ-चिनतनपवक भवति को सहायतास “ॐ शानत शानत सरवारिषटनारिनि सवाहा" इस मनतरस एक

लकष जप करन सवरोग शानत हो जात ह । इस मनतरका दस हजार बार जप कर सिदधि होन पर बादम करिया का अनषठान साधक समपनन

करगा । रोगो की शानतिक कायम पाथिव शिवलिगकी पजा अकति फलदायक ह ।

तमबरभरवक धयान गौर मनतरजपस सभीरोगो की शानति होती ह । मनतर यथा--2ॐ तमबर भरव हौ अमकसय सवशानति कर कर. ररदही ही ।'"

परथमतः उकत मनतर जननादि सयकत बलि साधक परदान करगा ।

वादम शवतदरवा, नानाविधि पषप मौर धपदीपादि विविध उपचारो

पजा कर उकत मनतरका यथाविधि हजार बार जप करगा । मनतरकः मधयम अमक सथल पर जिसका नाम उललख कर जप पजादि करगा

उसक सभी रोगकी शानति होती ह । तरिकोणकणडम वहि परजवलति कर उकत मनतरस दरवा, पषप ओौर तणडल सयकत घरतमिशित तिल ओर जीरकदवारा दशाग होम करनस शानति हआ करती ह । रोगीकक मसतक

भरवदव भमतधारा वषण करत ई--दिन-रात इस रपम चिनतनः

करनस शानति होती ह ।

शदधसफटिकसदधाश दवदव तरिलोचनम‌ ।

चनदरमणडलमधयसथ चनदरचड जटाधरम‌ । चतभज वषारढ भरव तमबरसजञकम‌ । शकमालाधर दकष वाम पसत सधाघटकम‌ ॥

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जवरादिकी गानति] तातरिकगर [ २६१

सरवावियवसयकत सरवाभिरणशरषितम‌ ।

उवतवसतरपरिधान नागहारविराजितम‌ ।1 *

नकषतरदोषस उतपनन जवरका परतिकार एक ढगस असाधय ह । एक-

मातर हारीतोकत विधानस उसका परतिकार हो सकता द । जरोतपततिक

नकषघरकी विवचना कर उस नकनतरोकत दरवय ओर मनतरहारा हौम करनस

भी परकार जवरकी शानति होती दह । किनत वह‌ अति विराट‌ वयापार

ह । उसस गरनथक ककवरकी बदधि हो जाएगी । हम सरवजवहरण

बलिकी परकरियाका विवरण परसतत कर रहरद। एकमातर उसक अन-

ानस जिस किसी नकषतरस उतपनन जवर होगा, उसकी लानति होगी ।

उसस गरनथकरता करमकरता दोनोको ही सविधा होगी । परणाखी इस

परकार की ह--

जवरगरसत वयकतिकी नवमषटि परिमिता तणडल ल बकिपिणड पाक

कर “कली ठठ भोभो जवर शण शछण हन हन गरज गजज

रकाटिक दाहिक वाहिक चातराहिक सासाहिक अदधमासिक वाषिक

दवािक मौहतिक नमिपिक अट अट भट भट ह फट‌ अमकसय जवर

हन हन मच मच भमया गचछ गचछ सवाहा ।'' इपत मनतरको कहकर

, परदान करना होगा ' परथमतः तणडल -चरणदरारा चारो ओर ह रिदराकत

एक जवरमति ( पततिका ) परसतत कर हरिदराक दवारा उसक अगको

रजित करगा भौर उसक चारो ओर हरिदराकत चार धवजदवारा शोभित

कर हरिदरास पण चार पटपातर सथ।पित करगा । वाद इस पततचिका-

को गनधपषपदवारा भषित कर वकति परदान करगा । वादम “'ॐ>अतयादि

अमक गोतरसय अमकसय उतपननजवरकषयाय तननकषतराय एष रचितपततलक-.

वलिनमः'” इस मनतरस इस परतिमतिको उततर दिशाम विसजित करगा ।

यथा-- -----------------------------

# सरल ससकत होनस अनवाद नहो दिया गया ।

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२६२]. `. तातरिकग [ परिकलिषट ` एतदहिनतर यम‌ करयात‌ जवररोगोपशानतयः

--कामरतनतनव बलि परदानक बाद नकषघरको आचमनीय परदामपरफ रोभीक हदणको

सपश कर “भो भो जवर शयण शयण हन हन यज गज ठकाहिक दवाहिक

छयाहिक चातराहिक सापताहिक मासिक अददमासतिक वारषिक. दनािक -मौहतिक नमिषिकम अट अट भट भट ह फट‌ यचरपाणि राजा ॐ शिरो सन कणठ मख वाह मख उदर म च कटिः मन उर मख भषया -गचछ भयण शण अमकसय जवर हन. हन ह एद‌” इस मनवका षाठ करत ` "करत उका शरीर भाजजन करगा । बादम दस मनतरको भरजजपतरम अलकतक दवारा छिखकर रोगीकी शिखाम बधन कर दगा ।

दस परककियास सरवभरकार दषित जवर विशय आसोगय होगा

मिव वाकयभ सनदह नी ।

आपददधार

भरतयह रात यथानियम आपददधार कवचका षाठ करनस सरवापिद शानति हो जाती' ह । _ परथमतः अगनयात करनयास कर बदकभरवका

“धयान करक परहषट ` चिततस उनका “ॐ ही बटकाय आपददधारगापय -कर कड अदकाय' ही" इस मनवरका जप करनस सरवापद विनषट होकर -कामय विषय परापत किया जा सकताह। इस कवचक पाठस सभी -शरकारक रोग, दषित जवर, भत-गरतादिका भय, चौरागनिका भय,

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अआपददधार | तातरिक शक ] सवर गरहभय, शतरभय, मा रोभयः; राज मय परभति विनषट होकर सव सौभागयका- उदय होता हः। जो वयकति. स कवचका पाठ करता ह, पाठ कराता ह, मथवा शरवण भौर पजन करता ह, उसका सरवापद शानति होकर सख; समपढ, माय, मा रोगय, दशवय भौर पतरपौतरादि कौ इदधिषावा ह। यरटातिक कि वह मनषयरदलभ इषटसिदधि परास कर सकता ह। नीक कन चको यथाविधउदधत करत ह! ससकता सरल होनक कारण उसका भनवादपरदतत नही हमा । इनम ही पाठका नियम, धयान, मनम, नयास मौर फलशरति की विवति ह; इकषो कारण हमन बर पथक‌ ढगस उस उदधत नही किया । कवच यथा--

कङासशिखरासीन ` दवदव जगदगरम‌ । सदकर परिपशरचछ पावती परमदचरम‌ः॥

शीषाववयवाच

भगवच‌ सरवधरमजञ सरवशासतरागमादिष । जपददधरण मनव सवसिदधिपरद नणाम‌ ॥ ` सरवषपाञव भताना हितारथम‌ वाञछित मया ।.. . विशषतसत राशञा व शानतिपषटिपरसाधनम‌ ॥ अगनयास-करनयास-बीजनयास-समनवितम‌ ।

वकतमहसि दवशा मम. हषविवदधनम‌ ॥ आोभगवानवाशच

ण, दवि महामनतरमापददधारहतकम‌ । . ` सवःपरसमन सवशनिवहणम‌ ॥

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तातरिकगर | १रि षट

. अपसमारादिरोगाणा जवरादीना . विदषतः ।

नारान समतिमातरण मनतरराजमिम परिय ॥ गरहराजभयानाच नाशन सखवदधनम‌ । सनहादरकषयामि त मनतर सवसारमिम शरिय ।।

-सरवकामाथद मनतर राजयभोगपरद नणाम‌ 1 आपददधरण मनतर वकषयामीति विहोषतः ॥ परणव परवमचचाय दवीपरणवमदधरत‌ ।

( }

वटकायति व पशचादापददधरणाय च ॥ करदरय ततः पशचादरटकाय पनः कषिपत‌ ।

दवीपरणवमधदतय मनतरोदधारमिम शरिय!

मनोदधारमिम दवि तरलोकयसयापि दरभम‌ ।

अपरकादयमिम मनतर सवशकतिसमनवितम‌ ॥

समरणादव मनतरसय भतपरतपिदाचकाः ।

विदरवनति भयारता व काकरदरादिव परजाः ॥

पठदवा पावठयदरापि पजयदवापि पसतकम‌ । नागनिचौरभय वापि , गरहराजभय तथा ॥ न च मारीभयनतसय सरवतर सखवान‌ भवत‌ । लागरारोगयमशवय पतरपौनादिसमपदः ॥। भवनति सतत तसय पसतकसयापि पजनात‌ ॥

भोपावतयवाच

य एषः भरवो नाम आपददधारको मतः 1 तवया च.कथितो दवः भरवः कतप उततमः #.

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धपिददार | ताति कगर [ २६५

. तसय `नारपहसताणि अयतानयरबदानि च । सारमदधत. तषा व नामाषटशतक वद ॥

यसत सकीरततयदतत‌ सवदषटनिवहणम‌ ।

सरवा कामानवापनोति साधकः सिदधिमव च ॥

शोभगवानवाच

शरण दवि परवकषयामि भरवसय महातमनः । -आपददधारकसयह नामाषटशतमततमम‌ ॥ सवपापहर पणय सवपिदिनिवारकम‌ ।

सरवकामाद दवि साधकाना सखावहम‌ ॥

दहागनयासनञचव पव करयात‌ समाहितः । , भरव मधनि विनयसय लरट भीमदशनम‌ ॥

अकषनोभताशचय नयसय वदन तीकषणदरशनम‌ ।

-कषतरद कणयोमधय कषतरपाल हदि नयसत‌ ॥ कषतराषय नाभिदय त कटया सरवाघनाशनम‌ ।

तरिनतरमरवोविनयसय जघयो रकतपाणिकम‌ ॥

. परादयोटवदवश* सवगि वटक नयसत‌ । „ एव नयासविधि कतवा तदननतरमततमम‌ ।

` पटदकमनाः सतोतर नमाषटरतसजञकम‌ ॥

नामाषटशतकसयापि छनदोऽनषटवदाहतम‌ ।

वहदारणयको नाम ऋषिशच परिकीततितः ।

दवता कथिता चह सदधिरवटकभरवः ॥

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२६६] ताननिकगर [ परिदिषट

सरवकामायसिदधयरथ विनियोगः परकी तितः । भरवो भतनाथशच भतातमा भतभावनः ॥ कषतरदः भतरपारशच कष जञः कषतरियो विरा । दमशानवासी मासाशी पराशची मखानतकरत‌ ॥1 रकतप पराणपः सिदधिः सिदधिदः सिदधिसवितः। करालः कालशमनः कलाकाषठातनः कविः ।\

तरिनतरो बहनतरशच तथा {पिगललोच नः । शरपाणिः खङगपाणिः ककाली धमरलोचनः ।। अभीररभरवो भीमो भतपो योगिनीपतिः । धनदो धनहारी च धनपः परतिभाववान‌ ॥ नागहारो नागकयो वयोमकरो कपारभत‌ । कालः कपालमाली च कमनीयः कलानिधिः ॥

तरिलोचनोजवलननतरसतिशिखी च तरिलोकपात‌ । तरिवततनयनो डिमभः शानतः शानतजनपरिमः ॥

बटको . बटकरशच खट‌वाखवरधारकः। भताधयकषः पञपतिरभिककः परिचारकः ॥ धरतो दिगमबरः शौरि हरिणः पाणडलोचनः । परशानतः शानतिदः शदधः शकरः परियबानधवः ॥

अषटमतिनिधीशशच जञानचसषसतमोमयः ।

अषटाधारः कलाधारः सपयकतः रादििखः ॥

भधरो भधराधीरो भपतिरभधरातमकः। कदधारधारी मणडी च नागयजञोपवीतवान‌ ॥